वेद ईश्वरीय ज्ञान है

-मनमोहन कुमार आर्य,

वेद ईश्वरीय ज्ञान है। इसका तात्पर्य है कि वेदों का ज्ञान ईश्वर प्रदत्त है। ज्ञान दो ही चेतन सत्ताओं के द्वारा दिया जाता है और मनुष्य आदि द्वारा ग्रहण किया जाता है। वेदों के सभी मन्त्र व उनके शब्द, अर्थ और सम्बन्ध ईश्वर द्वारा सृष्टि के आरम्भ में चार आदि ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा को दिये थे। उसके बाद उन चार ऋषियों के द्वारा वेदों का वह ज्ञान ब्रह्मा जी को दिया गया था। उन्हीं से वेदों के पठन पाठन व अध्ययन अध्यापन की परम्परा चली है। परमात्मा सृष्टि के आरम्भ में वेदों का ज्ञान देता है। उसके बाद भी मनुष्यों को अच्छे व बुरे कर्मों को करते समय वह उन्हें बुरे कर्मों के प्रति भय, शंका व लज्जा और अच्छे काम करने पर सुखानुभूति, उत्साह, निश्चिन्तता आदि के रूप में प्रेरणा करता है। ज्ञान देने वाली दूसरी सत्ता मनुष्य हैं जो मनुष्यों को ज्ञान दिया करते हैं जैसे माता, पिता व आचार्यों द्वारा अपने पुत्रों व शिष्यों आदि को। इसके अतिरिक्त कुछ पालतू व वन्य पशुओं को प्रशिक्षण द्वारा भी कुछ ज्ञान दे सकते हैं, ऐसा देखने में आता है। इसी कारण से हाथी, शेर आदि तक को सर्कस के लोग वश में करके उनसे इच्छित कार्य सम्पादित कराते हैं।

 

वेद ईश्वरीय ज्ञान है। इस पर अनेक मनुष्यों वा विद्वानों को शंका होती है और उसे वह नाना प्रकार से प्रस्तुत करते हैं। उनमें भी दो प्रकार के लोग होते हैं। एक सच्चे जिज्ञासु होते हैं और दूसरे अपने अपने मत व मजहब के आग्रही जो इसी कारण से पक्षपात करने वाले होते हैं। जिज्ञासु मनुष्यों की शंका का समाधान किया जा सकता है। इसके लिए स्वामी दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकार्श एवं अपने अन्य ग्रन्थ ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका में प्रकाश डाला है। वेदों को ईश्वरीय ज्ञान न मानने वाले लोग यह कहते हैं कि ईश्वर के मुख, नासिका, उदर व कण्ठ आदि इन्द्रिय व अवयवों के न होने के कारण वह मनुष्यों को ज्ञान नहीं दे सकता। यदि ऐसा है तो प्रश्न उठता है कि जो ईश्वर बिना शरीर के इस सारे ब्रह्माण्ड को बना सकता है, पालन कर सकता है, सभी वैज्ञानिक नियमों को स्थापित रख सकता है, संसार को धारण कर सकता है, तो भाषा व वेद का ज्ञान देना तो इन कार्यों से कहीं सरल कार्य हैं। वेदों का ज्ञान तो सर्वव्यापक परमात्मा आत्मा के भीतर प्रेरणा द्वारा स्थापित कर सकता है। सभी पशु व पक्षियों को भी उसी ईश्वर ने अपने अन्तर्यामी स्वरूप से ज्ञान दिया है जबकि वह भाषा को बोल व समझ नहीं सकते परन्तु वह सभी ज्ञान पूर्वक व्यवहार करते दीखते हैं। इसका एक उदाहरण यह है कि जब दो मनुष्य दूर दूर होते हैं तो जोर जोर से बोल कर संवाद करते हैं। जब वह पास आ जाते हैं तो धीरे बोलकर भी एक दूसरे की बातों का श्रवण कर सकते हैं। यदि दोनों एक साथ व पास पास हों और कोई गुप्त बात कहनी हो तो कान में बहुत ही धीरे से बोलते हैं जिसे बाहर कोई दूसरा सुन नहीं सकता। अब अनुमान कीजिए की यदि एक मनुष्य की आत्मा कान से हट कर उसकी आत्मा के भीतर विद्यमान हो तो क्या उसे बोलने की आवश्यकता होगी? नहीं होगी क्यों बोलकर दूर उपस्थित मनुष्य को कहा जाता है। हम जब चिन्तन मनन करते हैं तो भाषा का व्यवहार चिन्तन मनन के रूप में अपने मन व मस्तिष्क में करते हैं परन्तु बोलते नहीं है।

 

