लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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राकेश कुमार आर्य

हमारे यहां दीपावली का पर्व सृष्टि के प्रारंभ से ही मनाया जाता रहा है। इस पर्व का विशेष महत्व है। दीपों का यह प्रकाश पर्व हमारे अंत: करण में व्याप्त अज्ञान अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश करने का प्रतीक पर्व है। हमारे यहां पर प्रत्येक सद्गृहस्थ के लिए आवश्यक था कि घर में अग्नि हमेशा रखनी चाहिए। अग्नि के कई अर्थ होते हैं। अग्नि का एक अर्थ भौतिक अग्नि से है जो कि हमारे भोजन आदि के बनाने में सहायक होती है, दूसरे हमारे खून में गर्मी हो अर्थात यहां अग्नि का अर्थ है कि अन्यायी और अत्याचारी व्यक्ति के खिलाफ आवाज बुलंद करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक है। तीसरे अग्नि का अर्थ है ज्ञानाग्नि को सदा प्रज्ज्वलित रखना। हृदय मंदिर में सदा अलौकिक प्रकाश का अनुभव करना, इस अग्नि को आध्यात्मिक ज्योति भी कह सकते हैं। ये सारी अग्नियां हर गृहस्थी को उन्नत जीवन जीने के लिए प्रेरित करती हैं।

प्रकाश पर्व दीपावली एक ऐसा ही पर्व है जो हमारे भीतर ज्ञानाग्नि को प्रकाशित करने अथवा प्रज्ज्वलित करने का काम करता है। सृष्टि प्रारंभ में इस पर्व को नवशस्येष्टि पर्व कहा जाता था। कालांतर में इस पर्व का नामकरण दीपावली के रूप में हो गया। खील और बतासे इस पर्व पर विशेष रूप से बांटे जाते हैं। उनका अर्थ यही है कि जिस प्रकार भुनने के पश्चात खील बनता है उसी प्रकार विपत्तियों में पड़कर के हम खील की तरह और खिलें, यही हमारे लिए उचित है। हमारी खिलखिलाहट में रस घोलने के लिए बतासा मिठास का प्रतीक है, तो दीपक ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक है। इतना पावन पर्व है यह दीपावली।

दीपावली को श्रीराम के साथ जोडऩा कि इस दिन वह लंका से अयोध्या लौटे थे, सर्वथा गलत है। इसके लिए हमें रामायण में ही जो तथ्य और प्रमाण मिलते हैं वो इस धारणा को सर्वथा निराधार सिद्घ करते हैं। आप विचार करें कि श्रीराम के वन गमन पर भरत जब उन्हें लौटाने हेतु उनके पास गये और श्रीराम ने भरत के सब प्रकार के अनुनय विनय को सविनय अस्वीकार कर दिया तो भरत को रामचंद्रजी की खड़ाऊं लेकर ही संतोष करना पड़ा। इस समय रामचंद्रजी और अयोध्या के बहुत से लोगों के समक्ष भरत ने कहा था-

चर्तुर्दशे ही संपूर्ण वर्षेदद्व निरघुतम।

नद्रक्ष्यामि यदि त्वां तु प्रवेक्ष्यामि हुताशन।।

अर्थात हे रघुकुल श्रेष्ठ। जिस दिन चौदह वर्ष पूरे होंगे उस दिन यदि आपको अयोध्या में नही देखूंगा तो अग्नि में प्रवेश कर जाऊंगा, अर्थात आत्मदाह द्वारा प्राण त्याग दूंगा। भरत के मुख से ऐसे प्रतिज्ञापूर्ण शब्द सुनकर रामचंद्र जी ने अपनी आत्मा की प्रतिमूर्ति भरत को आश्वस्त करते हुए कहा था-तथेति प्रतिज्ञाय-अर्थात ऐसा ही होगा। उनका आशय स्पष्ट था कि जिस दिन 14 वर्ष का वनवास पूर्ण हो जाएगा मेरे अनुज भरत मैं उसी दिन अयोध्या पहुंच जाऊंगा। रामचंद्रजी अपने दिये वचनों को कभी विस्मृत नही करते थे। इसलिए भाई भरत को दिये ये वचन उन्हें पूरे वनवास काल में भली प्रकार स्मरण रहे। यहां पर हम यह भी देखें कि रामचंद्र जी जब बनवास के लिए चले थे अथवा जब उनका राज्याभिषेक निश्चित हुआ था तो उस समय कौन सा मास था? महर्षि वशिष्ठ ने महाराजा दशरथ से राम के राज्याभिषेक के संदर्भ में कहा था-

