लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 08 नवंबर को नोट बंदी का फरमान क्या सुनाया। उत्तर प्रदेश की चुनावी सियासत पर ग्रहण लग गया, जहां विभिन्न दलों में टिकट के लिये मारामारी मची हुई थी,वहां अब सबसे ज्यादा #नोटबंदी पर ही चर्चा हो रही है। नोटबंदी ऐसा मुद्दा है जिसे न तो बीजेपी छोड़ना चाहती हैं, नही विरोधी दलों के नेता इसके मोह से दूर हो पा रहे हैं। सबको इसमें अपना-अपना सियासी फायदा नजर आ रहा है। इसी फायदे के चक्कर में टिकट बांटने का काम हासिये पर चला गया है। सभी दल पूरी ताकत के साथ मोदी को घेरने में लग गये हैं। अब उम्मीद यही जताई जा रही है कि टिकट बांटने का काम नये साल में ही परवान चढ़ पायेगा। क्योंकि तब तक नोटबंदी की सियासत का ग्राफ गिर चुका होगा और चुनाव में भी कुछ दिन बाकी बचे रह जायेेगे। नोटबंदी के चलते तमाम उम्मीदवारों के टिकट भले ही नहीं फायनल हो पा रहे हों,लेकिन बीजेपी को छोड़कर सभी दलों ने अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार जरूर घोषित कर दिया है।
उत्तर प्रदेश विधान सभा का कार्यकाल करीब तीन माह में खत्म होने को है्र। सबके दिलो-दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा है। अखिलेश के बाद कौन………. या फिर से अखिलेश………. ? अगर अखिलेश पुनः सीएम बन गये तो ठीक,मगर नहीं बने तो इसके जबाव में बसपा सुप्रीमों मायावती के अलावा भी कई नाम हैं। कांगेस,सपा और बसपा ने तो अपने सीएम प्रत्याशी घोषित कर ही दिये हैं,लेकिन बीजेपी सीएम की जगह मोदी का चेहरा आगे करके चुनाव लड़ने का मन बना चुकी है। उक्त दलों में से किसी भी पार्टी को बहुमत मिला तो सीएम के नाम पर शायद ही कोई विवाद देखने को मिलेगा, लेकिन इसके अलावा भी कुछ ऐसी पार्टिंयां हैं जिनका अपना तो कोई खास जनाधार नहीं हैे,मगर गठजोड़ की राजनीति के सहारे यह अपनी नैया पार करने में लगे हैं। यह वह दल हैं जो यह मानकर चलते हैं कि अगर जनता ने किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया और खिचड़ी सरकार बनने की नौबत आई तो उनका (छोटे-छोटे दल और गठबंधन की पार्टियां) महत्व बढ़ जायेगा। लोग भूले नहीं हैं इसी सोच के तहत 2012 के विधान सभा चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजित सिंह ने अपने पुत्र जयंत चैधरी को सीएम प्रत्याशी घाषित करके चूुनाव लड़ा था। छोटे चैधरी को उम्मीद थी कि जयंत को आगे करने से रालोद की कुछ सीटें बढ़ सकती हैं। परंतु जब नतीजे आये तो रालोद इकाई की संख्या पर ही ठहर गई थी। उसे मात्र आठ सीटों पर ही जीत हासिल हो सकी।
अतीत से निकल कर वर्तमान पर आया जाये तो यह साफ नजर आ रहा है कि 2012 से 2017 के बीच यूपी की सियासत काफी बदल चुकी है। कई पुराने सूरमा हासिये पर जा चुके हैं तो अनेक नये सियासी चेहरे क्षितिज पर आभा बिखेर रहे हैं। 2012 के विधान सभा चुनावों से प्रदेश को अखिलेश यादव के रूप में एक युवा और उर्जावान नेता मिला था, जिसकी चमक तमाम किन्तु-परंतुओं के साथ आज भी बरकरार है। पांच वर्ष पहले सपा की सियासत मुलायम सिंह यादव के इर्दगिर्द घूमती थी,लेकिन आज की तारीख में सपा के लिये मुलायम से अधिक महत्ता दिखाई पड़ रही है। 2012 के चुनाव में बसपा-सपा मुख्य मुकाबले में थीं तो इस बार बीजेपी भी पूरी दमखम के साथ ताल ठोंक रही है। 2014 के आम चुनाव में बीजेपी गठबंधन ने 73 लोकसभा सीटें जीत कर विरोधियों को धूल चटाई थी,इसके बाद से बीजेपी के हौसले बढ़े हुए हैं। खैर, कोई भी पार्टी जीते सेनापति (सीएम) का फैसला तो हो ही जायेगा, लेकिन इसके लिये पर्याप्त संख्या में सैनिकों (विधायकों) की भी जरूरत पड़ती है। इसी लिये सभी दलों के नेता सैनिकों के चयन के लिये मैराथान बैठकें करने के अलावा तमाम ‘टोटके’ अपना रहे हैं। सभी दलों का शीर्ष नेतृत्व 2017 के चुनावी मैदान में प्रत्याशियों को उतारने से पहले उनका दमखम परखे रहे हैं। विभिन्न दलों का शीर्ष नेतृत्व प्रत्याशियों की जीत का फार्मूला तैयार करने के लिये जातीय गणित से लेकर प्रत्याशी की व्यक्तिगत खूबिंयों, विरोधियों की ताकत सब पर नजर रखे हुए है।
