लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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-अरुण तिवारी-

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चैंकिए नहीं ! यह भगवान कोई और नहीं, वे पंचतत्व ही हैं, जो इस प्रकृति को बनाते और चलाते हैं:  भ से भूमि, ग से गगन, व से वायु, अ से अग्नि और न से नीर। जीव, इस भगवान का निर्माण भले ही न कर सकता हो, किंतु भगवान के शोषण और बिगाड़ की गलती तो वह करता ही रहता है। ऐसा होने पर भगवान उसे चेताता है; डांटता है; डराता है; धमकाता है। इस प्रक्रिया में कुछ जीव मिट जाते हैं; कुछ चेत जाते हैं और शोषण और बिगाड़ की कोशिशें बंद कर देते हैं। कुछ गुहार लगाते हैं; सड़क पर, संसद में, अदालत में। कभी इन्हे विकास विरोधी मानकर, सरकार नहीं सुनती। कभी लंबी तारीख, मंहगे वकील, सुबूत और बयानात की जांच और न्यायाधीश की ईमानदारी पर आश्रित खर्चीली प्रक्रिया, प्राप्त न्याय को अर्थहीन बना देती है।

यह न हो; भगवान को संरक्षित रखने और न्याय दिलाने के लिए बने कानून लागू हों; भगवान के शोषण, अतिक्रमण और बिगाड़ को रोका जा सके; बिगाड़ से दुष्प्रभावित होने वाले जीवों को हुए नुकसान की भरपाई हो सके; इसके लिए वर्ष 2010 में एक कानून बना। इस कानून के तहत् 18 अक्तूबर, 2010 को एक न्यायाधिकरण बना। नाम रखा गया – राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल)। आवेदन देने के अधिकतम छह माह के भीतर फैसला यानी ’सस्ता न्याय, त्वरित न्याय’।

सस्ता और त्वरित – इन दो शब्दों ने ऐसे गंवई पर्यावरण कार्यकर्ताओं को भी गुहार लगाने का हौसला दिया, जिनके पास वकीलों को देने के लिए न ज्यादा पैसे हैं और न ही प्रदूषकों से टक्कर लेने के लिए ज्यादा धैर्य। न्यायाधिकरण द्वारा जानकारी तथा संपर्क को आॅनलाइन करने से पारदर्शिता आई और लोगों की इस तक पहुंच आसान हुई। न्याय बेंच में पर्यावरण विशेषज्ञों की सदस्यता ने न्याय को त्वरित और विवेकशील बनाया। हर रोज की रफ्तार से आये फैसले और पारदर्शिता ने मिलकर न्यायाधिकरण की विश्ववसनीयता बढाई। चैंके अफसर, घबराये प्रदूषक और मीडिया में छपी रिपोतार्ज ने इसे जन-जन में लोकप्रिय बना दिया। लिहाजा, राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण में आने वाले मामलों की संख्या यकायक बढ गई है। इससे वकील भी आकर्षित हुए है। कुछ वकीलों ने अपना सारा ध्यान राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण में प्रेक्टिस करने में लगा दिया है। निश्चित रूप से अगले कुछ वर्षों में भारत में पर्यावरण मामलों के नामी जानकारों की सूची में सिर्फ पर्यावरणविद् ही नहीं, कई वकील भी शामिल होंगे। पर्यावरण में स्नातक डिग्री के बाद वकालत की पढ़ाई करना शुभ रहेगा। यह भगवान को न्याय दिलाने का काम जो है।

हरित न्यायाधिकरण के न्याय से भगवान को कितनी सुरक्षा और न्याय मिला है ? इसका कोई ठोस अध्ययन हुआ हो; ऐसा अभी मेरी निगाह में नहीं है। हिंडन-बाढ क्षेत्र में अतिक्रण के मामले में दो अक्तूबर, 2013 में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा खुद मंजूर करने के बावजूद ’रिवर रेगुलटरी जोन’ अधिसूचित करने में हीला-हवाली; दादरी, गे्रटर नोएडा के गंाव बील अकबरपुर, स्थ्ति जलग्रहण क्षेत्र के 500 मीटर के दायरे में निर्माण पर 2012 में रोक के बावजूद सितम्बर, 2014 जारी रहने पर निर्माण की वीडियोग्राफी आदेश जारी की न्यायधिकरण की विवश्ता, और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पेट्रोल-डीजल के पुराने वाहनों पर रोक को लेकर जारी आदेश को केन्द्र सरकार द्वारा शोधपत्रों के जरिए उलझानें की कोशिश, पर्यावरण प्रेमियों को चिंतित कर सकती है। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने पूरे देश में नदी तट व तलहटी से बिना लाइसेंस व पर्यावरणीय मंजूरी के रेत खनन पर रोक लगाई। उसका हश्र हम देख ही रहे हैं। हरित न्यायाधिकरण के आदेश की पालना न करने की सरकारी मंशा के उदाहरण कई हैं। फिलहाल हम खुश हों सकते हैं कि हरित न्यायाधिकरण, अपने मकसद के मोर्चे पर सक्रिय हुआ है। न्यायमूर्ति श्री स्वतंत्र कुमार के अध्यक्ष बनने और चार नई बंेच बनने के बाद से फैसलों में तेजी आई है। अपने फैसलों को लागू कराने के लिए हरित न्यायाधिकरण ने शासन-प्रशासन की मुश्कें कसने की कोशिशें भी तेज की हैं। आइये, हम भी अपनी कोशिशें तेज करें।