चैत्र:श्रीमानय मास:पुण्य पुष्पितकानन:।

यौव राज्याय रामस्य सर्व मेवोयकल्प्यताम्।।

अर्थात-जिसमें वन पुष्पित हो गये। ऐसी शोभा कांति से युक्त यह पवित्र चैत्र मास है। रामचंद्र जी का राज्याभिषेक पुष्प नक्षत्र चैत्र शुक्ल पक्ष में करने का विचार निश्चित किया गया है।

षष्ठी तिथि को ज्योतिष के अनुसार पुष्य नक्षत्र था। रामचंद्र जी लंका विजय के पश्चात अपने 14 वर्ष पूर्ण करके पंचमी तिथि को भारद्वाज ऋषि के आश्रम में उपस्थित हुए थे। ऋषि के आग्रह को स्वीकार करके वहां एक दिन ठहरे और अगले दिन उन्होंने अयोध्या के लिए प्रस्थान किया उन्होंने अपने कुल श्रेष्ठ भाई भरत से पंचमी के दिन हनुमान जी के द्वारा कहलवाया-

अविघ्न पुष्यो गेन श्वों राम दृष्टिमर्हसि।

अर्थात हे भरत! कल पुष्य नक्षत्र में आप राम को यहां देखेंगे।

इस प्रकार राम चैत्र के माह में षष्ठी के दिन ही ठीक समय पर अयोध्या में पुन: लौटकर आए। इसके अतिरिक्त अन्य बिंदुओं पर भी विचार करें कि सीता जी का अपहरण कब हुआ? कितने काल वह रामचंद्र जी से अलग रावण के राज्य में रहीं? जब सीताजी का अपहरण हुआ तो वाल्मीकि ने रामचंद्र जी की उस समय की विरह वेदना का निम्न शब्दों में वर्णन किया है- हे लक्ष्मण नाना प्रकार के पक्षियों से निनादित यह वसंत सीता से वियुक्त मेरे शोक को और भी वियुक्त कर रहा है। मधुरभाषिणी कमल नयनी निश्चय ही इस बसंत ऋतु को प्राप्त होकर अपने प्राण त्याग देंगी।

इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि बसंत ऋतु में सीताजी का अपहरण हुआ। अपहरण के पश्चात अपने भवन में ले जाकर रावण ने उन्हें अपनी अद्र्घांगिनी बनाने का हर संभव प्रयास किया। किंतु सब भांति से उसे असफलता ही मिली। तब उसने सीताजी को बारह मास का समय देते हुए कहा कि मिथिला की राजकुमारी जानकी मेरी इस बात को सुनो-

हे भामिनी मैं तुम्हें बारह मास का समय देता हूं। हे सीते! यदि इस अवधि के भीतर तुमने मुझे स्वीकार नही किया तो मेरे याचक मेरे प्रातराश (नाश्ता) के लिए तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे।

इसके पश्चात सुंदरकांड 22/8-9 में रावण ने सीता जी से यह भी कहा कि मेरे द्वारा जो अवधि तुम्हें मेरी शैया पर आरोहण करने हेतु दी गयी थी उसमें मात्र दो माह का समय शेष रह गया है। यदि तुमने इन दो मासों में ऐसा नही किया तो मेरे चारक मेरे प्रातराश के लिए तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े कर देंगे।

