लेखक परिचय

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

लोकेन्द्र सिंह राजपूत

युवा साहित्यकार लोकेन्द्र सिंह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पदस्थ हैं। वे स्वदेश ग्वालियर, दैनिक भास्कर, पत्रिका और नईदुनिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। देशभर के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में समसाययिक विषयों पर आलेख, कहानी, कविता और यात्रा वृतांत प्रकाशित। उनके राजनीतिक आलेखों का संग्रह 'देश कठपुतलियों के हाथ में' प्रकाशित हो चुका है।

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– लोकेन्द्र सिंह

कवि के कोमल अंतस् से निकलती हैं कविताएं। इसलिए कविताओं में यह शक्ति होती है कि वह पढऩे-सुनने वाले से हृदय में बिना अवरोध उतर जाती हैं। कवि के हृदय से पाठक-श्रोता के हृदय तक की यात्रा पूर्ण करना ही मेरी दृष्टि में श्रेष्ठ काव्य की पहचान है। युवा कवि सुदर्शन व्यास के प्रथम काव्य संग्रह ‘रिश्तों की बूंदें’में ऐसी ही निर्मल एवं सरल कविताएं हैं। उनकी कविताओं में युवा हृदय की धड़कन है, रक्त में ज्वार है, भावनाओं में संवेदनाएं हैं। सुदर्शन की कविताओं में अपने समाज के प्रति चेतना है, सरोकार है और सकारात्मक दृष्टिकोण है। उनकी कविताओं में दायित्वबोध भी स्पष्ट दिखता है। उनकी तमाम कविताओं में रिश्तों की सौंधी सुगंध उसी तरह व्याप्त है, जैसे कि पहली बारिश की बूंदें धरती को छूती हैं, तब उठती है- सौंधी सुगंध। उनके इस काव्य संग्रह की प्रतिनिधि कविता ‘रिश्तों की बूंदें’ के साथ ही ‘अनमोल रिश्ते’ और ‘मुंह बोले रिश्ते’ सहित अन्य कविताओं में भी रिश्तों गर्माहट को महसूस किया जा सकता है। कुल जमा एक सौ साठ पन्नों में समृद्ध सुदर्शन का काव्य संग्रह चार हिस्सों में विभक्त है। पहले हिस्से में श्रृंगार से ओत-प्रोत कविताएं हैं, दूसरे हिस्से में सामाजिक संदेश देती कविताएं शामिल हैं। वहीं, तीसरे और चौथे हिस्से में गीत और गज़ल को शामिल किया गया है। काव्य के व्याकरण की कसौटी पर यह कविताएं कितनी खरी उतरती हैं, वह आलोचक तय करेंगे, लेकिन भाव की कसौटी पर कविताएं चौबीस कैरेट खरी हैं। कविताओं में भाव का प्रवाह ऐसा है कि पढऩे-सुनने वाला स्वत: ही उनके साथ बहता है। सुदर्शन की कविताओं पर किसी प्रकार की ‘बन्दिशें’ नहीं हैं। उन्होंने लिखा भी है- ‘बन्दिशें भाषा की होती हैं/ एहसासों की नहीं। बन्दिशें होती हैं शब्दों में/ भावनाओं में नहीं।’ उनकी पहली कृति में एहसास/भाव बिना किसी बन्दिश के अविरल बहे हैं, सदानीरा की तरह।

