संघ समर्पित रामलखन सिंह

संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री रामलखन सिंह का जन्म 15 जुलाई, 1939 को ग्राम धंधापार (जिला सिद्धार्थ नगर, उ.प्र.) के एक सामान्य कृषक श्री रामनारायण सिंह के घर में हुआ था। जब वे छोटे ही थे, तब इनकी माता जी तथा फिर पिता जी का भी निधन हो गया। इससे रामलखन जी तथा उनके बड़े भाई वासुदेव सिंह पर भारी संकट आ गया। ऐसे में ग्राम अपार, पो. छरहटा निवासी उनकी मौसी श्रीमती आंचल देवी उन्हें अपने साथ ले गयीं।
रामलखन जी की प्राथमिक शिक्षा ग्राम अपार में ही हुई। इसके बाद उन्होंने तिलक इंटर काॅलिज, बांसी से हाई स्कूल और इंटर किया। इसी दौरान 1950 में उनका संपर्क संघ से हुआ। इसमें मुख्य भूमिका श्री केसरीधर जी तथा ठाकुर संकठाप्रसाद जी की थी। इसके बाद पढ़ाई और संघ का काम साथ-साथ चलता रहा। क्रमशः उन्होंने गटनायक से लेकर मुख्य शिक्षक, कार्यवाह, सायं कार्यवाह और नगर कार्यवाह जैसी जिम्मेदारियां निभाईं। 1962 में एम.ए. की पढ़ाई पूर्ण कर उन्होंने प्रचारक जीवन स्वीकार कर लिया।
रामलखन जी ने 1958, 1962 और फिर 1966 में संघ के तीनों वर्ष के प्रशिक्षण लिये। प्रचारक जीवन में वे मेहदावल, बस्ती, राबट्र्सगंज, मिर्जापुर के बाद 1974 में सुल्तानपुर के जिला प्रचारक बनाये गये। अगले ही साल देश में आपातकाल लग गया। इस दौरान वे सुल्तानपुर, फैजाबाद तथा प्रतापगढ़ में भूमिगत रहकर काम करते रहे। आपातकाल के बाद वे बांदा, बाराबंकी तथा उन्नाव में जिला प्रचारक तथा फिर गोंडा और झांसी में विभाग प्रचारक रहे। बीच में कुछ वर्ष वे लखनऊ में ‘भारती भवन’ के कार्यालय प्रमुख भी रहे।
संघ के चहुंदिश विस्तार के साथ ही शाखा के अलावा और भी कई तरह के काम बढ़ने लगे। इनमें से एक काम धर्म जागरण का भी है। जो लोग किसी लालच, भय या अपमान के कारण हिन्दू धर्म छोड़कर दूसरे मजहबों में चले गये थे, उनसे सम्पर्क कर उन्हें फिर से अपने पूर्वजों के पवित्र धर्म में लाना धर्म जागरण का काम है। जिन बस्तियों और गांवों में मुसलमान तबलीगी या ईसाई मिशनरी धर्मान्तरण कराने के लिए घूमते रहते हैं, वहां लोगों को अपने धर्म, पूर्वजों और संस्कृति के प्रति जागरूक करना भी महत्वपूर्ण होता है।
वर्ष 2004 में रामलखन जी को धर्म जागरण विभाग (पूर्वी उ.प्र.) का काम दिया गया। अगले 12 साल तक पूरे क्षेत्र में प्रवास कर वे इसे गति देते रहे। 2016 में स्वास्थ्य की समस्याओं को देखते हुए उन्हें सक्रिय काम से विश्राम दे दिया गया। वे माॅडल हाउस, लखनऊ में ‘केशव भवन’ कार्यालय पर रहने लगे। पांच फरवरी, 2018 को उनका स्वास्थ्य अचानक बहुत बिगड़ गया। अतः उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। जांच से जलोदर और तपेदिक के साथ ही आंत, फेफड़े और यकृत में अनेक समस्याएं मिलीं। इन्हीं के कारण 20 फरवरी को संघ कार्यालय (केशव भवन) पर उनका निधन हुआ।
वरिष्ठ प्रचारक ठाकुर संकठाप्रसाद जी का रामलखन जी पर बहुत प्रेम था। इसके साथ ही उन्होंने जब संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार की जीवनी पढ़ी, तो उससे वे बहुत प्रभावित हुए। इस प्रकार उनके प्रचारक बनने की भूमिका बनी, जो फिर जीवन की अंतिम सांस तक चलती रही। माता-पिता के अभाव में रामलखन जी ने अपने मौसेरे भाई श्री महावीर सिंह जी को अपना अभिभावक माना। वे भी उन्हें अपने पुत्र की तरह ही मानते थे। महावीर जी के निधन के बाद उनके दोनों पुत्रों को रामलखन जी ने भी पुत्रवत स्नेह दिया।
शाखा के शारीरिक कार्यक्रम, उत्तम गणवेश तथा साफ-सफाई के प्रति वे बहुत आग्रही थे। इसके साथ ही मधुरता, सरलता, कम खर्च, अनुशासन, समय पालन, शाखाप्रिय, अपने प्रति कठोर पर दूसरों के प्रति उदार, हिसाब-किताब में प्रामाणिकता आदि उनके स्वभाव की अन्य विशेषताएं थीं।
– विजय कुमार,

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