भारत में दलितों का क्या होगा?

देवेंद्रराज सुथार

देश में दलितों के साथ हो रही हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। महाराष्ट्र के जलगांव में दो नाबालिग दलित लड़कों की पिटाई की घटना समूची इंसानियत को शर्मसार करनी वाली है। इन लड़कों का कसूर इतना था कि उन्होंने गर्मी से राहत पाने के लिए गांव के तालाब में नहाने की गुस्ताख़ी कर दी थी। वहीं गुजरात के ढोलका शहर में एक दलित युवक ने अपने नाम के पीछे सिंह लगा लिया, यह राजपूत युवकों को रास नहीं आया और उनकी जमकर धुनाई कर डाली। इससे पहले गुजरात के अहमदाबाद में पंचायत के दफ्तर में कुर्सी पर बैठने को लेकर भीड़ द्वारा एक दलित महिला पर कथित रूप से हमला करने का मामला सामने आया था। गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले गुजरात के ही राजकोट में एक दलित श्रमिक की फैक्ट्री के मालिक द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। इसके अलावा आए दिन दलित युवकों के मूंछ रखने पर मारपीट, दलित दूल्हे के घोड़ी पर चढ़ने को लेकर पिटाई जैसी खबरें सुनने को मिलती ही रहती हैं।

यह घटनाएं बताती हैं कि आजादी के सात दशक बाद भी देश में दलितों के साथ हिंसा खत्म नहीं हुई हैं। उन पर रोज किसी न किसी तरह से हमले करने का सिलसिला जारी हैं। भले भारतीय संविधान के तहत उन्हें समानता और अभिव्यक्ति का अधिकार मिल गया हो, लेकिन वे आज भी न तो सम्मानजनक और न समानतापूर्वक जीवनयापन कर पा रहे हैं और न ही खुलकर अपनी अभिव्यक्ति को प्रकट करने में खुद को सक्षम महसूस कर पा रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक बात करे तो पिछले 4 साल में दलित विरोधी हिंसा के मामलों में बहुत तेजी से वृद्धि हुई है। 2006 में दलितों के खिलाफ अपराधों के कुल 27,070 मामले सामने आए, जो 2011 में बढ़कर 33,719 हो गए। वर्ष 2014 में दलितों के साथ अपराधों के 40,401 मामले, 2015 में 38,670 मामले और 2016 में 40,801 मामले दर्ज किए गए। वहीं पिछले 10 साल में दलित महिलाओं के साथ दुष्कर्म के मामलों में दोगुनी वृद्धि हुई।

इन घटनाओं से जाहिर होता हैं कि देश में अब भी सामंतवादी मानसिकता कायम है। जिसके कारण आज भी दलित समाज तिरस्कृत व बहिष्कृत जीवन जीने को मजबूर हैं। दलितों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए किये जा रहे सरकारी प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। अलबत्ता अब दलितों पर प्रत्यक्ष रूप से प्रहार न करके उन पर कई तरह के आरोप लगाकर उन्हें दोषी बनाने के प्रयत्न किये जाने लगे हैं। मसलन- दलित युवा ने सवर्ण महिलाओं से छेड़छाड़ की है या करने का प्रयास कर रहा था, वह शराबी था जिससे गांव का माहौल खराब हो रहा था, सवर्णों का दलिताें द्वारा विरोध किया जा रहा था आदि और फिर उसके बाद उन पर हमला किया जाता हैं। ऐसे आरोपों का निराधार होना अचरज की बात नहीं, क्याेंकि ऐतिहासिक रूप से हाशिये पर पड़े दलितों की सामाजिक हैसियत अभी भी निम्न हैं और प्रशासन, पैसा और सत्ता के गठजोड़ में सवर्णों की तुलना में वे कहीं नहीं टिकते। यह अजीब है कि हमारे देश में ‘हरि’ को पूजा जाता है लेकिन ‘हरिजन’ का अपमान किया जाता है। सरकार को समझना होगा कि सिर्फ दलितों को आरक्षण के नाम पर अतिरिक्त राहत देने से बात नहीं बनेगी बल्कि सबसे अहम है सामंतवादी सोच को बदलना। जब तक सामंतवादी सोच का पतन नहीं होगा, तब तक समाज में दलितों का सिर उठाकर जीने का सपना सपना ही बना रहेगा। इस विकृत सोच व छिछली मानसिकता को मिटाने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने होंगे। इसके लिए सरकार को समानता तक ही सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि समाज में समरसता लाने के लिए भी कवायद करने होगी।

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