ऐसी परिस्थितियों में ही सीताजी के पास हनुमान जी का प्राकट्य हुआ। तब उन्होंने हनुमान जी से कहा था कि मुझे रावण ने कृपा कर के दो माह का जीने का और समय दिया है। दो मास के पश्चात मैं प्राण त्याग दूंगी। सीता जी के इस संदेश को जब हनुमानजी ने रामजी को सुनाया तो उन्होंने भली प्रकार चिंतन करके सुग्रीव को आदेशित किया था-

उत्तरा फाल्गुनी हयघ श्वस्तु हस्तेन योक्ष्यते।

अभिप्रयास सुग्रिव सर्वानीक समावृता:।।

अर्थात आज उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र है। कल हस्त नक्षत्र से इसका योग होगा। हे सुग्रीव इस समय पर सेना लेकर लंका पर चढ़ाई कर दो। इस प्रकार फाल्गुन मास में श्री लंका पर चढ़ाई का आदेश श्री राम ने दिया। सीताजी लगभग 11 माह तक लंका में रावण की दासता में रही।

रावण के सुपाश्र्व नामक मंत्री ने रावण को युद्घ के लिए जो परामर्श दिया था उसका मुहूर्त कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को उद्योग आरंभ करके अमावस्या के दिन सेना से युक्त होकर विजय के लिए निकलने का आवाह्न किया था उससे भी यही स्पष्ट होता है कि चैत्र मास की अमावस्या को रावणा मारा गया था। तब रावण की अंत्येष्टि क्रिया तथा विभीषण के राजतिलक के पश्चात रामचंद्र यथाशीघ्र अयोध्या के लिए चल पड़े थे। इस प्रकार रामायण की अंत:साक्षी से सिद्घ होता है कि रामचंद्रजी कार्तिक माह में नही अपितु चैत्र के माह में ही अयोध्या लौटे थे। उनकी लंका विजय का समय भी चैत्र माह में ही अभिनिर्धारित होता है, किसी और माह में नही। इसके उपरांत भी हमारे यहां दीपावली पर्व के साथ राम के अयोध्या पुन: आगमन की घटना को जोड़कर देखा जाता है। यह सर्वथा दोषपूर्ण है। दीपावली पर्व नवशस्येष्टि पर्व है। कार्तिक माह की नई फसल अर्थात शस्य का यज्ञ अर्थात इष्टि इस पर्व पर हमारे कृषक-वैश्य वर्ग अति प्राचीनकाल से करते आये हैं। इसी पर्व पर अंधियारी अमावस्या की रात्रि पर दीप जलाकर प्रकाश करने की परंपरा है। इसका अर्थ है कि हमारे हृदयाकाश पर विकारो का छाया घोर अंधेरा हम से दूर हो। तमसो मा ज्योर्तिगमय की हमारी वैदिक परंपरा का प्रतीक यह पावन पर्व हमारे उच्च जीवनादर्श की ओर हमारा ध्यान आकृष्टï करता है कि हम अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ें। हमारे ऋषिपूर्वजों का चिंतन कितना उच्च है कि उन्होंने अंधियारी रात को ही दीप प्रज्ज्वलित के लिए सर्वाधिक उपयुक्त समझा।

श्रीराम लंका विजय के पश्चात जब अयोध्या लौटे थे तो उन जैसे आदर्श दिव्य और आप्तपुरूष के लिए लोगों ने अपने अपने घरों में दीप जलाकर उनका स्वागत किया होगा। अर्थात उनके आगमन पर दीपावली मनायी होगी यह दीपावली मनाना अपने हृदय की प्रसन्नता का अभिप्रकटन था, न कि इससे राम की लंका से लौटने की घटना का संबंध होना। यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि लंका विजय और राम के लंका से लौटने के स्पष्ट प्रमाण हमारे पास उपलब्ध होते हुए भी रामायण के अंत: साक्ष्य को भी दृष्टि से ओछल करके हम परंपरा से यह कहते चले आ रहे हैं कि राम चंद्रजी इस दिन लंका से अयोध्या आये थे।

