टेक्सास में हुई अद्भुत भ्रूण शल्यक्रिया का विश्लेषण

देखा जाए तो अतिप्राचीन युग में भी भारत की चिकित्सा प्रणाली का उद्देश्य वृहत रुप से व्यापक और सर्वज्ञान पद्धति से परिपूर्ण था। ‘चरक संहिता’ सिर्फ भारत में ही नहीं, अपितु विदेशों में भी इसका अध्ययन किया जा रहा है। इसी आधार पर आज भी पाश्चात्य चिकित्सक इस बात को सार्वजनिकतौर पर बोलने से भले ही कतराते हों, परन्तु आंतरिकरुप से स्वीकार करते हैं कि चरक-सुश्रुत के काल में भारतीय चिकित्सा विज्ञान आधुनिक पश्चिमी चिकित्सा विज्ञान से कहीं अधिक आगे था।

foetusप्राचीन भारतीय शल्यचिकित्‍सा विज्ञान के परिपेक्ष्य में हाल ही में टेक्सास में हुई अद्भुत भ्रूण शल्यक्रिया का विश्लेषण

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

 

इन दिनों सभी अमेरिका के टेक्सास में हुए एक अद्भुत ऑपरेशन को लेकर चकित हैं, जिसमें मार्गरेट नामक एक अमेरिकी महिला ने अपनी ही बेटी को दो बार जन्म दिया है। यह बात अपनेआप में हैरतअंगेज करने वाली लगती है। वास्तव में जब मारग्रेट की बेटी उनकी कोख में पल रही थी, तब अल्ट्रासाउंड से ज्ञात हुआ कि विकसित हो रहे भ्रूण की रीढ़ की हड्डी में नवजात बच्चों को आम तौर पर पाए जाने वाला सेकरोकोसिजल टेराटोमा नामक ट्यूमर हो गया है। यह नवजात शिशुओं में पाए जाने वाला सबसे आम लेकिन दुर्लभ ट्यूमर होता है। हांलाकि अभी भी इसका कारण अज्ञात है परन्तु यह देखा गया है कि यह ट्यूमर लड़कों की बजाए लड़कियों में चार गुना अधिक पाया जाता है। मार्गरेट अपनी जिस बेटी को जन्म देने जा रहीं थीं, वह भी इस खतरनाक रोग की शिकार हो चुकी थी।

मार्गरेट के अंदर विकसित हो रहे पूरे भ्रण को यह ट्यूमर बुरी तरह प्रभावित कर रहा था, ट्यूमर का आकार लगभग भ्रूण के बराबर हो गया था और विशेषरुप से इसके कारण उसके हृदय पर घातक असर पड़ सकता था। जैसे जैसे समय गुजर रहा था, ट्यूमर भी उसी गति से बढ़ रहा था। डॉक्टरों के सामने एक चुनौती थी कि भ्रूण से ट्यूमर को कैसे हटाया जाए, क्योंकि इसका एकमात्र उपाय यही शेष रह गया था कि कैसे भी करके भ्रूण को गर्भ से बाहर निकाला जाए और ट्यूमर को ऑपरेशन द्वारा अलग करके वापस उसे गर्भ में स्थापित कर दिया जाए। यह बात कहने और सुनने में जितनी सहज लग रही थी, प्रायोगिकतौर पर ऐसा कर पाना उतना ही जोखिम भरा था। अंततः मां की सहमति मिली और गर्भाशय को खोलकर 538 ग्राम वजन के भ्रूण को बाहर निकाला गया, फिर उसकी रीढ़ की हड्डी में पनप रहे ट्यूमर को ऑपरेशन द्वारा काटकर अलग किया गया। अंततः लगभग 5 घंटे चले सतत् शल्यकार्य के माध्यम से भ्रूण को पुनः गर्भाशय में सफलतापूर्वक स्थापित कर दिया गया। इस पूरी लम्बी प्रक्रिया के दौरान भ्रूण की सांसें रुकने लगीं थीं, तब कृत्रिम सांसों ने साथ दिया। सम्पूर्ण शल्यकार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न हो चुका था और भ्रूण एक बार फिर कोख में सांस लेने लगा था। उचित समय आने पर  शल्यक्रिया के माध्यम से 2 किलोग्राम की लिनली नामक प्यारी सी बच्ची को 6 जून, 2016 को दुबारा जन्म दिया गया।। आज लिनली पांच महिने की होने वाली है और स्वस्थ है।