 

राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण- एक परिचय-

नई दिल्ली में मुख्य बेंच।

चेन्नई, पुणे, कोलकोता और भोपाल में चार अन्य बेंच।

एक अध्यक्ष, छह न्यायिक सदस्य और दस विशेषज्ञ सदस्य।

 

पूर्व और प्रथम अध्यक्ष: न्यायमूर्ति श्री लोकेश्वर सिंह।

वर्तमान अध्यक्ष: न्यायमूर्ति श्री स्वतंत्र कुमार।

वर्तमान न्यायिक सदस्य: न्यायमूर्ति सर्वश्री एम. चोकलिंगम, श्री वी. के. किंगांवकर, पी. ज्योतिमणि, श्री उमेश दत्तात्रेय साल्वी, श्री दिलीप सिंह और श्री शशिधरन नाम्बियार।

वर्तमान विशेषज्ञ सदस्य: सर्वश्री प्रो आर. नागराजन, डॉ. देवेन्द्र कुमार. डा. गोपाल कृष्ण पांडेय, प्रो. पी. सी. मिश्रा, श्री पी. एस. राव, प्रो. ए. आर. यूसुफ, श्री रंजन चटर्जी, श्री विक्रम सिंह, डा. रमेशचन्द्र त्रिवेदी और डा. अजय अच्युतराव।

 

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हवा और शांति के हक में कुछ हरित फैसले

जितना विकसित शहर, उतनी अधिक पर्यावरणीय समस्यायें। यह अनुभव सौ फीसदी सच है; भारत के महानगर, इसका उदाहरण बनकर सामने आये हैं। इस सच के सामने आने के साथ-साथ महानगर वासियों की चिंतायें बढी हैं और संचेतना भी। इस बात से भी इंकार नहीं किय जा सकता। किंतु संवेदना जगाने का असल काम, मीडिया, कुछ याचिकाकर्ताओं और नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल ने किया है; इस बात से भी शायद आपको इंकार न होगा। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली के पर्यावरण को लेकर ग्रीन ट्रिब्युनल के कुछ फैसले इसका प्रमाण हैं। आइये, इनका अवलोकन करें और खुद की संवेदना भी जगायें:

 

ध्वनि प्रदूषण

वाहनों का शोर: दिल्ली स्थित पंचशील पार्क निवासी उमेश सहगल ने बाहरी रिंग रोड के कारण ध्वनि प्रदूषण को लेकर शिकायत की, तो न्यायधिकरण ने गत् 11 मार्च को पंचशील पार्क को ’शांत क्षेत्र’ घोषित कर दिया। आदेश दिया: ’’वाहनों की रफ्तार 30 किलोमीटर हो। निगरानी हेतु कैमरें लगें और गति नियंत्रण हेतु 1000 का जुर्माना लगे। जरूरत से ज्यादा भार लेकर चल रहे वाहनों की आवाजाही और प्रेशर हाॅर्न पर रोक लगे। निवासी भी ऐसी खिड़कियां लगायें, ताकि कम से कम आवाज भीतर जाये।’’ बात नहीं बनी, तो मुख्य सचिव को तलब किया। पांच मई को प्रशासन और निवासी समिति की बैठक बुलाई।

 

वायु प्रदूषण

कूड़ा करकट: कूड़े में रबर, पलास्टिक, पत्ते और जाने क्या-क्या होता है। अतः कूड़ा जलाने से निकलने वाली गैंसें हवा में मिलकर उसे खराब करती हैं। हमारी संास के जरिए इससे हमारी सेहत पर बुरा असर पड़ता है। जलवायु प्रदूषण के अन्य कारणों में से एक ऐसी गैसों का वायुमंडल में उत्सर्जन भी है। अतः खुले में कूड़ा जलाकर उसका निष्पादन करने का तरीका पूर्णतः अवैज्ञानिक और नुकसानदेह है। इस तथ्य के आलोक में जिला गाजियाबाद से एक शिकायत आई।

