चाचा-भतीजे में पार्टी और सत्ता के वर्चस्व की जंग

akhileshपिछले कई दिनों से उत्तर प्रदेश सूबे के सबसे बडे राजनैतिक परिवार में सत्ता घमासान चल रहा है। लगातार कई दिनों से मीटिंग पर मीटिंग हो रही हैं फिर भी अब तक कोई हल नहीं निकल पाया है। झगडा यादव कुनबे का है इसलिए पार्टी का कोई भी सदस्य खुलकर नहीं बोल रहा है। जो बोल रहे हैं उनको बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। यहाँ तक की सपा के थिंक टैंक कहे जाने वाले रामगोपाल यादव जो की खुद इस कुनबे के सदस्य हैं उनको भी पार्टी ने 6 साल के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया है। क्योंकि रामगोपाल इस लडाई में अखिलेश का साथ दे रहे हैं और चाटुकार नेता अमर सिंह और शिवपाल के खिलाफ बोल रहे हैं। रामगोपाल के निष्कासन की जानकारी देते हुए समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव ने अपने चचेरे भाई रामगोपाल यादव पर गंभीर आरोप लगाए। यहाँ तक भाजपा से मिलीभगत के गम्भीर आरोप लगाते हुए कहा कि मुख्यमंत्री उनके षड्यंत्र को नहीं समझ रहे हैं। शिवपाल ने रामगोपाल पर भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोप भी लगाए। उन्होंने आरोप लगाया कि रामगोपाल अपने सांसद पुत्र अक्षय यादव और बहू को यादव सिंह भ्रष्टाचार प्रकरण में बचाने के लिये यह सब कर रहे हैं। शिवपाल ने रामगोपाल पर सी.बी.आई. से बचने के लिए भाजपा से मिलीभगत जैसे गंभीर आरोप भी लगाए। शिवपाल ने रामगोपाल पर बिहार में महागठबंधन तोडने जैसे आरोप भी लगाए। शिवपाल ने रामगोपाल पर जो आरोप लगाए वो मीडिया में पहले से ही चर्चा में थे। शिवपाल द्वारा लगाए गए आरोपों में कुछ नया नहीं था। कहा जाए तो अखिलेश द्वारा अपने आप (शिवपाल यादव) और समर्थक मंत्रियों की बर्खास्तगी की भडास थी। सवाल यहाँ है कि अगर शिवपाल को लगता है कि रामगोपाल के बेटे और बहु पर भ्रष्टाचार के आरोप सही हैं तो उन्होंने अब तक कोई बयान क्यों नहीं दिया था। और क्यों छुपाये रखा था। ये भी गौर करने वाली बात है।

रामगोपाल ने अपनी बर्खास्तगी के बाद मुम्बई से जारी एक पत्र में कहा कि नेताजी इस वक्त जरूर कुछ आसुरी शक्तियों से घिरे हुए हैं। जब वह उन ताकतों से मुक्त होंगे तो उन्हें सचाई का एहसास होगा। मंे (रामगोपाल) समाजवादी पार्टी में रहूं या ना रहूं लेकिन इस धर्मयुद्ध में अखिलेश यादव के साथ हूं। ये जो लडाई चल रही है वो सरकार और पार्टी में अपने वर्चस्व को लेकर अखिलेश बनाम शिवपाल है। अखिलेश यादव जब 2012 में मुख्यमंत्री बने थे उस समय शिवपाल यादव ने रोडा अटकाया था। लेकिन फिर भी अखिलेश को मुख्यमंत्री चुना गया तभी से शिवपाल और अखिलेश के बीच सरकार और पार्टी की जंग चल रही है। और 2017 के चुनाव से ऐन पहले पारिवारिक कलह के रूप में सामने आई। इस सबमे मुलायम अपने छोटे भाई शिवपाल और अमर सिंह का साथ दे रहे हैं। शिवपाल का साथ देते हुए मुलायम ने विधानमंडल की बैठक में बोला कि शिवपाल यादव बड़े नेता हैं। मुलायम ने शिवपाल का समर्थन करते हुए यहाँ तक कहा कि शिवपाल के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने शिवपाल यादव की तरफदारी करते हुए अपने बेटे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को फटकार लगाते हुए विधानमंडल दाल की बैठक में यहाँ तक कहा कि जो बड़ा नहीं सोच सकता है, वो नेता नहीं बन सकता है। उन्होने कहा कि मेरे एक इशारे पर नौजवान मेरे साथ खड़े हो जाएंगे। नेताजी ने अखिलेश के समर्थकों को इशारों में फटकार लगाते हुए कहा था कि पद मिलते ही तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है। जुआरियों और शराबियों की मदद कर रहे हो। उन्होने अखिलेश समर्थक नेताओं को चापलूस तक बताया। उन्होंने बैठक में शिवपाल को जमीन से जुडा हुआ नेता बताया और कहा कि मैं और शिवपाल कभी अलग नहीं हो सकते हैं। शिवपाल जमीन पर बैठते थे और मुझे कुर्सी देते थे। पार्टी में शिवपाल के कामों को कतई भुलाया नहीं जा सकता है।