यह पूरी घटना कितनी अद्भुत और चमत्कार से परिपूर्ण है। सभी इस शल्यक्रिया को आधुनिक चिकित्साविज्ञान की बहुत बड़ी उपलब्धि की तरह देख रहे हैं और निःसंदेह यह है भी। लेकिन क्या भारत के लिए यह कुछ अनोखा माना जा सकता हैॽ नहीं, क्योंकि भारत की पवित्र धरती ने सदियों पहले ऐसे चमत्कारों को देख लिया है। भारत का शल्यचिकित्सा इतिहास सुश्रुत संहिता के माध्यम से कहना चाहता है, कि वहां जो अब हो रहा है, भारत में सदियों पहले हो चुका है। भारत में आचार्य सुश्रुत को भारतीय चिकित्सा पद्धति में शल्य चिकित्सा का पितामह और सुश्रुत संहिता का प्रणेता माना गया है। उस समय जब विश्व में स्वास्थ्य जैसे किसी विषय के प्रति कोई सोच या अभिज्ञान भी नही था तब आचार्य सुश्रुत शल्य चिकित्सा के माध्यम से लोगो के रोगों का निवारण किया करते थे। सुश्रुत संहिता से स्पष्ट होता है कि उस समय आचार्य सुश्रुत शल्य क्रिया के लिए लगभग 125 तरह के शल्य उपकरणों का प्रयोग करते थे और उन्होंने 300 प्रकार की शल्य प्रक्रियाओं का भी अन्वेषण किया था। अस्तु, भारत में आचार्य सुश्रुत को शल्‍य चिकित्‍सा का जनक माना जाता है।

अमेरिका के टेक्सास में हुए जिस भ्रूण शल्यक्रिया को सुनकर विश्व दांतों तले उंगली दबा रहा है, वैसी ही कुछ मिलती जुलती शल्यक्रिया भारतीय वेदिक साहित्य में विष्णु पुराण और महाभारत में मिलती है, जो ऋषि भरद्वाज के जन्म से संबंधित है।  इस पौराणिक कथा के अनुसार ऋषि उत्थय की पत्नी ममाता जब गर्भवती थीं तो उनके देवर बृहस्पति ने उनके साथ संसर्ग किया। गर्भ में पहले से पल रहे भ्रूण, जो कालांतर में दीर्घात्मा नामक ऋषि बने, ने गर्भाशय के अंदर आपत्ति की और संसर्ग से बने नए भ्रूण को पैर से बाहर धकेल दिया। चूँकि वह बाहर आया भ्रूण बृहस्पति का अंश था इसलिए वे इस अपमान से अत्यधिक क्रोधित हुए और ऋषि दीर्घात्मा बनने वाले भ्रूण को श्राप देकर अंधा कर दिया। पैर से बाहर धकेला गया दूसरा भ्रूण जीवित बच गया था,  जिसे बाद में राजा पौरव ने अपना लिया था। राजा पौरव द्वारा पाला गया ममाता-बृहस्पति का यह दूसरा भ्रूण आगे जाकर ऋषि भरद्वाज बना। ऋषि भरद्वाज ने पृथ्वी पर रोगों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि होने पर इंद्र से चिकित्सा विज्ञान विषयक ज्ञान प्राप्त किया था। बाद में ऋषि भरद्वाज ने इसी ज्ञान को अपने शिष्य आत्रेय पुनर्वसु को प्रदान किया। कालांतर में चिकित्साशास्त्र का यह ज्ञान उनके छः शिष्यों अग्निवेश, भेल, जतूकर्ण, पाराशर, हरित और क्षारपाणि ने ग्रहण किया।