जानकारी हुई कि विजय नगर, प्रताप विहार, डूंडाहेड़ा, अकबरपुर-बहरामपुर, लालकुंआ, मिशलगढी, मेरठ रोड, राजनगर एक्सटेंशन, नंदग्राम, भाटिया मोड़, सैक्टर-33 संजयनगर, जागृति विहार, गुलधर, कविनगर, गोविंदपुरम्, कमला नेहरु नगर, शास्त्री नगर, विवेकांनद नगर, मोहन नगर, वसुंधरा मेें खुले में कूड़ा जलाया जाता है। न्यायधिकरण सख्त हुआ। गाजियाबाद ही नहीं, पूरे एन सी आर में कहीं भी कूड़ा जलाने पर पांच हजार रुपये जुर्माने का आदेश दिया। ईट भट्टे तथा मिट्टी के बर्तन आदि बनाने वाली औद्योगिक इकाइयों पर रिपोर्ट मांगी। नगरायुक्त ने कमर कसी। जुर्माने के साथ-साथ मुकदमा दर्ज करने की तैयारी की।

कूड़ा-करकट जलाने को लेकर न्यायाधिकरण की सख्ती का असर नई दिल्ली नगरपालिका की सक्रियता के रूप में भी दिखा। उसने दो टीम विशेष रूप से इस कार्य हेतु गठित की। पहली कार्रवाई के रूप में औरगंजेब रोड स्थित मेघालय हाउस के एक कर्मचारी को ऐसा करते पकड़ा; तुगलक रोड थाने में मामला दर्ज कराया और 5000 का चालान थमा दिया।

लोटस टैम्पल: भारत में एक ही बहाई मंदिर है। दिल्ली के कालकाजी स्थित यह बहाई मंदिर, पर्यटकों और भक्तों के बीच लोटस टैम्पल के नाम से ज्यादा विख्यात है। इसकी संगमरमरी आभा और ध्यान केन्द, लोगों को आर्कषित करते हैं। मंदिर के उपरी हिस्से को पीला होते देख वकील संजीव अलावादी को चिंता हुई। फरवरी, 2015 में उन्होंने हरित न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया। संजीव ने पीलेपन के लिए अवैध पार्किंग, मेट्रो निर्माण, वायु प्रदूषण और मंदिर प्रशासन को दोषी बताया; कहा कि साल में चार बार इमारत को धोना चाहिए। ऐसा नहीं हो रहा। न्यायाधिकरण ने तत्काल, दो कोर्ट कमिश्नर नियुक्त किए। एक सप्ताह में रिपोर्ट मांगी। यातायात पुलिस के संयुक्त आयुक्त मुक्तेश चन्द्र ने मामले मंे कड़ी कार्रवाई की सूचना दी।

 

वाहन प्रदूषण: दिल्ली की हवा में प्रदूषण को लेकर विज्ञान पर्यावरण केन्द्र, दिल्ली द्वारा एक अध्ययन ने सभी को चिंतित किया। एक याचिका के जवाब में न्यायाधिकरण ने सात अप्रैल, 2015 को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली में 15 साल पुराने पेट्रोल वाहन और 10 साल पुराने डीजल वाहनों के संचालन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। वाहन मालिक संघों ने इस आदेश को अनुचित बताया। उन्होने कहा कि 15 साल का रोड टैक्स जमा है। अतः 10 साल पुराने डीजल वाहनों पर रोक उचित नहीं। मीडिया ने इस पर बहस चलाई राजनेता, वाहन मालिकों के साथ दिखे। अपील हुई, तो न्यायाधिकरण ने रोक के आदेश को दो सप्ताह के लिए आगे बढा दिया। 17 अप्रैल को सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को नोटिस जारी किया। वायु प्रदूषण रोकने के लिए उठाये कदमों की जानकारी मांगी। वाहनों का घनन्व तथा वायु गुणवत्ता के नमूने, रिपोर्ट तथा वायु प्रदूषण रोकने पर सुझाव भी तलब किए।

 

मामला आगे बढा, तो केन्द्र सरकार आगे आई। उसने न्यायाधिकरण के आदेश पर रोक की मांग की। दलील दी कि अचानक रोक से जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित होगी। केन्द्रीय सड़क परिवहन एवम् राजमार्ग मंत्रालय ने अनुरोध किया कि गाड़ियों की उम्र को पैमाना बनाने की बजाय, उत्सर्जन की जांच और फिटनेस प्रमाणपत्र को पैमाना बनाया जाये। दलील के पक्ष में सरकार की ओर से पिंकी आनंद ने आई आई टी के चार प्रोफेसरों का एक शोधपत्र का उल्लेख किया, जो मानता है कि 10 साल और इससे  पुराने वाहनों से होने वाले प्रदूषण का स्तर इतना कम है कि इसकी उपेक्षा की जा सकती है।

