नक्सलवाद का सिकुड़ता लाल गलियारा

दुलीचन्द रमन
नक्सलवाद आंतरिक सुरक्षा का नासूर बन गया है। सुरक्षाबल एक लंबे अर्से से इस समस्या से जुझ रहे है। लेकिन फिर भी नक्सलवादी घात लगाकर सुरक्षा बलों को नुकसान पहुँचाने से नहीं चुकते। कभी-कभी इन्हें माओवादी भी कहा जाता है। जिसकी जड़े माक्र्सवाद में है। ये हैरानी की बात है कि जिस माओ को उनके देश चीन में शी जिनपिंग बेदखल कर चुका है। जिस माक्र्स को उनके देश जर्मनी में कोई नही पूछता उनके नाम पर भारत में षड़यंत्र हो रहे है।
भारत में नक्सली आंदोलन की शुरूआत 1967 में पश्चिमी बंगाल के दार्जिलिंग जिले में सिलीगुड़ी क्षेत्र के नक्सलवाडी गांव में वामपंथी विचारधारा से प्रेरित कानू सान्याल और चारू मजूमदार व अन्य युवाओं द्वारा जमींदारों की भूमि व फसलों पर जबरन कब्जा करने के प्रयास के तहत हुई। सरकार ने 1500 पुलिसकर्मियों को गाँव में तैनात कर दिया। स्थानीय पुलिस व वामपंथियों में टकराव व संघर्ष हुआ। कानू सान्याल को जेल में बंद कर दिया गया। कानू सान्याल और चारू मंजूदार के कई समर्थक पास के जंगलों में जा छिपे और वहीं से राज्य के खिलाफ संघर्ष करने लगे। यही आंदोलन बाद में नक्सलवादी आंदोलन के रूप में जाना गया जो बाद में बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, केरल तक फैल गया। (छतीसगढ़ और झारखंड तब तक राज्य नही बने थे)
यह विचारधारा धीरे-धीरे देश के 180 जिलो तथा 40 प्रतिशत हिस्से में फैल गई। एक समय पर करीब 92 हजार वर्ग किलोमीटर इलाका इनकी गतिविधियों से प्रभावित था। वास्तव में नक्सलवाद लोकतंत्र व कानून में विश्वास नहीं करता अपितु बंदूक के बल पर सत्ता हथियाने में विश्वास करता है। इसी विचारधारा से प्रेरित होकर आन्ध्र प्रदेश में पीपुल्स वार ग्रुप (पी.डब्ल्यू.जी.) तथा बिहार में माओवादी कम्यूनिस्ट सैंटर (एम.सी.सी.) अपनी हिसंक गतिविधियाँ चलाने लगे। एम.सी.सी. संगठित होकर अगड़ी जातियों के गांवों पर हमला कर नरसंहार करने लगी तो बिहार में रणबीर सेना वजूद में आयी। लेकिन जातीय संघर्ष को जन्म देने का यह षंडयंत्र सफल नहीं हो पाया।
सरकार विकास कार्यो के द्वारा आदिवासी व वनवासी बंधुओं को मुख्य धारा में जोड़ने की कोशिश में रहती है लेकिन नक्सली अपने षंडयंत्रों के तहत सरकारी विकास कार्यो में बाधा डालते है। सड़कों व पुलों के निर्माण का विरोध करते है। विद्यालयों की इमारतों को बम्बों से उड़ा देते है ताकि शिक्षा का उजाला वनवासी गरीबों तक न पंहुँच सके व नक्सलवाद के लिए उर्वरा भूमि गरीबी व अशिक्षा के रूप में बनी रहे। आज भी दांतेवाड़ा, बस्तर तथा कई अन्य इलाकों में केन्द्रिय पुलिस बलों के जवान अपनी निगरानी व सुरक्षा कवच के माध्यम नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में सड़क निर्माण कर रही एजेंसियों को सुरक्षा प्रदान कर रहे है। तकनीक एक अन्य माध्यम है जिससे हम दुनिया से जुड़ते है। आदिवासी व वनवासी क्षेत्रों में मोबाईल टावरों को भी बम्बों से ध्वस्त कर दिया जाता है ताकि इन इलाकों का संपर्क बाकी देश से कटा रहे।
भारत में नक्सली विचारधारा को लाने का श्रेय वामंपथ को है। चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी ने नेपाल और भारत के पूर्वी क्षेत्रों में अपनी विचारधारा को फैलाने तथा उसे मदद करने का कार्य किया है। इसके लिए धन, साहित्य व हथियार मुहैया करवाये जाते थे। नेपाल सालों तक गृहयुद्व में सालों तक नक्सलवाद/वामपंथ के कारण ही झुलसा और आज वहाँ एक राजनीतिक दल के रूप में सत्ता पर काबिज है। कभी एक वामपंथी भूमिगत नेता प्रचन्ड आज नेपाल में एक स्थापित नेता बन चुका है। भारत में भी विकास कार्यो के कारण तथा अतंर्राष्ट्रीय स्तर पर वामपंथी विचारधारा की विफलता के कारण भारत में भी वामपंथ का लाल गलियारा सिमटता जा रहा है। पश्चिम बंगाल तथा त्रिपुरा से वामंपथी सरकारों की हार ने भी इसके प्रभाव-क्षेत्र को कम किया है।
