वेद तथा वेदानुकूल ग्रन्थों पर आधारित धर्म ही सनातन धर्म है


-मनमोहन कुमार आर्य

धर्म मनुष्यों वा स्त्री-पुरुषों द्वारा उन सद्गुणों के धारण व आचरण करने को कहते हैं जो सत्य पर आधारित हों, अज्ञान व अन्धविश्वास से सर्वथा रहित हो तथा जिनके आचरण से मनुष्य का इहलोक व परलोक दोनों सुधरता हो। ऐसा ही धर्म सृष्टि के आरम्भ काल से आर्यावर्त में प्रचलित रहा है जिसका मूल-आधार ईश्वर प्रदत्त चार वेदों का ज्ञान है। मनुष्यों के जो आचरण वेदों की शिक्षाओं से अविरुद्ध हो उसे ही सनातन धर्म कहा जाता है। ऐसा धर्म संसार में कौन सा है? इसका उत्तर है कि सनातन धर्म वही है जो वेद व ऋषियों के वेदानुकूल ग्रन्थ उपनिषद, दर्शन, प्रक्षेप रहित शुद्ध मनुस्मृति में प्रतिपादित है अथवा जो वेदों के महान् ऋषि स्वामी दयानन्द के वेद एवं ऋषियों के ग्रन्थों पर आधारित सत्यार्थप्रकाश व ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका सहित वेदभाष्य आदि ग्रन्थों में वर्णित है। हम जानते हैं कि सृष्टि के आरम्भ से भारत व विश्व के सभी देशों में वेदों में निर्दिष्ट कर्तव्यों को ही धर्म माना जाता था तथा इसी की शिक्षा सभी ऋषि व विद्वान दिया करते थे। ऋषियों ने वेदों की शिक्षाओं को ही सरल करके उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में उनका विधान किया जिससे वेदावलम्बियों को धर्मपालन में किंचित असुविधा न हो। महाभारत युद्ध से पूर्व तक वेद ही पूरे संसार के धर्म ग्रन्थ थे। तब न पारसी, न बौद्ध व जैन और न ही ईसाई व इस्लाम मतों का अस्तित्व था। सारे संसार के लोग वेद मत को ही स्वीकार करते थे।

महाभारत के बाद भारत सहित विश्व में वेदों का अध्ययन व अध्यापन बाधित हुआ। वेदों का प्रचार व उसके सत्यार्थ को लोग भूलते गये और उनका स्थान वेदों के रूढ़ अर्थों व विकृत अर्थों जो भ्रान्तियों से युक्त थे, ले लिया। महाभारत से लेकर ऋषि दयानन्द (1825-1883) के काल तक वैदिक धर्म का निरन्तर ह्रास होता रहा जिसका कारण वेदों के अर्थों के न जानने वाले ऋषि आदि विद्वानों का विद्यमान न होना एवं धर्म से जुड़े कुछ लोगों के स्वार्थ थे जो वेदों के यथार्थ अर्थ जानने का प्रयास ही नहीं करते थे और न अन्य वर्णों को वेदाध्ययन की समुचित सुविधायें थीं। इसी कारण अज्ञान में वृद्धि होने से ज्ञानयुक्त धर्म का स्थान अज्ञान व अन्धविश्वासों ने ले लिया और इसके साथ समाज में भी मिथ्या ज्ञान व अन्धविश्वासों से युक्त जन्मना-जातिवाद आदि का प्रचलन हुआ। इस काल में स्त्री व शूद्रों को वेदाध्ययन ही नहीं अपितु वेद मन्त्रों के सुनने व उच्चारण करने के अधिकार को भी छीन लिया गया और यदि कोई वेद को जानने का प्रयास करते हुए मन्त्र का उच्चारण करता व सुनता था तो उसे यातनायें दी जाती थी। इसी कारण से विभिन्न मत-मतान्तर उत्पन्न होकर वेद ज्ञान का सूर्य अस्त हो गया और वैदिक धर्म का स्थान अविद्या व अन्धविश्वासों से युक्त पौराणिक एकाधिक मतों यथा वैष्णव, शैव, शाक्त आदि ने ले लिया जिसे कुछ लोग सनातन धर्म कहते हैं जबकि यह सब अविद्या व अन्धविश्वासों से मिश्रित व युक्त मत हैं। यदि वैदिक धर्म में अज्ञान व अन्धविश्वासों का मिश्रण न हुआ होता तो न तो बौद्ध-जैन व अन्य मत ही उत्पन्न होते और न देश मुसलमानों व अंग्रेजों का गुलाम हुआ होता। महर्षि दयानन्द को भी तब वेद व विद्या का प्रचार कर वैदिक धर्म का पुनरुद्धार करने की आवश्यकता नहीं थी। महर्षि दयानन्द जी ने जो कार्य किया वह प्राचीन वैदिक सनातन धर्म के सुधार संशोधन का कार्य था जिसे वेदों के पुनरुद्धार के नाम से भी जाना जाता है।

