लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

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मनोज ज्वाला
महाभारत नामक प्राचीन भारतीय महाकाव्य-ग्रंथ से संकलित महज सात सौ श्लोकों वाली ‘गीता’ आसमान से टपकी हुई खुदाई कुरान और ईसाई बाइबिल की तरह छुई-मुई आसमानी किताब नहीं है , जो टीका-टिप्पणी और व्याख्या-विश्लेषण से नापाक व नष्ट-भ्रष्ट हो जाए ; बल्कि यह तो ज्ञान की गंगा है गंगा, जिसमें कोई भी डुबकी लगा सकता है , इसके जल को छोटे-बडे किसी भी पात्र में भर ले जा कर अपने घर-परिवार-गांव-समाज-देश को अभिसिंचित कर सकता है । कोई बंदिश नहीं है, कोई रोक-टेक नहीं है ; लोगों के बीच माने जाने अथवा न माने जाने के लिए यह मुल्ला-मौलवियों के ‘फतवा’ या पोपों-पादरियों के ‘बुल’ के समान किसी पंडित-पुरोहित के सहारे का मोहताज नहीं है । क्योंकि यह परम सत्य सनातन और सार्वभौम है; सार्वकालिक और सार्वदेशिक है । स्वयं यह कोई ग्रंथ नहीं है , बल्कि महाभारत नामक ग्रंथ के भीतर का ऐसा बीज-तत्व है , जो तत्व-ज्ञान के बडे से बडे ग्रंथों की रचना का आधार-सार है । दुनिया की सर्वाधिक भाषाओं में न केवल इसका अनुवाद हो चुका है , बल्कि सर्वाधिक टीका-टिप्पणी और भाष्य लिखे जा चुके हैं । विश्व-स्तर पर देखें तो तत्व-मीमांसा और अध्यात्म-दर्शन का कोई भी ऐसा ग्रंथ नहीं मिलेगा जिसकी स्थापनाओं का आधार और विचारणाओं का सार गीता से इतर हो । वैश्विक स्तर पर देखें , तो न केवल भारत के , अपितु विश्व के श्रेष्ठतम विद्वानों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों, साहित्यकारों, विचारकों, चिंतकों तथा संतों ने मुक्तकंठ से इसकी प्राशंसा की है ।
गीता का सबसे पहला भाष्य आद्य शंकराचार्य ने लिखा , जिसे ‘शांकर भाष्य’ कहा जाता है । शंकराचार्य के पूर्व का कोई भी भाष्य किसी को ज्ञात नहीं है। हालांकि लोकमान्य तिलक ने ‘गीता रहस्य’ में लिखा है कि शांकर-भाष्य में उसके तीसरे अध्याय के अवगाहन से ऐसा प्रतीत होता है कि शंकराचार्य के सामने कुछ पुरानी टीकाएं विद्यमान रही होंगी , जिनका खंडन करने के लिए उन्हें अपना भाष्य लिखना पड़ा। शंकराचार्य के एक शताब्दी पूर्व बाणभट्ट की ‘कादंबरी’ में गीता का उल्लेख अवश्य है , किन्तु ततविषयक टीका नहीं है । इसी तरह कालिदास के ‘रघुवंश’ एवं ‘कुमारसंभव’ में भी गीता का उल्लेख है , लेकिन उसका कोई तात्विक विश्लेषण नहीं है । कुल मिलाकर गीता पर विधिवत टीका-लेखन और इसके भाष्यकरण का काम शंकराचार्य से ही प्रारंभ हुआ प्रतीत होता है । शंकराचार्य के उक्त भाष्य के पश्चात व परिणाम से ही दार्शनिक वाद-विवाद और आध्यात्मिक चिन्तन-मनन के फलक पर गीता एक कसौटि के रूप में स्थापित हो सकी , अन्यथा ज्ञान-विज्ञान का यह अद्भूत साहित्य आम जन-मानस की पकड व पहुंच से दूर ही था । ‘शांकर भाष्य’ के बाद तो किसी भी विद्वान-चिंतक-तत्ववेता-मनीषी के लिए गीता पर भाष्य लिखना और गीता में प्रतिपादित ज्ञान की कसौटि पर अपनी वैचारिक- तात्विक स्थापनाओं को सिद्ध करना जैसे अपरिहार्य सा हो गया । यही कारण था कि ईसाई विस्तारवाद और साम्राज्यवादी उपनिवेशवाद के संयुक्त झण्डाबरदार ईस्ट इण्डिया कम्पनी के गवर्नर वारेन हस्टिंग्स को भी अपने एक मित्र से गीता का तदनुसार अंग्रेजी भाष्य लिखवाना पडा । अनेक ईसाई मिशनरियों ने ईसाइयत के एक मात्र आधार ग्रंथ- बाइबिल की तत्वमीमांसा को दार्शनिक आयाम देने के लिए गीता का ही सहारा लिया , क्योंकि तत्वज्ञान का आधिकारिक और आदि ग्रंथ यही है ।
