नरेंद्र मोदी के तीन वर्ष

जर्मनी के एकीकरण के वास्तुकार बिस्मार्क ने अपनी राष्ट्र नीति को स्पष्ट करते हुए कहा था – “जर्मनी का ध्यान प्रशा के उदारवाद पर नहीं अपितु उसकी शक्ति पर लगा हुआ है. जर्मनी की  समस्याओं का समाधान बौद्धिक भाषणों से नहीं, आदर्शवाद से नहीं, बहुमत के निर्णय से नहीं वरन प्रशा के नेतृत्व में तलवार की नीति से होगा.” मुखर राष्ट्रवाद की भाषा बोलकर भारत की जनता का दिल जीत रहे नरेंद्र मोदी यदि अपनी राष्ट्र नीति को बिस्मार्क के इस कथन में  आज व्यक्त करेंगे तो उस कथन में केवल तलवार के स्थान पर “लोकतंत्र में विश्वास व राष्ट्रवाद की नीति” शब्दों को रखना होगा. बिस्मार्क ने जिस प्रकार प्रखर राष्ट्रवादी नीति की नींव पर जर्मनी के एकीकरण का वास्तु किया था ठीक उसी प्रकार नरेंद्र मोदी भारत को “विश्व गुरु” बनानें का वास्तु रच रहें हैं.

भारत के प्रधानमन्त्री के रूप में श्रीयुत नरेंद्र मोदी ने 26 मई 2016 को पद एवं गोपनीयता की शपथ ली, इस अवसर पर प्रसिद्ध संघ विचारक एवं दलित विमर्श के मनीषी रमेशजी पतंगे के एक आलेख में लिखी कुछ पंक्तिया स्मरण आती हैं, उन्होंने लन्दन के विश्वप्रसिद्ध समाचार पत्र द गार्डियन के सम्पादकीय की चर्चा लिखी है. द गार्डियन ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की चुनावी जीत पर लिखा कि “आज 18 मई 2014 का दिन वह दिन है जब अंग्रेजों ने वस्तुतः भारत छोड़ दिया है.  क्योंकि जिस पद्धति से अंग्रेजों ने भारत पर शासन किया था, भारत में स्वातंत्र्योत्तर भी करीब करीब वैसा ही शासन चलता रहा. इस कालखंड का अंत नरेंद्र मोदी की जीत ने किया है. स्वतंत्रता के बाद भारत ने कांग्रेस के राज में अंग्रेजी राज का ही अलग अलग तरीके से विस्तार होता रहा. द गार्डियन अखबार आगे लिखता है कि मई 2014 में भारत से अंग्रेजी शासन समाप्त हुआ अर्थात अंगेजी आचार विचारों के अनुसार, अंग्रेजी मूल्यों के अनुसार चलने वाली शासन पद्धति की समाप्ति और अब भारतीय पद्धति, भारतीय मूल्य, भारतीय आचार-विचार, भारतीय आदर्श के अनुसार शासनकाल का समय प्रारम्भ हुआ है. नरेंद्र मोदी के शासन का मूल्यांकन हमें इसी आधार पर करना चाहिए, ऐसा नहीं है कि भारत में यह प्रथम सत्ता परिवर्तन है, सत्ता परिवर्तन मोरारजी भाई देसाई, वी.पी. सिंह, देवेगौड़ा, गुजराल के समय भी हुआ किन्तु उस समय भिन्न-भिन्न कारणों से शासन का दृष्टिकोण पूर्ववत ही रहा.  अटलबिहारी वाजपेयी के समय भी सत्ता का दृष्टिकोण नहीं बदल पाया क्योंकि अटल जी की सरकार एक अल्पमत व विभिन्न विचारों से बनी पार्टियों की बैसाखी पर चल रही थी.  अब नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ है व उन्हें सहयोगी दल की बैसाखियों की भी आवश्यकता नहीं है अतः यह समय भारत में केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं अपितु वैचारिक आधार के बदलाव का समय है. विगत तीन वर्षों के दिन प्रतिदिन, नरेंद्र मोदी के शासन में, “द गार्डियन” का यह कथन सौ प्रतिशत सत्य होता दिखा है.