परमात्मा संसार के सभी मनुष्यों की जीवात्माओं के भीतर भी उपस्थित वा विद्यमान है, अतः उसे बोलकर ज्ञान देने की आवश्यकता नहीं है। उसे जो कहना है, उसे वह आत्मा के भीतर प्रेरित कर कह व बता सकता है। वेद ज्ञान इस कारण भी ईश्वरीय सिद्ध होता है कि सृष्टि के आरम्भ में यदि ईश्वर ज्ञान न देता तो मनुष्य परस्पर किसी प्रकार का कोई व्यवहार नहीं कर सकते थे। इसका कारण यह है कि परस्पर व्यवहार करने के लिए भाषा और ज्ञान दोनों की आवश्यकता है। यह भी तथ्य है कि विश्व की प्रथम भाषा ‘ईश्वरीय वैदिक भाषा’ ईश्वर से ही प्राप्त होती है। मनुष्य प्रथम भाषा को बना नहीं सकते। हां, इसके बाद इसमें विकार होकर अनेक भाषायें अस्तित्व में स्वतः आती व आ सकती हैं और संसार में ऐसा ही हुआ है। अनेक भाषाओं के होने का कारण मुख्य भाषा वैदिक भाषा में देश, काल व परिस्थितियोंवश विकारों का होना है। हम विचार करने पर यह भी अनुमान करते हैं कि यदि ईश्वर ने वेदों का ज्ञान न दिया होता तो मनुष्य ईश्वर व आत्मा के बारे में कुछ भी जान नहीं सकते थे। संसार में जहां ईश्वर व आत्मा आदि के बारे में जो भी शुद्ध व विकारयुक्त ज्ञान है उसका आरम्भ वेदों से हुआ और बाद में उसमें विकार होने से वह ज्ञान बदलता रहा और वर्तमान समय की सभी प्रकार की बातें देश देशान्तर में प्रचलित हुई हैं।

 

इस लेख में हम वेद के ईश्वरीय ज्ञान होने के विषय में ऋषि दयानन्द जी के लाहौर के एक पण्डित जी और एक लाट पादरी से हुए प्रश्नोत्तर को प्रस्तुत कर रहे हैं। यह प्रश्नोत्तर लाहौर में अक्तूबर, 1877 को हुए थे जिसे पं. देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय एवं पं. लेखराम रचित ऋषि दयानन्द जी के जीवन चरितों में दिया हुआ है। विवरण इस प्रकार है कि एक दिन एक पण्डित जी ने स्वामी दयानन्द जी से प्रश्न किया कि सामवेद में भरद्वाज आदि ऋषियों के नाम आये हैं। इससे सन्देह होता है कि वेद ईश्वर के बनाये हुए न होकर ऋषियों के बनाये हुए हैं। महाराज दयानन्द जी ने इसका उत्तर दिया कि उन मन्त्रों में यह नाम ऋषियों के नहीं हैं, प्रत्युत उनके विशेष अर्थ हैं अर्थात् वेदों के वह शब्द व्यक्तिवाची संज्ञा न होकर उनके अर्थ उनसे भिन्न हैं। बाद के काल में वेद से इन शब्दों को लेकर ऋषियों के नाम रखे गये हैं। ऋषि दयानन्द जी ने पण्डित जी को कई वेद मन्त्रों जिनमें ऋषि नामी शब्द आये हैं, उनका अर्थ करके सुनाया।

 

एक दिन विशप लाट (पादरी) महाराज से भेंट करने आये और वार्तालाप में यह प्रसंग उठाया कि वेद-ऋषियों को ईश्वर के विषय में कुछ ज्ञान न था और हिरण्यगर्भ सूक्त की ओर संकेत दिया कि उसमें यह आता है कि हम किस देव की उपासना करें (कस्मै देवाय हविषा विधेम)। राय मूलराज ने उक्त सूक्त का अंग्रेजी भाषा का हिन्दी अनुवाद महाराज को सुनाया तो उन्होंने विशप साहब से कहा कि आपको अशुद्ध अनुवाद के कारण भ्रम हुआ है। ऋषि ने उनसे कहा ‘इसके अर्थ यह नहीं कि हम किस देव की उपासना करें, प्रस्तुत यह है कि हम सर्वव्यापक, सुखस्वरूप परमात्मा की उपासना करते हैं।’ फिर विशप साहब बोले कि देखो बाइबल का प्रताप कि वह सारे संसार में इतने विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ है कि उसमें सूर्य अस्त नहीं होता। महाराज ने कहा कि यह भी वेद का ही प्रताप है। हम लोग वैदिक धर्म को छोड़ बैठे हैं और आप लोगों में वेदों में उपदिष्ट गुण हैं यथा ब्रह्मचर्य, विद्याध्ययन, एक-पत्नीव्रत, दूरदेश-यात्रा, स्वदेश प्रीति आदि। इसी (वेदों में उपदिष्ट गुणों के पालन व व्यवहार) से आपकी इतनी उन्नति हो रही है?, बाइबिल के कारण नहीं। यह सुनकर पादरी साहब निरुत्तर हो गये।

 

इससे स्पष्ट होता है कि वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान के ग्रन्थ है। इस तथ्य को विश्व के सभी लोगों को कभी न कभी स्वीकार करना ही होगा। यह सत्य है कि सत्य को अधिक समय तक छुपाया नहीं जा सकता। वह अपनी आन्तरिक शक्ति से प्रकट हो जाता है। भविष्य में वह दिन अवश्य आयेगा जब कि सारा विश्व वेद को ईश्वरीय ज्ञान स्वीकार करेगा। सत्य की सदा जय होती है असत्य की नहीं। इस सिद्धान्त के आधार पर ही वेद भविष्य के सारे संसार के लोगों के धर्म ग्रन्थ बनेंगे, यह निश्चित है। ओ३म् शम्।

 

 

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