लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

Posted On by &filed under लेख, साहित्‍य.


राकेश कुमार आर्य

मुझे बड़ा अटपटा लगता है जब कोई व्यक्ति-ये कहता है कि भारत वर्ष 1300 वर्ष पराधीन रहा। जब कोई इतिहासकार इसी प्रकार की मिथ्या बातें करता है तो मन क्षोभ से भर जाता है । यह इस देश का दुर्भाग्य है कि यहां सुनी सुनाई बातों पर अधिक चिंतन किया जाता है | अपेक्षाकृत स्वयं अध्ययन करने के यहां का सारा इतिहास विदेशियों ने लिख मारा। अब उसी इतिहास का शवोच्छेदन करने वाले भारतीय इतिहासकारों की एक लंबी सूची है, जो ‘अशोक महान’ को छलिया और ‘अकबर छलिया’ को महान बताने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाते रहते हैं। भारत का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप भी तभी जिंदा रहता माना जाता है जब राम और कृष्ण को कोसा जाए या रामायण और महाभारत को तो काल्पनिक माना जाए और मुस्लिम सुल्तानों के पापों को भारत के लिए पुण्य सिद्घ करने का प्रयास किया जाए।
जिन लोगों ने हिंदू जाति को कायर कहते हुए हजार वर्ष तक उसके गुलाम रहने की घोषणा का महापाप किया उन्हें लाला लाजपतराय जी ने अपनी पुस्तक ‘छत्रपति शिवाजी’ की प्रस्तावना में इन शब्दों में लताड़ा है-’जो जाति अपने पतन के काल में भी राजा कर्ण, गोरा और बादल, महाराणा सांगा और प्रताप, जयमल और फत्ता, दुर्गादास और शिवाजी, गुरू अर्जुन, गुरू तेगबहादुर, गुरू गोविंद सिंह और हरि सिंह नलवा जैसे हजारों शूरवीरों को उत्पन्न कर सकती है, उस आर्य हिंदू जाति को हम कायर कैसे मान लें? जिस देश की स्त्रियों ने आरंभ से आज तक श्रेष्ठ उदाहरणों को पेश किया है, जहां सैकड़ों स्त्रियों ने अपने हाथों से अपने भाईयों, पतियों और पुत्रों की कमर में शस्त्र बांधे और उनको युद्ध में भेजा, जिस देश की अनेक स्त्रियों ने स्वयं पुरूषों का वेश धारण कर अपने धर्म व जाति की रक्षा के लिए युद्ध क्षेत्र में लड़ कर सफलता पायी, अपनी आंखों से एक बूंद भी आंसू नही गिराया, जिन्होंने अपने पातिव्रत्य धर्म की रक्षा के लिए दहकती प्रचण्ड अग्नि में प्रवेश किया, वह जाति यदि कायर है तो संसार की कोई भी जाति वीर कहलाने का दावा नही कर सकती।’
यूनान, मिश्र, रोमां सब मिट गये जहां से,
बाकी मगर है अब तक नामोनिशां हमारा।
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नही हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा।।
कासिम के रूप में मुस्लिमों के आरंभिक आक्रमण
हमारे ब्रहन्नला इतिहासकारों को तो देखिये कि चाहे बलात रूप से अधिपति बने शासक का शासन क्षेत्र कितना ही छोटा क्यों न हो, यहां तक कि पेंशन भोगी मुगल सम्राटों तक को भी यहां का सम्राट मनवाने के लिए इतिहास के साथ क्रूर उपहास किया गया है। जिन लोगों का आदेश दिल्ली के लालकिले के भीतर तक ही सीमित होकर रह गया, और भी सच कहें तो जिनका आदेश उनके अधीनस्थ लोग भी नही मान रहे थे, वो भी भारत के सम्राट कहे जाते हैं और जिन मराठों का शासनादेश उसी समय महाराष्ट्र से उड़ीसा, दिल्ली, राजस्थान, बिहार के कुछ क्षेत्रों और दक्षिणी भारत के सुदूर प्रदेशों तक मजबूती के साथ चलता था, उन्हें देश में आतंकी, विद्रोही या लुटेरे कहा गया। यही स्थिति पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के विशाल राज्य की थी।
