लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

आमिर खान ने एक नई फ़िल्म बनाई है, दंगल । दंगल हरियाणा की खिलाड़ी गीता फोगट को लेकर बनाई गई है जिसने पिछली कामनवेल्थ खेलों में स्वर्ण पदक जीता था । लड़के कोई भी पदक नहीं ले सके और लड़कियों ने हिन्दुस्तान की लाज रख ली । शायद इसी से प्रोत्साहित होकर आमिर खान ने दंगल फ़िल्म बनाई । दंगल ने धूम मचाई । लड़कियां भी गौरवान्वित हुईं । बेटी पढ़ाओ , बेटी बचाओ आन्दोलन को भी बल मिला ही होगा । आमिर खान ने फोगट के बचपन की भूमिका में कश्मीर घाटी की सोलह साल की ज़ायरा वासिम का चयन किया । ज़ायरा ने अपनी इस भूमिका का बख़ूबी निर्वाह किया और सभी की प्रशंसा अर्जित की । सभी ने कहा कि ज़ायरा में जीवन्त अभिनय की क्षमता है । अभिनय और रंगमंच ऐसे क्षेत्र हैं , जिनमें अपनी पहचान बनाने के लिए वर्षों मुशक्कत करनी पड़ती है । लेकिन कम उम्र में ज़ायरा की यह क्षमता ख़ुदा की नियामत ही कहीं जा सकती है ।
ज़ायरा ने अभिनय का यह क्षेत्र अपने माता पिता की मर्ज़ी से ही चुना होगा या कम से कम उनको इसके लिए राज़ी किया होगा । क्योंकि फ़िल्म कोई एक दिन का काम तो नहीं था । शूटिंग और रिहर्सल के लिए वक़्त दरकार था । सोलह साल की एक लड़की को यह सब करने के लिए केवल माता पिता की अनुमति ही नहीं बल्कि सक्रिय सहयोग की भी आवश्यकता है । यक़ीनन उसे वह सब कुछ अपने माता पिता और अपने परिवार से मिला होगा । तभी वह दंगल में अभिनय की उंचाईयों को छू पाई । श्रीनगर की रहने वाली ज़ायरा के आसपास के लोग , वहाँ के समाज के लोग भी ज़ायरा के फ़िल्म में काम करने की बात को जानते ही होंगे । अनुमान लगाया जा सकता है कि श्रीनगर का आम कश्मीरी इस से उत्साहित ही हो रहा होगा कि उन्हीं में से एक साधारण लड़की कितने ऊँचे मुक़ाम को छू रही है । दंगल फ़िल्म रिलीज़ हो गई तो कश्मीर घाटी का युवा वर्ग ज़ायरा को लेकर उत्साह में ही था । ज़ायरा ने श्रीनगर का नाम चमका दिया है । यहाँ तक सब ठीक ठाक चलता रहा ।
फिर एक दिन कहीं से काले चेहरे नमूदार हुए । ये चेहरे खूंखार थे । उन्होंने एक दूसरे की ओर देखा । फिर वे सक्रिय हो गए । वे रात के अन्धेरे में चिल्लाए , एक मुसलमान लड़की यह सब कैसे कर सकती है ? इस्लाम इसकी इजाज़त नहीं देता । तीस साल पहले भी वे आधी रात को लाऊडस्पीकरों पर कश्मीर घाटी की गली गली में चिल्लाए थे । वे पंडितों को कश्मीर छोड़ जाने के लिए कह रहे थे लेकिन वटनियों यानि अपनी महिलाओं को कश्मीर में ही छोड़ देने का आदेश भी दे रहे थे । सारी रात कश्मीर घाटी ख़ौफ़ और चीत्कारों से गूँजती रही थी । इस मंज़र के कुछ दिनों के भीतर ही तीन लाख से भी ज़्यादा हिन्दू सिख कश्मीर छोड़ कर चले गए थे । तब उनके समर्थन में कोई नहीं आया था । इसके विपरीत कश्मीर घाटी से चले जाने में इन हिन्दू सिखों की बहुत से लोगों ने सहायता की । इस सहायता को मानवीय आधार कहा गया । कश्मीरी मुसलमान सामान पैक करने में अपने हिन्दू सिख पड़ोसियों की सहायता कर रहे थे । कुछ तो उनको छोड़ने जम्मू तक भी आए । उनका कहना था कि कश्मीरी मुसलमानों को कश्मीरी हिन्दुओं की सहायता करते देख कर सचमुच कश्मीरियत के दर्शन हो रहे थे । लगता है इतिहास अपने को दोहराने की स्थिति में पहुँच गया है । यह अलग बात है कि दोहराने में उसके सन्दर्भ बदल गए हैं ।