            चूँकि कवि का मन अत्यंत युवा है। इसलिए यह स्वाभाविक है कि प्रेम पर लिखी गईं कविताओं को पढ़ कर कोई भी उन्हें कवि के निजी जीवन का अनुभव मान सकता है। किंतु, कवि ने ‘अपनी बात’ में ही स्पष्ट घोषित कर दिया है कि ‘यह कविताएं उन कल्पनाओं पर आधारित हैं, जो रिश्तों में अकसर देखी जाती हैं।’यह तो सर्वविधित है कि अच्छा कवि हो या लेखक, उसे परकाया प्रवेश की कला आती है। दूसरे के मन में उतर कर उसके भावों को अनुभूत करना कवि से अच्छा कौन जानता है। हालाँकि, दूसरों के जज़्बातों को छोडि़ए, लोग अपने ही जज़्बात ठीक से बयां नहीं कर पाते। यह कठिनाई क्यों आती है, उसको सुदर्शन एक जगह लिखते हैं-‘बड़ा मुश्किल होता है/ जज़्बातों को पन्नों पर उतारना/ हर दर्द महसूस/ करना पड़ता है/ लिखने से पहले।’ दूसरों का दर्द महसूस कर उसे कविता के रूप में अभिव्यक्त करने का सामथ्र्य ईश्वर ने केवल कवि हृदय को दिया है। हम जानते हैं कि मादा क्रोंच पक्षी के विलाप को सुनकर जब ऋषि वाल्मीकि को प्रेमी नर पक्षी की हत्या से उपजे दु:ख की अनुभूति हुई तब उनके मुंह से जो श्लोक फूटा, वही काव्य का आधार बना और ऋषि वाल्मीकि आदिकवि। बहरहाल, युवा कवि सुदर्शन ने प्रेम को जिस तरह व्यक्त किया है, वह प्रेम का वास्तविक और उदात्त रूप है। अपनी कविता ‘सौदा’ में वह बताते हैं- ‘तुम्हें क्या लगता है कि/ महज दो जिस्मों का मिलन ही/ प्रेम का प्रतिमान होता है।’ वह अपनी इसी कविता में प्रेम के पूज्य प्रतीकों का संदर्भ देते हुए प्रेम की पराकाष्ठा को अभिव्यक्त करते हैं-‘यदि प्रेम शरीर से ही होता तो/ मीरा महलों को छोड़/ पागलों-सी/ गलियों में न भटकती।’ सिनेमा की रील लाइफ से निकल कर जो प्रेम आज रीयल लाइफ में दिख रहा है, वह बहुत आसान दिखता है। किंतु, प्रेम आसान नहीं है। दुनिया का सबसे कठिन कार्य कोई है तो वह प्रेम ही है। जीवन की सुंदरतम अभिव्यक्ति और अनुभूति आसान कैसे हो सकती है? श्रेष्ठ रचना परिश्रम माँगती है। समर्पण चाहती है। यकीनन प्रेम प्रकृति की सबसे सुंदर अनुभूति है, किंतु प्रेम पाने और करने के लिए क्या-क्या दाँव पर लगता है, इसे कवि ने कुछ इस तरह कहा है- ‘जानती हो/ कितना आसान होता है/ यह कहना कि/ मुझे प्यार हो गया है/ तुमसे। लेकिन,अकसर/ इस बात का/ अंदाजा नहीं होता कि/ अपनी साँसें भी/ गिरवी रखना पड़ती हैं।’ कवि सुदर्शन प्रकृति के विभिन्न तत्वों-अंगों से ‘प्रेम का भीना अहसास’ लेते हैं और अपनी एक कविता ‘कल्पना’ में प्रेयसी के आगमन की स्थिति को वर्णित करते हैं।