यूरोप को गीता से प्रथम परिचय भारत में व्यापार करने आई ईस्ट इण्डिया कम्पनी और उसके साथ ईसाइयत का प्रचार करने आई चर्च मिशनरियों के माध्यम से तब हुआ , जब कम्पनी के गवर्नर ने उसके एक कर्मचारी- चार्ल्स विलिकन्स (1749-1836) से सन 1776 में इसका अंग्रेजी में अनुवाद कराया । बाद में एडविन अर्नाल्ड नामक किसी अंग्रेज विद्वान ने भी पूर्व ‘द सांग सेलेस्टियस’ शीर्षक से अंग्रेजी भाष्य लिखा, जो 1885 में प्रकाशित हुआ । इस पुस्तक से गीता
यूरोप में दार्शनिक आध्यात्मिक तर्क-वितर्क बहस-विमर्श की कसौटी बन गई । जिस भांति विलियम जोन्स (1746-1794) ने ‘मनुस्मृति’ का अनुवाद कम्पनी की कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ करवाने के लिए करवाया था, उसी तरह कम्पनी के औपनिवेशिक शासन की जडें जमाने के निमित्त भारत की भाव-भूमि समझने के लिए तत्कालीन अंग्रेज गर्वनर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने इसका अंग्रेजी अनुवाद करवाया था । फ्रेंच विद्वान डुपरो ने 1778 में इसका फ्रांसीसी में अनुवाद किया तथा इसे ‘भोगवाद से पीड़ित पश्चिम की आत्मा को अत्यधिक शांति देने वाला’ बताया । जर्मन दार्शनिक श्लेगल ने गीता से प्रभावित हो कर कहा था कि “यूरोप का सर्वोच्च दर्शन, उसका बौद्धिक अध्यात्मवाद जो यूनानी दार्शनिकों से प्रारम्भ हुआ, प्राच्य अध्यात्मवाद के अनन्त प्रकाश एवं प्रखर तेज के सम्मुख ऐसा प्रतीत होता है जैसे अध्यात्म के प्रखर सूर्य के दिव्य प्रकाश के भरपूर वेग के सम्मुख एक मंद-सी चिंगारी हो, जो धीरे-धीरे टिमटिमा रही है और किसी भी समय बुझ सकती है।”
अमरीका के प्रसिद्ध दार्शनिक विल डयून्ट तथा हेनरी डेविड थोरो और इमर्सन से लेकर वैज्ञानिक राबर्ट ओपन हीमर तक सभी गीता ज्ञान से आलोकित हुए । थोरो स्वयं बोस्टन से 20 किलोमीटर दूर बीहड़ वन में, वाल्डेन में एक आश्रम में बैठकर गीता अध्ययन करते थे । इमर्सन एक पादरी थे, जो चर्च में बाइबिल का पाठ करते थे । परन्तु रविवार को उन्होंने चर्च में गीता का पाठ प्रारम्भ कर दिया था । अत्याधिक विरोध होने पर उन्होंने गीता को ‘यूनिवर्सल बाइबिल’ कहा था । उसने गीता का अनुवाद भी किया था । वैज्ञानिक राबर्ट ओपनहाबर ने 16 जुलाई, 1945 को अमरीका के न्यूमैक्सिको रेगिस्तान में जब अणु बम का प्रथम परीक्षण किया गया तो उसने विस्फोट से अनन्त सूर्य में अनेक ज्वालाओं को देखकर उसे गीता के विराट स्वरूप का दर्शन हुआ तथा वह त्यागपत्र देकर गीता भक्त बन गया था । टी.एस. इलियट ने गीता को ‘समस्त मानवीय वांग्मय की अमूल्य निधि’ बताया है । संसार की विभिन्न सभ्यताओं के विशेषज्ञ टायनवी ने स्वीकार किया है कि “अणुबम से विध्वंस की ओर जाते पाश्चात्य जगत को पौर्वात्य, भारतीय तत्वज्ञान अर्थात- गीता को आत्मसात करना पड़ेगा, जो समस्त जड-चेतन के भीतर आत्मा की व्यापकता व अमरता का साक्षात्कार कराता है” ।
