1857 की क्रांति की 160वीं जयंती

कई इतिहासकारों ने यह भी कहा है कि इस युद्ध में पूरा देश शामिल नहीं था। इसलिए इसे राष्ट्रीय युद्ध की संज्ञा देना अनुचित होगा। तो प्रश्न उठता है कि किसी स्थान विशेष में किया गया युद्ध राष्ट्रीय क्यों नहीं हो सकता। इस पर यदि गहराई से विचार करें तो बीसवीं शताब्दी के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी ऐसे अनेक आंदोलन हुए जो किसी स्थान विशेष तक ही सीमित रह गए। यहां तक कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की तीव्रता भी सारे देश में एक समान नहीं थी।

डॉ शैलेन्द्र कुमार

आज ही के दिन ठीक एक सौ साठ साल पहले यानी 10 मई  1857 को  जिस ऐतिहासिक क्रांति  का  सूत्रपात मेरठ से  हुआ  वह  कई  अर्थों  में  विलक्षण  थी । क्रांति का क्षेत्र व्यापक था और इसका प्रभाव लम्बे समय तक महसूस किया गया। पंजाब और बंगाल को छोड़कर लगभग पूरा उत्तर भारत इस क्रांति का प्रभाव क्षेत्र था। मई में शुरू हुई क्रांति सितम्बर में जाकर ही अंग्रेजी हुकूमत द्वारा पूरी तरह दबाई जा सकी। कुछ  समय  के  लिए  आन्दोलन  के  मुख्य  क्षेत्र  से  भारतीय  योद्धाओं  ने  अंग्रेजों  को  निकाल  बाहर  किया  था।  उस  समय  के  लिए  यह  अभूतपूर्व और  असाधारण  विजय  थी।

फिर भी कई इतिहासकार आज भी 1857 की घटना को ‘सिपाही विद्रोह’ कहा जाए या कि ‘स्वतंत्रता संग्राम’ इसमें उलझे हुए हैं।  सबसे पीड़ाजनक बात तो यह है कि कुछ इतिहासकार यह साबित करने में जुटे हुए हैं कि भारतीय सिपाहियों और उनके सहयोगियों ने अंग्रेजों के साथ अत्यंत बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया। ऐसे इतिहासकार महात्मा गाँधी के अहिंसा आंदोलन की दुहाई देना भी नहीं भूलते।  एक इतिहासकार ने तो यहाँ तक कहा है कि  1857 की जयंती मनाते  समय हमें भारतीय सैनिकों द्वारा की गई हिंसा को बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। तात्पर्य यह कि हमें संभवतः 1857 के योद्धाओं का प्रशस्ति गान नहीं करना चाहिए। पर क्या ऐसा करना उनके प्रति अन्याय नहीं होगा जिन्होंने अपनी धरती  से अंग्रेजों को बाहर करने के लिए अपनी जान दे दी।  क्या देश के लिए किए गए संग्राम में हुई हिंसा इतनी निंदनीय है।

परन्तु क्या यह सच नहीं है कि हमारे स्वतंत्रता आंदोलन की दो धाराएँ – अहिंसक और हिंसक – सदा प्रवाहित रही हैं।  समय-समय और जगह-जगह पर आदिवासियों, किसानों और मोप्पला जैसे आंदोलन कमोबेश हिंसक रहे हैं।  स्वतंत्रता आंदोलन के परवर्ती काल में बुद्धिजीवियों के शामिल हो जाने से इस हिंसक धारा को सामाजिक स्वीकार्यता मिली।  इस तरह इस धारा को खुदीराम बोस, अरबिंदो घोष, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, रामप्रसाद बिस्मिल, सुभाषचंद्र बोस जैसे बलिदानी सेनानियों से पर्याप्त बल मिला। दूसरा, क्या यह भी सच नहीं है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाया गया आंदोलन भी कभी-कभी हिंसक हुआ था। 1942 का ‘भारत छोड़ो’आंदोलन इसका सबसे बड़ा प्रमाण है जिसमें हजारों लोगों की जान गई थी। इसके अलावा हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत का अहिंसक स्वतंत्रता आंदोलन भारत तक ही सीमित रहा है।  क्योंकि दुनिया के दूसरे देशों में जितने आंदोलन हुए हैं वे मुख्यतः हिंसक ही रहे हैं। इस प्रकार भारत का  आंदोलन जिस सीमा तक भी अहिंसक रहा वह अपवाद ही है।

इस तरह क्या केवल इसलिए उन लोगों का योगदान भुला दिया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने हिंसा का सहारा लिया। ऐसी ही सोच के कारण संभवतः एक कवि ने ‘दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल’ जैसा गीत लिखा जो एक प्रकार से खडग और ढाल का प्रयोग करने वालों के योगदान को नकारता है।