विधानमंडल दल की मीटिंग से एक दिन पहले अखिलेश यादव ने मीटिंग करते हुए अमर सिंह को दलाल बताया था। और उनसे सम्बन्ध रखने वाले मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया था। जिनमें उनके चाचा शिवपाल भी थे। और नेताओं को हिदायत देते हुए कहा था कि जो अमर सिंह से सम्बन्ध रखेगा उसका भी यही हाल होगा। विधानमंडल दल कि बैठक में मुलायम ने अमर सिंह के बारे में कहा कि वे अमर सिंह के खिलाफ कुछ भी नहीं सुन सकते। उन्होंने यहाँ तक दावा किया था कि उनको (मुलायम सिंह यादव) को जेल जाने से अमर सिंह ने ही बचाया था। इस बारे में मुलायम सिंह यादव को खुलकर बताना चाहिए। जो व्यक्ति खुद तिहाड जेल गया हो भला वह मुलायम को कैसे जेल जाने से बचा सकता है। मुलायम ने विधानमंडल दल कि बैठक में अमर सिंह का खुल कर बचाव करते हुए जेल वाली जो बात बोली थी कहा जाये तो वो बिल्कुल तर्कहीन थी। अगर मुलायम सिंह यादव सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैंसले में ये बोल रहे हैं तो ये देश के सुप्रीम कोर्ट के फैंसलों पर सवाल उठाने जैसा है। और मुलायम का बयान असंवैधानिक है। जो खुद उनके चचेरे भाई रामगोपाल यादव कह रहे हैंै। विधानमंडल दल कि मीटिंग खत्म होते ही मुलायम ने अखिलेश और शिवपाल को गले मिलाया। यहाँ भी अखिलेश ने शिष्टाचार दिखाते हुए कहा कि शिवपाल मेरे चाचा हैं मैं उनके पैर छुऊंगा। लेकिन इसके बाद जो मंच पर हुआ उससे चाचा-भतीजे के बीच की खटास खुलकर सामने आई। जब अखिलेश इस वाकये के बाद मंच पर अपने खिलाफ एक निजी अखबार में छपवायी खबर के बारे में बोल रहे थे तो शिवपाल ने उनसे माइक छीनकर अखिलेश यादव को झूंठा तक कहा। दोनों चाचा-भतीजों में माइक को लेकर आपसी धक्का-मुक्की भी हुई। इससे जाहिर हुआ कि बेशक मुलायम सिंह के कहने पर दोनों को साथ आना पडे। लेकिन अब चाचा-भतीजे के दिल मिलने वाले नहीं है, और संबंधों पहले जैसी गर्मजोशी नहीं रहने वाली है।

इस बैठक के बाद दुसरे दिन कई दौर की बैठकों के बाद मुलायम सिंह ने दावा किया कि परिवार और पार्टी एक है। मुलायम ने मीडिया में कहा कि ‘‘हमारा परिवार एक है। पार्टी एक है। सभी नेता और कार्यकर्ता एक हैं।’’ पार्टी में आपसी टकराव पर विराम देने के लिए विधानमंडल दल की बुलायी बैठक के ना सिर्फ बेनतीजा रह जाने बल्कि दोनों खेमों के बीच खाई बढ जाने के बाद नेताजी मीडिया के सामने खुद आये। उनके साथ शिवपाल भी थे लेकिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव नहीं थे। इससे जाहिर हुआ कि मुलायम बेशक परिवार और पार्टी के एक होने की बात कर रहे हों लेकिन अब भी कुछ ठीक नहीं है। मुलायम ने यहाँ तक कहा कि बहुमत आने पर मुख्यमंत्री का फैसला होगा। इससे आने वाले दिनों में पार्टी और यादव परिवार में क्या होगा यह देखना रोचक होगा। लेकिन इतना जरूर है अखिलेश बिल्कुल भी खुश नहीं है। उन्होंने बेशक कहा हो कि नेताजी कहते तो वो खुद (अखिलेश यादव) मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देते। लेकिन असल में कहा जाए तो पार्टी और परिवार ने अखिलेश को इन पांच सालों में एक मुख्यमंत्री की तरह खुल कर काम ही नहीं करने दिया। वो इन पांच सालों में परिवार और उनके फैंसलों से ही घिरे रहे। जब अखिलेश इन सब चीजों से निकलना चाह रहे थे तब अमर सिंह ने अपनी चाल चलकर अपने पाले में मुलायम और शिवपाल को लेकर यादव परिवार में कलह करा दी।