यह लेख लिखे जाने तक न्यायधिकरण ने अपने आदेश पर रोक की अवधि 25 मई तक बढा तो जरूर दी, किंतु आई आई टी के शोधपत्र को लेकर जबरदस्त नाराजगी जाहिर की। वाहन और हवा पर आये इस शोधपत्र को एक तरह से हवाई करार दिया। शोधपत्र और आईआईटी पर कई सवाल दागे: ’’इस रिपोर्ट का आधार क्या है ? इस पर टिप्पणी करने का आई आई टी का कोई काम नहीं है।…. यह रिपोर्ट सिर्फ निजी वाहनों पर आधारित है।.. यह रिपोर्ट वाणिज्यिक वाहनों के प्रदूषण पर चुप है।… इन्होंने किसी जगह से नमूने नहीं लिए।…किसी को अनुसंधान से संबद्ध नहीं किया। सिर्फ पुराने आंकड़ों पर भरोसा किया। यह रिपोर्ट समग्र नहीं है। आपके अनुसंधान में कमी है।’’

न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली न्यायपीठ ने कहा -’’ आई आई टी बेहतर काम कर सकता था। आपने बिना अध्ययन किए 100 पन्ने रख दिए। सिर्फ इसलिए कि आप आई आई टी है, आप हमेशा सही नहीं हो सकते।’’ पीठ ने चलते और खड़े हुए वाहनों को ध्यान में रखते हुए मूल आंकड़ों को सुधारने की सलाह की। गुस्साई पीठ ने पूरी रिपोर्ट को यह साबित करने की कोशिश बताया कि वाहनों पर प्रतिबंध का आदेश खराब है। ऐसी अनुचित कोशिश के लिए केन्द्र सरकार की भी खिंचाई की।

एक अन्य याचिका के जरिये भी दिल्ली में वायु प्रदूषण हेतु वाहनों को दोषी ठहराने का मामला सामने आया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार, राजधानी के सभी वाणिज्यिक तथा निजी वाहन सीएनजी जैसे स्वच्छ ईंधन से चलने चाहिए। दिल्ली निवासी देवेन्द्र पाल सिंह ने शिकायत की कि उबर, ओला आदि सेवा प्रदाता कम्पनियों की डीजल टैक्सियां इसका उल्लंघन कर रही हैं। इनके पास आल इंडिया परमिट है। ये प्रदूषण कर रही हैं। इनकी समय-समय पर जांच होती रहनी चाहिए। वह नहीं हो रही। दिल्ली सरकार व प्रशासन इन पर रोक लगाने में नाकाम साबित हुई है। न्यायाधिकरण ने इसके लिए दिल्ली सरकार, उबर इंडिया सिस्टम प्रा. लिमिटेड, एएनआई टेक्नोलाॅजी प्रा. लिमिटेड, तथा सेरेनडिपिटी इंफोलैब प्रा. लिमिटेड से जवाब मांगा है। तीन जुलाई को अगली सुनवाई होगी।

 

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एनसीआर का पानी, नदी और ग्रीन ट्रिब्यूनल

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का दायरा फैला; आबादी बढ़ी; साथ-साथ पर्यावरण की चिंता की लकीरें भी। कहना न होगा कि पानी और नदी के मोर्चे पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली ने काफी कुछ खोया है। दिल्ली, पानी के मामले में एक परजीवी शहर है। नोएडा और गुड़गांव के कदम भी इस पराश्रिता की ओर बढ़ चुके हैं और ग्रेटर नोएडा में पानी में प्रदूषण से पैदा कैंसर के मरीज। साबी नदी का नाम हमने नजफगढ नाला रख ही दिया है। हिंडन और यमुना, को भी इसी दिशा में जाते प्रवाह हैं। चेत गये हाथों ने गुहार लगाई। लगाई गुहार को नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल का भरोसा मिला। इस भरोसे ने उम्मीद जगाई है और चेतना भी। संभव है कि इससे हमारा स्वार्थ शरमा जाये और हमारी नदियां जिंदा हो जायें; हमारा भूजल लौट आये। देखिये, पानी के प्रति हमारी चेतना और अनुशासन का आह्वान करते कुछ हरित फैसले:

 

अरावली की जमीन

अरावली की पहाड़ियों को हरियाली चाहिए और इनकी तराई, जल संचयन के लिए मुफीद जगह हैं। इन पर अतिक्रमण, प्रकृति की हकदारी पर अतिक्रमण है।  अरावली पहाड़ियों पर हरियाणा के हिस्से में भू-माफिया द्वारा किए जा रहे अवैध निर्माण को सरकार द्वारा न रोकने को लेकर दायर एक याचिका में न्यायाधिकरण ने हरियाणा सरकार को चार सप्ताह में जवाब देने को कहा।

 

पक्षियों के हिस्से का पानी

आकाश वशिष्ठ द्वारा पेश आवेदन ( मूल सं. 121/2013) में अकबरपुर पर्यावास को पर्यावरणीय दृष्टि से संरक्षित क्षेत्र घोषित करने तथा इसे प्रभावित करने वाले क्षेत्र में निर्माणरत शिवनादर यूनिवर्सिटी परियोजना की मंजूरी रद्द करने की मांग की गई थी। उल्लेखनीय है कि अकबरपुर स्थित दादरी जलसंरचना काफी विशाल है और पेश सूची के मुतातिक दुर्लभ प्रजाति के 240 प्रवासी पक्षियों का बसेरा है। न्यायाधिकरण ने जलक्षेत्र संरक्षण व प्रबंधन नियम – 2010 का हवाला देते हुए जलसंरचना के सर्वोच्च जलस्तर बिंदु के चारो आरे 500 मीटर के दायरे में निर्माण पर रोक का आदेश तो दिया ही, पालना व पालना की जांच की जिम्मेदारी भी सुनिश्चित करने हेतु एक समिति का भी गठन किया।

 

भूजल दोहन-प्रदूषण

लोहिया नगर: लोहिया नगर के भूजल मे क्रोमियम जैसे खतरनाक रसायन की उपस्थिति को लेकर हिंडन जलबिरादरी के संयोजक और पेशे से वकील विक्रांत शर्मा ने पानी को लेकर तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को भी ज्ञापन दिया। याचिका अदालत पहुंची, तो लोनी, लोहिया नगर, डासना, पिलखुआ तथा औद्योगिक इलाकों में भूमिगत जल की चिंता शुरु हो गई। न्यायाधिकरण ने तेवर तल्ख किए। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से प्रदूषित करने वाली इकाइयों की सूची तथा उन पर पिछले तीन साल के दौरान हुई कार्रवाई की सूचना मांगी। सूची 17 मई को प्रस्तुत करनी थी।

बिल्डरों पर नकेल: पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 की धारा 3(3) की अधिसूचना एस. ओ. 38 ई दिनांक 14 जनवरी, 1997 के तहत् केन्द्रीय भूजल प्राधिकरण की स्थापना करते वक्त अपेक्षा की गई थी कि भूजल प्राधिकरण देश में अंधाधुंध बोरिंग आदि पर लगाम लगाकर भूजल दोहन को विनियमित करेगा। भूजल का संरक्षित व सुरक्षित करने के दृष्टिकोण से आवश्यक विनियामक दिशा-निर्देशों जारी करेगा। केन्द्रीय भूजल प्राधिकरण की स्थापना के उद्देश्य यही थे। क्रियान्वयन सुनिश्चित न हो पाने के कारण प्रदूषण के लिए स्थापित केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की तरह भूजल प्राधिकरण भी कागजी रिकार्ड रखने वाले दफ्तरी से ज्यादा कुछ साबित नहीं हुआ। इन दोनो के पास आज अनुसंधान हैं, आंकड़ें हैं, बजट है, अमला है. सब कुछ है, लेकिन जमीनी कार्रवाई नहीं है। दोनांे अपनी जिम्मेदारियां स्थानान्तरित करने में माहिर हैं। हरित न्यायाधिकरण ने भी यही पाया। अतः नोएडा-ग्रेटर नोएडा के बिल्डर्स द्वारा निर्माण व अन्य कार्यों में अंधाधुंध दोहन को देखते हुए हरित न्यायाधिकरण ने मूल आवेदन संख्या 59/2012 पर 11 जनवरी, 2013 को एक आदेश दिया। गुड़गांव में भी बिल्डरों द्वारा जलदोहन नियंत्रण प्रतिबंध का आदेश है।

आदेश के अनुसार, नोएडा व ग्रेटर नोएडा.. दोनो प्राधिकरण व केंद्रीय भूजल आयोग की अनुमति/लाइसेंस के बिना बिल्डर्स द्वारा भूजल निकासी पर रोक लगा दी। अगले निर्णय तक के लिए स्थनगनादेश जारी करते हुए स्थगनादेश की पालना न करने वाले बिल्डर्स की बिजली आपूर्ति आदि बंद कर देने की कार्रवाई का अधिकार भी प्रशासन को दिया। किंतु आदेश कागजी ही साबित हुए, तो विक्रांत तोंगड़ न्यायाधिकरण पहुंच गये।

विक्रांत तोंगड़ बनाम यूनियन आॅफ इंडिया (मुख्य आवेदन सं. 203/2013) मामला न्यायाधिकरण के उक्त आदेश की पालना नहीं करने के संबंध में ही है। न्यायाधिकरण ने संबंधित विभागों द्वारा कोई कार्रवाई करने में स्वयं को असमर्थ बताने पर नाराजगी प्रकट की। हकीकत जांचने के लिए पांच वकीलों को स्थानीय आयुक्त नियुक्त किया: सर्वश्री पोटाराजू, विक्रमजीत, आनंद शर्मा, गुरिन्दर जीत और सुमित कुमार घोष। इन्हे जांच की सभी शक्तियां देते हुए न्यायाधिकरण ने स्थानीय पुलिस द्वारा सुरक्षा व प्रशासन द्वारा हर संभव सहायता देने का निर्देश भी दिया।

