कश्मीर में अधिक स्वायत्तता के दुष्परिणाम

प्रमोद भार्गव

सुलझने को आई कश्मीर की गुत्थी को उलझाने का काम पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिंदबरम और नेशनल क्रांफेंस के अध्यक्ष फारुख अब्दुल्ला ने कर दिया है। इन दोनों नेताओं ने कश्मीर को और अधिक स्वयत्तता देने की मांग उस समय उठाई है, जब खुफिया ब्यूरो (आईबी) के पूर्व प्रमुख दिनेष्वर शर्मा की नियुक्ति जम्मू-कश्मीर में सुशासन लाने और षांति बहाली के लिए की है। इस नाते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बेंगलुरु में दिया गया यह बयान स्वाभाविक ही है कि ‘जो लोग कल तक सत्ता में थे, वह अचानक यू-टर्न लेकर कश्मीर के मुद्दे पर अलगाववादियों और पाक की भाषा बोलने लगे हैं। इस समय घाटी में जैसे हालात हैं, उस परिप्रेक्ष्य में और अधिक स्वायत्तता की बात करना एक तरह से अलगाववादी तत्वों को प्रोत्साहित करने जैसा है। यह वह समय है, जब केंद्र के कड़े रुख के चलते हुर्रियत नेताओं की गतिविधियों और उनके बैंक खातों पर कड़ी नजर रखी जा रही है। आतंकवादी सैयद सलाहुदीन के बेटे सैयद शाहिद युसूफ को अपने पिता से धन ग्रहण करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। इन कार्यवाहियों से घाटी में यह संदेश गया है कि राष्ट्र विरोधियों को किसी भी हाल में बख्षा नहीं जाएगा। ऐसे में चिदंबरम और अब्दुल्ला के बयानों ने कश्मीर में स्वयत्तता का सवाल उठाकर देश की अखंडता को बरकरार बनाए रखने की चुनौतियों से जूझ रहे सशस्त्र बलों का मनोबल गिराने का काम किया है।

पी.चिदंबरम ने राजकोट में कहा था कि कश्मीरियों की आजादी की मांग संविधान के अनुच्छेद 370 के पालन में है। इस बयान के आने के अगले दिन ही फारुख अब्दुल्ला ने नेशनल कांफ्रेंस की बैठक में हजारों कार्यकताओं के बीच भारतीय सांविधान के दायरे में राज्य को और अधिक स्वयत्तता दिए जाने की मांग दोहरा दी। साफ है, चिदंबरम के बयान से अब्दुला को अपनी बात कहने का बल मिला है। हालांकि यह मुद्दा नया नहीं है। आजादी के बाद से ही रह-रह कर उठता रहा है। भारत की आजादी के समय ही 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्य अंग बन गया था। यह ब्रिटिष और भारतीय संसद के विभिन्न कानूनों के दायरे में था। इस पर अंतरराष्ट्रीय कानून की सहमति भी बन गई थी, जो इस रियासत को पूर्ण रूप से भारत में विलय की श्रेणी में रखता है। हालांकि 15 अगस्त 1947 को जिस तरह से भारतीय संघ में अन्य रियासतों का विलय हुआ था, उस तरह से जम्मू-कश्मीर का विलय नहीं हो पाया था। दरअसल यहां के राजा हरि सिंह ने पाकिस्तान और भारत दोनों सरकारों के समक्ष 6 सूत्री मांगें रखकर पेचीदा स्थिति उत्पन्न कर दी थी। यह स्थिति इस कारण और जटिल हो गई, क्योंकि यहां के राजा हरि सिंह तो हिंदू थे, लेकिन बहुसंख्यक आबादी मुसलमानों की थी। इसी समय शेख अब्दुल्ला ने महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन से प्रभावित होकर भारत से आंग्रेजी राज और रियासत से राजशाही को समाप्त करने की दोहरी जंग छेड़ दी थी। शेख ने जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद सिद्धांत को भी नकारते हुए भारतीय संघ में जम्मू-कश्मीर के विलय का अभियान चला दिया था। इस कारण हरि सिंह दुविधा में पड़ गए। दरअसल हरि सिंह कांग्रेस और महात्मा गांधी के आंदोलन से प्रभावित नहीं थे। इसलिए कश्मीर का भारत में विलय करना नहीं चाहते थे। दूसरी तरफ पाकिस्तान में विलय का मतलब, हिंदू राजवंश की अस्मिता को खत्म करना था। इस दुविधा से मुक्ति के लिए उनका इरादा कश्मीर को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में पूरब का स्विट्रलेंड बनाने का था।