सबसे पहले सपा की बात। समाजवादी पार्टी ने अब तक सिर्फ हारी हुई सीटों पर प्रत्याशी घोषित किए हैं। मौजूदा विधायकों के पांच साल के कामकाज को देखा जा रहा है। समाजवादी पार्टी 2012 में जिन सीटों पर हारी थी, उन 175 सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर चुकी है। इन प्रत्याशियों के नाम की घोषणा के लिये एक पैनल बनाया गया था। इस पैनल में मंत्री शाहिद मंजूर, कमाल अख्तर, अरविंद सिंह के साथ एमएलसी एसआरएस यादव और नरेश उत्तम शामिल थे। टिकट के दावेदारों से कई सवाल पूछे गये थे,जैसे वह(टिकट के दावेदार) चुनाव में कितना खर्च करेंगे ? क्षेत्र का जातीय आधार क्या है ? पिछले बार वहां क्या स्थिति थी ? क्यों चुनाव हार गए थे ? इसके बाद एक सीट पर दो या तीन के नाम पैनल दूसरी कमेटी को भेजे गये। इस कमेटी में सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव, सपा प्रदेश अघ्यक्ष शिवपाल यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अंतिम नाम पर फैसला लिया। जिन सीटों पर 2012 में जीत का अंतर काफी कम रहा था, वहां एक ही नाम भेजा गया और उसी प्रत्याशी का नाम घोषित कर दिया गया। सपा के मौजूदा सवा दो सौ विधायकों को टिकट देने से पहले उनकी भी ग्राउंड रिपोर्ट तैयार की गई है। करीब 50 विधायकों को इस योग्य नहीं माना गया कि वह अपना चुनाव जीत सकते है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विधायकों की रिपोर्ट सबसे ज्यादा खराब थी। कुछ विधायकों ने तो जनता के लिए कोई काम ही नहीं किए हैं। यह भी सामने आया है कि बहुत से विधायक क्षेत्र में कम और लखनऊ में ज्यादा चहल-कदमी करते रहे। जनता के काम की बजाए ठेके पट्टे,भू-कब्जे में ज्यादा लगे रहें।
उत्तर प्रदेश में करीब दो दशकों से सत्ता की अदला-बदली का खेल चल रहा है। कभी सपा सत्ता में आ जाती है तो कभी बसपा के हाथ में सूबे की कमान आ जाती है। 2007 में बसपा सोशल इंजीनयरिंग के सहारे सत्ता में आई थी। इसमें बसपा के परम्परागत दलित वोटरों के अलावा ब्राह्मण और मुसलमान वोटरों का भी साथ बीएसपी को मिला था। उस समय मायावती ने दलितों के बाद ब्राह्मणों को तवज्जो दी थी,परंतु अबकी से माया को ब्राह्मणों से अधिक मुस्लिम वोट बैंकी की चिंता सता रही है।। सबसे अधिक लगभग 125 टिकट मुसलमानों को दिए जाने को दिये गये हैं।इसके अलावा 90 के करीब सवर्ण नेताओं को टिकट दिया गया है। इसमें ब्राह्मणों को 35, क्षत्रिय को 35 और अन्य को 23 टिकट शामिल हैं। आरक्षित 83 सीटों पर दलित प्रत्याशी उतारे गए हैं। बसपा के लिये के लिए आरक्षित सीटें बड़ी चुनौती हैं। बीजेपी की भी इन सीटों पर मजबूत दावेदारी है। गौरतलब हो बसपा के लिए दलितों के अलावा अन्य जातियों का वोट हासिक करना मुश्किल काम होता है। सवर्ण और मुसलमान वोट जुटाने के लिए बसपा सुप्रीमों मायावती भाईचारा सम्मेलनों का सहारा ले रही है।