असल में 1857 की क्रांति हमारे इतिहास का एक ऐसा अध्याय है जिससे परवर्ती स्वतंत्रता आंदोलन ने प्रेरणा हासिल की।  इस क्रांति में सिपाहियों के साथ- साथ आम लोगों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था।  इस तथ्य के कारण इसे हम जन आंदोलन कह सकते हैं। यह भी एक निर्विवाद सत्य है कि उनका लक्ष्य था अंग्रेजी हुकूमत को समाप्त करना।  इस दृष्टि से यह निःसंदेह स्वतंत्रता आंदोलन था।  आखिर ऐसा आंदोलन इस देश में पहले क्यों नहीं हुआ जब विदेशियों ने अनेक बार आक्रमण किया और विजयी होकर शासन भी।

भारत पर ईसा पूर्व से ही विदेशी आक्रमणों का एक लम्बा इतिहास रहा है। इन आक्रमणों में महमूद गजनवी, तैमूर लंग और नादिर शाह द्वारा किया गया अत्याचार – हत्या, बलात्कार, लूटपाट, आगजनी – कुख्यात है। फिर भी ऐसे सबूत नहीं मिलते की तत्कालीन भारतीय सैनिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर देश के आम लोगों ने विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध युद्ध किया हो। इसलिए ऐसा क्या था कि  अंग्रेजों के विरुद्ध इसी देश के आम लोगों ने सैनिकों के साथ मिलकर इतना व्यापक युद्ध किया।  1857 का यह पहलू विलक्षण है। इस दृष्टि से यह संग्राम आधुनिक कहा जा सकता है।

इसलिए आश्चर्य होता है कि इतिहासकार सैकड़ों आदिवासी विद्रोहों को तो स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ते हैं।  परन्तु 1857 को लेकर हिचकते हैं। जबकि  यदि हम गहराई  में जाएँ तो जिन कारणों से आदिवासियों ने आंदोलन किए अमूमन उन्हीं कारणों से 1857 का भी आंदोलन हुआ।  अंग्रेजों के शासन का स्वरूप ही ऐसा था कि उसने भारतीय समाज के सभी अंगों को राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से बुरी तरह झकझोर दिया।  इतिहास में यह देश कभी भी इतना लाचार, असहाय और पंगु नहीं रहा जितना की अंग्रेजों के शासन काल में।  आम लोगों की जीविका के अनेक साधन नष्ट कर दिए गए। ईसाई मिशनरियों ने यहाँ के लोगों के धर्म परिवर्तन के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए। लोगों को असभ्य कहा गया। उनके आत्म सम्मान को हर तरह से चोट पहुँचाई गई।  स्पष्ट है कि इतने व्यापक संग्राम के कारण भी व्यापक ही रहे होंगे।

कहा जाता है की इतिहास सदा विजेता लिखते हैं।  इस प्रकार आश्चर्य नहीं कि अंगेजों ने इतने बड़े आंदोलन को सिर्फ ‘सिपाही विद्रोह’ कहना इसलिए पसंद किया ताकि सनद रहे कि देश की जनता को उसकी उपस्थिति से कोई गुरेज नहीं थी। पर हमें क्या हो गया है कि हम उन शहीदों की निंदा करने पर उतारू हैं। यदि हम दुनिया भर की क्रांतियों के इतिहास पर दृष्टि डालें तो हमें दिखेगा कि फ़्रांसिसी और रूसी क्रांतियों में कितना रक्तपात हुआ है, फिर भी कोई प्रश्न नहीं उठाता कि इन्हें क्रांति क्यों कहा जाए! यदि सफलता को ही क्रांति का मापदंड माना जाए तो रूसी क्रांति को अब  असफल माना जाएगा जबकि 1857 की क्रांति सफल कही जाएगी क्योंकि उसके ठीक नब्बे वर्षों के अंदर भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त कर ली और वह स्वतंत्रता अब तक अक्षुण्ण बनी हुई है।

1857 के वीर सपूतों ने जिस साहस, शौर्य और पराक्रम का परिचय दिया वह अभूतपूर्व है। तब तक तो उन्हें इतना अनुमान हो गया होगा कि संसाधन के मामले में उनके दुश्मनों की हैसियत कहीं ज्यादा है।  फिर भी, बिना इस बात की परवाह किए कि हारने का अंजाम क्या होगा,  इन सिपाहियों और आम लोगों ने अपनी वीरता की मिसाल कायम की। यह अकारण नहीं है कि देश के जिन वीर सपूतों ने अपनी जान की बाजी लगाकर अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए वे आज कविताओं, कहानियों, लोक-गीतों के माध्यम से जन-जन के प्रिय बन गए हैं। रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, वीर कुंवर सिंह, नाना साहेब, मंगल पाण्डेय, बहादुर शाह जफर, बख्त खान जैसे बलिदानी लोगों के नाम सुनकर आज भी हमारी धमनियों में राष्ट्र प्रेम, अदम्य साहस, शौर्य और पराक्रम  का संचार होता है।