2012 के चुनाव में अखिलेश यादव ने प्रदेश भर में यात्राएं निकालकर समाजवादी पार्टी के पक्ष में माहौल बनाया था। उनका 2012 में सबसे बडा मास्टर-स्ट्रोक बाहुवली नेता डीपी यादव को पार्टी में न लेना था। इससे 2012 में लोगों का अखिलेश कि तरफ और समाजवादी पार्टी कि तरफ रुझान बढा। और समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला। बेशक मुलायम यादव कह रहे हों कि 2012 में जनमत उनके नाम पर मिला। लेकिन सच्चाई यही है कि जो बहुमत मिला उसमे अखिलेश यादव का बहुत बडा योगदान था। हालांकि मुलायम और शिवपाल के योगदान को भी कम नहीं आँका जा सकता। दोनों ही जमीन से जुडे हुए नेता हैं। दोनों ने सपा को बनाने के लिए बहुत संघर्ष किया है। लेकिन अब मतदाता समाजवादी पार्टी में अखिलेश कि तरफ देखता है। इसी कडी में अखिलेश ने कौमी एकता दल से गठबंधन का भी विरोध किया, लेकिन मुलायम ने विधानमंडल दल कि मीटिंग में अंसारी को इज्जतदार नेता बताया। यह बात भी सोचने वाली है कि जिन भाइयों पर हत्या और अपहरण करने के दर्जनों केस हों वो कैसे इज्जतदार हो सकते है। अमनमणि त्रिपाठी के बेटे अमरमणि त्रिपाठी जो खुद अपनी पत्नी की हत्या के मामले में आरोपी हैं को टिकेट देना भी अखिलेश को नागवार गुजरा। कहा जाए तो सपा ने अंसारी को साथ लेकर और अमनमणि के बेटे और अपनी पत्नी की हत्या के आरोपी अमरमणि को टिकट देकर अखिलेश के पूरे चुनावी अभियान की हवा निकाल दी।

अब आने वाले समय में यह देखना होगा कि उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी सपा में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और चाचा शिवपाल में बर्चस्व की जंग क्या रूप लेती है। जिसमे एक तरफ अखिलेश और रामगोपाल है। दूसरी तरफ मुलायम शिवपाल और अमर सिंह हैं। देखना यह भी होगा कि निकट भविष्य में समाजवादी पार्टी दो धडों में बंटती है या मुलायम पार्टी और परिवार का एका कराने में कामयाब होंगे। या फिर पार्टी इस अंदरूनी कलह के साथ ही 2017 के विधानसभा चुनाव में उतरेगी। अगर पार्टी अंदरूनी कलह के साथ चुनाव में उतरती है तो निश्चित ही समाजवादी पार्टी को नुक्सान उठाना पडेगा। इस पारिवारिक कलह ने पहले ही मुस्लिम और अन्य मतदाताओं को सपा को वोट देने के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया है। अगर ऐसा हुआ तो बहुजन समाज पार्टी की तरफ मुस्लिम मतदाताओं का रुझान हो सकता है।

लेकिन इस जंग ने अखिलेश यादव को भविष्य का नेता बना दिया है। और अखिलेश ने भी दिखाया है कि वो भी बडे फैंसले लेने में सक्षम हैं अगर उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने दिया जाए। अब भविष्य में यह भी देखने वाली बात होगी की सपा के थिंक टैंक कहे जाने वाले अपने चचेरे भाई रामगोपाल यादव का निष्कासन मुलायम रद्द करते हैं या उन्हें पार्टी से बाहर ही रखते हैं। अखिलेश को टिकट बांटने का अधिकार मिलता है या नहीं यह भी देखने वाला होगा। पार्टी और परिवार में एका तभी माना जाएगा जब मुलायम, रामगोपाल, शिवपाल, और अखिलेश यादव सामूहिक रूप से काम करेंगे। ये तभी संभव हो सकता है जब अमर सिंह पार्टी से बाहर होंगे क्योंकि अमर सिंह अखिलेश यादव को फूटी आँख नहीं सुहाते हैं। लेकिन मुलायम द्वारा ये होना मुश्किल है। इस सबके बीच निकट भविष्य में मुलायम परिवार का एका भी मुश्किल है। पार्टी के नाम पर बेशक एका हो जाये लेकिन दिलों के अन्दर आयी हुई खटास को दूर करना मुश्किल है।

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