               यह भी बता दें कि वेदों का प्रकाश परमात्मा से सृष्टि के आरम्भ में हुआ था जबकि 18 पुराणों की रचना कुछ लोगों ने वास्तविक लेखक का नाम छुपा कर ऋषि वेदव्यास जी के नाम से की जिससे लोग भ्रम का शिकार होकर इन पर विश्वास कर लें। सभी पुराणों की रचना का काल विगत 500 से 2000 वर्षों के बीच का है। पुराणों में परस्पर विरोधी एवं अविद्यायुक्त वचनों की भरमार है तथा अविश्वसनीय इतिहास भी है जिस कारण यह ग्रन्थ धर्म ग्रन्थ के महिमापूर्ण आसन पर विराजमान नहीं हो सकते। आर्यसमाज के विद्वान पं. मनसाराम वैदिकतोप जी ने पौराणिक पोल प्रकाश’ एवं पौराणिक पोप पर वैदिक तोप’ नामक विशालकाय ग्रन्थ लिखकर इनसे सम्बन्धित तथ्यों को प्रकाशित किया है जिससे पुराणों के अर्वाचीन होने सहित इसमें अविद्या का प्रभूत अंश होने का ज्ञान होता है। यही कारण था कि जब ऋषि दयानन्द ने वेदों के सत्य अर्थों का प्रचार किया तो पठित व विवेक बुद्धि रखने वाले लोग उनके द्वारा प्रचारित वैदिक धर्म की ओर आकृष्ट हुए और उन्होंने न केवल वैदिक धर्म को अपनाया अपितु इसका पूरी निष्ठा से प्रचार भी किया। स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज, स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती एवं महात्मा आनन्द स्वामी जी ऐसे ही धर्मनिष्ठ व सत्पुरुष थे जिन्होंने देश विदेश तक वेदों का सन्देश पहुंचाया। इसी कारण हिन्दुओं का ईसाईयों व मुसलमानों द्वारा जो छल व प्रलोभन सहित बल प्रयोग द्वारा धर्मान्तरण होता था उस पर भी आंशिक रोक लगी और उन्होंने नगर आदि में धर्मान्तरण न कर दूर दराज के ग्रामीण, पर्वतीय व अन्य दूरस्थ नागरिक सुविधाओं से रहित स्थानों के निर्धन व अशिक्षित लोगों को अपना शिकार बनाया।

               ऋषि दयानन्द के प्रचार क्षेत्र में आगमन के समय देश में अज्ञान व अन्धविश्वासों पर आधारित ईश्वर-ज्ञान-वेद के विरुद्ध मूर्तिपूजा, अवतारवाद की मिथ्या मान्यता, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध आदि अविद्यायुक्त बातें प्रचलित थे जिससे समाज कमजोर व दुःखी हो रहा था। गुण, कर्म व स्वभाव पर आधारित वर्ण व्यवस्था लुप्त हो चुकी थी और उसका स्थान अस्वाभाविक व अनुचित जन्मना-जाति-प्रथा ने ले लिया था जिससे समाज में योग्य विद्वान, शिक्षक, ज्ञानी, विवेकी लोग उत्पन्न होना बन्द हो गये थे। नारियों और जन्मना-जातिवाद द्वारा कुछ लोगों को विद्याध्ययन में समर्थ तथा बलवान होने पर भी शूद्र कहकर वेद और विद्या के अधिकार से वंचित कर दिया गया था। यदि इन्हें पढ़ने का अधिकार होता तो भारत का जो धार्मिक सामाजिक पतन हुआ है वह कदापि होता। जन्मनाजातिवाद व भेदभाव की यह बुराई समाज में इस कदर फैल चुकी है और सुदृण हो चुकी है कि आज ज्ञान का प्रकाश होने पर भी बड़ी जातियों की तो बात ही क्या, निम्न जातियों के लोग भी जातिवाद को छोड़ कर वैदिक धर्म व आर्यसमाज की गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को अपनाने को तैयार नहीं हैं। इसे विडम्बना ही कह सकते हैं। जन्मना जातिवाद के समाप्त न होने के पीछे आरक्षण भी एक कारण हैं। जिन लोगों को आरक्षण की सुविधा से लाभ होते हैं, वह दलित कहलाकर ही सन्तुष्ट हैं क्योंकि जातिवाद को छोड़ने से उनकी सुविधायें समाप्त होने का खतरा लगता है। ऋषि दयानन्द ने जन्मना-जातिवाद को अवैदिक व वैदिक धर्म के सिद्धान्तों के विपरीत बताया और आर्यसमाज ने इस बुराई को दूर करने के लिये प्रशंसनीय कार्य किये हैं। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने तो एक दलितोद्धार सभा भी बनाई थी। आर्यसमाज ने अपने गुरुकुलों में सभी वर्ण वा जातियों के लोगों को निःशुल्क शिक्षा दी जिससे हमारे अनेक दलित भाई वेद और संस्कृत भाषा के विद्वान बने और पण्डित कहलाते हैं। सन् 1947 अथवा 1950 के बाद आरक्षण की व्यवस्था होने के कारण आर्यसमाज का दलितोद्धार कार्य शिथिल व ठप्प हो गया। यदि आरक्षण न न होता तो शायद दलित-बन्धु आज सवर्ण समाज के अंग बन सकते थे।