            स्वाभाविक तौर पर युवा कवि से श्रृंगार रस की कविताओं के साथ ऐसी कविताओं की भी अपेक्षा रहती है, जिसमें समाज के प्रति उसका चिंतन दिखाई दे। सुदर्शन की कविताओं को जब हम पढ़ते हैं तब ध्यान आता है कि अपने आस-पास विषबेल की तरह पनप रहीं अव्यवस्थाओं पर कवि की पैनी नजर है। वह अपनी कविताओं के माध्यम से अपेक्षित हस्तक्षेप भी करते दीख पड़ते हैं। भौतिकवाद की चमक से दिग्भ्रमित लोगों को आईना दिखाती है, उनकी कविता ‘क्या अपेक्षा करें’। अपने आस-पास होते अत्याचार, अनाचार और पापाचार पर मौन धारण किए एवं हाथ बांध कर खड़े लोगों को उन्होंने उचित ही कठघरे में खड़ा कर सवाल किए हैं- ‘जिंदा लाशों के इस/ प्रगतिशील और/ सभ्य समाज से/ क्या अपेक्षा की जा सकती है… क्या अपेक्षा करें झूठे बहरों/ अंधों और गूंगों से।’ कवि सिर्फ कायर सज्जन शक्ति को ही नहीं ललकार रहा है, बल्कि वह अपनी एक कविता में शक्ति का दुरुपयोग करने वाले सामर्थ्यवान लोगों को भी समझाइश दे रहा है- हद में रहो। सूरज, मेघ, नदी और समुद्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने संकेत किया है कि जिस तरह प्रकृति हद में रह कर सृजनशीलता का संदेश देती है, वैसे ही सामर्थ्यवान मनुष्यों को अपनी हद में रह कर अपनी शक्ति का उपयोग रचनात्मक कार्यों में करना चाहिए। प्रकृति के साथ सामंजस्य कर चलने की सीख भी इस कविता के माध्यम से दी गई है।

            कवि सुदर्शन ‘बेटियों’ को लेकर भी बहुत संजीदा दिखाई देते हैं। हमारे देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने एक भाषण में कहा था कि माता-पिता को बेटियों की अपेक्षा अपने बेटों से अधिक पूछताछ करनी चाहिए- कहाँ जा रहे हैं, कहाँ से आ रहे हैं? बेटियों को सुरक्षित वातावरण देने के लिए बेटों को अधिक जिम्मेदार बनाने की आवश्यकता है। यही बात कवि सुदर्शन ने अपनी कविता ‘अच्छे घर की लड़कियां’ में कही है। उन्होंने कटाक्ष किया है कि जो बातें लड़कियों के लिए गलत हैं, वह लड़कों के लिए अच्छी कैसे हो सकती हैं? समाज को इस दिशा में विमर्श करना चाहिए। यह कविता उन नारिवादियों को भी पढऩी चाहिए, जो उन सब बुराइयों को अपनाना नारी-सशक्तिकरण मानती हैं, जो लड़कों में व्याप्त हैं। ‘लव यू पापा’ सहित दूसरी कविताओं में पिता और पुत्री के रिश्ते को भी सुदर्शन ने बहुत अच्छे से बयां किया है। ‘नवसंवत्सर’ पर उनकी कविता पढ़ कर यह ध्यान आता है कि कवि का अपनी संस्कृति से गहरा और आत्मीय जुड़ाव है। वह अपनी थाती पर गर्व करते हैं। हालाँकि, अपने देश, संस्कृति और समाज के प्रति उनका जो समर्पण है, वह अन्य कविताओं में भी दिखाई देता है। कविता में अपनी बात प्रभावपूर्ण ढंग से कहने के लिए जब वह संदर्भ चुनते हैं, तो उनका अध्ययन भी झलकता है और संस्कृति के प्रति सरोकार भी दिखाई देते हैं।

            कविताएं कवि की भावभूमि की उर्वरता को भी प्रकट करती हैं। युवा कवि सुदर्शन की 91 कविताओं से होकर जब गुजरते हैं, तो उनकी उर्वरा क्षमता का अनुमान सहज लग ही जाता है। उनका प्रथम काव्य संग्रह उम्मीदों के बादलों की तरह है, जो नंदन वन को सींचेगा। उन्होंने अपने पहले काव्य संग्रह ‘रिश्तों की बूंदें’से साहित्य के द्वार पर स्नेहिल दस्तक दी है। साहित्य जगत सहर्ष और प्रोत्साहन के साथ उनका स्वागत करेगा, ऐसी उम्मीद है। मेरी ओर से अनेक शुभकामनाओं सहित… उनकी ‘रिश्तों की बूंदें’ का आत्मीय स्वागत है।

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