स्कूलों में असुरक्षित बच्चे

unsafeअरविंद जयतिलक
अगर यह सच है कि दिल्ली के रेयान इंटरनेशल स्कूल के छात्र देवांश की मौत सेप्टिक टैंक में गिरने की वजह से नहीं बल्कि अमानवीय कृत्यों की वजह से हुई तो निःसंदेह यह घटना देश व समाज को शर्मसार करने वाला है। जिस तरह स्कूल प्रशासन देवांश की मौत को लेकर एक के बाद एक नयी कहानी गढ़ रहा है उससे उसकी भूमिका कठघरे में आ गयी है। यह तथ्य ढे़र सारी आशंका पैदा करता है कि देवांश के शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था और उसके प्राइवेट पार्ट पर काॅटन लगा हुआ था। देवांश के अभिभावकों की मानें तो देवांश के साथ पहले दुष्कर्म हुआ और फिर उसकी हत्या कर सेप्टिक टैंक में फेंक दिया गया। उचित होगा कि दिल्ली सरकार इस घटना की निष्पक्ष जांच कराए और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दे। यह इसलिए भी आवश्यक है कि स्कूलों में बच्चों के यौन शोषण की घटना लगातार बढ़ रही है और अभिभावकों के मन में अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर भय बढ़ता जा रहा है। अभी चंद रोज पहले ही रांची के सफायर इंटरनेशनल स्कूल के हाॅस्टल में 12 वर्षीय छात्र विनय की मौत भी अखबारों की सुर्खियां बना है। इस मौत को भी यौन शोषण से ही जोड़कर देखा जा रहा है। इस मामले मे स्कूल के तीन शिक्षकों को गिरफ्तार किया गया है और उनकी भूमिका की जांच हो रही है। हालात यह है कि इस घटना के बाद कोई भी अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल के छात्रावास में रखने को तैयार नहीं है। इन घटनाओं से समझना कठिन हो गया है कि जब शिक्षा स्थली में ही बच्चे सुरक्षित नहीं रहेंगे तो फिर अन्यत्र उनकी सुरक्षा को लेकर मुतमईन कैसे हुआ जा सकता है। गौर करें तो स्कूलों में बच्चों के साथ यौन शोषण की यह कोई पहली दिलदहलाने वाली घटना नहीं है। अभी दो वर्ष पूर्व देश के आइटी हब कहे जाने वाले बंगलुरु में एक दसवीं की छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार का मामला उजागर हुआ। इसी तरह देश की राजधानी दिल्ली, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, मध्यप्रदेश के दामोह और बवाना में स्कूली बच्चों के साथ यौन शोषण का मामला उजागर हुआ। याद होगा गत वर्ष पहले मथुरा में एक शिक्षक द्वारा अपनी शिष्या को डरा धमका कर कई दिनों तक दुराचार करने का मामला अखबारों की सुर्खियां बना। उड़ीसा के भुवनेश्वर में एक शिक्षक दस साल की बच्ची के साथ ज्यादती करते पकड़ा गया। एक स्कूल में एक नेत्रहीन बच्चे को एक शिक्षक द्वारा जल्लादों की तरह पीटा गया। इस तरह की घटनाएं आए दिन सामने आ रही है। ऐेसे में सवाल लाजिमी है कि आखिर स्कूल और शिक्षक अपनी सकारात्मक भूमिका को लेकर कब संवेदनशील होंगे? लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि स्कूलों में बच्चों के साथ इस तरह का अमर्यादित और घिनौना आचरण क्यों किया जा रहा है? इस तरह की घटनाएं यही प्रतीत कराती है कि हमारे शिक्षा मंदिर बुरी तरह दुषित और संवेदनहीन होते जा रहे हैं। संभवतः उसी का नतीजा है कि आज इस तरह की शर्मसार करने वाली घटनाएं सामने आ रही हैं। स्कूलों को शिक्षा का मंदिर और गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का दर्जा प्राप्त है। अनादिकाल से गुरु को समाज व राष्ट्र का विधाता और युग निर्माता कहा जाता रहा है। धार्मिक व ऐतिहासिक गं्रथों में उसकी महिमा की बखान किया गया है। वेद, पुराण, उपनिषद् और ब्राह्मण ग्रंथों में गुरुजनों की ज्ञान, शील, आचारण के हजारों आख्यान मौजूद हैं। लेकिन त्रासदी है कि आज के दौर में शिक्षा न तो मंदिर की तरह पवित्र रह गया और न ही गुरु का आचरण अपनाने लायक। स्कूल और शिक्षक दोनों ही संस्कारों की वर्जनाएं तोड़ समाज के मूल्य-प्रतिमानों को आघात पहुंचा रहे हैं। गुरु और शिष्य का पवित्र संवेदनात्मक रिश्ता जो कभी पिता-पुत्र व पिता-पुत्री के तौर पर परिभाषित होता था वह आज शिक्षा