संस्कृत भाषा में शोध एवं गहन अध्ययन का नियंत्रण – राजीव मल्होत्रा का व्याख्यान

rajiv malhotraधर्मा प्रहरी

यह लेख श्री राजीव मल्होत्रा के व्याख्यान पर आधारित है जो उन्होंने विश्व संस्कृत सम्मेलन, बैंकाक में २८ जून २०१५ को दिया था।

इस व्याख्यान में राजीव मल्होत्रा जी ने संस्कृत भाषा और उससे सम्बंधित ज्वलंत मुद्दों को उठाया था। उन्होंने तीन मुख्य पहलुओं पर बात की थी। मल्होत्रा जी ने अपनी पुस्तक (The Battle For Sanskrit, दी बैटल फॉर संस्कृत) में इन तीन विचारों का गहराई से अध्ययन किया है। इस व्याख्यान में उन्होंने संक्षेप में इन तीन विषयों पर अपनी बात रखी थी:

१.      क्या संस्कृत एक जीवंत भाषा है? (विदेशी भारतविदों (Indologists) के अनुसार संस्कृत एक मृत भाषा है)

२.      क्या संस्कृत भाषा कुछ वर्गों के शोषण के लिए प्रयुक्त हुई थी? (विदेशी भारतविदों के अनुसार संस्कृत भाषा के मूल में उत्पीड़न छुपा हुआ है)

३.      क्या संस्कृत भाषा मूल रूप से सनातन धर्म की धार्मिक परम्पराओं से जुडी है? (विदेशी भारतविदों के अनुसार संस्कृत भाषा मूलतः राजनीतिक कार्य के लिए इस्तेमाल होती थी?)

(राजीव जी का व्याख्यान – प्रथम पुरुष में)

एक साल पहले अचानक एक विचित्र घटना घटी। न्यू जर्सी में जहाँ मैं रहता हूँ, वहां के कुछ भारतीयों ने मुझे बताया कि वे न्यूयॉर्क व न्यू जर्सी में विभिन्न विश्वविद्यालयों में श्रृंगेरी मठ की शाखाएं बनाना चाहते हैं। उन दोस्तों ने कहा कि यह तो बहुत अच्छा हो रहा है कि आदि शंकराचार्य के विचार सब जगह फ़ैल जायेंगे, और अमेरिकन प्रोफेसर उन्हें पढ़ाएंगे। मैं तुरंत सतर्क हुआ। मैं यह जानने में उत्सुक हुआ कि इसका मुख्य कर्ताधर्ता कौन होगा? वे किस तरह की पढ़ाई कराएँगे? वे किसके दृष्टिकोण से पढ़ाएंगे?  तब पता चला कि उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति (शेल्डन पोलाक) को प्रमुख बनाया है, जो अमेरिकन ओरिएण्टलिस्म के सिद्धांत का मुख्य प्रणेता है। उनके मुख्य विचारों  पर एक नज़र डालें:
१. संस्कृत शास्त्र बौद्धिक विकास को पीछे ले जाने वाले हैं. यह शास्त्र मानसिक एवं बौद्धिक स्तर पर पंगु करने वाले ग्रन्थ हैं जो व्यक्तिगत रचनात्मकता को उबरने नहीं देते.

२. संस्कृत शास्त्रों का उपयोग राजनीतिक एवं सामाजिक उत्पीड़न के लिए किया गया और केवल उन जैसे (अर्थात पोलाक जैसे विद्वान) ही इन बुराइयों को उजागर कर सकते हैं और भारतियों को (इन उत्पीड़क विचारों से) “मुक्ति” दिला सकते हैं

३. राम की पूजा एक नए पंथ के तौर पर करीब बारहवीं शताब्दी में लोकप्रिय करवाई गयी. ऐसा इसलिए किया गया ताकि राम-रावण युद्ध की तरह भारतीय शासक को राम के सामान पूजनीय और बाहरी आक्रान्ता को एक राक्षस की तरह दिखाया जाये.

४. महाभारत विश्व इतिहास की सबसे खतरनाक राजनीतिक कथा है क्योंकि इसमें गृहयुद्ध की दशा में भ्रातृघात (Fratricide: भाइयों को मार देना) के विषय पर गंभीर चिंतन हुआ है

५. संस्कृत एक मृत भाषा है और असल में बाहरी आक्रमणकारी ((अर्थात मुसलमान आक्रान्ता) इसको बढ़ावा देना चाहते थे

६. द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मन लोगों ने जो यहूदियों का नरसंहार किया था वो नाज़ी विचारधारा के संस्कृत अध्ययन का नतीजा था.
मैंने तुरंत श्रृंगेरी मठ के शंकारचार्य से बात करी। मैंने उन लोगों से बात कीजो इस प्रोजेक्ट को फंडिंग दे रहे थे। मैंने अमेरिका में श्रृंगेरी मठ के प्रतिनिधियों से बात करी। मैंने इन सभी को बताया कि इन (अमेरिकन ओरिएण्टलिस्म वाले) लोगों की विचारधारा क्या है और इन्होने अभी तक क्या काम किया है। मैंने अपने लोगों से कहा कि तुम शत्रुओं को अपनी संस्कृति की कुंजियाँ दे रहे हो। तुम आदि शंकराचार्य की परंपरा को outsource कर रहे हो। आप पहले इन लोगों का पूर्व पक्ष करो, उसके बाद निर्णय करो। पहले पता तो करो वो कैसे हैं, तब आप उन्हें स्वीकार करो। मगर आप उन्हें सिर्फ उनकी प्रसिद्धि के बल पर या अखबार के कुछ लेखों के ऊपर, या परिष्कृत भाषणों से प्रभावित होकर मत स्वीकारो। तुम्हारी परंपरा कहती है कि तुम ठीक से समझो। आदि शंकर ने जगह जगह भ्रमण किया, गंभीर अध्ययन किया और अपने विरोधियों से तर्क किया था। उन्होंने सतही कार्य नहीं किया था।

और इस बात का क्या मतलब है कि “वे बड़े अच्छे आदमी हैं!!?” मैंने जब सवाल उठाये तो मुझे यही जवाब मिला कि “अरे वो तो बड़े अच्छे और मृदुभाषी व्यक्ति हैं!” तब मैंने उन्हें कहा कि जिस तर्क (Aestheticization of Power) से वे संस्कृत की बुराई करते हैं उसी का प्रयोग वो तुम्हारे साथ कर रहे हैं। वो अपना प्रभुत्व भी फैलाना चाहते हैं मगर बड़े शांत भाव से।

जो भारतीय पूंजीपति इस प्रोजेक्ट की फंडिंग कर रहे थे उन लोगों को सच्चाई का ज़रा भी पता नहीं था और उन्होंने ज़रा भी गंभीर जांच नहीं कीथी।
हमें कुछ मूलभूत अंतरों को समझना होगा:

संस्कृत भाषा के अध्ययन में हमें इनसाइडर (अन्दर से अध्ययन करने वाले) और आउटसाइडर (बाहरी अध्ययन करने वाले) के बीच के अंतर को सही तरह से समझना होगा। हमें यह देखना होगा कि यह दोनों वर्ग संस्कृत परंपरा को किस प्रकार अलग तरह से देखते हैं और किन बातों में (इनसाइडर और आउटसाइडर) उनके विचार समान हैं। हमें देखना चाहिए कि किन बातों में यह दोनों दृष्टिकोण परिपूरक (complementary) हैं, और किन बातों में इन दोनों दृष्टिकोणों में परस्पर विरोध है।

पहली बात, इनसाइडर और आउटसाइडर के विचार का जातीयता या राष्ट्रीयता से कुछ लेना देना नहीं है। यह विचार जुड़ा हुआ है “दृष्टि” से, पर्सपेक्टिव (perspective) से; तो आपकी दृष्टि एक इनसाइडर की हो सकती है या फिर आपकी दृष्टि बाहरी (एक आउटसाइडर की) हो सकती है। मेरे कई पश्चिमी मित्र “इनसाइडर” हैं क्योंकि उनका दृष्टिकोण आंतरिक है। दूसरी तरफ एक बहुत बड़ी संख्या में ऐसे भारतीय हैं जो आउटसाइडर दृष्टिकोण (perspective) रखते हैं, क्योंकि या तो वे पश्चिम से बहुत प्रभावित हो गए (westernized हो गए) या अपने को पंथ-निरपेक्ष मानने लगे।

आंतरिक (इनसाइडर) दृष्टिकोण, संस्कृत को सिर्फ एक भाषा नहीं समझता बल्कि उसको सभ्यता व संस्कृति के मूलभूत आधार की तरह देखता है। आंतरिक (इनसाइडर) दृष्टिकोण संस्कृत को एक जीवित परंपरा मानता है; ऐसी परंपरा जो यज्ञों, मन्त्रों, एवं कुछ विशेष शब्दों के द्वारा – ऐसे संस्कृत शब्द जिनका अनुवाद नहीं हो सकता – के द्वारा जीवित है। ये विशेष शब्द हमारी विचार प्रक्रिया के महत्वपूर्ण अंग हैं। ये शब्द गहरा आध्यात्मिक अर्थ रखते हैं एवं हमारे अनेक पवित्र रीतिरिवाजों को भी दर्शाते हैं।

ऐसे शब्दों में एक है – श्रद्धा। श्रद्धा का सही अनुवाद नहीं हो सकता। एक आउटसाइडर के पास “श्रद्धा” नहीं होती। दूसरी तरफ एक “आंतरिक” व्यक्ति के मन में अपनी प्राचीन एवं अनुपम परम्पराओं के प्रति गहरी श्रद्धा होती है।

आंतरिक व्यक्ति संस्कृत को एक अधि-भाषा के तौर पर भी देखते हैं; संस्कृत विभिन्न स्थानीय भाषाओँ एवं परम्पराओं के बीच में एक मूल सूत्र के तरह है (न सिर्फ भारतीय उपमहाद्वीप में बल्कि दक्षिण पूर्व एशिया में भी)

आंतरिक व्यक्ति मन्त्रों द्वारा जनित स्पंदन का भी महत्व समझते हैं। ध्यान रहे, इन स्पंदनों का अनुवाद नहीं हो सकता; यह कोई वैचारिक मत नहीं है कि जिनका अनुवाद किया जा सके।

इनसाइडर लोग काव्य, नाट्य को संस्कृत का एक अभिन्न अंग मानते हैं, क्योंकि इनके द्वारा संस्कृत भाषा के आध्यात्मिक स्वरुप को व्यक्त किया जा सकता है।

इनसाइडर मानते हैं हैं कि संस्कृत भाषा की अपनी अलग व्याख्या करने की प्रणालियाँ (systems of interpretations) हैं। उनके अनुसार जब आप संस्कृत भाषा की व्याख्या करते हैं तो कई वैकल्पिक विचार सामने आ सकते हैं। ये विभिन्न विचार एक दूसरे से अलग हो सकते हैं, इनको मानने वाले आपस में शास्त्रार्थ कर सकते हैं, मगर ये सभी विचार अपनी अलग अलग व्याख्या कुछ मूलभूत सिद्धांतों के अंतर्गत ही करते हैं।

बाहरी दृष्टिकोण वाले (आउटसाइडर) इन बातों को नहीं मानते। वे संस्कृत को मुख्यतः एक भाषा के तौर पर लेते हैं, न कि एक जीवन पद्दति के रूप में।

 

(Contd….)

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