शाहबानो से शायरा बानो तक

यह बड़ा ही शर्मनाक तथ्य है कि जो तीन तलाक पाकिस्तान जैसे कट्टरपंथी इस्लामिक देश में 1961 में प्रतिबंधित हो गया  और पच्चीसों अन्य अरब-इस्लामिक देशों में दशकों से प्रतिबंधित है वही तीन तलाक भारत में आज भी शाहबानों से लेकर शायरा बानों तक कछुआ चाल से ही पहुँच पाया है. शायरा बानो वह मुस्लिम महिला जिसने पहले पहल तीन तलाक जैसी कुप्रथा के विरुद्ध वर्ष 1915 में न्यायालय के द्वार पहलेपहल खटखटाए थे और शाहबानों वह महिला है जिसकी हितहत्या राजीव गांधी की तुष्टिकरण की नीति ने कर दी थी. आज तीन तलाक पर सर्वोच्च न्यायालय के परिवर्तनकारी निर्णय के बाद मुस्लिम बहनों में प्रसन्नता का और शेष देश भर में उत्सुकता, उत्कंठा का वातावरण है. देश भाजपा और संघ परिवार के समान नागरिक संहिता के आग्रह और वचन के प्रति आशान्वित हो गया है. हाल ही हुए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की चर्चा करें उसके पूर्व यह समझ लेना चाहिए कि स्वयं मुस्लिम समाज में यह ग़लतफ़हमी बड़े तौर पर विद्यमान है कि मुस्लिम पर्सनल ला मुस्लिम धर्म का एक हिस्सा है. किन्तु इस्लाम के गहरे जानकार यह बताते हैं कि ऐसा कतई नहीं है. मुस्लिम पर्सनल ला में केवल विवाह, उत्तराधिकार, संरक्षण, गोद लेना तथा भरण-पोषण जैसे मामलों से सम्बंधित क़ानून सम्मिलित हैं. मुस्लिम बंधू यह समझें कि इन दुनियावी चीजों से किसी धर्म का मूल चरित्र नहीं बदलता है. पर्सनल ला मामले में महत्वपूर्ण प्रगति तब हुई थी जब 18 वें विधि आयोग ने दो महत्वपूर्ण सिफारिशें की थीं, जो समान नागरिक संहिता की अवधारणा पर आधारित नहीं थीं, किंतु इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति थी. इसमें 1954 के विशेष विवाह अधिनियम में संशोधन कर भेदभावपूर्ण प्रावधानों को खत्म करना तथा सभी विवाहों का पंजीकरण अनिवार्य करना शामिल था. किन्तु तब भी राजनैतिक संकल्पशीलता के अभाव के चलते इस दिशा में प्रगति नहीं हो पाई थी. संविधान के आर्टिकल 44 में स्पष्ट लिखा है कि सरकार इस बात का प्रयत्न करेगी कि एक दिन देश भर में यूनिफार्म सिविल कोड लागू हो जाए. यूनिफार्म सिविल कोड लागू करने का मतलब ये है कि शादी, तलाक और जमीन जायदाद का बंटवारा करने में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होगा. अभी मुस्लिमो के लिए इस देश में अलग कानून चलता है जिसे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कहते है यह गैर सरकारी संगठन है. इसमें मुस्लिमों में ही परस्पर सरफुटौवल की हद तक मतभेद हैं जिसके चलते  साल 2005 में, शियाओं ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ से सम्बन्ध तोड़ लिए और उन्होंने ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के रूप में स्वतंत्र लॉ बोर्ड का गठन किया था.

अब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से तीन तलाक पर क़ानून बनाने के स्पष्ट आग्रह के साथ तीन तलाक को असंवैधानिक सिद्ध करते हुए इस पर छः माह हेतु रोक लगा दी है. न्यायालय ने सभी राजनैतिक दलों से अपने मतभेदों को दरकिनार रखने और तीन तलाक के संबंध में कानून बनाने में केंद्र की मदद करने को कहा है. देश की सर्वोच्च न्याय व्यवस्था ने यह भी कहा कि जब विश्व के अनेकों मुस्लिम बहुल देश तीन तलाक की कुप्रथा से छुटकारा पा सकतें हैं तो भारत क्यों नहीं. कोर्ट ने इस एतिहासिक निर्णय में जो विषय लिए और जो शब्द प्रयोग किये हैं उन शब्दों ने  मुस्लिम समाज में सुधार की संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए हैं. कोर्ट ने कहा कि शादी तोड़ने के लिए यह सबसे खराब अनावश्यक पद्धति है और जो मुस्लिम धर्म के अनुसार ही घिनौना है वह क़ानून के अनुसार सही कैसे हो सकता है, और कोई “पापी प्रथा” आस्था का विषय हो, यह कैसे संभव है ?! इस प्रकार इस विषय को न्यायालय ने वॉइड (शून्य), अनकॉन्स्टिट्यूशन (असंवैधानिक) और इलीगल (गैरकानूनी) शब्दों के साथ अपना निर्णय दे दिया.

मुस्लिम समाज में तीन तलाक के भयावह परिणामों को इससे समझा जा सकता है कि भारत में अगर एक मुस्लिम तलाकशुदा पुरुष है तो तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं की संख्या चार है साथ ही अपने देश में तलाकशुदा स्त्रियों में 68% हिंदू और 23.3% मुस्लिम हैं. इस स्थिति से मुस्लिम स्त्रियों को छुटकारा दिलाने हेतु आवश्यक ही होगा कि सरकार आगामी छः माह में तीन तलाक पर व्यवस्थित विधायी प्रबंध कर लेवे. यदपि न्यायालय  स्पष्ट किया है कि छः माह में क़ानून नहीं बन पाने की स्थिति में भी तीन तलाक पर न्यायालय की रोक जारी रहेगी.

