लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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डॉ. मधुसूदन

(एक) प्रवेश: 
विमान छूटने में विलम्ब घोषित हुआ, तो कुछ अवकाश मिल गया।और,  मुझे छोडने  आया युवा हर्षित हो उठा। मैं, पहले, कारण समझ नहीं पा रहा था; पर, विलम्ब के कारण वार्तालाप का जो समय मिला, उसपर युवा हर्षित था। ताडने में मुझे विशेष समय ना लगा। उसके कुछ प्रश्न थे; विशेष कर जापानी भाषा द्वारा जापान की उन्नति को लेकर। जिसका उल्लेख मैं ने वहाँ की प्रस्तुति में किया था।  मैं विलम्ब से चिन्तित अवश्य था। चल-भाष ( मोबाइल फोन )से घर पर विलम्ब का संदेश छोड युवा के प्रश्नों के उत्तर देने सिद्ध हुआ।

युवा अपने हिन्दी प्रेम के कारण मुझे छोडने आया था, काफी प्रोत्साहित था, और उत्सुक भी।

उसके प्रश्न थे, उत्तर जानना चाहता था। इस लिए हर्षित था, कि, प्रश्नोत्तरों से शंका समाधान हो पाएगा।

 

अचरज था मुझे भी, एक दूसरे बिंदुपर।  जहाँ पिता, हिन्दी के प्रति कुछ उदासीन दिखे थे, वहाँ  यह बेटा उत्सुक था।

यह हमारी पीढी की ही राम कहानी है।

’हम है गुलामी के रखवाले।
और, ये बालक, मुक्ति के उजाले॥’
पर, ऐसा हमें ही क्यों होता है? क्यों जापान को नहीं होता?

 

पर, जापान को लेकर अनेक प्रश्न थे उसके।  पूछे हुए प्रश्नों के विस्तृत उत्तर पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं।

बातचीत में जिसका संकेत ही दे पाया, उसे भी विस्तृत लिखित रूप दे सका हूँ।

युवा ने मेरी प्रस्तुति भी  सुनी थी। उसे एक गुजराती की हिन्दी पर भी बडा अचरज था। शायद इसी लिए उत्सुक था।

 

यदि आप भी विषय समझ पाते हैं, तो दो-तीन  मित्रों को अवश्य समझाइए। और नहीं समझ पाते, तो मुझे पूछिए; उत्तर देने का प्रयास करूँगा। भारत का हित सामने रखकर प्रश्न पूछ सकते हैं।

 

( दो) जापानी भाषा क्यों कठिन मानी जाती है?

 

(२) उत्तर: उदाहरण के लिए, एक जापानी परिच्छेद देता हूँ। बाद में उसका उच्चारण ( जो देवनागरी में दिया है।)
जापानी आप पढ नहीं पाएंगे। पर कठिनाइका  अनुमान तो हो ही जाएगा।एक हिन्दी परिच्छेद का यह जापानी अनुवाद है।
उदाहरण देखिए।
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ヒンディー語の精神で私たちの国のさまざまな部分をリンクします 。国籍の指標です。自由は使用され、 そして最も話し言葉でました。我々が求められた場合、 それが最大の能力が国語で保持する、です。だから、 それはそのヒンディー語否定できない。
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जानता हूँ पाठक जापानी नहीं पढ सकता; पर उसकी कठिन लिपि उदाहरण के लिए प्रस्तुत की है।

पहले, यह,  जापानी परिच्छेद ==>आगे उसका हिन्दी अर्थ   दिया है।

 

प्रश्न (३)मूल हिन्दी परिच्छेद क्या था?
उत्तर:

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*हिन्दी हमारे देश के विभिन्न प्रदेशों को भावना से जोडती है।  राष्ट्रीयता की परिचायक है। स्वतंत्रता संग्राम में प्रयुक्त थी, और सर्वाधिक बोली जानेवाली भाषा है। यदि हमें पूछा जाए, कि, कौनसी भाषा राष्ट्रभाषा की सर्वाधिक योग्यता रखती है; तो, निर्विवाद वह हिन्दी ही है।
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प्रश्न (४) उसका रोमन लिपि में रूपांतर दीजिए:
hindee hamaare desh ke vibhinn pradeshon ko bhaavana se jodatee hai.  raashtreeyata kee parichaayak hai. svatantrata sangraam mein prayukt thee, aur sarvaadhik bolee jaanevaalee bhaasha hai. yadi hamen poochha jae, ki, kaunasee bhaasha raashtrabhaasha kee sarvaadhik yogyata rakhatee hai; to, nirvivaad vah hindee hee hai.
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प्रश्न (५) लिखित जापानी, रोमन लिपि में कैसे बोली या (पढी) जाएगी? 
Hindī-go no seishin de watashitachi no kuni no samazamana bubun o rinku shimasu. Kokuseki no shihyōdesu. Jiyū wa shiyō sa re, soshite mottomo hanashikotobademashita. Wareware ga motome rareta baai, sore ga saidai no nōryoku ga kokugo de hoji suru,desu. Dakara, sore wa sono hindī-go hiteidekinai.