‘शहरी नक्सलवाद’ की एक नई अवधारणा भी इन दिनों सुर्खियों में है। यह भी एक सच्चाई है कि आदिवासी व वनवासी लोग नक्सलवादी नही महज एक मोहरा है। उनकों विध्वंस की बौद्विक खाद अपने देश के कई विश्वविद्यालयों में नक्सली विचारधारा के संगठनों से मिलती है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जाधवपुर विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय में पिछले दिनों देश विरोधी नारों व गतिविधियों की खबरें आती रही है। अफ़जल गुरु जैसे आतंकवादी के पक्ष में नारेबाजी तथा ‘भारत तेरे टुकडे होगें….’ जैसे नारों के समर्थन से आप खुद ही इस विचारधारा के मानसिक दिवालियेपन का अंदाजा लगा सकते है।
त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद वहाँ के स्थानीय लोगों ने लेनिन की मूर्ति को गिरा दिया। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप जाधवपुर विश्वविद्यालय के नक्सली विचारधारा से प्रभावित कुछ छात्रों ने डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा को खंड़ित करने का प्रयास किया। दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डी.एन साईनाथ को नक्सली नेताओं के संपर्क सूत्र बनने अन्य षंडयंत्रकारी गतिविधियों के मामले में आजीवन कारावास की सजा मिल चुकी है। जे.एन.यू में भी वामपंथ और नक्सलवादी विचारधारा जिनकी अंतिम सांसे गिन रही है। लेकिन यह विचारधारा कश्मीर की अलगाववादी विचारधारा तथा अंबेडकर के नाम पर दलित छात्रों को भड़काकर अपना उल्लू सीधा करना चाह रही है।
छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड तथा महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में नक्सली अपनी सरकार चलाते है। उनकी अपनी ‘जंगल-अदालते’ लगती है जिसमें सबके सामने सजा दी जाती है ताकि बाकी की जनता में भय का वातावरण बन सके। उस क्षेत्र में रहने वाले लोगों से टैक्स वसूला जाता है। सरकारी कर्मचारियों, ठेकेदारों, उद्योगपतियों से जबरन वसूली की जाती है। पूर्व में नक्सलियों का हौसला इतना बढ़ गया था कि वे जेलों पर आक्रमण कर अपने साथियों को छुड़ा लेते थे। उनके पास अत्याधुनिक शस्त्र तथा तकनीक है। जिससे वे सुरक्षा बलों को कई बार भारी नुकसान पहुँचाने से भी नही चुकते। लेकिन ये इसलिए संभव हो पाता है कि वे जंगल के चप्पे-चप्पे से परिचित है तथा सुरक्षा बलों के लिए वह इलाका नया होता है।
सी.पी.एम. के प्रति आस्थावान मानवाधिकारों का ढकोसला करने वाले बुद्विजीवी नक्सली समस्या के अंहिसक समाधान पर जोर देते है। लेकिन क्या सुरक्षा-बलों और केन्द्रिय पुलिस बलों का कोई मानवाधिकार नहीं होता।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े वनवासी कल्याण आश्रम व कई अन्य संगठन भी वनवासी बंधुओं के बीच लगातार कार्य कर रहे है। जिससे वामपंथी व नक्सलवादी विचारधारा के पैर उखड़ रहे है। वर्तमान में भारत में आर्थिक विकास तो बढ़ा है। लेकिन समाज में गैर-बराबरी भी बढ़ी है। सरकार को समावेशी विकास की अवधारणा तथा पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद भी एक सही दिशा दे सकता है। नक्सलवादी विचारधारा को जड़ से समाप्त करने के लिए केन्द्र सरकार व राज्य सरकार को मिलकर एक नई पहल करनी पड़ेगी जिससे वे सभी कारण समाप्त किये जा सके जिससे इस विचारधारा के पनपने की सभी संभावनाओं को समाप्त किया जा सके।

 

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