नतीजा यह हुआ कि स्थानीय आयुक्तों ने एक दिन मंे 12 इकाइयों की जांच की और सभी को आदेश के उल्लंघन का दोषी पाया। उन्होने पाया कि ये जलापूर्ति का कोई स्वतंत्र स्त्रोत का उपयोग नहीं कर रहे हैं और न ही उनके पास भूजल निकासी की कोई अनुमति है। न्यायाधिकरण ने सभी 12 इकाइयों के प्रमुखों का कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि उनके द्वारा किए गये उल्लंघन व पर्यावरणीय नुकसान के लिए क्यों न उन पर सजा व जुर्माना किया जाय। केन्द्रीय भूजल आयोग से भी रिपोर्ट मांगी गई। पाया गया कि लोग रिहायिश से ज्यादा, निवेश के लिए मकान खरीद रहे हैं। आयोग ने अनुरोध किया कि नोएडा में किसी को एक से ज्यादा घर खरीदने की अनुमाति न हो। निगरानी जारी है।

 

नदी प्रदूषण

यमुना और हिंडन, कहने को ये दो नाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की नदियां हैं। किंतु क्षेत्र के भीतर गुजरते हुए इनकी हालत ऐसी है कि आप इन्हे जीवनरेखा कहने की बजाय मृत्युरेखा कह सकते हैं। दोनो को लेकर न्यायाधिकरण ने कई आदेश दिए।

 

हिंडन

पुल: करैहड़ा गांव और मेरठ बाइपास को जोड़ने के नाम पर मोहन नगर के पास हिंडन नदी पर एक पुल बनाने का काम शुरु हुआ। पुल, खंभों पर बनता, तो हिंडन को कोई नुकसान न होता। इस पुल की ज्यादातर लंबाई भरवां बनाकर हिंडन के प्रवाह को सिकोड़ने की कोशिश हुई, तो वकील विक्रांत शर्मा, राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण जा पहुंचे। न्यायाधिकरण ने अफसरों को बुलाकर डांट तो खूब मारी, किंतु अंततः पुल जैसा बनना था, वैसा ही बना। असफलता में दोस्तों ने हौसला बढाया; सो निराश नहीं हुए। प्रदूषण के मोर्चे पर कमान कसने में लग गये। हिंडन जलबिरादरी के प्रांतीय समन्वयक कृष्णपाल सिंह के जरिये ंिहंडन में कचरा फेंके जाने को लेकर याचिका दायर कर दी। कृष्णपाल सिंह की याचिका पर हाल ही में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने उत्तर प्रदेश शासन, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग और भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय को नोटिस जारी कर दिए है। ’सोसाइटी फाॅर प्रोटेक्शन आॅफ एन्वायनमेंट एण्ड बायोडायवर्सिटी’ ने याचिका दायर कर सहारनपुर से गौतमबुद्व नगर तक 172 फैक्टरियां, हिंडन में कचरा डाल रही हैं। याचिकाकर्ता ने ऐसी फैक्टरियों को बंद कर हिंडन स्वच्छता हेतु कार्य योजना बनाये जाने की मांग की है। न्यायाधिकरण ने संबंधित सरकारों व विभागों को 25 मई तक जवाब देने को कहा।

 

नहर: वसुंधरा एन्कलेव के निवासी श्री जे पी शर्मा ने हिंडन नहर में कचरे को लेकर याचिका दायर की। शिकायत थी कि निगम के अलावा अन्य स्त्रोतों द्वारा फेंका जा रहा है। श्री शर्मा की याचिका पर आदेश देते हुए न्यायाधिकरण ने हिंडन नहर विशेष में कचरा फेंकने पर प्रतिबंध लगा दिया है। आदेश में कहा गया है कि यह आदेश उत्तर प्रदेश के लोगों व सार्वजनिक प्राधिकरणों पर समान रूप से लागू होगा। लेख लिखे जाने तक प्राप्त जानकारी के अनुसार, अगली तारीख सभी पक्षों को न्यायाधिकरण में पेश होने का आदेश दिया गया। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने चिंता व्यक्त की थी कि जिम्मेदारियों को लेकर सभी विभाग एक-दूसरे पर डालते रहते हैं; लिहाजा, स्थानीय निगम, प्रािधकरण, सार्वजनिक संस्थान, इनके कर्मचारी तथा अधिकारी सभी अपने-अपने स्तर इसके लिए जिम्मेदार माने जायेंगे। हिंडन में कचरा डाले जाने की जांच तथा कचरा रोकने के उपाय सुझाने के लिए एक समिति भी गठित की गई है। दिल्ली विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष, पूर्वी दिल्ली नगर निगम के आयुक्त, दिल्ली लोक निर्माण विभाग, दिल्ली जल बोर्ड तथा उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा नामित अधिकारियों को इस समितिं का सदस्य बनाया गया है।