प्राचीन भारतीय चिकित्‍सा विज्ञान के ग्रंथों से स्पष्ट होता है कि लगभग 2600 वर्ष पूर्व आचार्य सुश्रुत और उनके शिष्य शल्‍य क्रिया द्वारा अनेक रोगों का उपचार निश्‍चेतक का उपयोग करके करते थे। जीवविज्ञान की प्रत्येक शाखा जैसे शारीरिकी, भ्रूण विज्ञान, पाचन, चयापचय, शरीर क्रिया विज्ञान,  आनुवांशिकी और प्रतिरक्षा विज्ञान आदि उस समय भलीभांति समझे जा चुके थे। आज के समय में टेक्सास में हुआ भ्रूण शल्यक्रिया का यह अद्भुत ऑपरेशन कहीं न कहीं भारत को ऐतरेय उपनिषद की ओर ले जाता है। वास्तव में ऐतरेय उपनिषद एक शुक्ल ऋग्वेदीय उपनिषद है। इसमें आत्मज्ञान और भूत वैराग्य की सिद्धि के लिये जीव की तीन अवस्थाओं का  वर्णन किया गया है। जिस तरह टेक्सास भ्रूण शल्यक्रिया से लिनली के दो बार जन्म लेने की बात स्पष्ट हुई है, ठीक इसी तरह से ऐतरेय उपनिषद में जीव के तीन जन्म माने गये हैं, जिनमें पहली बार वीर्य रूप से माता के गर्भाशय में प्रवेश करना, दूसरी बार संतान रूप से उत्पन्न होना और तीसरी बार पिता के मृत्यु को प्राप्त होने पर पुनः जन्म ग्रहण करना। ऐतरेय उपनिषद में ही भ्रूण संरचना की विस्तृत जानकारी भी मिलती है कि कैसे भ्रूण के अंग गर्भाशय में किस क्रम में विकसित होते हैं। आधुनिक चिकित्साशास्त्र की मान्यता के अनुसार ही ऐतरेय उपनिषद में वर्णित क्रम भी मेल खाता है, कि पहले भ्रूण का मुंह बनता है, फिर नाक, फिर आंखें, फिर कान, फिर हृदय, फिर नाभि और अंत में लिंग बनता है।

देखा जाए तो अतिप्राचीन युग में भी भारत की चिकित्सा प्रणाली का उद्देश्य वृहत रुप से व्यापक और सर्वज्ञान पद्धति से परिपूर्ण था।  ‘चरक संहिता’ सिर्फ भारत में ही नहीं, अपितु विदेशों में भी इसका अध्ययन किया जा रहा है।  इसी आधार पर आज भी पाश्चात्य चिकित्सक इस बात को सार्वजनिकतौर पर बोलने से भले ही कतराते हों, परन्तु आंतरिकरुप से स्वीकार करते हैं कि चरक-सुश्रुत के काल में भारतीय चिकित्सा विज्ञान आधुनिक पश्चिमी चिकित्सा विज्ञान से कहीं अधिक आगे था। आज हम दीर्घात्मा और भरद्वाज ऋषियों की गाथाओं को विस्मृत करते जा रहे हैं और टेक्सास में हुए अद्भुत ऑपरेशन की जयजयकार कर रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि सदियों पुराने जयघोष को हमारे युवा एक बार फिर गुँजा दें समस्त ब्रह्माण्ड में और विश्व देख सके कि आधुनिक विज्ञान की हर उपलब्धि की जड़ें भारत में आकर ठहरती हैं।

Leave a Reply

%d bloggers like this: