लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

भैया हमारे सनातन ऋषि तो पहले ही कह गए कि काजल की कोठरी में रहोगे तो थोड़े बहुत काले होगे ही। अब बेचारे निष्काम निर्लिप्त प्रधानमंत्री ने काजल की इस कोठरी में रहने की मजबूरी तो पूरे छह साल ढोर्इ, सो सफेद पोषाक पर थोड़े बहुत काले छींटे पड़ भी गए तो उनकी यह नादानी क्षमा के काबिल है।

अब विपक्ष संसद में चाहे जितना हल्ला बोले। बहस न होने दे। आप भले ही कहते रहें ”कोयले की दलाली है, सारी कांग्रेस काली है।” मूर्ति सदृष्य मनमोहन इस्तीफा देने वाले नहीं हैं। ऐसे कर्इ अवसरों का दिलेरी से मौन साधे वे कर्इ मर्तबा सामना कर चुके हैं। टूजी स्पैक्ट्र्रम घोटाला, राष्ट्र मण्डल खेल धोटाला और सार्वजानिक निजी साझेदारी के कर्इ ऐसे कर्इ मुददे संसद में परवान चढ़े, पंरतु संसद में साधना के मौन हठयोग के चलते उन्होंने सब पर पार पा ली। हठयोग की इस सिद्धी की सीख बाबा रामदेव को मनमोहन से लेने की जरुरत है। संसद के बाहर बेचारे अण्णा और रामदेव भ्रष्टाचार, धोटालों और लूट की सरकार होने का मंत्रजाप करते ही रह गए, किंतु मंत्र सिद्धि दूर की कौड़ी ही रही।

अब जो समन्वय समीति की बैठक काग्रेंस आलाकमान सोनिया गांधी के धर हुर्इ है, उसमें गठ जोड़ की गांठ और मजबूत होकर उभरी है। सर्वसम्मति से सहमति बनी कि बाजार में आवारा पूंजी का प्रवाह बनाए रखने और विकास दर चढ़ाए रखने के लिए आंखें मूंदी रखना जरूरी था। जिससे कोयले की दलाली में हाथ काले होते रहें। इस दलाली को बढ़ावा देने के लिए लाचार प्रधानमंत्री को भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधियां और रमण सिंह ने तो मजबूर किया ही पश्चिम बंगाल के माकपा मुख्यमंत्री बुद्धदेव भटटाचार्य भी कब पीछे रहे। बतौर प्रमाण कैग रिपोर्ट में इनकी चिटठियों का हवाला है। अब अण्णा सदस्य के अरबिंद केजरीवाल कहते रहें कि संसद में कांग्रेस और भाजपा के बीच सबकुछ फिक्स है।किसी दल के पास यह नैतिकता नहीं बची है कि वह कोयला घोटाले के खिलाफ आवाज को बुलंदी दे सके। माया का मोह अच्छे अच्छों की नैतिकता और र्इमान डिगा देता है। यही वजह है भैया, सार्वजानिक जीवन में नैतिकता का संकट गहरा रहा है और आर्दष के प्रतिमान बदल रहे हैं।

मिलीभगत बनाम फिकिसंग की कार्यवाहियां अब दलों और कि्रकेट का हिस्सा भर नहीं रह गर्इ हैं। इस बुरार्इ का विस्तार राज्यसभा में भी पहली बार देखने को मिला। संसदीय मामलों के मंत्री राजीव शुक्ला ने सभा के नये उपसभापति पी.जे. कुरियन के कान में कुछ फुसफुसाया और सदन में हंगामा होते ही सदन की कार्यवाही दिनभर के लिए टाल दी गर्इ। मैच फिकिसंग का यह अनैतिक वार्तालाप वीडियों कैमरो में फिक्स होकर सार्वजनिक भी हो गया। मौजूदा सियासत के सामाजिक सरोकार तो अब भैया सिमटकर ही चंद पूंजिपातियों को बेजा फायदा पहुंचाने तक रह गए हैं। नीति नियम और तौर तरीको में ढीले देगें तभी तो कुदरती भू संपदा को दोनों हाथों से लूट पायेंगें। और फोब्र्स पात्रिका में नाम दर्ज कराने की लायकी हासिल करेंगें। इस लूट पर छूट का शिकांजा कस दिया जाएगा तो चुनाव खर्च के किए राजनीतिक दलों को चंदा कौन देगा ?

अब भारत अमेरिका तो है नहीं कि आप राष्ट्र प्रमुख के पद बैठे रहें और अरोप लगें तो आपकी संवैधानिक प्रवाधनों के तहत जांच भी शुरू हो जाए। और अरोप सिद्ध हो जाने पर बिना कोर्इ अपील किए चुपचाप इस्तीफा दे दें। हमारे यहां जैसे कोलगेट कांड हुआ, वैसा ही अमेरिका में सत्तर के दशकमें वाटर गेट स्केंडल हुआ था। हमारे यहां घोटाले सीएजी, पीएसी और अदालतों में दायर जनहित याचिकाओं के जरीए बाहर आ रहे है जबकि वाटरगेट कांड का खुलासा वहां के समाचार पत्र ‘वाशिंगटन पोस्ट ने 1972 में किया था। जांच बैठी और जांच में लगे आरोप सिद्ध हुए, वैसे ही राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने 1974 में इस्तीफा दे दिया। अब बेचारे अण्णा ऐसे राजनीतिक घोटालेबाजों पर नियंत्रण के लिए ही तो जन लोकपाल को कानूनी दर्जा देने की बात कर रहे हैं। अब भला इसमें हर्ज ही क्या है।

पर सरकार है कि कोयले की दलाली में हाथ काले होते रहे इसलिए खदानों में नीलामी के नियमों को दरकिनार रखेगी। साथ ही उल्टे पैर चलकर कोशिश करेगी कि किन्हीं ऐसे उपायों को अंजाम दिया जाए, जिससे सीएजी, पीएसी और सर्वोच्च न्यायालय की सक्रीय चाल में बेडि़या पड़ जाएं। आर्थिक उदारवादी दौर का भी यही तकाजा है कि कानून के हाथ बंधे रहें, जिससे बाजारवाद उन्मुक्त ताण्डव के लिए मुक्त हो जाए।

One Response to “वाटरगेट बनाम कोलगेट”

  1. Prahlad Sharma

    भारत सरकार द्वारा सार्वजनिक सेवाओं का निजीकरण करते जाना अपराध को इतना हद तक बढ़ा दिया है कि इसके द्वारा किसी भी ढंग से पाई गई रकम एक रोज़ी-रोटी का ज़रिया बनता जा रहा है. और जब नौबत यहाँ तक आ पहुंची है तो इसे मिटाना मुस्किल ही नहीं नामुमकिन लगती है.इसके मुख्या कारण इस तरह हैं

    ऐसे अपराध अकेले नहीं हो रहें हैं
    इन अपराधों का खुलासा तभी हो पा रहा है जब किसी को हिस्सा संतोषजनक नहीं मिल पता है
    इन अपराधो का खुलासा अपराध मिटने के लिए नहीं बल्कि अपना हिस्सा निकलवाने के लिए किये जातें हैं.
    इससे उसका हिस्सा मिलने के साथ-साथ दूसरों की भी भागेदारी शामिल होने के कारण उनको भी अच्छी रकम हाथ लग जाती है जैसे media वाले, गृह-मंत्रालय के सरे कर्मचारी आदि.
    इन अपराधों के खुलने से अपरोक्ष रूप से बहुतों को लाभ मिलता है.

    नतीजा कुछ भी नहीं निकलता और टायं-टायं फ़ीस हो जाती है.

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