मृत्यु-शैय्या पर पड़े प्रसिद्ध जर्मन विद्वान शोपनहावर को गीता पढ़ने से जीवनदान मिला था । उसने कहा था कि “भारत मानव जाति की पितृ-भूमि है” । जर्मनी के ही एक विश्व-प्रसिद्ध विद्वान कांट , जो भूगोल व खगोल दोनों का अध्यापक था, उसके जीवन की दिशा गीता पढ़कर इस कदर बदल गई कि वह दर्शन-शास्त्र का का पंडित बन गया । नोबल पुरस्कार-प्राप्त फ्रेंच विद्वान रोमां रोलां को स्वीकार करना पडा कि “गीता ने यूरोप की अनेक आस्थाओं को धूल-धुसरित कर मानव जाति की दार्शनिक-आध्यात्मिक बौद्धिकता को नवदृष्टि प्रदान की है” । एक अंग्रेज विद्वान ने तो यहां तक कहा था कि जिस देश में गीता मौजूद है वहां क्रिश्चियनिटी और बाइबल का प्रचार करना व्यर्थ है । लेकिन ब्रिटेन पर औपनिवेशिक साम्राज्यवाद और वेटिकन सिटी पर ईसाई विस्तारवाद का भूत सवार था , इस कारण भारत में ब्रिटिश शासन का अत्याचार और मिशनरियों का बाइबिल प्रचार साथ-साथ चलता रहा ।
कालान्तर बाद उसी युरोपीय औपनिवेशिक अंग्रेजी शासन के विरूद्ध जनजागरण-आंदोलन के निमित्त प्रेरणा-विचारणा ग्रहण करने वाले लोकमान्य तिलक ने गीता-रहस्य लिख कर जन-मानस को अंग्रेजी आतंक-अन्याय-अत्याचार के विरूद्ध स्वराज्य के लिए प्रेरित किया, तो महात्मा गांधी ने गीता के अनासक्त कर्म-योग को अपने विचारों के सम्प्रेषण-प्रवचन का माध्यम बना कर स्वराज-स्वतंत्रता को जन-जन की आकांक्षाओं से जोड दिया । बंकिमचन्द्र के उपन्यास ‘आनंदमठ’ से उत्तेजित होकर अंज्रेजी शासन को उखाड फेंकने के बावत सशस्त्र क्रांतिकारी बने नवजवानों की प्रेरक-शक्ति गीता ही थी । राष्ट्र की संस्कृति व स्वतंत्रता के लिए सर्वस्व न्योछावर कर देने का भाव जगाने में लोकमान्य तिलक रचित भाष्य- ‘’गीता रहस्य’ का योगदान सर्वाधिक था । यह सचमुच आश्चर्य चकित करने वाला तथ्य है कि बर्मा के मंडाले जेल में कालापानी भुगतते हुए तिलक महाराज ने नवंबर 1910 से मार्च 1911 के बीच मात्र एक सौ पांच दिनों में ही बारह सौ दस पृष्ठों का यह भाष्य-ग्रंथ लिख दिया था । उन दिनों लोकमान्य के गीता-भाष्य से राष्ट्रधर्म के लिए आत्म-बलिदान की भावनाओं का जागरण हुआ , तो गांधीजी का गीता-प्रवचन से सत्य और असत्य के बीच संघर्ष में सत्य की जीत के प्रति आश्वासन पुष्ट हुआ । अनगिनत क्रांतिकारियों ने गीता से ही प्रेरणा ग्रहण कर भारत-राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए फांसी के फंदों को गले लगा लिया , यह सभी जानते हैं । गीता के विविध भाष्यों के प्रभाव से भारत भर में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरूद्ध जाग्रत हुई राष्ट्रीय चेतना और क्रांतिकारियों की आत्मोत्सर्गी भावना से ब्रिटिश हुक्मरानों को यह संदेह होने लगा था कि इसमें कहीं बम-बारुद बनाने और विद्रोह-बगावत भडकाने के सूत्र-समीकरण तो नहीं भरे हुए हैं , किन्तु जांच कराने पर पता चला कि नहीं , इसमें तो अन्याय-अत्याचार के विरूद्ध युद्ध-कर्म बनाम कर्म-योग ज्ञान-योग व भक्ति-योग विषयक ‘विचार-बम’ भरे पडे हैं ।
गीता वास्तव में प्राचीन भारतीय ज्ञानधारा का शिरोमणि ग्रन्थ है । आदि शंकराचार्य ने इस महान ग्रंथ को अपने ‘प्रस्थानत्रयी’ में स्थान दिया। उन्होंने प्रस्थानत्रयी के अन्तर्गत वेदान्त सूत्र, एकादश उपनिषदों (ईशावास्य, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, श्वेताश्वतर, छान्दोग्य व बृहदरण्यक) के साथ गीता को भी सम्मिलित किया और इन सभी पर भाष्य लिखा । शंकराचार्य जी के बाद कोई ऐसा संप्रदाय प्रवर्तक, आचार्य या दार्शनिक भारत में नहीं हुआ जिसने अपने मत का प्रतिपादन करने के लिए गीता का आश्रय न लिया हो । रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, निम्बार्काचार्य , भास्कराचार्य , वल्लभाचार्य , श्रीधर स्वामी, आनन्द गिरि, संत ज्ञानेश्वर आदि अनेक मध्यकालीन आचार्यों ने भी तत्कालीन युगानुकूल आवश्यकतानुसार भगवद्गीता के ऐसे-ऐसे भाष्य-भाषण व व्याख्यान-विश्लेषण प्रस्तुत किए कि शासन-संचालित धर्मान्तरण की आंधी में भी हमारा समाज पूरी तरह से स्खलित नहीं हुआ और राष्ट्र की सांस्कृतिक अक्षुण्णता कायम रही ।