प्रश्न (६) देव नागरीमें जापानी उच्चारण कैसे होंगे?
उत्तर(६) ये बात हमारे लिए सरलाति-सरल होगी। सारे विश्व में किसी और लिपि के लिए भी इतनी सरल नहीं होगी।

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हिन्दी -गो नो सैशिन दे वाटाशिताची नो कुनी नो सामाझामाना बुबुन ओ रिंकु शिमासु.
कोकुसेकी नो शिह्योदेसु. जियु वा शियो सा रे, सोषिते मोट्टोमो हानाशिकोटोबाडेमाशिटा.
वारेवारे गा मोटोमे रारेटा बाई, सोरे गा साईदाई नो नोर्योकु गा कोकुगो डे होजी सुरु, देसु.
डाकारा, सोरे वा सोनो हिन्दी-गो हितैदिकानाई.
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(७) कुछ विचार अपेक्षित है।

(१)जापानी लिपि चित्र-भाव-चित्र- लिपि है।
(२)  लिखा जाता है, चित्र।
(३) पर पढा जाता है उच्चारण।
(४) उच्चारण अमर नहीं हो सकता।पर  चित्र (भाव चित्र) अमर बना हुआ है।
(५) पर, चित्र से भी -भाव चित्र होने के कारण, किसका  चित्र है; यह परम्परा से ही जानना पडता है।
उच्चारण आपको किसी व्यक्ति से सुनकर ही जानना पडेगा।

(६)और, चित्रों में काल भी दर्शाया नहीं जाता। उसे संदर्भ से जानना पडता है।
(७) घिसते घिसते, भाव-चित्र भी सरलता से लिखने के कारण अलग और क्लिष्ट हो गए हैं।
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पर ऐसी कठिनाइ झेलकर भी, जापान ने उन्नति की है। और जापानी भाषा के माध्यम से उन्नति की है।

ये, जापानी भाषा कठिनातिकठिन गुट की भाषा मानी जाती है। भावचित्रों की भाषा है। अब सोचिए, कि, हम देवनागरी वाले कितने भाग्यवान हैं?

 

(८) पर जापान ने ऐसी कठिन लिपि और भाषा के साथ कैसे उन्नति की?

 

जापान ने अपने हजारों बुद्धिमान युवकों को जर्मनी, फ्रान्स, अमरिका, हॉलण्ड, इंग्लण्ड और रूस (?) इत्यादि उन्नत देशों में भेजकर शिक्षित किया और वापस आनेपर अनुवादके काम में लगाया।  इन सारी भाषाओं के शोधपत्रों का, जापानी भाषा में अनुवाद किया जाता है। और तीन सप्ताह के अंदर छापकर मूल कीमत से भी सस्ते मूल्यपर  वितरित किया जाता है।जापान में अनुवाद का ही उद्योग के स्तर पर काम होता है।
सारी शोध पत्रिकाएँ अलग अलग प्रकरणों के पन्नो को फाडकर अलग की जाती है।फिर, एक एक प्रकरण का अनुवाद एक सप्ताह के अंदर एक-दो विद्वान करते है। ऐसे सारे प्रकरण अलग अलग विद्वानों को बाँटे जाते हैं। दूसरे सप्ताह में संपादन। और तीसरे सप्ताह में मुद्रण, और वितरण।

 

जापान सारा सट्टा केवल अंग्रेज़ी पर नहीं लगाता। और जापानी माध्यम में ही पढाता है। इस के फलस्वरूप अपने युवाओं के अमूल्य पढाइ के वर्ष बचाता है; उतने ही वर्ष उनके उत्पादन में  भी बढ जाते हैं।

युवा जल्दी ही उत्पादन के काम में नियुक्त हो जाता है।

शिक्षा का व्यय बचता है; अनुवाद द्वारा छः-सात गुना लाभ प्राप्त होता है। जापानी को प्रोत्साहित कर, अपनी राष्ट्रीय अस्मिता की धरोहर संजोता है।और  आगे बढता है। ऐसे, जापान में क्षमता ही आरक्षित है। उत्पादन क्षमता के अनुसार वैयक्तिक उन्नति होती है।

 

हम भी हमारी आवश्यकता के अनुसार परदेशी भाषाएँ पढें, गुलाम की भाँति नहीं। हमारे देश की आवश्यकताओं के अनुपात में अन्यान्य भाषाएँ सीखें। हम देश का अमूल्य धन जो युवा हैं; उसका उचित उपयोग करें।

 

{यह अंतिम परिच्छेद जानकारों के वार्तालाप पर और कुछ अनुमान पर आधारित है। जापानी पढने में मैं Translator का उपयोग करता हूँ।}

 

 

आप अपने प्रश्न पूछ सकते हैं।

 

 

5 Responses to “भाषा का प्रश्न और  जापान का अनुकरणीय उदाहरण (१) ”

  1. मनोज ज्वाला

    मनोज ज्वाला

    बहुत ज्ञानबर्द्धक और प्रेरक यह आलेख अपने देश के सत्ताधीशों की आंखों में उंजली डाल कर कैसे दिखाउं , सोच रहा हूं । अपने मोदी जी भी तो बने-बनाए अंग्रेजी रास्ते पर ही चल रहे हैं जी । किससे उम्मीद की जाए ?
    आपको सादर प्रणाम !

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      मनोज जी —धन्यवाद. मोदी जी भी यदि इस की सच्चाई से प्रभावित हो जाए; तो कठिन नहीं मानता. हमे भारत की दृष्टि से पूरा अध्ययन और सिद्धता करनी होगी.

      मोदी जी अवश्य भारत की भलाई की दिशा में ही चरण बढाएंगे. उन्हें सच्चाई बताकर प्रभावित करना होगा.
      इसे (Critical Path Method ) –हिन्दी में *निर्णायक पथ पद्धति* जो बडे बडे प्रकल्पों में प्रायोजित की जाती है; उसके अनुसार क्रियान्वित करना होंगी. मैं ने University में इसे पढाया भी है, और परामर्शक के नाते भी प्रयोजा है। आप एक और आलेख पर दृष्टिपात कर लें, वो है *माध्यम के बदलाव का प्रबंधन*–कुछ महिनो पहले प्रवक्ता में ही डाला है. आपका सहयोग अवश्य काम आएगा.
      बहुत बहुत धन्यवाद. मधुसूदन

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      https://www.pravakta.com/managing-change-through-education/
      मनोज जी इस आलेख को देखने पर क्रियान्वयन के अंग कुछ स्पष्ट होंगे.

      पूरी (तैयारी ) सिद्धता के साथ ऐसा बदलाव होता है. सफलता भी तुरंत प्रमाणित नहीं होती. पर Critical Path Method से सारा विना विघ्न (न्यूनमात्र विघ्न) सफल हो सकता है. आप को निर्देशित आलेख देखने पर बहुत कुछ जानकारी प्राप्त होगी.
      इस की सूक्ष्मताएँ बिलकुल सारी समस्याएँ, और अलग अलग अंशों की अवधियाँ भी पता करा देती है. —यह कोर्स ४५ घण्टे (३ क्रेडिट ) का होता है. मैं इस विषय का निष्णात (क्षमा करें) माना जाता हूँ। यथा क्षमता पूरी सहायता, करने तत्पर हूँ।
      धन्यवाद. आप बात आगे बढाइए. —मधुसूदन

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  2. डॉ. मधुसूदन

    शकुन्तला बहादुर द्वारा

    आदरणीय मधु भाई,
    आपका आलेख आँखों पर से अंग्रेज़ी की महत्ता का भ्रमपूर्ण आवरण हटाकर भारत के उत्कर्ष हेतु विचारने के लिये प्रेरित करता है।बड़े ही
    परिश्रम से आपने अन्य लिपियों और भाषाओं का उदाहरण देते हुए
    हिन्दी/ देवनागरी लिपि की सरलता और सार्थकता को प्रमाणित कर दिया है । हमें जापान से ये बातें सीखनी चाहिये , जो निश्चय ही भारत
    के विकास और उन्नति में सहायक होंगी ।।
    सादर एवं साभार,
    शकुन बहन

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