ज्योतिषशास्त्र में राधा-कृष्ण का अवलम्बन

              लेख –  आत्माराम यादव पीव

                बृषभानु नंदिनी राधा सम्पूर्ण ब्रजमण्डल की अधीश्वरी और श्रीकृष्ण की नित्य और आल्हादिनी-संगिनी है।श्रीकृष्ण स्वयं राधाजी की आराधना करते है तभी भक्त राधाभक्ति के बाद श्रीकृष्ण पूजा का अधिकार पाते है। देवी भागवत में ’’श्री राधायै स्वाहा’’ का षडक्षर मंत्र राधा जी की कृपा पाने के लिये उपासकों द्वारा प्रयुक्त होता है। चिन्मयी भुवनेश्वरी मूल प्रकृतिरूपिणी ने जब सृष्टि रची तब राधा प्राण की तथा दुर्गा बुद्धि की देवी के रूप में थी। विश्वसृष्टि के मूल में रस और श्रृंगार रस के दर्शन विभिन्न मतान्तरों में शिव और शक्ति, कामेश्वर और कामेश्वरी तथा श्रीकृष्ण और राधा के रूप में है। राधा को संपूर्ण ऐश्वर्यो से परिपूर्ण माना है ठीक वैसे ही जैसे श्रीकृष्ण को सोलह कलाओं से पूर्णपुरूष प्रतिष्ठित किया है। यह आश्चर्यमय करता है कि ज्योतिषशास्त्रियों ने ज्योतिष में सम्पूर्ण राधातत्व को शामिल कर ज्योतिषपिंडों में उन्हें घटाकर ज्योतिषशास्त्र का मूलाधार माना है, जो राधा को सर्वोच्च शिखर पर प्रतिष्ठित करता है।

    राधाकृष्ण के धर्ममत पक्ष की व्याख्याओं से सभी अवगत है किन्तु ज्योतिषतत्व में उनके जन्म के समय उनसे जुड़े जिन नामों का उल्लेख मिलता है वे सहज नहीं हो सकते है । कृष्ण विष्णु के अवतार है जिससे स्पष्ट होता है कि वे सूर्य के प्रतिबिंब है । ब्रज में उनके जन्म के समय से बाद तक जितनी भी लीलायें हुई वे सभी सूर्य के प्रतिबिम्ब और तारों के युक्तियुक्त स्थानों पर अवस्थित होने पर कृष्ण के पराक्रम और पराभव से मेल खाती है। गर्ग मुनि स्वयं ज्योतिषमर्मज्ञ रहे हेै तभी आदित्य के अवतार श्रीकृष्ण का वे पहले ही ज्योतिष में आविष्कार कर सके थे । कालखण्ड की परिधियों से परे ये सारे पौराणिक दृष्टांत राधाकृष्ण को मूलतः धर्मतत्व से जोड़ने से बेहतर उनके मूलतः ज्योतिषतत्व में अवस्थित होना दर्शाते है।

     ज्योतिषशास्त्र में ग्रहों,नक्षत्रों एवं राशियों में प्रयुक्त होने नामों पर चिंतन करें तो सूर्यग्रह का पर्याय विष्णु अर्थात श्रीकृष्ण को मानकर प्रातः, मध्यान्ह और संध्या को तीन गति एवं तत्व समझा गया है। विशाखा नक्षत्र को राधा जी का पर्याय माना है जिसके प्रमाणस्वरूप अथर्ववेद में ’’राधोविशाखे’’ पद का उल्लेख है। ब्रजमण्डल में अनुराधा को राधा(विशाखा) की प्रिय सखी माना है और कहा जाता है कि मूल शब्द तो राधा ही है जिसे कब और किसने राधा की भक्ति में लीन रहते राधा को विशाखा नाम दे दिया पता ही नहीं चला वास्तव में विशाखा सही मायने में राधा ही है। यजुर्वेद में विशाखा और अनुराधा नक्षत्रों का उल्लेख इसकी प्रमाणिकता है। राधा की सखियों के नामों में विशाखा प्रमुख है , इसके अतिरिक्त अनुराधा (ललिता)ज्येष्ठा,चित्रा, भद्रा के नाम है, जो नक्षत्रों के नाम भी है। ऐसे ही नक्षत्रों के नाम से कृष्ण के बड़े भाई बलराम की माॅ रोहणी व उनकी पत्नी रेवती, उनकी बहिन चित्रा(सुभद्रा)के अलावा राधा की माॅ कार्तिका के व अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के नाम ज्योतिषशास्त्रपरक है।