गीता के तत्व ज्ञान और उसके विविध भाष्यों से हुए लोकशिक्षण का ही परिणाम था कि ‘कुरान’ और ‘बाइबिल’ नामक दोनों आसमानी किताबें हमारे देश के जन-मन और राष्ट्र-जीवन में जडें नहीं जमा सकी और उन दोनों ‘आसमानी किताबियों’ के धर्मान्तरण अभियान उनकी राज-सत्ता से संरक्षित होने के बावजूद असफल ही रहे , हमारे राष्ट्र का इस्लामीकरण और ईसाईकरण नहीं हो सका । थोडे-बहुत परिमाण में लोग धर्मान्तरित हुए भी तो उन आसमानी किताबों के आकर्षण से अथवा उनके किसी ज्ञान (जो उनमें है ही नहीं) से प्रभावित होकर नहीं , बल्कि उन किताबवादियों की राज-सत्ता से पीडित-प्रताडित हो कर हुए । गीता के तत्व-ज्ञान की ऊर्जा के बदौलत ही सदियों तक हम एक ओर आसमानी किताबियों के जेहादी जंग व धर्मान्तरण अभियान से टक्कर लेते रहे , तो दूसरी ओर उनके मुगलिया सलतनत और औपनिवेशिक शासन से भी मुक्त हो सके । फिर तो गीता-ज्ञान की गंगा उसके विविध भाष्यों के माध्यम से दुनिया भर में ऐसे प्रवाहित होने लगी कि विनाशकारी साम्राज्यवादी विश्वयुद्ध-जनित विभीषिकाओं से आहत-अशांत मानवता को भोग-उपभोग की असंतुलित-मर्यादित पाश्विक वृतियों से उबारने वाली शांति-सद्गति-मुक्ति की युक्ति गीता में ही दिखाई पडने लगी । गीता-प्रचारक संस्थाओं के साथ गीता के विविध भाषों से दुनिया भर में लोग ऐसे जुडते गए कि पश्चिम के विभिन्न देशों में “हरे राम हरे कृष्ण” आन्दोलन ही चल पडा । मानव-जीवन को शांति और मुक्ति की युक्ति प्रदान करने वाली गीता की ऐसी ख्याति उन अहले-आसमानी किताबियों को अखरने लगी , जो गीता-ज्ञान उपजाने वाली भारत-भूमि और इसकी संस्कृति व संतति को जिहाद और क्रूस से जीत लेने की जुग्गत भिडाने में सदियों से लगी हुई हैं । उनके द्वारा “धर्म संस्थापनार्थ निःसृत ज्ञान की धारा” के गतिमान प्रवाह को बाधित करने का षडयंत्र रचे जाने लगे हैं ।
अन्तर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ (इस्कान) के संस्थापक तथा ‘हरे राम हरे कृष्ण’ आन्दोलन के प्रवर्तक श्रील प्रभुपाद के विश्वप्रसिद्ध गीता-भाष्य- “श्रीमद्भागवत गीता यथा रूप” को प्रतिबंधित कर देने के बावत रूस की एक अदालत में दायर हुआ मुकदमा और उसे ले कर गीता के विरूद्ध फैलायी गईं तरह-तरह की भ्रांतियां दोनों आसमानी किताबियों की दुरभिसंधि-युक्त ऐसे ही षडयंत्रों का परिणाम था । हालांकि वह मुकदमा बुरी तरह से निष्फल रहा । किन्तु इस तरह के षड्यंत्र तो जारी ही हैं , जिनसे दो-दो हाथ करते रहने के लिए हमें तैयार रहना होगा और हमारी ‘धर्मनिरपेक्ष’ सरकार को भी यह तथ्य व सत्य समझना-समझाना होगा कि ‘गीता’ वेदों-उपनिषदों का सार होने के बावजूद किसी पंथ-सम्प्रदाय की धार्मिक-पुस्तक नहीं है , बल्कि दुनिया के सभी धर्मों के तत्व-ज्ञान की धुरी और कसौटि है तथा भारतीय संस्कृति की मुखर अभिव्यक्ति और शांति व मुक्ति की युक्ति है ।

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