किंतु उनके अरमानों को पंख मिलते इससे पहले ही 20 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तानी कबाइलियों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया। 22 अक्टूबर को ये सशस्त्र कबाइली तेज गति से बारामूला को पार कर राजधानी श्रीनगर की ओर बढ़ने लगे। तब हरि सिंह श्रीनगर से भगकर दिल्ली आए और 24 अक्टूबर को भारत सरकार से मदद मांगी। बड़ी संख्या में भारतीय फौज 28 विमानों में सवार होकर कश्मीर पहुंची। अंततः 27 अक्टूबर 1947 को हरिसिंह ने इस रियासत की भारत में विलय की घोषणा कर दी। हरि सिंह ने विलय के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते हुए शर्त रखी कि जम्मू-कश्मीर राज्य के मामलों में भारत सरकार का दखल केवल रक्षा, विदेश और दूर-संचार क्षेत्रों में ही होगा। 1948 में शेख अब्दुल्ला को कश्मीर में प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिल गया। संयोग से हरि सिंह की तर्ज पर शेख अब्दुल्ला भी व्यापक स्वायत्तता के पैरोकार थे। 17 अगस्त 1949 को जब सरदार वल्लभ भाई पटेल ने राष्ट्रीय संविधान सभा की बैठक बुलाई तो इसका सदस्य बनने का अवसर शेख अब्दुल्ला को भी मिल गया। इसी क्रम में 1952 में दिल्ली समझौते के तहत अनुच्छेद 370 का भी प्रावधान किया गया। इस बैठक में ष्यामा प्रसाद मुखर्जी भी उपस्थित थे। इस प्रावधान में संविधान के अनुच्छेद 1 के तहत जम्मू-कश्मीर भारतीय परिसंघ का अभिन्न अंग होगा। वहीं अनुच्छेद 370 के जरिए इसे विशेष दर्जा दिया गया। अनुच्छेद 370 (सी) में स्पष्ट उल्लेख है कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 1, अनुच्छेद 370 के माध्ययम से लागू होगा।

अनुच्छेद-370 में 4 ऐसे प्रावधान हैं, जो इसे भारतीय संविधान से इतर स्वायत्तता देते हैं। एक, जम्मू-कश्मीर भारतीय संविधान के उन प्रावधानों से मुक्त रहेगा, जो देश के अन्य राज्यों पर लागू होते हैं। जम्मू-कश्मीर का संचालन उस के स्वयं के संविधान से होता है, जो उसकी संविधान सभा द्वारा वर्श 1951 से 1956 के दौरान लिखा गया था। दो, जम्मू-कश्मीर पर केंद्र सरकार की सत्ता केवल 3 क्षेत्रों रक्षा, विदेश और दूरसंचार संबंधी मामलों में लागू होगी। तीसरा, केंद्र सरकार के समस्त अधिकार इस राज्य पर तभी लागू हो सकते हैं, जब राज्य सरकार की सहमति से राष्ट्रपति आदेश पारित करें। चैथा यह है कि देश के राष्ट्रपति को अनुच्छेद 370 को समाप्त करने या उसमें संशोधन करने का अधिकार तो है, लेकिन वह ऐसा राज्य सरकार की सहमति और राज्य की संविधान सभा से अनुमोदित के पश्चात ही कर सकते है। 1957 में राज्य की संविधान सभा इसलिए भंग कर दी गई थी, क्योंकि जम्मू-कश्मीर में भारत के विलय की प्रकिया लगभग पूर्ण हो गई थी। इसी करण तकनीकी रूप से धारा-370 को समाप्त करना संभव नहीं हो रहा है। यह तभी बदली जाएगी, जब एक नई संविधान सभा का गठन हो और वह इस अनुच्छेद को समाप्त करने संबंधी प्रस्ताव को पारित करे।

दरअसल इस अनुच्छेद को लेकर दो विरोधाभासी दृष्टिकोण शेख अब्दुल्ला के समय से ही देखने में आते रहे हैं। शेख अब्दुल्ला एवं इस राज्य के अन्य मुस्लिम नेता 370 की ओट में केवल मुस्लिम हितों के पक्षधर हैं। यह स्वायत्तता के व्यापक फलक को संकीर्ण बनाता है। इसी के चलते विस्थापित कश्मीरी पंडितों का अपने मूल निवास स्थलों में पुनर्वास नहीं हो पा रहा है। बावजूद मुस्लिम नेता और मुस्लिम तुश्टिकरण के पक्षधर राजनीतिक दल एक तो इस अनुच्छेद को बनाए रखने की पैरवी करते हैं, दूसरे इसके दायरे में और अधिक स्वायत्तता की मांग भी कर डालते है। जबकि स्वयं पंडित जवाहर लाल नेहरू इस अनुच्छेद को जम्मू-कश्मीर को भारत से जोड़ने की एक मजबूत कड़ी के रूप में देखते थे। यही वजह थी कि जब 1953 में शेख अब्दुल्ला ने अनुच्छेद-370 की ओट में ऊल-जलूल मांगें और अनर्गल क्रियाकलाप शुरू किए तो नेहरू ने अब्दुल्ला की निर्वाचित सरकार को बर्खास्त कर दिया और उन्हें राष्ट्रद्रोह के आरोप में लगभग 20 साल तक नजरबंद रखा गया। कांग्रेस को नेहरू के इस दृष्टिकोण से सीख लेते हुए कश्मीर की दुविधा का समाधान निकालने में सहयोग की जरूरत है न कि स्वायत्तता का प्रलाप कर अलगाववादियों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है ? क्योंकि अलगाववादी तो कश्मीरियत को अंततः कलंकित करने का ही काम कर रहे हैं।

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