 

आपात्कालीन योजना चाहिए: जयहिंद नामक एक संस्था द्वारा ग्रीन ट्रिब्युनल में पेश एक अन्य याचिका में भी हिंडन और सहायक नदियों की चिंता की गई है। वकील गौरव कुमार बंसल के माध्यम से दायर यह याचिका  में आरोप लगाया गया है कि चीनी मिलों, कागज कारखानों, रासायनिक उद्योगों तथा बूचड़खानों की वजह से उक्त नदियां प्रदूषित हो रही हैं। याचिका में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा दिए गये उस हलफनामें का भी जिक्र है, जिसमें बोर्ड ने हिंडन, काली और कृष्णी नदी में आ रहे औद्योगिक कचरे के कारण जल गुणवत्ता पर दुष्प्रभाव की बात स्वीकारी है। याचिका में मांग की गई है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की नदियों में प्रदूषण रोकने की आपात्कालीन योजना तैयार करने के लिए उत्तर प्रदेश शासन को निर्देश दिए जायें।

 

सुखद है कि ग्रीन ट्रिब्युनल ने मांग का जवाब देने के लिए केन्द्रीय पर्यावरण एवम् वन मंत्रालय, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और उत्तर प्रदेश शासन को नोटिस जारी कर दिए गये हैं। यह नोटिस 14 मई, 2015 दिन गुरुवार को ग्रीन ट्रिब्युनल के अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा जारी किए गये। सुखद यह भी है कि राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के दखल के बाद हिंडन को लेकर भी उत्तर प्रदेश शासन कुछ कदम उठाने पर मजबूर हुआ है। आप थोड़े संतुष्ट हो सकते हैं कि देर से ही सही, उत्तर प्रदेश शासन ने हिंडन के प्रदूषण पर नजर रखने का निर्णय ले लिया है। तय किया है कि नालों की सेटेलाइट मैपिंग की जायेगी। रिमोट संेसिंग एजेंसी को सौंपी जिम्मेदारी से अपेक्षा की गई है कि आगामी दो माह के भीतर एजेंसी अपनी रिपोर्ट सौंप देगी। संभव है कि यह सभी हो। किंतु उस बयान का क्या करेंगे, जो कहता है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सिर्फ जानकारी दे सकता है; कार्रवाई तो शासन-प्रशासन ही कर सकता है।

 

यमुना

 

यमुना को लेकर न्यायाधिकरण पहला अह्म आदेश नदी में मलवा-कचरा डंप करने को लेकर आया। इस आदेश में मलवा डालने वालों से पांच लाख का जुर्माना वसूलने की बात कही गई थी। दूसरी अह्म बात, उनके खर्च पर मलवा उठाने के निर्देश भी दिए गये थे। याचिकाकर्ता ने खुद निगरानी की। समय-समय पर सरकार तथा न्यायाधिकरण को सूचित किया। लिहाजा, नतीजे बेहतर आये। फिर यमुना के बाढ क्षेत्र के सीमांकन और यमुना की जमीन पर स्थित इंन्द्र्रप्रस्थ बस अड्डे को लेकर आदेश हुए। यमुना पर श्री मनोज मिश्र की कई और याचिकायें चर्चा में आई। न्यायाधिकरण के आदेश के बाद सरकार हरकत में भी आई। कार्यबल बनाया।

 

पर्यावरण मुआवजा: जानकारी मिली है कि यमुना पुनर्जीवन हेतु कार्य योजना भी अब बन गई है। इसी बीच सफाई के नाम पर यमुना में गैर कानूनी खुदाई की शिकायत करते हुए राहुल नागर ने याचिका दायर की। दलील के बाद न्यायाधिकरण ने जगतरपुर और वजीराबाद बांध पर खुदाई की अनुमति तो दे दी; किंतु कहा कि खुदाई में निकाले माल की एवज् में खुदाई ठेकेदार, 500 रुपये प्रति क्युबिक मीटर अदा करे। भुगतान सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी, दिल्ली जल बोर्ड के अधिकारियों को दी गई। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति को खुदाई के स्थान के नमूने नियमित तौर पर उठाने का निर्देश भी दिया।

’मैली से निर्मल यमुना पुनर्जीवन योजना – 2017’ की देखरेख को लेकर दायर एक याचिका में न्यायाधिकरण ने कहा है कि इसके तहत् पर्यावरण मुआवजे को लेकर 45 दिन के भीतर कार्ययोजना बनाकर न्यायाधिकरण के पास जमा की जाये। यह समय सीमा बढाई नहीं जायेगी। यदि योजना में कुछ कमी हुई, तो संबंधित अधिकारी को जिम्मेदार माना जायेगा। न्यायाधिकरण ने इस योजना को वर्ष 2016 से पहले लागू करने को कहा है।