अब एक बार फिर वही ख़ौफ़ पैदा किया जा रहा है । फ़र्क़ सिर्फ़ इतना ही है कि इस बार आदेश और फ़तवे लाऊडस्पीकरों पर नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर दिए जा रहे हैं । इस बार निशाना ज़ायरा है । सोलह साल की ज़ायरा । इन खूंखार चेहरों के अपने मजहब की ज़ायरा । वह ज़ायरा जिस ने अपना सिक्का अपनी क़ाबलियत से मनवाया है । लेकिन खूंखार चेहरों को डर है यदि घाटी का युवा वर्ग अपने निर्णय ख़ुद लेने लगेगा तो उनका निज़ाम समाप्त हो जायेगा । इन खूंखार और काले चेहरों का निज़ाम लोकतंत्र और तर्क से नहीं चलता , वह तो बंदूक़ के भय से संचालित है । घाटी में हो रहे विस्फोटों के भय से संचालित । एक ४७ से नियंत्रित । पहले चेतावनी फिर एक्शन । सोशल मीडिया चेतावनी का पहला चरण है । ये काले और छिपे हुए चेहरे घाटी के युवा को बताएँगे कि उन्हें क्या पहनना है , क्या खाना है , क्या करना है , क्या नहीं करना है , कहाँ जाना है , कहाँ नहीं जाना है । इस्लाम की व्याख्या अब दानिशमन्दों के हाथ में नहीं रहेगी, उसका अधिकार मुल्लाओं और इन खूंखार चेहरों ने अपने हाथ में ले लिया है । उनका कहना है कि किसी का दुनियावी रहन सहन कैसा होना चाहिए , इस्लाम में यह सब पहले से ही तय है । उससे एक ईंच दाएं नहीं , उससे एक ईंच बाएँ नहीं । लेकिन इस बार हालात 1990 से एक मायने में बहुत अलग है । इस बार सोशल मीडिया पर फ़तवे जारी करने वाले खूंखार चेहरे ज़ायरा को घाटी छोड़ कर जाने के लिए नहीं कह रहे । वे उसे जाने भी नहीं देंगे । वह कहीं जा भी नहीं सकती । बहुत अरसा पहले एक कश्मीरी ने , जिसके पुरखों ने सैकड़ों साल पहले इस्लाम मज़हब स्वीकार कर लिया था , फुसफुसा कर कहा था,”हमारे जिन कश्मीरी भाईयों के पुरखों ने इस्लाम स्वीकार नहीं किया था वे तो इन खूंखार चेहरे वालों की धमकियों से डर कर जम्मू या अन्य प्रदेशों में चले गए । ये खूंखार चेहरे हमें भी उसी प्रकार भयभीत करते हैं और हम भी उनके राक्षसी अत्याचारों से उसी प्रकार त्रस्त हैं । उनका ख़ौफ़ सिक्के का एक पहलू था और हमारा ख़ौफ़ सिक्के का दूसरा पहलू है । लेकिन हम कहाँ जाएँ ? ” यह प्रश्न बहुत बड़ा है । यही कारण है कि ज़ायरा को घाटी में रह कर ही इनके निज़ाम के अनुसार चलना होगा । ज़ायरा तो मात्र प्रतीक है । सवाल तो उन तमाम कश्मीरियों का है जो घाटी में रहते हुए इन खूंखार चेहरों की हुकमअदूली नहीं कर सकते । हुकमअदूली का अर्थ सजा-ए-मौत है ।
