महाकवि रंगपालजी की लोक रचनाएं


डा. राधेश्याम द्विवेदी
(स्रोत : डा. मुनिलाल उपाध्याय कृत “बस्ती जनपद के छन्दकारों का साहित्यिक योगदान” भाग 1)
रंगपाल नाम से विख्यात महाकवि रंग नारायण पाल जूदेश वीरेश पाल का जन्म सन्तकबीर नगर (उत्तर प्रदेश) के नगर पंचायत हरिहरपुर में फागुन कृष्ण 10 संवत 1921 विक्रमी को हुआ था। ‘बस्ती जनपद के छन्दकारों का सहित्यिक योगदान’ के भाग 1 में शोधकर्ता डा. मुनिलाल उपाध्याय ‘सरस’ ने पृ. 59 से 90 तक 32 पृष्ठों में विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया गया है। इसे उन्होने द्वितीय चरण के प्रथम कवि के रुप में चयनित किया है। युवा मन, साहित्यिक परिवेश, बचपन से ही तमाम कवियों व कलाकारों के बीच रहते-रहते उनके फाग में भाषा सौंदर्य श्रृंगार पूरी तरह रच-बस गया था। महाकवि रंगपाल लोकगीतों, फागों व विविध साहित्यिक रचनाओं में आज भी अविस्मरणीय हैं। दुनिया भर में अपने फाग गीतों से धूम मचाने वाले महाकवि रंगपाल अमर हैं। हालांकि आज रंगपाल की धरती पर ही, फाग विलुप्त हो रहा है। इक्का-दुक्का जगह ही लोग फाग गाते हैं। महाकवि के जन्म स्थली पर संगोष्ठी के साथ फाग व चैता का रंग छाया रहा। एक झूमर फाग में महाकवि रंगपाल ने श्रीकृष्ण व राधा के उन्मुक्त रंग खेलने का मनोहारी चित्रण कुछ इस तरह किया है-
सखि आज अनोखे फाग खेलत लाल लली।
बाजत बाजन विविध राग,गावत सुर जोरी।।
खेलत रंग गुलाल-अबीर को झेलत गोरी।
सखी फागुन बीति जाला, नहीं आये नंदलाला।
प्रेम बढ़ाय फंसाय लियो।
रंगपाल जी के लोकगीत उत्तर भारत के लाखों नर नारियों के अन्र्तात्मा में गूंज रहे थे। फाग गीतों में जो साहित्यिक विम्ब उभरे हैं वह अन्यत्र दुर्लभ हैं। वियोग श्रंगार का उनके एक उदाहरण में सर्वोत्कृष्टता देखी जा सकती है।
ऋतुपति गयो आय हाय गुंजन लागे भौंरा।
भयो पपीहा यह बैरी, नहि नेक चुपाय।
लेन चाहत विरहिनि कैजिमरा पिय पिय शोर मचाय।
हाय गुंजन लागे भौंरा।
टेसू कचनार अनरवा रहे विकसाय।
विरहि करेज रेज बैरी मधु दिये नेजन लटकाय।
हाय गुंजन लागे भौंरा।
अजहुं आवत नहीं दैया, मधुबन रहे छाय।
रंगपाल निरमोही बालम, दीनी सुधि बिसराय।
हाय गुंजन लागे भौंरा।
रंगपालजी द्वारा लिख हुआ मलगाई फाग गीत हजारों घरों में फाग गायकों द्वारा गाया जाता है। एक उदाहरण प्रस्तुत है-
यहि द्वारे मंगलचार होरी होरी है।
राज प्रजा नरनारि सब घर सुख सम्पत्ति बढ़े अपार।
होरी होरी है।
बरस बरस को दिन मन भायो, हिलि मिलि सब खेलहुयार।
होरी होरी है।
रंगपाल असीस देत यह सब मगन रहे फगुहार।
होरी होरी है।
यहि द्वारे मंगलचार होरी होरी है।
रंगपाल जी भक्ति भावना उनके शान्त रसार्णव गंथ में सूर तुलसी तथा मीरा को भी मात देती है-