जहां तक संघ परिवार, भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सम्बन्ध है तो यह स्पष्ट है कि मोदी इस विषय में अपने कदम पर सुस्पष्ट, सुसंगत व सटीक ढंग से आगे बढ़कर इस विषय को आमूलचूल हल करनें हेतु कटिबद्ध दिखते हैं. ऐसा करके जहां वे संघ के समान नागरिक संहिता के लक्ष्य की ओर आगे बढ़ेंगे वहीँ भाजपा से दूरी बनाये हुए मुस्लिम समाज के अर्धांग को भाजपा के मोहपाश में भी जकड़ लेंगे. मुस्लिम समाज की महिलायें निश्चित ही बड़ी संख्या में अपनी दुर्गति, पिछड़ेपन व मध्ययुगीन परम्परा से निजात दिलाने हेतु बड़ी संख्या में नरेंद्र मोदी की पक्षधर हो जायेंगी. यह एक सर्वविदित तथ्य है कि अन्य समाजों की तुलना में मुस्लिम समाज अधिक प्रतिशत में व लक्ष्य केंद्रित मतदान करता है. देश की नौ करोड़ मुस्लिम महिलाओं में से यदि आधी मुस्लिम महिलाओं ने भी तीन तलाक के मुद्दे पर मोदी को मतदान कर दिया तो आगामी संसद की तस्वीर कुछ और ही होगी. एक अध्ययन के अनुसार केवल इस कारण से भाजपा नीत एनडीए की लोकसभा में लगभग 30-40 सीटें बढ़ सकती है. इस्लामिक कट्टरपंथियों को अब दोहरी चिंता सता रही है एक यह कि उनके द्वारा तमाम नकली हस्ताक्षर अभियानों व अन्य बाधाएं उत्पन्न करने के बाद भी एक ओर जहां तीन तलाक की कुप्रथा कब्रगाह की ओर बढ़ रही है वहीँ दूसरी ओर सबसे बड़ा ख़तरा यह उत्पन्न हो गया है कि बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलायें इस नारकीय कुप्रथा से निजात दिलाने की प्रसन्नता में मतदान मोदी के पक्ष में ही करेंगी. मुस्लिम महिलओं के मोदी के पक्ष में खड़े होने का एक कारण यह भी है कि मोदी केवल तीन तलाक पर नहीं रूकने वाली है उनके एजेंडे में अभी मुस्लिम बहुविवाह, हलाला, स्त्री खतना  जैसी कुप्रथाएँ समाप्त करने के अभियान लाना बाकी है. मुस्लिम महिलाओं  को नारकीय जीवन गुजारने को मजबूर कर चुके भारतीय मुस्लिम समाज में व्याप्त इन कुरीतियों के विरुद्ध समाज के अंदर से भी आवाज उठना प्रारम्भ हो गई है. बोहरा समाज की महिलाएं स्त्री-खतना Female Genital Mutilation (FGM) को लेकर भी आवाज उठा रही हैं. बोहरा मुस्लिम महिला  मासूमा रानाल्वी ने प्रधानमंत्री मोदी के नाम एक खुला ख़त लिखकर इस कुप्रथा को रोकने की मांग की है. मासूमा ने अपने पत्र में पीएम को लिखा है कि – बोहरा समुदाय में सालों से ‘स्त्री-ख़तना’ या‘ख़फ्ज़’ प्रथा का पालन किया जा रहा है, जो कि एक भीषण यंत्रणा से कम नहीं है. बोहरा, शिया मुस्लिम होते हैं, इस समुदाय में आज भी छोटी बच्चियां जब 7 साल की हो जाती है, तब उसकी मां या दादी मां उसे एक दाई या लोकल डॉक्टर के पास ले जाती हैं, बच्ची को ये नहीं बताया जाता कि उसे कहां ले जाया जा रहा है या उसके साथ क्या होने वाला है? वहां उसकी योनि का वह अग्र-भाग भगांकुर (Clitoris)जो यौन-सुख देने में महती भूमिका निभाता है, उसे काट देते हैं. इस कुप्रथा का दर्द, टीस और संत्रास जीवन भर के लिए उस बच्ची के साथ रह जाता है. इस कुप्रथा का एकमात्र उद्देश्य है, महिलाओं की यौन इच्छाओं को दबाना और इस घृणित मानसिकता को लेकर विश्व भर में प्रतिवर्ष लगभग 20 करोड़ मुस्लिम महिलाओं को खतना की पाशविक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. उल्लेखनीय है कि मुस्लिम महिलाओं के साथ इस विषय में संयुक्त राष्ट्र संघ भी खड़ा है. UN ने 6 फरवरी को महिलाओं की खतना के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित किया है.

यद्दपि यह सच है कि तीन तलाक या मुस्लिम समाज में व्याप्त अन्य कुप्रथाएँ केवल क़ानून बनाने से समाप्त नहीं होने वाली हैं क्योंकि शरियत के अतीव प्रभाव में पलने बढ़ने वाला यह समाज कम ही परिवर्तनों को स्वीकार कर पाता है तथापि यह सत्य ही है कि क़ानून के इस प्रकार के सकारात्मक परिवर्तनों का शनैः शनैः ही सही किंतु स्थायी प्रभाव अवश्य होगा.

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