 

तीस वर्षों पश्चात 2014 के आम चुनावों में देश की जनता ने जब नरेंद्र मोदी को स्पष्ट बहुमत के साथ जनादेश दिया तब इस देश की जनता अपनें इस नए नेतृत्व की क्षमताओं को जान चुकी थी. देश के राजनीतिक गलियारों में नरेंद्र मोदी को गुजरात से निकलकर दिल्ली आने के मार्गों की कठिनाई समय समय पर लोगों द्वारा दोहराई जाती रही किंतु जनता के मन में कभी संशय नहीं रहा, भारतीय जनता मोदी के प्रति मन बना चुकी थी!

अपेक्षा के अनुरूप प्रधानमंत्री बननें के पश्चात नरेंद्र मोदी ने स्वयं का कोई नया रूप प्रकट नहीं किया, जैसा कि उनके विरोधी उनसे आशा या आशंका कर रहे थे. मोदी ने अपने उस रूप-स्वभाव का ही विस्तार किया जिस रूप से वे गत बारह वर्षों से गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य कर रहे थे. उन्होंने एक ओर देश में सबका साथ – सबका विश्वास की नीति को आगे बढ़ाया तो दूजी ओर अपनें अहर्निश, अथक, अचूक परिश्रम से विश्व के सामनें भारत की वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा को शक्ति, दृढ़ता, प्रतिबद्धता के साथ किंतु विनम्र शैली में प्रस्तुत किया. भारत को विश्वगुरु बनानें की राह में मोदी नें पश्चिम के देशों को जहां अपनें व्यक्तित्व की चकाचौंध से प्रभावित किया तो बहुत से एशियाई और पड़ोसी देशों को अपनी “बुद्ध सर्किट” की अवधारणा से प्रभावित किया. एक प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी जब भी विदेश गए या जब भी विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के साथ देश की भूमि पर घूमें तब तब उन्होंने भारतीय संस्कृति के प्रतिमानों को अद्भूत दृष्टि के साथ विदेशियों के समक्ष प्रस्तुत किया. आज निस्संदेह यह दृढ़ता के साथ कहा जा  सकता है कि विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के समक्ष भारतीय संस्कृति का वैभव प्रदर्शन जिस प्रकार नरेंद्र मोदी ने किया वैसा कभी कोई पूर्व प्रधानमंत्री नहीं कर पाया. हाँ इस विषय में अल्पमत सरकार का नेतृत्व कर रहे अटल बिहारी वाजपेयी जी को अवश्य कुछ छूट अवश्य दी जा सकती है. भारत आनें वाले विदेशी अतिथियों को भारत का सच्चा सांस्कृतिक परिचय देना और यह बताना कि मूलतः हम क्या हैं, क्यों हैं व कैसे हैं; एक अत्यंत सहज व सरल कार्य था जिसे भारत के किसी अन्य प्रधानमंत्री ने क्यों नहीं किया यह किसी से छिपा नहीं है. वस्तुतः भारत की राजनीति पर जिस प्रकार भारतीय राजनीतिज्ञों ने चुन-चुनकर व समय-समय पर तुष्टिकरण

के दंश कराये उस सब से हमारी जो पहचान विश्व भर में बन रही थी वह एक बनाना कंट्री की थी जिसके पास कुछ भी एतिहासिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक संपदा थी ही नहीं. इस कोण से ही नरेंद्र मोदी व देश के अन्य नेतृत्व कर्ताओं का आकलन प्रारम्भ होता है जो बड़े विस्तृत किंतु विचित्र वितान तक जाता है. नरेंद्र मोदी ने अपनी प्रत्येक विदेश यात्रा को  या विदेशी राष्ट्राध्यक्षों की भारत यात्रा को भारतीय संस्कृति व दर्शन के वैश्विक परिचय हेतु एक सुअवसर बना दिया.