लेकिन इसके बाबजूद ज़ायरा सूबे की मुख्यमंत्री से मिली । सूबे की मुख्यमंत्री लोकतंत्र के निज़ाम की प्रतिनिधि हैं । इन काले चेहरे वालों की नज़र में लोकतंत्र का निज़ाम ही इनके मुल्ला निज़ाम का सबसे बड़ा दुश्मन है । वे जानते हैं , ज़ायरा को अभी रोकना पड़ेगा । ज़ायरा तो एक प्रतीक है । घाटी की युवा पीढ़ी को अभी से रोकना पड़ेगा । देरी हो गई तो उनका बंदूक़ का निज़ाम ज़्यादा देर टिक नहीं पाएगा । घाटी चाहे बर्फ़ से ढंकी हुई है लेकिन ये काले खूंखार चेहरे जानते हैं कि अन्दर ही अन्दर कसमसाहट अँगड़ाई ले रही है । यह कसमसाहट कभी भी दंगल में बदल सकती है । इसी लिए ज़ायरा पर निशाना साधा जा रहा है । ज़ायरा ने सोशल मीडिया में अपना मुआफीनामा लिख कर पेश कर दिया है । ज़ायरा ने लिखा,” السَّلاَمُ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَةُ اللهِ وَبَرَكَاتُهُ यह मेरा सार्वजनिक माफ़ीनामा या स्वीकारोक्ति है । मैं जानती हूँ कि बहुत से लोग मेरे हाल के कृत्यों के कारण या फिर हाल ही में मैं जिन लोगों से मिली हूँ , उस मुलाक़ात के कारण , ग़ुस्से में हैं या नाराज़ हैं । मैं उन सभी लोगों से माफ़ी माँगती हूँ जिन लोगों को मैंने दुखी किया है । चाहे ऐसा मैंने जानबूझकर नहीं किया । मैं उन्हें विश्वास दिलाना चाहती हूँ कि इस नाराज़गी के पीछे की उनकी भावनाओं को , ख़ासकर पिछले छह महीनों में जो कुछ हुआ है उसे देखते हुए , मैं भी समझती हूँ । मुझे आशा है कि ये लोग यह भी जानते होंगे कि कभी ऐसी परिस्थितियाँ पैदा हो जाती हैं जिन पर चाह कर भी नियंत्रण नहीं किया जा सकता । मुझे आशा है कि ये लोग यह जानते ही होंगे कि मेरी उम्र अभी केवल सोलह साल की है । इसलिए मेरी प्रार्थना है कि मेरे साथ उसी के अनुरूप व्यवहार किया जाए । मैंने जो भी किया है , उसके लिए मैं क्षमाप्राथीं हूँ । लेकिन यह किसी ख़ास मक़सद को ध्यान में रख कर लिया गया निर्णय नहीं था । इसलिए मैं आशा करती हूँ कि ये लोग मुझे माफ कर देंगे । कुछ और महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिन्हें मैं इसी वक़्त स्पष्ट कर देना चाहती हूँ । सबसे पहले तो यह कि मुझे कश्मीरी युवाओं के रोलमाडल के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है । मैं साफ़ कर देना चाहती हूँ कि कोईँ भी मेरे पद चिन्हों पर न चले और न ही मुझे अपना रोलमाडल समझे । जो कुछ मैं कर रही हूँ उस पर मुझे रत्ती भर भी गर्व नहीं है । मैं चाहती हूँ कि सभी, ख़ास कर युवा पीढ़ी यह समझ ले कि हमारे पास वर्तमान में भी और इतिहास में भी असली रोलमाडल हैं । मुझे रोलमाडल स्वीकारना तो उन असली नायकों का अपमान करना ही होगा । उनका अपमान हमारा अपना अपमान होगा । मैं यह बहस बढ़ाना नहीं चाहती । यह मेरी ओर से स्वीकारोक्ति है । मैं चाहती हूँ कि सभी लोग यह जान लें । अल्लाह हम सभी को रास्ता दिखाता रहे और हम पर अपना आशीर्वाद बनाए रखे ।”