मंदिरों में कलंकित होने लगा है। हालात इतने बदतर हो गए हैं कि शिक्षा के मंदिर जहां चरित्र को गढ़ा-बुना जाता है, उदात्त भावनाओं को पंख दिया जाता है, वह आज खुद चरित्र के गहरे संकट से जुझ रहा है। जिन शिक्षा मंदिरों से ज्ञान की गंगा प्रवाहित होनी चाहिए वहां अब शारीरिक-मानसिक शोषण की चीत्कारें उठ रही हैं। अभी गत वर्ष पहले ही महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया कि देश में हर चैथा स्कूली बच्चा यौन शोषण का शिकार हो रहा है। हर ढ़ाई घंटे के दरम्यान एक स्कूली बच्ची को हवस का शिकार बनाया जा रहा है। यूनिसेफ की रिपोर्ट से भी उद्घाटित हो चुका है कि 65 फीसदी बच्चे स्कूलों में यौन शोषण के शिकार हो रहे हैं। इनमें 12 वर्ष से कम उम्र के लगभग 41‐17 फीसदी, 13 से 14 साल के 25.73 फीसदी और 15 से 18 साल के 33.10 फीसदी बच्चे शामिल हैं। यह सच्चाई हमारी शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद को हिला देने वाली है। रिपोर्ट पर विश्वास करें तो स्कूलों में बच्चों को जबरन अंग दिखाने के लिए बाध्य किया जाता है। उनके नग्न चित्र लिए जाते हैं। दुषित मनोवृत्ति वाले अधम शिक्षकों द्वारा बच्चों को अश्लील सामग्री दिखायी जाती है। एक दौर था जब गुरुजनों द्वारा बच्चों में राष्ट्रीय संस्कार विकसित करने के लिए राष्ट्रीय महापुरुषों और नायकों के साथ अमर बलिदानियों के किस्से सुनाए जाते थे। इन कहानियों से बच्चों में आत्माभिमान जाग्रत होता था। उनमें समाज व राष्ट्र के प्रति निष्ठा और समर्पण का भाव विकसित होता था। लेकिन आज बच्चों में आदर्श भावना का संचार करने वाले खुद आदर्शहीनता से शापग्रस्त दिखने लगे हैं। शिक्षा मंदिरों में अराजक वातारवरण के कारण बच्चे स्कूल जाने से कतराने लगे हैं। उनके मन में खौफ पसर रहा है। सवाल यह उठता है कि ऐसे विकृत माहौल को जन्म देने के लिए कौन लोग जिम्मेदार है? सिर्फ शिक्षक ही या समाज व हमारी संपूर्ण शिक्षा प्रणाली भी? सवाल यह भी है कि अगर शिक्षा मंदिरों का माहौल इसी तरह अराजक बना रहा तो फिर बच्चों में नैतिकता और संस्कार का भाव कैसे पैदा होगा? जब शिक्षा देने वाले ही अनैतिक आचरण का प्रदर्शन करेंगे तो फिर राष्ट्र की थाती बच्चों का चरित्र निर्माण कैसे होगा। गत वर्ष पहले राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा बच्चों के शोषण पर गहरी चिंता जताया गया। आयोग ने आपत्ति जाहिर करते हुए कहा कि बच्चों की सुरक्षा के निमित्त सरकार द्वारा सकारात्मक कोशिश नहीं की जा रही है। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया की रिपोर्ट में भी आशंका जतायी गयी कि शिक्षण संस्थाओं में बढ़ रहा यौन शोषण समाज को विखंडित कर सकता है। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक देश की राजधानी दिल्ली में ही 68.88 फीसदी मामले छात्र-छात्राओं के शोषण से जुड़े पाए गए। ये आंकड़े समाज को शर्मिंदा करने वाले हैं। समझा जा सकता है कि जब देश की राजधानी में बच्चों के साथ इस तरह का आचरण-व्यवहार हो रहा है तो दूरदराज क्षेत्रों में बच्चों के साथ क्या होता होगा। स्कूलों में समुचित वातावरण निर्मित करने के उद्देश्य से गत वर्ष राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने शिक्षकों के लिए मानक आचार संहिता पेश की। उद्देश्य था-छात्रों को मानसिक और भावनात्मक संरक्षण प्रदान करना। लेकिन जिस तरह शिक्षा के केंद्रों में बच्चों के शारीरिक शोषण की घटनाएं बढ़ रही हैं और भगवान कहे जाने वाले गुरुजनों का आचरण घिनौना होता जा रहा है उससे शिक्षा के सार्थक उद्देश्यों पर ग्रहण लगता जा रहा है। आज जरुरत इस बात की है कि सरकार और स्कूल प्रबंधन स्कूलों में बच्चों के साथ होने वाली ज्यादतियों और अप्रिय घटनाओं को रोकने के लिए ठोस नीति तैयार करें और शिक्षकों की नियुक्ति के पहले उनके आचरण-व्यवहार का मनोवैज्ञानिक परीक्षण कराएं।

 

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