भारतीय संकृति के वैश्विक परिचय का एक उल्लेखनीय अवसर भारत व समूचे विश्व ने एक बार और देखा जब 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्यों द्वारा 21 जून को ” अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस” को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली। प्रधानमंत्री मोदी के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अंदर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय है। इस पहल को कई वैश्विक नेताओं से समर्थन मिला। सबसे पहले, नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला ने प्रधानमंत्री मोदी के प्रस्ताव का समर्थन किया। संयुक्त राज्य अमेरिका सहित 177 से अधिक देशों, कनाडा, चीन और मिस्र अदि ने इसका समर्थन किया है। “अभी तक हुए किसी भी संयुक्त राष्ट्र महासभा के संकल्प के लिए यह सह प्रायोजकों की सबसे अधिक संख्या है।”

यदि विगत तीन वर्षों के मोदी के कार्यकाल का आकलन करें और प्रथमतः उत्तरप्रदेश के चुनाव की चर्चा करें तो हमारें सामनें कोई विशिष्ट नहीं अपितु अत्यंत सहज तथ्य सामनें आते हैं. ऐसे सहज तथ्य जिससे कोई साधारण बुद्धि का राजनीतिज्ञ भी उत्तरप्रदेश की राजनीति को अपनें सुर में साध सकता था. उप्र जैसे धुर जातिवादी राजनीति वाले प्रदेश में जब पहलेपहल नरेंद्र मोदी ने 80 में से 73 लोकसभा सीटों को विजय किया तब सभी ने यही कहा था कि ये लोस चुनाव है अतः राष्ट्रीय मुद्दों के आधार पर मोदी बढ़त बना गए किंतु विस चुनावों में राज्य की राजनीति जातिगत गणित पर ही चलेगी. यह कहना स्वाभाविक ही था, उप्र का राजनैतिक इतिहास व वातावरण अपनें जातिवादी रुझान को सस्वर व निस्संकोच प्रकट करता है. उप्र का स्थानीय राजनीतिज्ञ या देश भर से उप्र में जानें वाला कोई भी राजनीतिज्ञ, उप्र के नौकरशाह या उप्र के सांस्कृतिक सामाजिक कार्यकर्ता सभी उप्र के जातिवादी राजनीति के चरित्र को न केवल सार्वजनिक स्वीकार करते थे अपितु उसे निस्संकोच मान्यता भी देते और उस अनुरूप ही निर्वाचन कार्यक्रम, व्यक्ति और समाज तय करते थे. उप्र में कब कौन कहाँ जाएगा, किस दिशा में जाएगा व किसके साथ जाएगा इन प्रश्नों के उत्तर राजनीति तय किया करती थी. उप्र की राजनीति जातिवाद के दलदल से बाहर निकलेगी इस बात की कल्पना भी लोगों ने करना बंद कर दी थी. उप्र ने अपनें इस चरित्र का पर्याप्त से बहुत अधिक मूल्य चुकाया व एक पिछड़ा, बीमारू, गरीब अविकसित राज्य बन गया.

चरम जातिवाद की परिस्थितियों में वर्ष 2017 के विस चुनाव के परिणाम नरेंद्र मोदी के करिश्में को एक नया विस्तार दे गए. दूसरी ओर उप्र विस के परिणामों के पश्चात योगी आदित्यनाथ का मुख्यमंत्री के रूप में मनोनयन नरेंद्र मोदी, अमित शाह व भाजपा के राष्ट्रीय संगठन मंत्री रामलाल जी के “अभियान 2019” की उद्घोषणा कर गया. उप्र के मुख्यमंत्री के रूप में योगी का चयन समूचे भारतीय जनमानस को आंदोलित व झंकृत कर गया. यूं तो योगी आदित्यनाथ पिछली बार से गोरखपुर से सांसद चुने जाकर, लगभग आधे उप्र की राजनीति को प्रभावित करते रहें हैं किंतु उनके मुख्यमंत्री के रूप में मनोनयन के बाद देश के प्रत्येक आबालवृद्ध ने यह आभास किया कि भारतीय राजनीति को आगामी दशकों हेतु एक नया राष्ट्रवादी चेहरा मिल गया है. योगी के मुख्यमंत्री बननें से जहां एक ओर देश का राष्ट्रवादी वर्ग प्रसन्न हुआ तो वहीं देश में सेक्युलर व मुस्लिन तुष्टिकरण की राजनीति करनें वालों व वामपंथियों के ऊपर तो जैसे घड़ों पानी पड़ गया.