लेकिन बाद में ज़ायरा ने अपना यह माफ़ीनामा अपने फ़ेसबुक एकाउंट से स्वयं ही हटा दिया । लेकिन मामला यहीं शान्त नहीं हुआ । उसके बाद ज़ायरा के फ़ेसबुक एकाउंट पर अपनी दूसरी पोस्ट डाल दी । उसने अब लिखा,” जहाँ तक मेरी पिछली पोस्ट का सम्बंध है , मुझे समझ नहीं आ रहा कि इस मामले को इतना बड़ा मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है ? मैं केवल यही बताना चाहती थी कि मैंने अपने कृत्य से किसी की भी भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाई है । लेकिन अचानक ही यह मामला राष्ट्रीय ख़बर बन गया है । मैं बार बार कह रही हूँ कि मुझे किसी ने भी , कुछ भी करने के लिए विवश नहीं किया है । मेरी पहली पोस्ट किसी के भी ख़िलाफ़ नहीं थी । मैं तो उसके माध्यम से यही सुनिश्चित करना चाहती थी कि मैं जो कर रही हूँ , उससे किसी की भी भावनाएँ आहत न हों । मीडिया समेत सभी से मैं आग्रह कर रही हूँ कि बात का बतंगड मत बनाएं । न तो मुझे यह सब कुछ कहने सुनने के लिए मजबूर किया गया था और न ही मैं किसी के ख़िलाफ़ हूँ । आशा करती हूँ इस पोस्ट से यह सारा विवाद यहीं समाप्त हो जाएगा ।” कुछ समय के बाद यह पोस्ट भी हटा लिया गया ।
ज़ायरा ने इन दोनों पोस्टों में जो कहा है , पहले उसको सूत्र शैली में सारणीबद्ध कर लिया जाए । क्यों कहा ? इसकी चर्चा उसके बाद ही संभव है । ज़ायरा के अनुसार, उससे कुछ लोग दो कारणों से ख़फ़ा हैं ।
1.उसने दंगल फ़िल्म में अभिनय किया है
2. वह पिछले दिनों जिन लोगों से मिली है । ( ध्यान रहे वह पिछले दिनों सूबे की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती से मिलीं थीं और उसके चलते ही सारा विवाद शुरु हुआ )
यदि ज़ायरा के अभिनय को लेकर ही प्रमुख प्रश्न होता तो यह विवाद 21 दिसम्बर 2016 को ही शुरु हो जाना चाहिए था जब फ़िल्म रिलीज़ हुई थी । इससे भी पहले जब फ़िल्म बन रही थी तब भी सभी जानते थे कि ज़ायरा उसमें काम कर रही है । तब किसी ने विरोध नहीं किया । यह ठीक है कि उस वक़्त भी कुछ लोगों ने छोटी मोटी छींटाकशी की लेकिन ज़ायरा ने भी उसे गंभीरता से नहीं लिया । क्योंकि यह मात्र पराजित मानसिकता की भड़ास थी । दरअसल सारा विवाद तब शुरु हुआ जब वह 14 जनवरी 2017 को प्रदेश की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती से मिलीं । इसका अर्थ यह हुआ कि गिलानियों का विरोध ज़ायरा के अभिनय करने को लेकर इतना नहीं है जितना उसके महबूबा मुफ़्ती से मिलने को लेकर है । गिलानियों- करमानियों की नज़र में इस वक़्त यदि कोई उनका सबसे बड़ा शत्रु है तो वह महबूबा मुफ़्ती है । उनकी नज़र में महबूबा मुफ्ती कश्मीर घाटी में अपनी पहचान ही नहीं बनाती जा रहीं बल्कि आतंकवादियों और गिलानियों की हुर्रियत कान्फ्रेंस से त्रस्त कश्मीरी युवा महबूबा मुफ़्ती के प्रयोग में अपने लिए आशा की किरण बनती जा रही हैं । गिलानियों को लगता है कि कश्मीरी युवा के लिए आशा की किरण तो हुर्रियत कान्फ्रेंस और गले में एके -47 लटकाए घूम रहे आतंकवादी होने चाहिए थे । लेकिन कश्मीरी युवा ज़ायरा ी कामयाबी का जश्न मना रहे हैं । और उससे भी आगे ज़ायरा जाकर महबूबा मुफ़्ती को मिलती है । महबूबा मुफ़्ती से इस भेंट को जम्मू कश्मीर सरकार के जनसंचार विभाग ने अख़बारों में प्रचारित भी कर दिया ।
तब ज़ायरा को धमकाने का काम शुरु हुआ और उसे गिलानियों की बिरादरी से धमकियाँ मिलनी शुरु हुईं । रेडीकलज ने अपने तरीक़े से संदेश भिजवाए । उसका कारण था । गिलानियों -खुरासानियों की बिरादरी कश्मीर की युवा पीढ़ी को चेतावनी देना चाहती है कि उनका नायक बुरहान बानी होना चाहिए न कि ज़ायरा । ज़ायरा का महबूबा मुफ़्ती से मिलना तो रोल माडल की इस गुत्थी को और भी उलझा देता है । बुरहान बानी को नायक बनाने और कश्मीरियों की नज़र में महबूबा मुफ़्ती को खलनायिका बनाने के लिए लिए हुर्रियत कान्फ्रेंस ने छह महीने लगाए हैं । कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि सुरक्षा बलों को सूचना देकर आतंकवादियों ने ख़ुद ही बुरहान बानी को मरवाया क्योंकि उन्हें कश्मीर की युवा पीढ़ी के लिए एक नायक की तलाश थी और उनका लगता था सुरक्षा बलों के हाथों मारा गया बुरहान बानी इस रिक्त स्थान की पूर्ति कर सकता है । मरे हुए बुरहान बानी को नायकत्व तक ले जाने के लिए कश्मीर घाटी को छह महीने तक बन्धक बना कर रखा गया । इस दौरान कुछ कश्मीरियों की बलि भी दी है । पैलेट गन से जो नुक़सान हुआ है , वह अलग है । रणनीति सीधी थी । यदि महबूबा मुफ़्ती हुर्रियत के इस शोरगुल से डर कर हथियार डाल देती है तो लोकतांत्रिक तरीक़े से उभरा कश्मीरियों का यह नेतृत्व ध्वस्त हो जाएगा और आतंकवादी कश्मीरियों को डरा-धमका सकेंगे कि घाटी में लोकतांत्रिक नेतृत्व की कोई औक़ात नहीं है । यदि महबूबा मुफ़्ती नहीं झुकती और इन अलगाववादियों का मुक़ाबला करती हैं तो उसे आसानी से कश्मीर विरोधी घोषित किया जा सकता है । महबूबा मुफ्ती ने गिलानियों-खुरासानियों के आगे हथियार नहीं डाले और उनका मुक़ाबला किया । उसने इनको कश्मीरियों के ख़ून के प्याले कहा और आरोप लगाया कि इनके अपने बच्चे सुरक्षित स्थानों पर पढ़ रहे हैं और ग़रीब कश्मीरियों के बच्चों को ये मरवा रहे हैं । लेकिन ऐन वक़्त पर दंगल में अपनी अभिनय कला के बलबूते शिखर पर पहुँची ज़ायरा कश्मीरी युवा पीढ़ी के कल्पना लोक में विचरने लगी । मामला यहीं तक रहता तब भी शायद गिलानी विरादरी मन मार कर चुप हो जाती । लेकिन कश्मीर की युवा पीढ़ी की आशा बनी ज़ायरा तो अपनी सफलता की कहानी सुनाने महबूबा मुफ्ती के पास जा पहुँची । इतनी मेहनत से तैयार किया गया बुरहान बानी कहीं पीछे छूट गया । चर्चा ज़ायरा से होती हुई महबूबा मुफ़्ती तक की होने लगी । अब तो अलगाववादियों के पास ज़ायरा को सबक़ सिखाने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं बचा था । ज़ायरा के माफ़ीनामा की यह पंक्ति काबिलेगौर है, पिछले छह महीनों की घटनाओं को जानते हुए भी मैं उन लोगों से मिली हूँ , जिनसे मिलने के कारण कुछ लोगों को ठेस पहुँची है । इसलिए मैं माफ़ी माँगती हूँ।” मामला यदि केवल ज़ायरा के फ़िल्मों में काम करने का होता तो ज़ायरा अपने माफ़ीनामा में यह घोषणा भी कर सकती थी कि वह आमिर खान की अगली फ़िल्म Secret Superstar में काम नहीं करेगी । लेकिन उसने इस का ज़िक्र तक नहीं किया । इसके विपरीत उसकी दूसरी पोस्ट का स्वर कहीं धीमे से यह कहता हुआ भी सुनाई देता है कि आप प्लीज़ मेरा पीछा छोड़ दीजिए ।
बहुत से लोग ज़ायरा के इस मुआफीनामा पर आश्चर्य चकित हैं । लेकिन मुझे इसमें आश्चर्य वाली कोई बात दिखाई नहीं दे रही । ज़ायरा बहादुर लड़की है , यह तभी पता चल गया था जब उसने दंगल में अभिनय के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था । वह जानती है कि आमिरखान द्वारा व्यक्त किए गए समर्थन से उसे कोई लाभ होने वाला नहीं है । सभी जानते हैं कि ज़ायरा का मुआफीनामा घाटी की वर्तमान यथार्थ हालात में से निकला है । इस हालात में यह मुआफीनामा ही निकल सकता है और कुछ नहीं । मुआफीनामा केवल इतना ही इंगित करता है कि यदि कुछ लोगों को महबूबा मुफ़्ती से एतराज़ है , ख़ास कर बुरहान बानी के नायकत्व को स्थापित करने के उनके प्रयासों के असफल हो जाने के बाद भी तो ज़ायरा महबूबा को मिलने के अपने निर्णय पर खेद प्रकट करती है । ज़ायरा ने इसमें यह भी जोड़ दिया है कि घाटी का युवा उसे अपना रोल माडल न समझे । बस इतना ही । उसने यह नहीं कहा कि मैं अपना यह रास्ता छोड़ रही हूँ । इसलिए यह मुआफीनामा ज़ायरा की कायरता तो नहीं समझा जा सकता । बल्कि यह उसकी बुद्धिमत्ता को ही इंगित करता है । बल्कि कहीं न कहीं इससे ज़ायरा गिलानी बिरादरी को यह भी कह रही है कि आपके संतोष के लिए मैं कह देती हूँ कि कश्मीरी युवा मुझे रोल माडल न समझे , लेकिन मैं कश्मीरी युवा के स्वयं निर्णय लेने के अधिकार को कैसे रोक सकती हूँ ? इस लिहाज़ से तो इस तथाकथित माफ़ीनामा को उसकी बुद्धिमत्ता ही मानना होगा । यह भी ध्यान में रखना होगा कि अपनी ये दोनों पोस्टों उसने अपने एकाउंट से स्वयं ही हटा भी लीं । गिलानी विरादरी के ख़िलाफ़ कश्मीरी युवा के विद्रोह की यह पहली घटना नहीं है । इसका संकेत कुछ साल पहले ही मिलना शुरु हो गया था जब श्रीनगर की ही स्कूल की तीन सहेलियों ने 2012 में प्रकाश नाम से अपना राक बैंड ग्रुप बना लिया था और सार्वजनिक प्रदर्शन शुरु कर दिए थे । फरवरी २०१३ में उन्होंने श्रीनगर में हुए बैटल आफ बैंडज में काफ़ी वाहवाही भी लूटी थी । लेकिन बाद में गिलानियों, मुफ़्तियों , जमायते इस्लामियों और अलगाववादियों की धमकियों के चलते इन्होंने अपने प्रदर्शन बन्द कर दिए । परन्तु कश्मीर की युवा शक्ति की वह उर्जा फिर भी रुकी नहीं । ज़ायरा का धमाका उसका प्रतीक है । ज़ायरा के साथ भी वही किया जा रहा हे जो उन तीन सहेलियों के साथ किया गया था । लेकिन ज़ायरा ने बहादुरी से उसका सामना किया । उतनी बहादुरी से , जितनी कश्मीर की एक सोलह साल की स्कूली लड़की से आशा की जा सकती है । वह भी उस माहौल में जब आतंकवादी एक४७ के ज़ोर पर बुरहान बानी को कश्मीरी युवा का नायक बना कर थोपने के प्रयासों में लगे हों और फारुक अब्दुल्ला जैसे लोग गिलानियों की गोद में बैठ कर उनका अप्रत्यक्ष समर्थन कर रहे हों ।
