कांग्रेसी नेताओं को क्या हो गया है?

– ललित गर्ग –
जम्मू-कश्मीर में धारा-370 हटाए जाने के बाद पूरे देश ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के फैसले का समर्थन किया। लेकिन कांग्रेस पार्टी एवं उसके कुछ बड़बोले नेताओं ने इस राष्ट्रीयता के ऐतिहासिक एवं साहसिक कदम की आलोचना करके अपनी नकारात्मकता को दर्शा दिया है। हद तो तब हो गई जब अपने उलटे-सीधे बयानों के लिए चर्चित रहने वाले कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने मोदी सरकार के फैसले की आलोचना करते यह कह डाला कि मोदी और शाह ने जम्मू-कश्मीर को फिलिस्तीन बना डाला। आश्चर्य तो तब भी हुआ जब पूर्व वित्तमंत्री एवं गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ने धारा-370 को हटाए जाने की घटना को साम्प्रदायिक रंग देने की बेहूदा कोशिश की। वे लम्बे समय से आतंक एवं हिंसा की लपटों में झुलस रहे कश्मीर में अमन एवं शांति की अनूठी कोशिश को भी हिन्दू-मुस्लिम के संकीर्ण साम्प्रदायिक नजरिये से देख रहे हैं। कांग्रेस के भोंपू रहे दिग्विजय सिंह और अन्य नेता ऐसे ही सुर में बोल रहे हैं। इन कांग्रेसी नेताओं के बयानों ने संकीर्ण सोच को प्रदर्शित किया, क्या हो गया है इन नेताओं को? ऐसा लगता है कांग्रेस पार्टी ने आदर्श को उठाकर अलग रख दिया था। उसके नेता भी चश्मा लगाए हुए हैं। चश्मा लगाएं पर कांच रंगीन न हो। साम्प्रदायिकता एवं राष्ट्र-विरोध के दृश्य न हो। 
ऐसा लगता है कि कांग्रेस खुद ही रसातल में जाने को उतावली है तभी तो इसके एक से एक बड़े नेता कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाये जाने पर इस तरह बौखला गये हैं और अशालीन एवं असंयमित हो गये हैं कि जैसे मोदी सरकार ने भारत की एकता एवं अखण्डता के लिये नहीं, बल्कि भारत को विखण्डित करने का कोई अपराध कर दिया हो। कश्मीर के लोग केवल बुराइयों एवं आतंकवाद से लड़ते नहीं रह सकते, वे व्यक्तिगत एवं सामूहिक, निश्चित सकारात्मक लक्ष्य के साथ जीना चाहते हैं, विकास चाहते हैं। अन्यथा उनके जीवन की सार्थकता नष्ट हो जाएगी। मोदी ने कश्मीर की जनता के दर्द को समझा, उन्होंने इस दर्द को दूर करने की कोशिश की है, अपने नेतृत्व को सार्थक आयाम दिया है, इसके लिये विरोध को कैसे जायज माना जा सकता है?
दो तरह के नेता होते हैं- एक वे जो कुछ करना चाहते हैं, दूसरे वे जो कुछ होना चाहते हैं। असली नेता को सूक्ष्मदर्शी और दूरदर्शी होकर, प्रासंगिक और अप्रासंगिक के बीच भेदरेखा बनानी होती है। संयुक्त रूप से कार्य होता तो बहुत पहले कश्मीर के नक्शे को बदला जा सकता था। अब जो कोशिश हुई है, वह देर आये दुरस्त आये की स्थिति है, उसका स्वागत होना ही चाहिए। लेकिन चिदम्बरम- अय्यर इस अच्छाई में भी बुराई तलाश रहे हैं। वे इतनी बेहूदी बात कैसे कर सकते हैं, क्योंकि वे स्वयं एकवोकेट है, कानून के जानकार हैं कि अगर जम्मू-कश्मीर में हिन्दू बहुल होते तो भाजपा धारा-370 नहीं हटाती। चिदम्बरम से कोई पूछे कि भारत में जम्मू-कश्मीर को छोड़ और किस राज्य में धारा-370 थी। 1947 में कश्मीर-भारत झगड़े की वजह से कश्मीर में धारा-370 लगानी पड़ी। मुस्लिम आबादी तो उत्तर प्रदेश में भी है, बिहार में भी, पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत के सभी राज्यों में मुसलमान बसते हैं लेकिन 1947 में कश्मीर को छोड़ देश में बसे सभी राज्यों के मुसलमानों ने भारत की नागरिकता ले ली लेकिन जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की साजिशों के चलते यह संभव नहीं हो पाया था।
कश्मीर मुद्दे पर जिस तरह भारत को अंतर्राष्ट्रीय जगत का समर्थन मिला है उससे भी कांग्रेस के नेताओं की आंखें नहीं खुल रही हैं और वे परोक्ष रूप से पाकिस्तान के पक्ष को ही हवा देने की भयंकर भूल कर रहे हैं। जबकि कांग्रेस के कुछ बड़े नेता जनार्दन द्विवेदी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद और दीपेन्द्र हुड्डा ने भी जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटाए जाने का समर्थन किया। इस मुद्दे पर कांग्रेस दो खेमों में बंटी हुई साफ-साफ दिखाई दे रही है। उससे साफ संदेश यही गया कि देश की सबसे सशक्त पार्टी आज टूट चुकी है, बिखर चुकी है, वैचारिक स्तर पर दोफाड़ हो चुकी है और उसका राष्ट्रीय नेतृत्व वैचारिक