महर्षि दयानंद का हम पर असीम ऋण है कि जिन्होंने हमें सत्यान्वेषी बुद्घि प्रदान की। आज ऋषि शिष्य तो इस तथ्य और सत्य को स्वीकर कर रहे हैं कि दीपावली को राम के अयोध्या लौटने से कोई संबंध नही है। किंतु पौराणिक लोग आज भी भयंकर अंधकार में भटक कर इस पर्व की और श्री राम की गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं। उनके इस कृत्य से श्रीराम जी आत्मा भी अवश्य आहत होगी ।

9 Responses to “राम अयोध्या कब लौटे?”

  1. Shelander singla

    Sir aaj hm vikram sanvat k anusar chalte jo 2074va saal chal rha.aaj hm chetrr sukl partipda se nya saal mnate h jb ki ye ghtna vikram samvat chalu hone se hzaro saal purani h .kiya us tym bhi hindu mahino ki gadna ishi trha hoti thi. Ho sakta h us tym kuch or gadna chalti ho ya jis trha hindu mahine m mitiyan ghat ya baad jati h us hisab se 14 varsh pure hone ki tithi (miti)bdal gayi ho.ho sakta h ramayan k lekhak ne baad m jb ramayan likhi ho to 14 varso ki gadna bjaye dino k hisab karne k mhine to mhine kr di ho kirpiya parkas dale

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  2. डॉ. राजेश कपूर

    डा.राजेश कपूर

    बडा शोधपूर्ण, सोचने पर बाध्य करने वाला लेख आर्य जी ने लिखा है, बधाई स्वीकार करें. पर क्या भाषा अनावश्यक रूप से अधिक कठोर नहीं है? अनेक वषों से देख रहा हूं कि हमारे आर्यसमाजी बन्धु आवश्यक्ता न होने पर भी अत्यंत कठोर भाषा का प्रयोग कर जाते हैं, ऐसा क्यूं ? अनेक मित्र हैं जो नमस्ते और नमस्कार के मुद्दे को देश की सुरक्शा के अनेक विषयों से भी अधिक महत्व देते हैं, ऐसा क्यों ? लगता है कि खंडन-मंडन निरंतर करते-करते ऐसी भाषा के प्रयोग का स्वभाव बन जाता होगा. यदि यह रो्ष और ऊर्जा देश के सानमे उपस्थित अनेक भयावह संकटों के विरुध आर्यसमाजी मित्रों की प्रकट होती तो देश का कितना कल्याण हो पाता और आर्यसामाज अपनी पुरानी प्रतिष्ठा को फिर से प्राप्त कर पाता. आर्यजी के बकाने से मेरे मन की वह बात आज कहने का सुयोग बन गया जो अनेक वषों से मन में घुमड रही थी. आश करता हूं कि विद्वान लेखक राकेश आर्य जी इसे अन्यथा न लेंगे.
    * पौराणिक इतिहास के इस महत्वपूर्ण बिन्दु को स्मरण करवाने हेतु बधई व आभार.

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    • राकेश कुमार आर्य

      Rakesh Kumar Arya

      आदरणीय कपूर साहब,
      मैं आपकी बात से सहमत हूँ वाणी में कठोरता जनसाधारण के लिए अनुचित होती है लेकिन जिन लोगों ने अर्थ का अनर्थ किया है या भारत की संस्कृति को सीरसाशन करा दिया है उनके प्रति क्षमा भाव उचित नहीं है । आप एक वेद की सूक्ति को लें-यज्ञ ही श्रेष्ठतम कर्म है-इसका अर्थ है कि प्रत्येक श्रेष्ठ कार्य ही यज्ञ है लेकिन इसका अनर्थ करते हुए लोगों ने अर्थ कर दिया कि यज्ञ ही श्रेष्ठ कार्य है । इस अनर्थ ने हमारे देश में निकम्मापन फैलाया है फलस्वरूप लोग स्वाहा स्वाहा के लिए यज्ञों पर बैठ गए और राष्ट्र धर्म को भूल गए परिणाम निकला कि “सोमनाथ” लुट गया क्योंकि तलवार को अशोक ने खूटी पर टांग दिया था हमसे अफगानिस्तान काटा नेपाल,तिब्बत,बर्मा,श्री लंका,पाकिस्तान,मालदीप आदि कटे । इतिहास के लंबे कालखंड पर इस एक गलत व्याख्या के परिणाम देखता हूँ कितने घातक दिखते है कि पूरी एक किताब लिख दो ।
      मनु महाराज ने पंडित के लिए अधिक दंड कि व्यवस्था की है इसलिए जिन लोगों ने पंडित होते हुए हमे दिग्भ्रमित किया उनके प्रति ही हम अपना रोष व्यक्त करें आपके उचित मार्गदर्शन का ध्यान रखने का प्रयास करूंगा ।

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  3. शिवेंद्र मोहन सिंह

    इस तथ्य की जानकारी अब जा कर हुई, दरअसल कभी इन बातों पर ध्यान ही नहीं दिया था। समय के साथ महाकाव्यों में बहुत सारे क्षेपक जोड़ दिए गए, इसी से ये सारा मामला उलझ गया, जन साधारण की इन बातों में कोई रूचि ही नहीं है। अभी कुछ दिनों पहले पढ़ा था की किसी संत ने रामायण या राम चरित मानस में जोड़े गए क्षेपकों पर काम किया था और कुछ त्रुटी सुधार की थी, संत सभा ने उलटे उन्ही पर अनर्गल आरोप लगा कर माफ़ी मांगने पर मजबूर कर दिया था। इसी तरह कहीं मैंने पढ़ा की महाभारत ग्रन्थ का भी 3 या 4 बार नाम बदली किया जा चुका है, अब जरा सोचिये मूल पाठ का क्या हुआ होगा या यों कहें की मूल पाठ का कितना अंश होगा, अद्यतन ग्रन्थ में।

    सार्थक, तथ्यपरक जानकारी से भरपूर लेख के लिए धन्यवाद आपका।


    सादर,
    शिवेंद्र मोहन सिंह

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    • राकेश कुमार आर्य

      Rakesh Kumar Arya

      आदरणीय शिवेंद्र जी
      मूल रूप में महाभारत “जय” नाम का एक छोटा ग्रंथ था जिसका अठारवा अध्याय गीता था । गीता का अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं था । वैसे भी जहां दुर्योधन जैसा व्यक्ति युद्ध के लिए तैयार खड़ा हो वहाँ इतना बड़ा व्याख्यान कृष्ण जी के लिए दे पाना संभव नहीं था । बात संक्षेप में हुई और कृष्ण जी द्वारा अर्जुन का मोह भंग करके युद्ध पहले दिन से ही 10-20 मिनट की देरी से शुरू हो गया । अब आप अनुमान लगाए कि कृष्ण जी ने अपनी बात को कितनी देर में कह दिया होगा ? आपकी चिंता सही है । हम भारतीय स्वाध्यायशील नहीं रहे उसी का परिणाम है कि हमे अपने बारे में ही सही जानकारी नहीं है ।

