सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम पड़ाव नहीं 

 सामाजिक जागरूकता, सख्त कानून की दरकार 

    संजय सक्सेना

स्ुाप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक पर अपना फैसला सुना दिया है। इस कुप्रथा को सख्ती से रोकने के लिये अगर कानून बनाने की जरूरत पड़ेगी तो मोदी सरकार इसके लिये भी तैयार है। सबसे अच्छी बात यह है कि तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के फैसले का लगभग पूरा मुस्लिम समाज एक सुर में स्वागत कर रहा है, लेकिन लगता है कि अभी तीन तलाक के खिलाफ लड़ाई पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। यह बात तीन तलाक के खिलाफ न्याय का दरवाजा खटखटाने वाली महिलाएं,बुद्धिजीवी और कानून क जानकार भी मान रहे हैं। सुप्रीम अदालत के फैसले के बाद भी जो कुछ घट रहा है उससे भी ऐसा लग रहा है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद भी तीन तलाक की घटनाएं थम नहीं रही हैं, जिस दिन फैसला आया उसी के चंद घंटे के भीतर कानपुर और पटना में दो मुस्लिम महिलाओं ने अपने पतियों के खिलाफ दहेज की मांग पूरी नहीं होने पर तलाक देने और प्रताड़ित करने की रिपोर्ट दर्ज कराई,जिन लोगों के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई गई उसमें सपा की पूर्व विधायक गजाला लारी भी शामिल थीं। इसी तरह से सुप्रीम कोर्ट के फैसले के एक दिन बाद 24 अगस्त को मेरठ के सरधना में एक साथ तीन तलाक कहने का संभवता पहला मामला भी दर्ज हो गया। जहां तीन बच्चों की माॅ और एक बार फिर गर्भवती को उसके पति ने तमाम लोंगो की मौजूदगी में तलाक- तलाक -तलाक  कह डाला।
उक्त घटनाएं बानगी भर हैं और ऐसी घटनाओं से यह बात भी सच साबित होती दिख रही है कि सख्त कानून बनाये बिना यह परम्परा रूकती नहीं दिखती है। फिर भी खुशी की बात है कि हिन्दुस्तान की बड़ी आबादी(लगभग 09 करोड़)महिलाओं को आखिरकार तलाक के मामले में मुल्लाओं द्वारा थोपे गये इस्लामी कानून से मुक्ति मिल ही गई।भले ही इसके लिये लगभग 1400 सौ साल का समय लग गया हो। कई दशकांें से यह मामला विभिन्न मंचों पर सुर्खिंया बटोरते हुए कोर्ट की चैखट पर पहुंच रहा था, लेकिन तमाम सरकारों की इच्छा शक्ति के अभाव में इस पर कभी अंतिम निर्णय नहीं हो सका। अबकी बार भी सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः इस समस्या को संज्ञान में लिया था।
दरअसल,कर्नाटक की हिंदू महिला फूलवती के हिंदू उत्तराधिकारी कानून को चुनौती वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव का मुद्दा उठने पर 16 अक्टूबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक-ए-बिद्दत पर जनहित याचिका दायर करने को कहा था। इस पर उत्तराखंड के काशीपुर की सायरा बानों, जयपुर की आफरीन रहमान, हावड़ा की इशरत जहां,  सहानपुर की अतिया साबरी और रामपुर की गुलशन परवीन ने तीन तलाक को असंवैघानिक बताते हुए याचिका दायर की थी। शायद आज भी बीजेपी की जगह किसी और दल की सरकार होती तो यह फैसला नहीं आ पाता। क्योंकि जिस साफगोई के साथ केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार का पक्ष रखा, उससे सुप्रीम कोर्ट को फैसला सुनाने में और भी आसानी हो गई। केन्द्र की मोदी सरकार ने सुप्रीम अदालत में अपना पक्ष दृढ़ता पूर्वक रखते हुए कहा था कि सभी पर्सनल कानून संविधान के दायरे में हों।शादी, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकारी के अधिकार को भी एक नजर से देखा जाना चाहिए। तीन तलाक इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है।
भले ही देश की सर्वोच्च अदालत के आदेश से मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) से छुटकारा मिला हो, लेकिन इसके पीछे की उन राजनैतिक शक्तियों को नकारा नहीं जा सकता है, जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट को इस अमानवीय गैर इस्लामिक परम्परा को खत्म करने में कोई खास परेशानी नहीं आई। खासकर पीएम मोदी को इसके लिये साधुवाद देना चाहिए, जिन्होंने मुल्लाओं,कट्टरपंथियों से लेकर सियासतदारों, कथित बुद्धिजीवियों तक की आलोचनाओं और तमाम अवरोधों की परवाह नहीं की और  मुस्लिम महिलाओं को उनका हक दिलाने के लिये चट्टान की तरह अडिग रहे। इसी लिये बीजेपी के साथ-साथ अन्य कुछ दल भी इस फैसले के लिये सुप्रीम कोर्ट के अलावा मोदी सरकार की भी पीठ थपथपा रहे हैं, तो तलाक के मुद्दे पर अपने आप को पिछड़ता देख कांगे्रस मोदी सरकार को यह कहकर कटघरे में खड़ा कर रही है कि तीन साल तक मोदी सरकार ने कुछ नहीं किया, इसलिये सुप्रीम कोर्ट को तीन तलाक पर फैसला लेना पड़ा। ऐसा कहते समय कांगे्रसियों को वह मामला जरा भी नहीं याद आया जब राजीव गांधी सरकार ने कठमुल्लाओं के दबाव में आकर मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को कानून बनाकर पलट दिया था।
