टेलीकॉम घोटाले और कोयला घोटाले : सच जो कभी उजागर न हो पाएगा


वर्षों से चल रहे भ्रष्टाचार विषयक न्यायालयीन प्रकरणों में एक एक कर फैसले आ रहे हैं और अपने अपने राजनीतिक लाभ के लिए इन फैसलों का उपयोग, राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा खुल कर किया जा रहा है। आरोप-प्रत्यारोप और स्तरहीन बयानबाजी का यह दौर उन मीडिया समूहों और एक व्यावसायिक रणनीति के तहत लार्जर दैन लाइफ इमेज से नवाजे गए कुछ स्वघोषित सुपरस्टार एंकरों को बड़ी राहत प्रदान कर रहा है जो इन मामलों में अदालत से बहुत पहले ही अपना वह फैसला सुना चुके थे जो न्यायालय के वर्तमान निर्णय के बाद हास्यास्पद लगने लगा है।यह गंभीर और बड़े मुद्दों को मनोरंजक प्रहसनों में बदल कर महत्वहीन बना देने का युग है। प्रश्नचिन्ह सब पर लगाए जा रहे हैं- दोषियों पर, निर्दोष प्रमाणित हुए लोगों पर, मामला उजागर करने वालों पर, जांच एजेंसियों पर, न्यायपालिका पर, आरोपियों के मीडिया ट्रायल पर और इनसे प्रभावित होकर अपनी सरकार चुनने वाली जनता पर। प्रश्नचिन्हों की यह भीड़ इतनी ज्यादा है कि तय करना कठिन है कि इसमें से कौन सा प्रश्नचिन्ह सच को उजागर करने के लिए लगाया गया है और कौन सा विमर्श को भटकाने के लिए लगाया गया है। पिछले डेढ़ दशक का कालखंड संवैधानिक संस्थाओं और जांच एजेंसियों पर बढ़ते अविश्वास के लिए जाना जाएगा। इस अविश्वास के पीछे इनमें आई गिरावट उत्तरदायी है या एक रणनीति के तहत इन्हें निशाना बनाया जा रहा है इसे तय करना अत्यंत कठिन है। किंतु एक भ्रष्ट समाज के उपकरण और औजार भ्रष्टाचार से मुक्त होंगे यह मानना आत्मप्रवंचना की सीमा तक आशावादी होना है। इन संस्थाओं का विरोध राजनीतिक दल तभी करते हैं जब वे विपक्ष में होते हैं, सत्तासीन होते ही ये संस्थाएं उनके लिए निष्पक्ष बन जाती हैं और वे पूरी निर्लज्जता और निर्ममता से इन संस्थाओं का उपयोग अपने राजनीतिक लाभ के लिए करने के प्रयास में रत हो जाते हैं। चाहे वह सीबीआई हो या सीएजी हो, आयकर विभाग हो, ईडी हो या फिर न्यायपालिका हो सभी की समस्याएं लगभग एक जैसी ही हैं – सभी में निचले और शीर्षस्थ स्तर पर नियुक्तियों की प्रक्रिया को पारदर्शी और सशक्त बनाए जाने की आवश्यकता है। सभी में स्टॉफ की भारी कमी है और काम का बोझ बहुत ज्यादा है, इसलिए गुणवत्ता की अपेक्षा करना व्यर्थ है। सभी संस्थाओं की स्वायत्तता को बरक़रार रखते हुए इनमें व्याप्त भ्रष्टाचार और कमियों को दूर करने के लिए एक आंतरिक नियंत्रण प्रणाली बनाये जाने की आवश्यकता है। इन पर व्यापक नियंत्रण के लिए जन लोकपाल जैसी कोई संस्था- निरंकुश और सर्वशक्तिमान होने के खतरों के बावजूद- इन खतरों को कम करने के उपायों को अपनाकर बनायी जानी चाहिए। इन संस्थाओं और एजेंसियों को सशक्त बनाने के इरादे के बिना की गई कोई भी आलोचना, इन्हें पंगु बनाए रखने की कुचेष्टा ही मानी जायेगी।
इन फैसलों पर विमर्श को जिस दिशा में ले जाया जा रहा है उसके अनेक गंभीर परिणाम निकल सकते हैं। इस बात की पूरी पूरी संभावना बनती है कि  भ्रष्टाचार के आरोपियों के निर्दोष सिद्ध होने या सबूतों के अभाव में बरी हो जाने की दर यदि इसी तरह बढ़ती रहेगी तो भ्रष्टाचार एक मुद्दे के रूप में धीरे धीरे अपनी अहमियत खोने लगेगा। एक अन्य खतरा न्यायपालिका से जरूरत से ज्यादा उम्मीद पाल लेने का है। न्याय प्रक्रिया की अपनी सीमाएं होती हैं। किसी मामले में गवाहों, सबूतों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर बहुत सीमित और संकीर्ण प्रश्नों के उत्तर देने की एक वस्तुनिष्ठ कोशिश न्यायपालिका द्वारा की जाती है किंतु यह भी न्यायाधीशों की वैयक्तिक व्याख्याओं की मोहताज होती है। जो मामले अब चिंताजनक रूप से बड़ी संख्या में न्यायपालिका के सम्मुख लाए जा रहे हैं वे नीति निर्धारण, कानून निर्माण और इन नीतियों तथा कानूनों के क्रियान्वयन की जटिलताओं से सम्बंधित हैं जिन्हें कार्यपालिका और विधायिका ही हल कर सकती हैं। किंतु आशाएं न्यायपालिका से पाली जा रही हैं और न्यायपालिका इन मुद्दों पर हस्तक्षेप कर ज्यूडिशल एक्टिविज्म के आरोप तो झेल ही रही है, अपने अव्यावहारिक सुझावों के कारण आलोचना का पात्र भी बन रही है। न्यायाधीश(और शीर्षस्थ संवैधानिक पदों पर बैठे अन्य लोग भी) मीडिया के महिमामंडन से इस प्रकार आत्ममुग्ध हो जाते हैं कि एक तंत्र के कार्यकुशल पुर्जे के स्थान पर खुद को इस तंत्र से बड़ा सर्वशक्तिमान महानायक मानकर अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करने लगते हैं। अंततः वे भी हाड़ मांस के मनुष्य ही हैं।