स्तर पर शून्यता की स्थिति में पहुंच चुका है। नेतृत्व के नीचे शून्य तो सदैव खतरनाक होता ही है पर कांग्रेस पार्टी के तो ऊपर-नीचे शून्य ही शून्य है। पार्टी एवं उसके नेताओं में राष्ट्रीय स्तर पर, समाज स्तर पर तेजस्वी, स्वस्थ सोच और खरे नेतृत्व का नितान्त अभाव है। देश के राजनीतिक दल ही नहीं, बल्कि दार्शनिक, चिन्तक और मानवतावादी व्यक्ति कश्मीर के केनवास पर शांति, प्रेम, अमन विकास और सह-अस्तित्व के रंग भरना चाहते हैं, पर आज कांग्रेस तो नायकविहीन है। रंगमंच पर नायक अभिनय करता है, राजनीतिक मंच पर नायक के चरित्र को जीना पड़ता है, कथनी-करनी में समानता, दृढ़ मनोबल, इच्छा शक्ति, राष्ट्रीयता और संयमशीलता के साथ। कांग्रेस पार्टी एवं उसके नेताओं की संकीर्ण सोच एवं स्वार्थों की हद देखिये कि उनके पांव इतने कमजोर हो गए हैं, उनके पैर मे कोई जूता आ नहीं रहा है। उनका हर वार उन पर ही उल्टा पड़ रहा है। जिस पार्टी के शासनकाल में भारत में तो भ्रष्टाचार और साम्प्रदायिकता के जबड़े फैलाए, आतंकवाद की जीभ निकाले, मगरमच्छ सब कुछ निगलता रहा है। सब अपनी जातियों और ग्रुपों को मजबूत करते रहे हैं– देश को नहीं। प्रथम पंक्ति का नेता ही नहीं है जिसे देश जानता हो। जो पार्टी अपना नेता नहीं चुन पाती, वो क्या देश की ज्वलंत समस्याओं के समाधान के रास्ते चुनेगी, जनता इस बात को गहराई से समझ चुकी है।
कश्मीर की समस्या के समाधान की दिशा में अनुच्छेद 370 को हटाये जाने पर कांग्रेस जो बेसूरा राग अलाप रही है, जो विखण्डन एवं बिखराव की राजनीति कर रही है, इसके लिए इतिहास उनको कभी माफ नहीं करेगा और इसका खामियाजा पूरी पार्टी को ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के परिणाम के रूप में मिला है और अब पूरे सफाये की तैयारी वह स्वयं करने में जुटी है। यह कोई छोटी बात नहीं है कि इस्लामी देशों से लेकर रूस, चीन व अमेरिका समेत राष्ट्रसंघ की राय भारत के हक में है। विदेश मन्त्री श्री एस. जयशंकर आजकल चीन की यात्रा पर हैं और उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि भारत में जम्मू-कश्मीर का रुतबा बदले जाने से अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। फिर कांग्रेस के दिलों में क्यों फर्क पड़ रहा है? यह सोची-समझी कांग्रेसी कुचेष्टा एवं नकारात्मकता है जिसे उत्तर से लेकर दक्षिण भारत की जनता किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं कर सकती। जम्मू-कश्मीर कभी भी ‘हिन्दू-मुसलमान’ के तंग नजरिये की गिरफ्त में नहीं रहा है, कांग्रेसी नेताओं ने उसे साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की है, ताकि उनकी एवं उनके द्वारा पोषित राजनीतिक दलों एवं राजनेताओं की राजनीतिक स्वार्थों की रोटियां सिकती रहे। इसलिए कांग्रेस के नेता पी. चिदम्बरम और मणिशंकर अय्यर को समझना चाहिए कि वे आज जिस अनुच्छेद 370 को हटाने के नाम पर मोदी सरकार के कदम का विरोध कर रहे हैं, जहर उगल रहे हैं उसका कश्मीरियत से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। अय्यर ने तो कश्मीर को ‘फिलस्तीन’ बनाये जाने जैसी बात कहकर भारत के उस लोकतन्त्र का खुला अपमान किया हैं जो केवल संविधान से चलता है। क्या अय्यर साहब को याद दिलाना पड़ेगा कि अनुच्छेद 370 को भारत के संविधान में ही जोड़ कर जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया था और 35(ए) लागू करके इसके नागरिकों को विशेष अधिकार दिये गये थे। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था, है और रहेगा। इसमें बाधा डालने वाली संवैधानिक प्रक्रियाओं को दूर किया जाना समय की जरूरत थी और इस जरूरत को देखते हुए उठाये गये कदम स्वागतयोग्य है, राष्ट्रीयता को मजबूती देने वाले हैं। समझना जरूरी है कि राष्ट्रीयता न तो आयात होती है, न निर्यात। और न ही इसकी परिभाषा किसी शास्त्र में लिखी हुई है। हम देश, काल, स्थिति व राष्ट्रहित को देखकर बनाते हैं, जिसमें हमारी संस्कृति, विरासत सांस ले सके। कांग्रेस राष्ट्रीयता को शब्दों का नहीं, आचरण का स्वर दें। संकीर्णता का नहीं, सृजन का कलेवर दे। ऐसा हुआ तो उनके नेताओं के बयानों का रंग भी बदलेगा और जनता की स्वीकार्यता भी।
प्रेषकः

(ललित गर्ग)
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