बात करीब चालीस वर्ष पुरानी है। जब मघ्य प्रदेश के जिला इंदौर की शाहबानो अपने प्रति हुए उत्पीड़न तथा अन्य मुस्लिम महिलाओं को उनका हक मिले,इसके लिये संघर्ष की शुरुआत की थी। शाहबानो को उनके पति मोहम्मद अहमद खान ने वर्ष 1978 में तलाक दे दिया था। तलाक के वक्त शाहबानो के पांच बच्चे थे। इनके भरण-पोषण के लिए उन्होंने निचली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाया, बाद में यह मामला हाईकोर्ट होता हुआ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सभी जगह शाहबानों के ही पक्ष मंे फैसले सुनाये गये। उस समय मुस्लिम समाज की करीब-करीब पूरी पुरुष बिरादरी शाहबानो की अपील के खिलाफ थी। इसी का ख्याल करते हुए तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला अधिनियम पारित कर दिया, जिसने शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को उलट दिया। इस कानून में कहा गया था, ‘हर वह आवेदन जो किसी तालाकशुदा महिला के द्वारा अपराध दंड संहिता 1973 की धारा 125 के अंतर्गत किसी न्यायालय में इस कानून के लागू होते समय विचाराधीन है, अब इस कानून के अंतर्गत निपटाया जायेगा, चाहे उपर्युक्त कानून में जो भी लिखा हो।’
उस समय राजीव गांधी सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्त था, इसीलिये उच्चतम न्यायालय के धर्म-निरपेक्ष निर्णय को उलटने वाला मुस्लिम महिला(तालाक अधिकार सरंक्षण) कानून 1986 आसानी से पास हो गया। इसके आधार पर शाहबानो के पक्ष में सुनाया गया फैसला कोर्ट ने पलट दिया।
शाहबानो के बेटे जमील अहमद उन दुख भरे दिनों को याद करते  और हाल ही में  आये (22 अगस्त 2017 के) फैसले पर खुशी जाहिर करते हुए बताते हैं,‘ 38 साल पहले जब कोर्ट ने अम्मी (शाहबानो) को भरण-पोषण के 79 रुपए अब्बा से दिलवाए थे, तो लगा था जैसे दुनिया भर की दौलत मिल गई, जो खुशी उस समय मिली थी, वही आज फिर महसूस हो रही है। जब फैसले को लेकर विवाद बढ़ने लगा तो अम्मी इतनी आहत हुई कि उन्होंने भरण पोषण की राशि ही त्याग दी। अबकी ऐसा नहीं हो पायेगा।सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक ठहराकर मुस्लिम महिलाओं के हक में फैसला सुनाया है। जो मशाल 38 साल पहले अम्मी ने जलाई थी, उसकी रोशनी आज पूरे देश और समाज को रोशन कर रही है।’
यह बात दावे के साथ कही जा सकी है कि आज तीन तलाक के मसले पर पीड़ित सायरा बानों जैसी तमाम महिलाओं की कोशिश भले ही रंग लाई हो, लेकिन इसकी नींव तोे 1978 में शाहबानों ने ही रखी थी। अगर उस समय मोदी की सरकार होती तो शायद मुस्लिम महिलाओं को 40 वर्षो तक यों भटका नहीं पड़ता। फिर भी यह समझा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जहां भी कहीं शाहबानों होंगी, उन्हें शुकून मिल रहा होगा। हिंदू कोड बिल व सती प्रथा उन्मूलन  के बाद यह सामाजिक कुप्रथा को बदलने का तीसरा बड़ा अवसर है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने मुस्लिम महिलाओं में ईद की खुशी बांट दी है तो कठमुल्लों की नींद उड़ी है। वह ‘मोहर्रम’ मना रहे हैं। उनको भी समझ में आ गया है कि अब देश में मुल्लाओं का नहीं अल्ला का इस्लाम स्थापित होगा। इस फैसले से हलाल जैसी कुरीतियों पर भी विराम लगना तय है।
लब्बोलुआब यह है कि मोदी के मास्टर स्ट्रोक ने करीब 40 वर्ष पूर्व लिये गये तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के निर्णय को तुच्छ साबित कर दिया है। राजीव युग में मुल्लाओं के आगे उनकी सरकार ने घुटने टेक दिये थे,लेकिन मोदी काल में किसी की नहीं चली। सिर्फ महिलाओं के हितों की बात की गई वह भी इस्लाम के दायरे में। इसके अलावा यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम महिलाओं की जीत अंतिम पड़ाव नहीं है। तीन तलाक का समूल विनाश करने के लिये सख्त कानून बनाने के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर भी और कदम उठाने पड़ेगे।