               ऋषि दयानन्द ने स्त्रियों शूद्रों को अन्य ब्राह्मण आदि वर्णों के समान वेदाध्ययन और शिक्षा का अधिकार दिया जिसका विधान यजुर्वेद के एक मन्त्र में उपलब्ध है। यदि पौराणिक बन्धुओं का धर्म सनातन धर्म होता तो फिर उसमें स्त्री व शूद्रों के प्रति वेद विरुद्ध विधान कदापि न होता। इसी से यह ज्ञात होता है कि ऋषि दयानन्द से पूर्व पुराणों की मान्यताओं के अनुरूप जो मत प्रचलित था वह सनातन मत धर्म होकर पुराणी मत ही था। सत्य वैदिक सनातन धर्म वही है जिसको ऋषि दयानन्द ने प्रवर्तित किया है और जो सभी प्रकार के अज्ञान अन्धविश्वासों सहित मिथ्या सामाजिक कुप्रथाओं भेदभावों से मुक्त है। ऋषि दयानन्द की दृष्टि देश में प्रचलित बाल विवाहों पर भी गई जो मुस्लिम काल में कन्याओं को पतित होने से बचाने के लिये आरम्भ हुई थी। ऋषि ने वेद व स्मृति के आधार पर 16 वर्ष से कम आयु की कन्या और 25 वर्ष आयु से कम के युवक के बाल-विवाह को वेदविरुद्ध बताकर निषिद्ध किया। उन्होंने जन्मना-जातिवाद को त्याग कर गुण, कर्म व स्वभाव के आधार पर पूर्ण युवावस्था में किये जाने वाले विवाहों का समर्थन किया। आर्यसमाज ने कम आयु की विधवाओं को विवाह का अधिकार भी दिया। विख्यात उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द जी ऋषि दयानन्द व आर्यसमाज के भक्त थे। उन्होंने अपने समय में सामाजिक मान्यता के विरुद्ध एक विधवा महिला से विवाह कर आर्यसमाज व वेद की मान्यता का अनुकरण किया था। आर्यसमाज की इस मान्यता के कारण ही आज न केवल आर्यसमाज अपितु पौराणिकों की विधवा कन्याओं व पुत्रियों के तलाक होने पर पुनर्विवाह होते हैं। विधवाओं को ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज की यह बहुत बड़ी देन है।