यही कारण है कि जहां कठमुल्लों से ज़ायरा को धमकियाँ मिल रही हैं , वही घाटी की युवा पीढ़ी से ज़ायरा को समर्थन मिला है । बारामुला की अजमा तो मानों चुनौती देती लग रही है । वह भी फ़िल्मों में काम करना चाहती है । उसे विश्वास है कि वह ज़ायरा से भी अच्छा अभिनय कर सकती है ।सेवा निवृत्त ब्रिगेडियर गुरिन्दर सिंह उसे समझाते हैं कि देख लो ज़ायरा के साथ क्या हो रहा है ? उसे धमकियाँ मिल रही हैं । वह कहती है , इनकी कौन प्रवाह करता है ? यदि मैंने यह भूमिका निभाई होती तो मैं तो मुम्बई से वापिस ही न आती । ( दी ट्रिब्यून, चंडीगढ, 20 जनवरी 2017,माई दंगल गर्ल, ब्रि० गुरिन्दर सिंह) कश्मीरी युवा पीढ़ी के सपने फैलने लगे हैं । वे आकार लेने लगे हैं ।
दरअसल ज़ायरा को कश्मीर की युवापीढी का मिल रहा यह समर्थन ही आश्चर्यजनक कहा जा सकता है । यह आश्चर्यजनक तो है लेकिन यह घाटी के वर्तमान पर उगा ऐसा अंकुर है जिसका भविष्य घाटी के आतिशी चिनारों में फूट सकता है । ज़ायरा को युवापीढी का यह समर्थन ज़ायरा की बहादुरी का प्रतीक है । इसके आगे उसका मुआफीनामा अपने आप गौण हो जाता है । बर्फ़ के नीचे दबे इस परिवर्तन को काले खूंखार चेहरे भी जानते हैं । यही कारण है कि वे और भी ज़ोर से ज़ायरा को निशाने पर ले रहे हैं । इतना तो मानना पड़ेगा कि ज़ायरा के अभिनय और घाटी की युवा पीढ़ी से उसे मिल रहे समर्थन ने काले चेहरों के निज़ाम में बित्ते भर का एक छेद तो कर ही दिया है ।
बहुत साल पहले मैं ईरान में था । करज से तेहरान की ओर जा रहा था । रास्ते में मीलों लम्बा जाम लगा हुआ था । मैं भी बस से बाहर आ गया । दो तीन लड़के मेरे पास आए । पूछने लगे कहाँ के रहने वाले हो ? मैंने बताया , हिन्दोस्तान से हूँ । मेरी दाढ़ी उन दिनों काफ़ी लम्बी थी । दाढ़ी देख कर बोले, शुमा आखुन्दा ए ? क्या तुम मुल्ला हो ? मेरे नहीं कहने पर बोले , आखुन्दा खैली बद ए । मुल्ला बहुत ख़राब हैं , सारा ईरान तबाह कर दिया । ज़ायरा प्रकरण के बाद मेरा विश्वास बढ़ा है कि कश्मीर घाटी तबाह नहीं होगी क्योंकि अब दंगल शुरु हो गया है और ज़ायरा के साथ अनेक युवा जुड़ गए हैं । कई सौ साल पहले जब बाबर ने भारत पर हमला किया था, तब गुरु नानक देव जी ने कहा था, खुरासाना खसमाना क्रीआ , हिन्दोस्तान डराईया । लगता है कश्मीर घाटी में अभी भी खुरासानियों का हिन्दोस्तान को डराने का खेल जारी है । चाहे डराने के लिए बुरहान बानी की लाश का ही इस्तेमाल क्यों न करना पडा । कश्मीर घाटी में गिलानियों , हमदानियों, करमानियों और खुरासानियों के बीच यह लड़ाई लम्बे अरसे से चल रही है । लेकिन कश्मीरियों ने अभी तक हथियार नहीं डाले । खुरासानियों के इस भय के बीच में से ही कभी तीन सहेलियों की ,कभी ज़ायरा वसीम की और कभी उजमा जैसी लड़कियों की तीखी विद्रोह भरी आवाज़ें सुनाई देने लगतीं हैं । यही आवाज़ें कश्मीर घाटी में आशा की आवाज़ें हैं , जो दिन ब दिन ताक़तवर होती जा रही हैं ।

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