   बीजेपी की राजनैतिक बढ़त

भले ही तीन तलाक को खारिज करने का फैसला सुप्रीम अदालत ने लिया हो लेकिन इससे तमाम दलों को होने वाले नफा-नुकसान को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है। शायद यही वजह है जमीनी हकीकत को भांप कर कांगे्रस के अलावा सपा और बसपा जैसे तमाम दल भी जिन्होंने कभी भी मुस्लिम महिलाओ के हितों के बारे में नहीं सोचा, खुलकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत कर रहे हैं। अस्सी के दशक में शाह बानो मामले में मुस्लिम पर्सलन लॉ बोर्ड के रुख की वकालत करने वाली कांग्रेस ने लगभग तीन दशक बाद बोर्ड से अलग स्टैंड लिया है तो उसके पीछे भी सिर्फ सियासी वजह ही हैं। उस समय कांग्रेस की नजर देश के अल्पसंख्यक समुदाय पर थी, क्योंकि देश में तब  अल्पसंख्यकों  को अपनी ओर खींचने वाले क्षेत्रीय दलों की संख्या और मजबूती उतनी नहीं थी, जितनी आज है। इसी लिये शाहबानो मामले में कांग्रेस पर्सनल लॉ के खिलाफ जाकर अपने मजबूत वोट बैंक को खोना नहीं चाहती थी,जबकि आज जब मुस्लिमों के लिए अछूती मानी जाने वाली बीजेपी ने तीन तलाक का दांव चल कर मुस्लिम महिलाओं के बहाने अल्पसंख्यक वोट बैंक को बांटने व सेंध लगाने की कोशिश की तो कांग्रेस को अपने रुख में बदलाव करना पड़ा।
गौरतलब हो, यूपी में नतीजों ने काफी हद तक साबित कर दिया था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह काफी चतुराई के साथ मुस्लिम वोटों में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा कांगे्रस के रुख में आए बदलाव का एक कारण सामाजिक भी माना जा सकता है। जहां तीन दशक पहले तक महिलाएं अपनी निजी सोच और राय का खुलकर इजहार नहीं करती थीं, वहीं आज वह खुल कर अपने अधिकारों की बात कर रही हैं। मुस्लिम पुरूषों की सोच से इत्तर मुस्लिम महिलाएं वोट बैंक के रूप में अलग से एक बड़ी ताकत बनकर उभर रही हैं। कांगे्रस सहित सपा, बसपा और लालू यादव जेसे नेताओं के तुष्टिकरण को बढ़ावा देने वालो सियासी दल आज इस बात को समझ चुके हैं कि शाहबानो के समय में जहां महिलाएं अपने घर के पुरुषों के निर्देश पर वोट देती थीं, वहीं आज वह स्वतंत्र तौर पर अपनी पसंद जाहिर कर रही हैं। वह घरों के पुरूषों के अलावा मुल्ला मौलवियोें की खुलकर मुखालफत करने की स्थिति में है। मोदी सरकार बनने के बाद तो हालात और भी बदल गये हैं। इसी लिये कांगे्रस और सपा-बसपा और राजद जैसे  दलों की सोच में बदलाव देखने को मिल रहा है। सपा का तो इस फैसले से पूरा सियासी समीकरण ही बिगड़ सकता है।
असल में मुस्लिम महिलाएं अपनी बिरादरी के पुरूषों की तरह हो-हल्ला मचाये बिना मतदान करती हैं। इस वजह से उनके वोटों का रूझाान पता नहीं चल पाता है। 2017 के यूपी विधान सभा चुनाव हों हो या फिर इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव दोंनो में ही बीजेपी को मिली शानदार जीत को मुस्लिम महिलाओं के बीजेपी के पक्ष में किये गये मतदान से जोड़ कर देखा जाता रहा है। मुस्लिम वोट बैंक में वोटिंग का यह तरीका सपा के लिये आगे भी खतरा बन सकता है।
उधर, भाजपा जिसने 2014 के लोकसभा चुनाव में तीन तलाक को लेकर मुस्लिम महिलाओं के दर्द को उभारा और उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के समय एक कदम आगे बढ़ाते हुए अपने लोक कल्याण संकल्प पत्र का हिस्सा बनाया। उस वादे को उसने अंजाम तक पहुंचाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। भाजपा अब इस फैसले को 2019 के लोकसभा चुनाव में बड़ा मुद्दा बना सकती है। बीजेपी के कुछ नेता तो शाहबानों केस में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की कारगुजारी को आधार बनाकर उनसे (कांगे्रस से) मुस्लिम महिलाओं से माफी मांगने की भी बात करने लगे हैं। पीएम मोदी तीन तलाक वाले मास्टर स्ट्रोक से भले ही मुल्ला-मौलवियों की आंख की किरकिरी बन गये हों,लेकिन मुस्लिम महिलाओं के उनकी लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ गया है। कई मुस्लिम महिलाएं तो खुल कर कह रही हैं कि ऐसा फैसला सिर्फ मोदी राज में ही संभव था।

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