2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी से शानदार जीत हासिक करने के बाद से ही बीजेपी यहां सत्ता में वापसी का सपना देख रही है। बीजेपी ने अभी तक अपने प्रत्याशियों के नाम फायनल नहीं किये हैं। करीब दो-तिहाई सीटों पर परिर्वतन यात्रा के बादं उम्मीदवारों के नाम सार्वजनिक किये जाने की बात कही जा रही हैै। पहले चरण में वह सीटें होगी,जो भाजपा की झोली में हैं या फिर जहां बीजेपी मजबूत स्थिति में है। ऐसी सीटों की संख्या सौ के करीब बताई जा रही है। इसके अलावा बीच सीटों पर बीजेपी आलाकमान बेहद बारीकी के साथ प्रत्याशियों का नाम छांटने की प्रक्रिया में लगा है। सूत्र बताते हैं कि कुछ सीटांे को छोड़कर प्रत्याशियों के नामों पर आम सहमति बन गई हैं। इन सीटों के लिए दो-तीन नाम छांटे चा चुके हैं। प्रत्याशियों के नाम तय करने की प्रक्रिया में संगठन के अलावा आरएसएस के सर्वे से लेकर सांसदों-विधायकों के सुझाव भी शामिल हैं। अंतिम नाम चुनने की कवायद शुरू भी हो चुकी है,लेकिन प्रत्याशियों के नाम सार्वजनिक किये जाने से पूर्व आलाकमान की प्राथमिकता सम्मेलनों और परिवर्तन यात्रा जैसे संगठनात्मक अभियानों को कामयाब बनाने की है। टिकट के दावेदारों को भी पता है कि परिवर्तन यात्रा या सम्मेलनों मंे भीड़ जुटा कर ही वह अपने नाम पर मोहर लगवा सकते हैं। परिर्वतन यात्रा और सम्मेलनों के दौरान पार्टी को तय नामों पर बेहतर फीडबैक लेना आसान रहेगा। परिवर्तन यात्रा 24 दिसंबर को खत्म होगी।
बीजेपी आलाकमान द्वारा बाहर से आए तमाम पार्टी के विधायकों और कुछ बड़े नेताओं को टिकट की गारंटी नहीं दी गई है,लेकिन इनकी भी मजबूत दावेदारी है। यूपी में बीजेपी के 47 विधायक हैं। बाहरी विधायकों और टिकट के दावेदार नेताओं की संख्या भी इसमें जोड़ दी जाये तो यह आंकड़ा 70 के करीब हो पहुंच जाता है। करीब 5 सीटें ऐसी हैं, जिन पर टिकट को लेकर बहुत ज्यादा मारामारी मची हुई है। यह वो सीटें हैं, जहां बीजेपी को करीबी मुकाबले में हार मिली थी। वहीं कुछ सीटों पर जहां सांसद या किसी बड़े नेता के रिश्तेदार का लड़ना पार्टी के लिए फायदेमंद लगता है, वहां भी आलाकमान सामजस्य बैठाने में लगा है।
कांग्रेस में टिकट वितरण की तस्वीर फिलहाल साफ नहीं नजर आ रही ही है। कांगे्रस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर और यूपी में प्रचार-प्रसार की कमान संभालने वाले नेताओं के बी मनमुटाव खुल कर सामने आ रहा है। गठबंधन को लेकर भी कांगे्रस को कहीं कोई सफलता मिलती नहीं दिख रही है। बसपा हाथ नहीं रखने दे रही है और सपा ने भी कांगे्रस को ठंेगा दिखा दिया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर भले ही गठबंधन की बात सिरे से खारिज करते हों लेकिन प्रशांत किशोर सपा-बसपा से बात नहीं बनने के बाद राष्ट्रीय लोकदल,जनता दल युनाइटेट आदि क्षेत्रीय दलों का गठबंधन बनाने को आतुर नजर आ रहे हैं,लेकिन इस सबके बीच रूक-रूक कर चर्चा यह भी चल रही है कि प्रशांत किशोर का साथ कांग्रेस छोड़ सकती है। अगर ऐसा हुआ तो टिकट के लिए पहले से तय किए गए मानकों को लागू करा पाना कांग्रेस नेतृत्व के लिए आसान नहीं होगा। ऐसे में फिर पुरानी परंपरा के आधार पर ही टिकट बंटेंगे। फिलहाल कांगे्रस में टिकट वितरण से अधिक चर्चा प्रियंका गांधी को लेकर हो रही है। कांगे्रसी ऐसा प्रचार कर रहे हैं मानों प्रियंका जादू की छड़ी लेकर आयेंगी और सबको किनारे लगा देंगी।
लब्बोलुआब यह है कि अगले दो महीनों सभी राजनैतिक दलों के लिये काफी अहम होने जा रहे हैं। इसी बीच सभी को अपने प्रत्याशियों के नामों पर अंतिम फैसला करना ही पड़ेगा। यह फैसला संभवता हो भी चुका होता अगर नोटबंदी की सियासत न परवान चढ़ी होती। मोदी के नोटबंदी के एलान ने सभी दलों की सियासी सैटिंग बिगाड़ दी है। इस सदमें से उबरने के बाद ही सपा,बसपा और कांगे्रस अपने प्रत्याशियों के नामों पर अंतिम मोहर लगा पायेंगी। वहीं राष्ट्रीय लोकदल जैसे छोटे-छोटे सियसी दल अपनी साख बचाये रखने के लिये ‘बैसाखी’ तलाश रहे हैं।

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