उप्र विस चुनाव एक विषय के लिए और स्मरण किया जाएगा जब यह विश्लेषण सामनें आया कि इस चुनाव में भाजपा की प्रचंड विजय के मूल में एक कारण मोदी द्वारा छेड़ा गया तीन तलाक का मुद्ददा भी है. नरेंद्र मोदी ने उप्र के व देश भर के अन्य मंचों से जिस प्रकार तीन तलाक व बहुविवाह परम्परा के नाम मुस्लिम बहनों पर होनें वाले अत्याचार व पाशविकता की चर्चा की उससे मुस्लिम स्त्री जगत इस सामाजिक अत्याचार के विरुद्ध आंदोलित हो उठा व मोदी के समर्थन में आ खड़ा हुआ. कहा गया कि तीन तलाक के विरुद्ध मुहीम के कारण बड़ी मात्रा में मुस्लिम महिलाओं ने भाजपा को वोट किया.

उप्र चुनाव के पूर्व देश ने नरेंद्र मोदी की निर्णय क्षमता व तटस्थता का एक और उदाहरण देखा था नोटबंदी के रूप में. नोटबंदी के निर्णय को जिस गोपनीयता व आकस्मिकता से घोषित किया गया वैसा निर्णय व वैसी निर्णय प्रक्रिया की आदत इस देश को पूर्व में कभी नहीं रही. विपक्षियों ने इस निर्णय पर बड़ा विवाद मचाया व जनता को होनें वाली परेशानियों के नाम देश की हमदर्दी बटोरने का प्रयास किया किंतु देश भर में इस निर्णय के बाद विभिन्न स्थानों पर हुए चुनाव परिणाम ने यह सिद्ध कर दिया कि जनता नोटबंदी के निर्णय पर मोदी सरकार के साथ है.

बड़े बड़े अकल्पनीय आंकड़ों वाले घोटालों व आर्थिक अपराधों को देख देख कर जब देश की जनता का मानस दुखी व राजनैतिक अवसाद की स्थिति में आ खड़ा हुआ था तब देश के प्रधानमंत्री की दहाड़ कि “ न खाऊंगा न खानें दूंगा” ने देश में एक अद्भुत ऊर्जा का संचार कर दिया. इस दहाड़ के बाद अपनें मंत्रिमंडल व दलीय सहयोगियों के मध्य मोदी की कार्यशैली यह मौन मंत्र देती रही कि “ राष्ट्र सेवा में अहर्निश परिश्रम करूंगा – न सोऊंगा न सोनें दूंगा.” विगत तीन वर्षों में उन्होंने जो कहा वैसा किया भी. मोदी सरकार का भ्रष्टाचार विहीन व भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टालरेंस का रवैया रहा है उसे देखकर देश की जनता ने राहत की सांस ली है व उसका मानस “राजनैतिक अवसाद” की स्थिति से बाहर आ गया है.

मोदी सरकार ने ऐसे अनेकों निर्णय लिए जो पिछली सरकारों से या स्थापित भारतीय संसदीय प्रतिमानों (जो मूलतः तुष्टिकरण पर आधारित होते थे) से आमूलचूल अलग थे. मात्र कुछ प्रतिनिधि घटनाओं की चर्चा ही यहां की गई है, किंतु यह एक ब्रह्म सत्य है कि स्वतंत्रता के पश्चात मोदी सरकार ऐसी प्रथम सरकार है जिसके प्रत्येक निर्णय में राष्ट्रवाद का पुट प्रमुखता से रहा है.

 

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