मुस्लिमों के द्वारा पहला आक्रमण भारत पर 712 ई. में मौहम्मद बिन कासिम के द्वारा किया गया। सातवीं सदी के प्रारंभ में जब अरब में 610ई. में इस्लाम की स्थापना हुई थी तो उस समय भारत पर सम्राट हर्षवर्धन (606-647 ई.) का शासन था। सम्राट हर्षवर्धन के समय में सिंध पर भी हर्ष का ही शासन था। परंतु हर्ष की मृत्यु के उपरांत भारत की केन्द्रीय सत्ता दुर्बल पड़ गयी। राजनीतिक अव्यवस्था फ़ैल गयी। इसी राजनैतिक अव्यवस्था के कारण हर्ष की मृत्यु के 65 वर्ष पश्चात मौहम्मद बिन कासिम ने भारत के सीमावर्ती राज्य सिंध पर हमला किया।
यह मुस्लिम आक्रांता भारत के सिंध प्रांत से टकराया और थोड़ा आगे बढ़ा। यह लुटेरा था जो अपने खलीफा को खुश करने के लिए यहां से धन लूटकर ले जाने के उद्देश्य से आया था। इसे सिंध के शासक दाहर की बेटियों सूर्य प्रभा और चंद्रप्रभा ने अपने बौद्धिक कौशल से इसी के खलीफा के द्वारा मरवा दिया था। वह कहानी यदि लिखी जाएगी तो मालूम होगा कि भारत की नारियों ने संस्कृति नाशकों का नाश कराने में पहले दिन से ही कितना प्रशंसनीय योगदान दिया था। पर यहां उसे लिखना प्रासंगिक नही है। यहां तो केवल ये देखना है कि जो इतिहासकार ऐसी धारणा बनाते हैं कि भारत को मौहम्मद बिन कासिम ने गुलाम किया था, उसी के आक्रमण से ही भारत गुलामी की ओर बढ़ गया था, वो कितने गलत हैं? मौहम्मद बिन कासिम ने भारत पर कोई राज्य स्थापित नही किया। वह तूफान की भांति आया और चला गया। लुटेरों से आर्थिक हानि हो सकती है, लेकिन उनसे राजनीतिक हानि नही होती है। क्योंकि मौहम्मद बिन कासिम अपने खलीफा के एजेण्ट के रूप में भारत आया था और उसे अपने लूट के माल में से शरीयती व्यवस्था के अनुसार अपने खलीफा को एक निश्चित धनराशि देनी थी। बात साफ है कि मौहम्मद बिन कासिम के आक्रमण का उद्देश्य लूट था उसका उद्देश्य राजनीतिक नही था, जैसे बाद में इसी तर्ज पर यहां ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी आयी थी, तो उसका उद्देश्य भी आर्थिक लाभ अर्जित करना ही था। उसके भारत आगमन का उद्देश्य राजनीतिक नही था।
हमें मौहम्मद बिन कासिम को इतिहास के एक अमर पुरूष के रूप में पढ़ाया जाता है और राजा दाहर को एक पराजित शासक के रूप में-जबकि राजा की दोनों बेटियों का तो कहीं उल्लेख भी नही आता। इतिहास का गला घोंट दिया जाता है और तथ्यों को बदल दिया जाता है।
मौहम्मद बिन कासिम के लौटते ही सिंध में स्वतंत्रता के लिए विद्रोह फैल गये और राजा दाहर के बेटे जयसिंह ने पुन: सिंध का राज्य प्राप्त कर लिया। यद्यपि जयसिंह कालांतर में इस्लामिक हमलावरों से परेशान होकर उन्हें सबक सिखाने के लिए योजना पूर्वक मुस्लिम बन गया था, बाद में वह मुस्लिमों के द्वारा ही मार दिया गया। अत: राजा दाहर के सैनिक और उसकी दो बेटियां स्वतंत्रता के युद्घ के पहले स्मारक हैं तो राजा जयसिंह और उसके वीर सैनिक इस युद्घ के दूसरे स्मारक हैं।
मौहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के पश्चात अरबों की ओर से आक्रमण परंपरा को सिंध में राजा जयसिंह के स्थान पर बने मुस्लिम शासक जुनैद ने आगे बढ़ाया। जुनैद व उसके सेनापति मर्मद, मण्डल, बैलमान, दहनज, बरबस और मलीबा को आक्रांत करते हुए उज्जैन तक आगे बढ़ गये थे। यहां मर्मद मरूदेश के लिए, बरबस भड़ौंच के लिए मलिवा मालवा के लिए, बैलमान बल्लमंडल (गुर्जर राज्यों का संघ) के लिए कहा गया है। इतिहास हमें बताता है कि अरबों ने चाहे कितनी ही दूर तक धावा बोल दिया था, परंतु वे यहां अपने प्रभुत्व को अधिक देर तक स्थापित नही कर पाए। अवन्ति के गुर्जर प्रतिहार राजा नागभट्ट, लाट देश (दक्षिणी गुजरात) के चालुक्य राजा अवनिजनाश्रम, पुलकेशीराज ने उन्हें परास्त कर भगा दिया। लुटेरों को अपनाया नही गया, अपितु उनके साथ वही व्यवहार किया गया जिसके वह पात्र थे। स्वतंत्रता का तीसरा दैदीप्यमान स्मारक है इन स्तवनीय राजाओं का ये स्तवनीय कृत्य। इसी स्तवनीय कृत्य में नांदीपुरी के गुर्जर राजा जयभट्ट चतुर्थ ने भी संघर्ष में सम्मिलित होकर सहयोग दिया था। चित्तौड़ के राणा वंश के वीर प्रतापी शासक बप्पा रावल का गौरवपूर्ण शासन भी इसी समय फलफूल रहा था, उनका म्लेच्छों को मार भगाने में उल्लेखनीय रूप से सहयोग मिला था।
उत्तर भारत में कश्मीर के प्रतापी शासक ललितादित्य और कन्नौज के शासक यशोवर्मा ने सिंध की सेनाओं का सामना किया और जुनैद को आगे बढ़ने से रोक कर स्वतंत्रता का एक शानदार स्मारक उन्होंने भी खड़ा कर दिया। सत्यकेतु विद्यालंकार ने बड़े गर्व से लिखा है:-’अरबों की जिन सेनाओं ने पूर्वी रोमन साम्राज्य और पर्शियन साम्राज्य की शक्ति को धूल में मिला दिया था, ईजिप्ट और उत्तरी अफ्रीका को जीतकर यूरोप में स्पेन की भी जिन्होंने विजय कर ली थी और मध्य एशिया के बौद्घ राज्य भी जिनके सामने नही टिक सके थे, वे भारत को जीत सकने में असमर्थ रहीं।’ भारत के इतिहास का अध्ययन करते हुए इस तथ्य को आंखों से ओझल नही करना चाहिए। भारत की सैन्यशक्ति इस काल में अरबों की तुलना में उत्कृष्ट थी, यह सर्वथा स्पष्ट है। इसलिए बड़ी निराशा के साथ मौलाना हाली ने भी लिखा था-
‘वो दीने हजाजी का बेबाक बेड़ा,
जो कुलजम में झिझका,
न जेहु में अटका,
मुकाबिल हुआ कोई खतरा न जिसका,
किये थे पार जिसने सातों समंदर,
वो डूबा दहाने में गंगा के आकर।’
सच भी ये ही है कि दीने हजाजी का बेबाक बेड़ा गंगा के दहाने में आकर डूब गया। फिर भी झूठा पढ़ने और जूठन खाने की किसी की प्रवृत्ति ही बन हो गयी हो तो क्या कहा जा सकता है?
झूठे चाटुकारों से और लेखनी को बेचकर व आत्मा को गिरवी रखकर लिखने वाले इतिहासकारों से स्वतंत्रता के अमर सैनानियों के ये पावन स्मारक यही प्रश्न कर रहे हैं। समय के साथ हम इन प्रश्नों को जितना उपेक्षित और अनदेखा करते जा रहे हैं-उतना ही बड़ा प्रश्नचिन्ह लगता जा रहा है।
हमारी नई पीढ़ी इतिहास के झूठ पढ़ते-पढ़ते उन्हें ही सच मान रही है। हमें पहले अपनी प्राचीन वैदिक संस्कृति से काटा गया, इसलिए स्वराज्य हमसे बहुत दूर का शब्द हो गया। आज हमारी युवा पीढ़ी भारत को समझने के लिए भारत के प्राण-वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, स्मृति आदि की ओर न देखकर विदेशियों की ओर देख रही है और इसीलिए विश्व के सबसे अधिक सांस्कृतिक रूप से समृद्घ भारत वर्ष को कंगाल और यूरोप को इस क्षेत्र में सर्वाधिक समृद्घ समझने की भूल कर रही है। हमारा दुर्भाग्य है कि स्वतंत्रता के पश्चात इस देश की शिक्षा नीति इस देश के अतीत के स्मारकों को उत्कीर्ण कर उन्हें पूज्यनीय बनाने के लिए लागू नही की गयी अपितु उन्हें अपमानित और तिरस्कृत करने के लिए लागू की गयी। वर्तमान पीढ़ी उसी अपमानित और तिरस्कृत करने की भावना से लिखे गये इतिहास को पढ़कर अपने अतीत के बारे में जो कुछ समझ पा रही है, वह उसके लिए निराशाजनक है।

