मणिपुर में अलगाववादियों को सर उठाने का मौका क्यों मिला ?

मणिपुर में लंबे समय से सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून का विरोध होता आ रहा है . राज्य में एकबार फिर से कई संगठन इसके विरोध के लिए एकजुट होकर सडकों पर उतरे हैं. मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाते हुए इस विशेषाधिकार क़ानून के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करते हुए इन संगठनों ने राज्य में 60 घंटे का बंद बुलाया जिसमें जनजीवन पर मिलाजुला असर दिखाई पड़ा . मामले के अभी गरम होने की वजह पहले चरमपंथी रहे और अब सामान्य जीवन में वापसी कर चुके संजीत की कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ में हत्या को समझा जा रहा है .

मणिपुर में लंबे समय से सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून का विरोध होता आ रहा है . राज्य में एकबार फिर से कई संगठन इmanipur1सके विरोध के लिए एकजुट होकर सडकों पर उतरे हैं. मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाते हुए इस विशेषाधिकार क़ानून के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करते हुए इन संगठनों ने राज्य में 60 घंटे का बंद बुलाया जिसमें जनजीवन पर मिलाजुला असर दिखाई पड़ा . मामले के अभी गरम होने की वजह पहले चरमपंथी रहे और अब सामान्य जीवन में वापसी कर चुके संजीत की कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ में हत्या को समझा जा रहा है . संजीत मुठभेड़ के विरोध के लिए यह बंद बुलाया गया था . पिछले कुछ समय से मणिपुर में सशस्त्र बलों को दिए गए विशेष अधिकारों के विरोध में प्रदर्शनों का सिलसिला तेज़ हुआ है और इन प्रदर्शनों को नेतृत्व देने के लिए कई संगठनों ने मिलकर अपुनब लुप नाम से एक बड़ा मंच बनाया है .मणिपुर की वर्तमान परिस्थिति में उपरोक्त कथित फ़र्जी मुठभेड़ मामले ने राज्य में अलगाववादी संगठनों को सर उठाने का मौका दे दिया है . जानकारों के मुताबिक कहा जा सकता है कि फ़र्जी मुठभेड़ का मुद्दा उठने से अलगाववादी संगठनों को सहारा मिला है, क्योंकि सशस्त्र बलों को मिले विशेषाधिकार का दुरुपयोग करके एक सुरक्षाकर्मी किसी को भी संदेह के आधार पर मार सकता है. लोगों को सशस्त्र बलों की नीयत पर शक है.” जहां तक वर्तमान परिस्थिति से निपटने का सवाल है, तो सरकार की तरफ से इस मसले से निपटने के लिए कोई राजनीतिक पहल नहीं की गई है मणिपुर में सशस्त्र बलों को मिले विशेष अधिकारों के ख़िलाफ़ आंदोलन अब काफी पुराना हो चला है. इस मांग को लेकर वर्ष 2000 से इरोम शर्मिला आमरण अनशन पर है. वर्ष 2004 में पूरा देश सकते में आ गया था जब कुछ मणिपुरी महिलाओं ने निर्वस्त्र होकर सुरक्षा बलों द्बारा कथित अत्याचारों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था. फिलहाल इस मुद्दे को उपेक्षित रखकर सरकार मामले को और भी भड़का रही है . एक ओर सत्तापक्ष की कमजोर इच्छाशक्ति की वजह से देश भर में नक्सली और अलगाववादी संगठनों की जड़ें मजबूत होती जा रही है वहीँ दूसरी तरफ प्रधानमंत्री कहते हैं आतंरिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सरकार को अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल पाई है . महोदय सफलता तो तब मिलेगी जब कोई कदम उठाये जायेंगे .

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