       कार्तिक महिने में पूर्णिमा को सूर्य(नारायण) विशाखा (राधा) नक्षत्र में रहते है तब सूर्य की किरणों के कारण सारे नक्षत्र दृश्यमान नहीं होते वे सूर्य की किरणों में समाहित हो जाते है जो महारास को श्रीराधाकृष्ण के मिलन का संकेतिक बनता है। दूसरी ओर देखा जाये तो अमावस्या की रात को चन्द्र-सूर्य का मिलन होता है। राधा वृषभानु की कन्या है और वृषभानु वृष-राशिस्थ भानु,,रश्मि है। राधा की माॅ का नाम कीर्तिदा बताया है जो अपभ्रंश में कृत्तिका माना गया है। पद्यपुराण में राधा के पति का नाम आयन बताया है । ’अयने भव, आयन’’ अयन में, ,उत्तराायण के दिनों में जन्म होने के कारण आयन नाम पड़ा। सहस्त्रों वर्षो से सारी दुनिया भक्ति में प्रयुक्त राधा और श्रीकृष्ण की आराधना में लगी है तब यह संयोग नहीं कहा जा सकता कि राधा कृष्ण के साथ जुड़े इतने नामों को नक्षत्र विद्या में ज्योतिषशास्त्रों से पृथक रखा जा सके लेकिन यह सुखद अनुभूति है जो ज्योतिषशास्त्र में राधाश्रीकृष्ण की उपस्थिति का दर्शन कराती है। ज्योतिषशास्त्र में राधाजी और श्रीकृष्णमेरूदण्ड की तरह है जिनके अन्वेषण की दूरदृष्टि उनकी कृपा से संभव नहीं । चिरकाल से प्रेम और श्रद्धा की देवी के रूप में आरूढ़ श्रीकृष्ण की चिरसंगिनी श्री राधा को ज्योतिषशास्त्र तक सीमित करना न्यायपूर्ण नहीं है।

       जो आराधना नाम की गोपी थी, श्रीकृष्ण उसकी विशेष आराधना करते थे जिसके उपरांत वह आराधना ही राधा हो गयी। एक मत के अनुसार राधा ’राघ्’ धातु से हुआ है जिसका अर्थ आनन्ददायिनी या प्रसन्नतादायिनी है, जो श्रीकृष्ण को प्रसन्न करती थी, आनंदित करती थी इसलिये वह राधा कहलायी। राधा प्रेम की उत्कृष्ट विरह पीड़ा की तीव्रता को जीने वाली थी इसलिये वे प्रेमाकाश में अंकित हो गयी । कृष्ण से स्वकीया प्रेम भावना से उत्साहित रूक्मणी जी ने उन्हें विवाह हेतु प्रस्ताव भेजकर उनकी पत्नी तो बन गयी किन्तु सामाजिक सानिग्ध में महल की चारदीवारी में वे प्रेम की विरहपीडा से मुक्त रहीं इसलिये श्रीकृष्ण की कोई भी पटरानी, महारानी, रानी स्वकीया प्रेम में परकीया विरह पीड़ा भाव से मुक्त थी तभी श्रीकृष्ण राधाजी के परकीया प्रेम की उत्कृष्ट विरह वेदना की अग्नि से तप्त होते उनके मन को समझ सके लेकिन अपने जीवन को तपाकर कुंदन बनाने वाली राधा को उन्होंने प्रेयसी के रूप में अंगीकार कर अपना नाम उनके साथ जोड़ दिया। लगता है जोड़ने घटाने का यह सिलसिला राधा के साथ ऐसे जुड गया जैसे ज्योतिषाचार्यो द्वारा ज्योतिषशास्त्र में राधा तत्व को घटाने का सिलसिला चलता है और परमात्मा कृष्ण की प्रेयसी राधा चिन्मयी भुवनेश्वरी के रूप में सृष्टि रचना के साथ अधिष्ठित हो ज्योतिषशास्त्र में समा गयी।

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