3 Responses to “कौन कहता है कि हम एक हजार वर्ष गुलाम रहे”

  1. Dr.shriharsha Sharma

    Majority of India has been ruled Muslim invaders from 8th. century and then under British raj until 15. Aug.1947 this is a fact. During this period Hindus were under the rule of invaders. In this period many great Hindus tried to free India and fought but we could not come out of slavery. This truth must be accepted and we must take lessons not to get into trouble again.
    The cruelty, terror, conversion, loot, plunder,rape, kidnapping, destruction of of temples, burning of libraries, by Muslims in general and rulers in particular is well known and must be well documented and must be taught in schools and universities so the truth is known to all. Negation by post partition rulers is a mistake and a blunder. Those who deny the bitter truth of history are doing dis service to Bharatmata and themselves and future generation.
    The atrocities and cruelty of Muslim and christian rulers for thirteen centuries on India is shame on Hindus.

    Reply
  2. Anil Gupta

    बिलकुल ठीक कहा है आपने! हमारा पिछले तरह सौ वर्षों का इतिहास हमारी दस्ता की नहीं बल्कि अपनी अतिशय उदारता और उदासीनता से गंवाई गयी अस्मिता को पुनः स्थापित करने के संघर्ष का इतिहास है! इसी कारण यदि एक हमलावर ने किसी क्षेत्र को जीत लिया तो उसके उत्तराधिकारी को पुनः उस क्षेत्र को जीतना पड़ा क्योंकि उस क्षेत्र की जनता ने अपनी पराजय को स्वीकार नहीं किया बल्कि उसका प्रतिकार करने का प्रयास करते रहे! ठाकुर घनश्याम नारायण सिंह देहरादून स्थित अंध महाविद्यालय के प्रमुख थे! उन्होंने अपना शोध प्रबंध ‘ठगों’ पर लिखा था! उनके अनुसार जिन क्षेत्रों में विदेशी आक्रमणकारियों ने स्थानीय शासन को परास्त करके अपना कब्ज़ा कर लिया था उस क्षेत्र के लोग अपनी खोई हुई आज़ादी को पाने के लिए शाही दस्तों पर घात लगाकर हमले करते थे और उनका खजाना लूट लेते थे!लेकिन लम्बे समय तक भी कोई बड़ी सफलता नहीं मिली! कालांतर में यह लूटपाट ही उनका जीविकोपार्जन का जरिया बन गया! जिससे निबटने के लिए अंग्रेज हुकूमत ने इंग्लैंड से एमर्सन यंग नाम के एक ऑफिसर को लगाया और ठगी की इस व्यवस्था पर अंकुश लगाया!

    Reply
  3. DR.SHRIHARSHA SHARMA

    This article by Shri Rakesh Arya is miles away from the bitter and shameful history of Hindus that they have been under foreign and minority rule for nearly thirteen centuries.We must accept the truth and take lessons to correct ourselves.Just by mentioning two poem you cannot change the history and Iqbal proved to be traitor and you are quoting him is a disgusting thing.

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *