लेखक परिचय

विनोद कुमार सर्वोदय

विनोद कुमार सर्वोदय

राष्ट्रवादी चिंतक व लेखक ग़ाज़ियाबाद

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जब प्रधानमंत्री जी का स्पष्ट संदेश है कि “सबका साथ एवं सबका विकास” ही सशक्त राष्ट्र निर्माण का मार्ग है तो ऐसे वातावरण में यह अत्यंत विचारणीय तथ्य है कि उपराष्ट्रपति जैसा उच्चपद भी कट्टरवाद के कारण उच्च शिक्षित मुसलमान को भी राष्ट्र की मुख्यधारा में समाहित करने में असफल रहा। लेकिन यह तो सोचना ही होगा कि अनेक वर्षों तक विभिन्न मुस्लिम देशों में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले डॉ हामिद अंसारी क्या मुस्लिम मानसिकता से प्रभावित नही हुए होंगें ? इसके अतिरिक्त उन्हें अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय का भी तो सानिध्य प्राप्त हुआ था। अतः यह कहना उचित ही होगा कि अन्तःस्थल तक वे मुस्लिम कट्टरवाद से ग्रस्त अवश्य होंगे ?  फिर भी उन्हें अपने उपराष्ट्रपति पद के कार्यकाल की अंतिम बेला पर *सांस्कृतिक राष्ट्रवाद* को नकारना नही चाहिए था । उन्होंने नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु में  7 अगस्त को जो विचार व्यक्त किये तथा राज्य सभा दुरदर्शन पर करण थापर को 10 अगस्त को जो साक्षात्कार दिया उससे हमारी तथाकथित धर्मनिरपेक्षता पर चोट अवश्य हुई है । क्या उनको अपने इस उच्च पद की गरिमा का भी ध्यान नही रहा ? वे केवल दिखावे को मुस्लिम समाज की चिंता करते हुए यह मानते है कि भारत में मुसलमान अभी असुरक्षा की भावना से ग्रस्त है। जबकि उन्हें यह भी अच्छी प्रकार से समझना चाहिये कि वे केवल ढोंगी धर्मनिरपेक्षता के कारण मुस्लिम पोषित राजनीति से ही इस पद पर दो बार चुने गये । समाचार पत्रों में इनकी विदेश यात्राओं का उल्लेख अवश्य होता रहा है, परंतु इन्होंने मुस्लिम समाज की उन्नति के लिये क्या क्या किया उसका कोई समाचार सम्भवतः नही आया ? क्या देश की वर्तमान राष्ट्रीय व प्रदेशीय राजनीति में असफल हो रही कांग्रेस व अन्य क्षेत्रीय दलों की पराजय एवं राष्ट्रवादियों की सफलता से कही हामिद अंसारी  विचलित तो नही हुए ?  कहीं यह लोकतांत्रिक राजनीति में “मुस्लिम मताधिकारकोष” के प्रभावहीन होने के कारण मुसलमानों की पिछले 70 वर्षों से चली आ रही ब्लैकमेलिंग का अनैतिक दबाव समाप्त होने की चिंता तो नही है ? अगर मोदी जी के नेतृत्व में सशक्त केंद्रीय सरकार होने के कारण  कट्टरपंथियों व उनके साथियों की अनेक मनमानी गतिविधियों पर भी अंकुश लगने से हामिद अंसारी को मुसलमान डरा हुआ प्रतीत हो रहा हैं तो कोई आ5श्चर्य नही होगा ? अतः ऐसी विपरीत परिस्थितियों में हामिद अंसारी ने संभवतः अपनी पिछले कुछ वर्षों की घुटन को उजागर करके 10 अगस्त को अवकाश प्राप्त करके मुक्ति पायी हो ।
भारत की उच्च सांस्कृतिक मानवीय सभ्यता को अगर उन्होंने आत्मसात किया होता तो सम्भवतः वे मुसलमानों में असुरक्षा की मिथ्या चर्चा नही करते। अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष रहने पर उन्हें भारत सरकार की मुसलमानों को निरंतर सुख-सम्पन्न करते रहने की योजनाओं का ज्ञान तो अवश्य रहा होगा ? क्या उन्हें पाकिस्तान में भारत से गये हुए मुसलमानों के कष्टों का ज्ञान नही ? क्या वे  धर्मनिरपेक्ष भारत में प्रतिवर्ष हज़ारो करोड़ रुपयों से मुस्लिम समुदाय की केंद्र व राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं को भूल रहे है ? अल्पसंख्यकों के नाम पर मुसलमानों का निरंतर सशक्तिकरण होने के उपरांत भी भूतपूर्व उपराष्ट्रपति के ऐसे विचार अत्यंत निंदनीय व अशोभनीय है। उन्होंने भारत की पवित्र भूमि पर जन्म लेकर व  भारत सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर रहकर भी प्रायः भारतीय संस्कृति का सम्मान नही किया । विशेषतौर पर रामलीलाओं के मंचो  व गणतंत्र दिवस पर उनके व्यवहारों पर राष्ट्रवादी समाज को आपत्ति ही रही। ऐसा क्यों है कि इतना सब कुछ पाने के बाद भी हामिद अंसारी जैसे मुस्लिम समाज के लोग देश की मुख्य धारा से जुड़ना नही चाहते और राष्ट्र की आत्मा के प्रति भी अनास्था रखते है ?  क्या ऐसी मानसिकता वाले मुसलमान उच्च पद पाने के उपरांत भी कभी “सर्वे भवन्तु सुखिनः”  की भारतीय संस्कृति को अपनायेगें ?
यह कैसी विडम्बना है कि अनेक घनी मुस्लिम बस्तियों से भयभीत होकर पलायन करने वाले बहुसंख्यक हिंदुओं की पीड़ा ने हामिद अंसारी को कभी विचलित नही किया।  इस्लामिक जिहाद के कारण कश्मीर से पलायन कर चुके लाखों हिंदुओं के उत्पीडन पर उन्होंने कभी कोई संवेदना प्रकट नही करी। पाकिस्तान व बांग्लादेश के हिंदुओं के ऊपर हो रहें अनेक मुस्लिम अत्याचारों को छोड़ भी दें तो भी केरल, पश्चिम बंगाल, आसाम , बिहार ,पश्चिमी उत्तर प्रदेश व जम्मू-कश्मीर आदि क्षेत्रों के अनेक नगरों में होने वाली असंख्य हिन्दू विरोधी हिंसक घटनाओं पर भूतपूर्व उपराष्ट्रपति ने कभी कोई संज्ञान नही लिया ? क्या उन्होंने कभी बढ़ते इस्लामिक आतंकवाद पर चर्चा की या नरसंहार को बढ़ाने वाले जिहादी दर्शन में कोई संशोधन कराने के लिये कोई प्रयास किये ?  क्या उन्होंने कभी यह साहस करा कि कुरान की उन आयतों में जो बहुत ही खतरनाक और घृणास्पद होने के कारण मुसलमानों व अन्य समुदायों के बीच भेदभाव व द्वेष का निर्माण करती है, में आवश्यक संशोधन करवा कर साम्प्रदायिक सौहार्द बढ़ाया जाय। जिन आयतों के संबंध में दिल्ली के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट श्री जेड.एस. लोहात ने कुरान के विषय में किये गये अपने एक ऐतिहासिक निर्णय में 31 जुलाई 1986 को उल्लेख किया था। ऐसा नही है कि हामिद अंसारी इन सब विषयों से अवगत न हो फिर भी भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में अल्पसंख्यकों की ओट में मुस्लिम समुदाय के लिये चिल्लाते रहो तो इस प्रकार उनकी इस्लाम के प्रति कट्टरता के साथ साथ शांतिप्रिय जिहाद के लिये भागीदारी भी बनी रहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं ।
आपको स्मरण होगा कि 2012 में जब हामिद अंसारी को पुनः उपराष्ट्रपति बनाने की तत्कालीन संप्रग सरकार में चर्चा हुई तो श्रीमान हामिद अंसारी ने राष्ट्रपति पद पाने के लिये उत्सुकता दिखाई थी और पुनःउपराष्ट्रपति  बनने के लिये तैयार नही थे। परंतु जब श्री प्रणव मुखर्जी का राष्ट्रपति बनना सुनिश्चित हो गया तो फिर इन्होंने पुनः उपराष्ट्रपति बनने में ही अपनी भलाई समझी। लेकिन भविष्य में उनकी भारत का राष्ट्रपति बनने की महत्वकांक्षा अभी शेष है इसीलिए वे चाहते होंगे कि ऐसे विवादित कथन से छदम धर्मनिरपेक्ष दलों की चर्चा में बनें रहेंगे और संभवतः भविष्य में भारत का राष्ट्रपति बनने की अभिलाषा भी पूरी हो सकेंगी , तो इससे अधिक सुरक्षित और शोभायमान पद उनके लिये और क्या हो सकता है ?
यहां यह भी उल्लेख करना अवश्यक हैं कि हमारे प्रधानमंत्री जी की यह कूटनीति समझो या सरकारी औपचारिकता जो उन्होंने “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” के कारण ही उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के अवकाश की अंतिम बेला पर कुछ ऐतिहासिक विवादित बिंदुओं का उल्लेख करते हुए भी उनका सम्मान रखते हुए उनकी सराहना करके निभाई है।
लेकिन राष्ट्र को यह विचार अवश्य करना होगा कि “साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाडने वाली मुस्लिम कट्टरता” के विरोध की आवश्यकता क्यों है ? अन्यथा इतिहास साक्षी है कि कट्टरवाद के कारण ही मुस्लिम उन्मुखी राजनीति आरम्भ हुई थी जिससे देश का विभाजन हुआ  और स्वतंत्रता के बाद भी कट्टर मुसलमानो में भारतीयता और उसके प्रतीकों के प्रति आज तक कोई सम्मान नही जागा। ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्य धारा में लाने के नाम पर मुस्लिम समाज के चरणों में कितनी ही सुख-सुविधाओं की धाराऐं बहा दी जाय तब भी  इनकी अनन्त इच्छायें कभी पूरी नही हो सकती और इनकी कट्टरवादिता इनको भारतीय संस्कृति अपनाने में बाधक ही बनी रहेगी।

विनोद कुमार सर्वोदय

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