कई इतिहासकारों ने यह भी कहा है कि इस युद्ध में पूरा देश शामिल नहीं था।  इसलिए इसे राष्ट्रीय युद्ध की संज्ञा देना अनुचित होगा।  तो प्रश्न उठता है कि किसी स्थान विशेष में किया गया युद्ध राष्ट्रीय क्यों नहीं हो सकता।  इस पर यदि गहराई से विचार करें तो बीसवीं शताब्दी के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी ऐसे अनेक आंदोलन हुए जो किसी स्थान विशेष तक ही सीमित रह गए।  यहां तक कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की तीव्रता भी सारे देश में एक समान नहीं थी। दरअसल 1857 की चर्चा करते समय हमें यह याद रखना होगा कि उस समय संचार के साधन आदिम थे और संभवतः गुप्त तरीके से काम करने के कारण व्यापक प्रचार और भी अधिक जोखिम भरा हो सकता था।  फिर भी ऐसा लगता है कि उन्होंने अपने तरीके से संचार व्यवस्था कायम की थी। क्योंकि जहाँ कहीं अंग्रेज हमला करते थे  उसके बाद ये वीर सिपाही बदला लेने के लिए वहाँ  पहुँच जाते थे।

कौन जानता है कि अगर युद्ध थोड़ा और लम्बा खिंचता तो देश के बाकी हिस्से भी उनका साथ देते। असल में सत्य का पता लगाने में सबसे बड़ी चुनौती तो यह है कि 1857 के बारे में जो भी लिखा गया है वह अंग्रेजों द्वारा ही लिखा गया है।  इसलिए हम भारतीय सेनानियों की योजनाओं, उनके उद्देश्य, उनकी दृष्टि आदि के बारे में ठीक से नहीं जानते। जिन थोड़े से तत्कालीन  भारतीय बुद्धिजीवियों ने इस घटना पर लिखा उनमें मिर्जा गालिब का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।  परन्तु गालिब की विडंबना यह है कि उन्होंने कमोबेश अंग्रेजों का साथ ही दिया था। कहा जाता है कि गालिब अपना पाला बदल कर मुगलों के विरुद्ध और अंग्रेजों के साथ हो गए थे।

1857 के कई साल बाद सर सैय्यद अहमद खान ने अपने किसी स्कूल के उद्घाटन के लिए गालिब से एक सन्देश लिखवाया।  पर जब खान ने सन्देश पढ़ा तो आग बबूला हो गए क्योंकि उस सन्देश में अंग्रेजों का प्रशस्ति गान था। शायद  उन्हें यह बिल्कुल नागवार लगा कि जहाँ भारत और भारतीयता की बात होनी चाहिए वहाँ अंग्रेजों की कसीदाकारी हो। गालिब के बारे में यह भी कहा जाता है कि दिल्ली में अंग्रेजों द्वारा किए गए कत्लेआम में शायद वह अकेले नामवर मुस्लिम व्यक्ति थे जो जीवित बचे। अतः यदि हम 1857 की घटना के विषय में और विशेषकर भारतीय मानस को जानना चाहते हैं तो इसके लिए गालिब उपयुक्त व्यक्ति नहीं हो सकते।

1857 की क्रांति भारत के इतिहास में मील का पत्थर है। इसने परवर्ती स्वतंत्रता आंदोलन को प्रभावित किया। 1857 की क्रांति बाद के स्वतंत्रता सेनानियों में यह भाव भरने में सफल रही कि शत्रु चाहे कितना भी बलवान क्यों न हो उससे लड़ा जा सकता है। 1942 के आंदोलन की चर्चा करते हुए जवाहरलाल नेहरु ने लिखा है कि 1857 के महान विद्रोह के बाद पहली बार देश में इतने व्यापक रूप से लोगों ने बलपूर्वक अंग्रेजों को चुनौती दी। इससे सहज ही 1857 के महत्त्व को समझा जा सकता है।

1857 के युद्ध के लिए दिल्ली राजधानी बन गई और लाल किला उस राजधानी का केंद्र बिंदु। यह अकारण नहीं है कि कालांतर में सुभाषचंद्र बोस ने लाल किले को राष्ट्रीयता का प्रतीक माना। जिसे बाद में औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया गया। इस प्रकार प्रति वर्ष वहाँ झंडा फहरा कर हम प्रकारांतर से 1857 के शहीदों का भी नमन करते हैं। इसलिए 1857 के वीर सपूतों के बलिदान, त्याग और पराक्रम को ध्यान में रखते हुए हमें तो यही लगता है कि 1857 की जयंती मनानी चाहिए।

 

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