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      • basant kumar

        दशहरा के दिन असल में “अशोक विजयदशमी” और धम्म चक्र परिवर्तन दिवस होता है विजय दशमी बौद्धों का पवित्र त्यौहार है।
        “अशोक विजयदशमी” सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध में विजयी होने के दसवें दिन तक मनाये जाने के कारण इसे अशोक विजयदशमी कहते हैं। इसी दिन सम्राट अशोक ने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी। ऐतिहासिक सत्यता है कि महाराजा अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद हिंसा का मार्ग त्याग कर बौद्ध धम्म अपनाने की घोषणा कर दी थी। बौद्ध बन जाने पर वह बौद्ध स्थलों की यात्राओं पर गए। तथागत गौतम बुद्ध के जीवन को चरितार्थ करने तथा अपने जीवन को कृतार्थ करने के निमित्त हजारों स्तूपों ,शिलालेखों व धम्म स्तम्भों का निर्माण कराया।सम्राट अशोक के इस धार्मिक परिवर्तन से खुश होकर देश की जनता ने उन सभी स्मारकों को सजाया संवारा तथा उस पर दीपोत्सव किया। यह आयोजन हर्षोलास के साथ १० दिनों तक चलता रहा, दसवें दिन महाराजा ने राजपरिवार के साथ पूज्य भंते मोग्गिलिपुत्त तिष्य, से धम्म दीक्षा ग्रहण की। धम्म दीक्षा के उपरांत महाराजा ने प्रतिज्ञा की, कि आज के बाद मैं शस्त्रों से नहीं बल्कि शांति और अहिंसा से प्राणी मात्र के दिलों पर विजय प्राप्त करूँगा। इसीलिए सम्पूर्ण बौद्ध जगत इसे अशोक विजय दशमी के रूप में मनाता है।
        अशोक विजयदशमी के अवसर पर ही 14 अक्टूबर 1956. के दिन डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर ने नागपुर की दीक्षाभूमि पर अपने 5 लाख) समर्थको के साथ तथागत भगवान गौतम बुद्ध की शरण में आये और बौद्ध धर्म ग्रहण किया ,इस कारण इस दिन को” धम्म चक्र परिवर्तन” दिवस के रूप में भी मनाया जाता है,
        मैं बसंत कुमार यहां यह उपरोक्त तथ्य इसलिए प्रस्तुत कर रहा हूँ क्यूकि मैं स्वयं बोद्ध धर्म अर्थात गौतम बुद्ध का अनुयायी हम इसलिए इस पवित्र दिन की सत्यता को भारत की जनता को अवगत करना अपना कृतव्य समझता हूँ इतिहास गवाह है कि हिन्दू धर्म के पुनर्जागरण के काल अर्थात मोर्य साम्राज्य के अंतिम साशक चन्द्रगुप्त मोर्य से पहले सम्पूर्ण भारत बुद्ध एवं बोद्ध धर्म का अनुयायी था आज भी दुनिया के अधिकांश देश बोद्ध धर्म को मानने वाले है मुझे गर्व है कि बुद्ध जैसे महान अतमा का जन्म हमारे देश अर्थात तत्कालीन भारत में हुआ,
        आप सभी को अशोका विजयादशमी एवं दीपावली तथा भैयादूज की हार्दिक शुभकामनाएं
        धन्यवाद आपका जीवन सुखी रहे

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  4. डॉ. मधुसूदन

    Dr. Madhusudan

    एक भ्रांत धारणा को प्रमाण पूर्वक दूर करने में आपका यह आलेख बहुत उपयोगी है.
    जन साधारण के मानस में गलत धारणा कैसे दृढ़ हो गयी होगी, इसका समाधान भी, आपने दिया, जो विश्वासार्ह ही प्रतीत होता है.
    महर्षि दयानंद जी के अनेकानेक योगदान रहें हैं; समय समय पर इसी प्रकार योगदान कर कर उपकृत करते रहें.
    लेखक का, बहुत बहुत आभार.

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    • राकेश कुमार आर्य

      राकेश कुमार आर्य

      श्रद्धेय डा० साहब आपके लेखो का मैं नियमित पाठक और लाभार्थी हूँ । हमारे साप्ताहिक समाचार पत्र “उगता भारत” की ईमेल ugtabharat@gmail.com पर मोहन गुप्ता जी क्रपापूर्वक आपके लेखो को प्रकाशनार्थ डाल देते है तो उन लेखो से पत्र के पाठक भी लाभान्वित होते है।आपका पुरुषार्थ वंदनीय है।आपके प्रयास की गंगा धारा को हमारे प्रयास भी कहीं बलवती कर रहे है तो यह मेरा सोभाग्य है ।

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      • डॉ. मधुसूदन

        Dr Madhusudan

        मेरे लिए, हर्ष की ही बात है, मोहन जी प्रकाशानार्थ मेरे द्वारा लिखे गए, आलेख डाल देते हैं.
        श्री राकेश कुमार आर्य जी, बहुत बहुत धन्यवाद.

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