फ़रवरी 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने ए राजा के कार्यकाल में आबंटित सभी 122 लाइसेंसों को रद्द कर दिया था। अब जब स्पेशल कोर्ट ने किसी को दोषी नहीं पाया है तो कई सवाल मन में उत्पन्न होते हैं। इस घोटाले का टेलीकॉम सेक्टर की सेहत पर बड़ा प्रभाव पड़ा था। अर्थजगत के जानकारों के विश्लेषण दर्शाते हैं कि इसके बाद टेलीकॉम सेक्टर में मौजूद 14 कंपनियों की संख्या घट कर आधी रह गई है। इस प्रकार जब प्रतिस्पर्धा कम हो गई है तो इसका सीधा लाभ मौजूदा कंपनियों को होगा। और इसका सीधा नुकसान ग्राहकों को होगा जिन्हें सेवा में बेहतर गुणवत्ता और सस्ती दरों के अनेक विकल्प पहले की तरह उपलब्ध न होंगे। एक आकलन यह भी है कि नए रोजगारों के सृजन की बात तो दूर टेलीकॉम सेक्टर में आने वाले समय में करीब डेढ़ लाख लोग नौकरियों से हाथ धो सकते हैं।
कोयला घोटाले के आरोपी इतने भाग्यशाली नहीं हैं। पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा समेत कुछ वरिष्ठ पूर्व शासकीय अधिकारियों को सीबीआई की विशेष अदालत सजा सुना चुकी है। जब सुप्रीम कोर्ट ने 214 कोयला खदानों के लाइसेंसों को रद्द किया था तब अर्थशास्त्रियों और उद्योगपतियों के एक समूह ने इसे अर्थव्यवस्था के लिए घातक बताया था। इसे कोल् ब्लैक जस्टिस की संज्ञा दी गई थी और कहा गया था कि पावर, स्टील और माइनिंग क्षेत्रों पर इसका अत्यंत विपरीत प्रभाव पड़ेगा।
टेलीकॉम घोटाले और कोयला घोटाले में एक समानता है- लचर नीतियों और अपारदर्शी प्रक्रिया के कारण भ्रष्टाचार के अवसर उत्पन्न हुए जिनका राजनेता,अफसर और कॉर्पोरेट गठजोड़ ने भरपूर लाभ उठाया। यदि नीतियों और प्रक्रिया के निर्धारण में सभी स्टेकहोल्डर्स की भागीदारी होती, राजनीतिक दलों की राय को अहमियत दी गई होती और कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखा गया होता तो यह भ्रष्टाचार तो रुकता ही देश के आर्थिक विकास का पहिया भी निर्बाध घूमता रहता। किन्तु ऐसा नहीं हुआ।
निर्णय लेने की प्रक्रिया यदि किसी एक शक्ति केंद्र पर आश्रित हो जाती है तो बड़े बड़े निर्णय बहुत जल्दी लिए जा सकते हैं लेकिन आवश्यक नहीं है कि ये निर्णय सही भी हों।
ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो इस परिस्थिति के लिए कॉर्पोरेट्स द्वारा दिए गए प्रलोभनों को उत्तरदायी मानते हैं और इन घोटालों के उजागर होने और  मीडिया में चर्चित होने के पीछे कॉर्पोरेट समूहों की प्रतिद्वंद्विता को देखते हैं। यह भी शायद कभी तय नहीं किया जा सकेगा कि कुछ कॉर्पोरेट्स ने अपने पसंदीदा राजनीतिक दल को लाभ पहुँचाने के लिए इन घोटालों से सम्बंधित खुलासे मीडिया के माध्यम से कराए या यह एक स्वाभाविक घटनाक्रम था। जांच एजेंसी पर केस को कमजोर करने के आरोप भी लग रहे हैं और इसे डीएमके की भाजपा के साथ संभावित नजदीकियों से जोड़ कर भी देखा जा रहा है। इससे बिल्कुल विपरीत न्यायपालिका में कांग्रेस के साथ सहानुभूति रखने वाले न्यायाधीशों की चर्चा भी जोरों पर है। यदि यह चर्चाएं सत्य भी हैं तो यह घटनाक्रम भूतकाल से चली आ रही कुटिल राजनीतिक षड्यंत्रों की परंपरा के एक नवीन उदाहरण के रूप में ही देखा जाएगा। राजनीतिक घटनाक्रमों के व्याख्याकार राजनीति के इस रहस्यमय अंधकार को भेद पाने में सदैव स्वयं को असमर्थ पाते रहे हैं और यह प्रकरण कोई अपवाद नहीं है।
डॉ राजू पाण्डेय,

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