बोलिये जो नहिं भावत तो एक वारहि आंखि मिलाई तो देखो।
जो नहि हो तो सहाय कोऊ लखि दीन दशा पछताय तो देखो।
रंग जू पाल पिछानतो नाहिं कछु कहि धीर धराइ तो देखो।
छोरि विपत्ति तो लेतो नहिं, भलाबुन्द दुह आंसू गिराय तो देखो।।
देखत काहि सोहाय भला अरु को दृग जोरि कै नय सुख जोवै।
कौन सुनै गुनै पाछिलिहि प्रीतिहि यातेन काहूय जाय कै रोवै।
रंग जू पाल पड़े सो सहै औ रह्यो सह्यो भ्रम काहू पै खोवै।
वर्षा गीत रंग महोदधि नामक पाण्डुलिपि में संकलित है, जिसमें मनभावन छटा झलकता है-
मुदित मुरैलिन के कूकत कलापी आज,
तैसे ही पपीहा पुंज पीकहि पुरारै री।
लपटि तरुन लोनी लतिका लवंगन की ,
चहुं दिशि उमगि मिले हैं नदी नारे री।
रंगपाल एरी बरसा की य बहार माहि,
आये नहि हाय प्रान प्रीतम हमारे री।
धूरिये धारे धुरदान, चहु धाय धाय,
गरजि गरजि करैं हियै में दरारे री।।
इसी क्रम में बसन्त ऋतु का एक चित्रण दर्शनीय है-
भूले भूले भौंर चहु ओर भावंरे से भरैं,
रंगपाल चमके चकोर समुदाई है।
कुसुमित तरु जू भावन लगे हैं मन,
गावन त्यों कोकिल को गांवन सुहाई है।
सुखप्रद धीरे धीरे डोलत समार सीरो,
उड़त पराग त्यों सुगंध सरसाई है।
विपिन समाज में दराज नवसाज भ्राज,
आज महाराज ऋतुराज की अवाई है।।
शरद गीत रंग महोदधि नामक पाण्डुलिपि में संकलित है इसकी छटा भी निराली है-
अमल अवनि आकाश चन्द्र प्रकाश रास हरि।
कुंद मालती कासकंस कुल विमलक सर सरि।
चंहकित हंस चकोर भंवर धुनि खंजन आवन।
पूजन पितृ सुदेव सुखिन मगधावनि धावन।
अरु उदित अगस्त पयान नृप दीपावलि गृहचित्र तिमि।
घन श्वेत साजहू वरनि के रंगपाल ऋतु सरद इमि।।
वरिज विकास पर मालती सुवास पर ,
माते मधु पालिनी के सरस विलास पर।
भनय रंगपाल निम लाई आस पास पर ,
कुसुमित कास पर हंसन हुलास पर।
फैली अलबेली आज सुषमा सरद वारी,
जलज निवास पर अवनि अकास पर।
तारागण भास पर चांदनी सुहास पर,
चन्द्र छवि रास पर राधा वर रास पर।।
डा. मुनिलाल उपाध्याय सरस :- “रंगपालजी ब्रज भाषा के प्राण थे। श्रंगार रस के सहृदयी कवि और बीर रस के भूषण थे। उन्होने अपने सेवाओं से बस्ती जनपद छन्द परम्परा को गौरव प्रदान किया। उनके छन्दो में शिल्प की चारुता एवं कथ्य की गहराई थी। साहित्यिक छन्दों की पृष्ठभूमि पर लिखे गये फाग उनके गीत संगीत के प्राण हैं। रीतिकालीन परम्परा के समर्थक और पोषक रंगपालजी की रचनाओं में रीतिबद्ध श्रंगार और श्रंगारबद्ध मधुरा भक्ति का प्रयोग उत्तमोत्तम था।……आपकी रचना भारतेन्दु जी के समकक्ष है।….. आपका युगान्तकारी व्यक्तित्व साहित्य के अंग उपांगों को सदैव नयी चेतना देगा एसा विश्वास है।”

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