 

8 मई को जारी एक अन्य बहुचर्चित आदेश में न्यायाधिकरण ने घरों से निकलने वाले सीवेज की एवज् में राजधानी वासियों को 100 से 500 रुपये तक पर्यावरण मुआवजा देना होगा। कहा है कि संपत्ति कर अथवा पानी का बिल, जो भी अधिक हो, उसके बराबर मुआवजा देना होगा। यह सभी को देना होगा, चाहे सीवर हो या न हो। बिजली कंपनियों को भी प्रदूषण भुगतान सिद्धांत के तहत् पर्यावरण मुआवजा लेने के लिए कहा है। इससे असहमति हो सकती थी; कारण कि दिल्ली जल बोर्ड, पहले ही सीवेज की एवज में जलशुल्क का 60 प्रतिशत वसूलता है। किंतु इसे लेकर कोई असहमति मुखर नहीं हुई।

एक समग्र योजना आदेश: दिल्ली नालों में कूड़े पर रोक के जरिये यमुना निर्मल बनाने की एक पहल, न्यायाधिकरण ने समग्र योजना आदेश देकर की। रोक को न मानने वाला चाहे सरकारी हो या निजी, पांच हजार रुपये जुर्माना वसूला जाये। नालों के पास अतिक्रमण, अवैध निर्माण, बूचड़खाने तथा कपड़ा धोने वालों के खिलाफ कार्रवाई का जिम्मेदारी नगर निगम, लोक निर्माण विभाग, दिल्ली विकास प्राधिकरण समेत सभी संबंधित एजेंसियों को दी गई है। नगर निगम को आदेश दिया कि नालों से सीवेज तथा कचरा साफ करे। दिल्ली राज्य औद्योगिक एवम् बुनियादी ढांचा विकास निगम को जिम्मेदारी सौंपी कि वह सुनिश्चित करें कि फैक्टरियों का कचरा नालों में न जाकर, सीधे शोधन संयंत्र मंे जाये।

 

दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कहा कि वह सामुदायिक अवजल शोधन संयंत्रों की क्षमता और व्यवहार पर रिपोर्ट तैयार करे। दिल्ली जल बोर्ड को कहा कि पक्का करे कि मल शोधन संयंत्र अपनी पूरी क्षमता के अनुकूल शोधन कर रहे हैं। नजफगढ नाला और दिल्ली गेट नाला, दिल्ली में यमुना में 63 प्रतिशत प्रदूषण के कारण हैं। न्यायिधकरण ने कहा कि योजना-2017 से पहले इन्हे सुधार लें। संबंधित एजेंसियों को चार सप्ताह के भीतर, उन जमीनों का कब्जा लेने को कहा, जहां मल शोधन संयंत्र बनाये जाने हैं। केन्द्र सरकार को कहा कि वह मल शोधन संयंत्र के निर्माण के लिए दिल्ली विकास प्राधिकरण और दिल्ली जल बोर्ड को धन मुहैया कराये। दिल्ली जल बोर्ड और दिल्ली औ़द्योगिक एवम् बुनियादी ढांचा विकास निगम को संयंत्रों की  आॅनलाइन निगरानी तथा रिपोर्ट को आॅनलाइन सार्वजनिक करने संबंधी व्यवस्था बनाने के आदेश भी दिए। दिल्ली जल बोर्ड को भी कहा कि वह ऐसे वाहन मुहैया कराये, जिनसे सीवेज घरों से सीधे संयंत्रों तक पहुंचे। इन वाहनों में ’ग्लोबल पोजीशनिंग सिस्टम’ लगा हो, ताकि निगरानी संभव हो।

 

इस आखिरी आदेश को पढकर आप समझ सकते हैं कि राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण किस तैयारी और समग्र सोच के साथ से आदेश दे रहा है। वह सिर्फ नालों में कूड़े पर रोक लगाकर संतुष्ट नहीं हुआ; उसने इसके लिए किए जाने विविध कदमों का उल्लेख कर यह सुनिश्चित करने की भी हरसंभव कोशिश की है कि यह हो। वह अपने आदेश की पालना की जिम्मेदार एजंेसी को सीधे निर्देश कर रहा है। यही राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण की खूबी है। आवश्यक है कि हम इस खूबी का लाभ, पंचतत्वों के नामयोग से बने भगवान और इस भगवान द्वारा बनाये अनगिनत जीवों के शरीर की सेहत की रक्षा के लिए के लिए उठायें। यह तभी हो सकता है कि जब हम पहले खुद भगवद्प्रेमी बन जायें यानी पंचतत्वों से प्रेम करें।

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