               आर्यसमाज चन्द्र ग्रहण व सूर्य ग्रहण आदि ग्रहों के ज्ञान से सम्बन्धित ज्योतिष को मानता है परन्तु फलित ज्योतिष का खण्डन करता है। यह फलित ज्योतिष वेद के विरुद्ध व मिथ्या है। इस फलित ज्योतिष के कारण ही सोमनाथ मन्दिर का खण्डन और विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा उसे लूटा गया था। भारत की पराधीनता में भी फलित ज्योतिष व इससे जुड़े अन्धविश्वास प्रमुख कारण रहे है। आश्चर्य है कि आज के वैज्ञानिक युग में भी बड़ी संख्या में लोग फलित ज्योतिष पर विश्वास रखते हैं जबकि ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज की दृष्टि में यह मिथ्या विश्वास है। गुरुकुलीय व डीएवी स्कूलों के माध्यम से भी आर्यसमाज ने शिक्षा जगत में क्रान्ति की है। आर्यसमाज के गुरुकुलों के कारण ही आज देश में बड़ी संख्या में संस्कृत के विद्वान हैं जबकि सरकारी स्तर पर संस्कृत के समाप्त करने के कुचक्र भी रचे गये हैं। इसका कारण यह है यदि वैदिक धर्म को नष्ट करना है तो संस्कृत पठन-पाठन में सरकारी सहायता न की जाये जिससे यह स्कूल बन्द हो जायें। विदेशी मैकाले की शिक्षा पद्धति को सरकार पूरा अनुदान देती हैं और ईश्वर व ऋषियों की शिक्षा पद्धति पर संचालित गुरुकुलों को नहीं देती। इसे सरकार का वैदिक धर्मियों के प्रति भेदभाव ही कह सकते हैं। आज स्कूलों में संस्कृत की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है जबकि यह सृष्टि की आदि भाषा होने, सभी भाषाओं की जननी होने के साथ इस देश के बहुसंख्यक हिन्दुओं की भाषा है। संस्कृत भाषा इसकी लिपि को भी आज विद्वानों वैज्ञानिकों ने सर्वोत्कृष्ट बताया है। ऋषि दयानन्द वेदों के विद्वान थे। उन्होंने अंग्रेजी का अध्ययन कभी नहीं किया। इस पर भी देश को आजाद कराने की प्रेरणा स्वराज स्थापित करने की सर्वप्रथम प्रेरणा उन्हीं ने की थी। आर्यसमाज का देश की आजादी के नरम गरम दोनों आन्दोलनों को आरम्भ करने उसमें सक्रिय भाग लेने वालों में सर्वाधिक योगदान है। देशोद्धार व देशोत्थान सहित समाजोत्थान का ऐसा कोई कार्य नहीं है जिसका आरम्भ, प्रचार व समर्थन आर्यसमाज ने न किया हो अथवा आर्यसमाज न करता हो। विदेशी विद्वान संत रोमा रोलां ने लिखा था कि स्वामी दयानन्द और आर्यसमाज समाज देश में एक अग्नि के समान हैं जो समाज में प्रचलित सभी पापों व बुराईयों को नष्ट कर देंगे, ऐसी उन्होंने आशा व्यक्त की थी।

               ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज ने वेदों के मिथ्या अर्थों तथा धर्म में अज्ञानता व अन्धविश्वासों को दूर करने का कार्य किया और उसे सभी दोषों व बुराईयों से मुक्त कर ज्ञान व विज्ञान की कसौटी पर स्थापित किया। आज का वैदिक धर्म सत्य, ज्ञान व विज्ञान की कसौटी पर खरा है। यही मनुष्य का सत्य व सर्वश्रेष्ठ धर्म है। अन्य सब मत-मतान्तर विद्या सहित अविद्या से भी युक्त हैं, जो विष से युक्त अन्न के समान त्याज्य हैं। इसका दिग्दर्शन ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के अन्तिम चार समुल्लासों वा अध्यायों में किया है। ऋषि दयानन्द ने वेदों को शत प्रतिशत सत्य, ज्ञान से युक्त तथा मिथ्या व काल्पनिक इतिहास सहित सभी प्रकार के लौकिक इतिहासों से मुक्त बताया है। उन्होंने पक्षपातयुक्त विदेशी विद्वानों की इससे सम्बन्धित धारणाओं का भी सप्रमाण खण्डन किया है। जो भी व्यक्ति ऋषि दयानन्द द्वारा प्रवर्तित वैदिक धर्म का अध्ययन करेगा वह इसी को शुद्ध सनातन धर्म स्वीकार करेगा। पौराणिक मत के कारण समाज में भेदभाव व नाना प्रकार की विकृतियां व भ्रम उत्पन्न होने से लोगों को हानि व परेशानी होती है। वह जिन ऊंचाईयों तक उन्नति कर सकते हैं, अज्ञान व अन्धविश्वासों के कारण नहीं कर सकते। अतः ऋषि दयानन्द द्वारा प्रचारित व प्रवर्तित वैदिक धर्म ही सत्य सनातन वैदिक धर्म है जो सृष्टि के आरम्भ से वर्तमान समय तक चला आ रहा है और भविष्य में भी विश्व का धर्म होने की सामर्थ्य व शक्ति इसी धर्म में है। इसके पालन व आचरण से मनुष्य की सर्वांगीण उन्नति होती है। इसी के साथ इस चर्चा को विराम देते हैं। ओ३म् शम1l

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