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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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अशोक टंडन 

बात 25 दिसम्बर, 2008 की है अटलजी के जन्मदिन के अवसर पर बधाई देने वालों का आना जाना जारी था. अचानक स्वागत कक्ष से संदेश आया कि पूर्व राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण आये हैं. जब तक लोग संभल पाते कि 4 दिसंबर को अपने जीवन के 98 वर्ष पूरे कर चुके वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी इतना कष्ट उठाकर भला यह सब क्यों कर रहे हैं, तब तक अपने निजी सचिव का सहारा लेकर धीरे-धीरे वेंकटरमण गाड़ी से उतरते हुये दिखाई दिये. अपने पैरों पर चलकर वह अटलजी के बंगले में दाखिल हुये. परिवार के सदस्यों एवं वहां उपस्थित अन्य गणमान्य महानुभावों के प्रश्नात्मक भाव को भांपते हुये उन्होंने स्वयं ही बड़े सहज भाव से अपनी धीमी होती आवाज में कहा मैं स्वयं को नहीं रोक पाया और सोचा जाकर अपने मित्र वाजपेयी को जन्मदिन की बधाई दे आऊं.

वेंकटरमण अटलजी के निजी कक्ष में उनसे मिले, उन्हें जन्मदिन की बधाई दी, दोनों भावभिवोर हो उठे. कुछ पल वहां बैठने के पश्चात वेंकटरमण लौट गये. वहां उपस्थित सभी की आंखे नम थीं. इस अवस्था में भी वेंकटरमण हर साल की तरह अटलजी को जन्मदिन की बधाई देना नहीं भूले, मित्रता की यह कैसी मिसाल है?

इसके लगभग एक महीने बाद 27 जनवरी, 2009 को वेंकटरमण स्वर्ग सिधार गये. अटलजी के अनन्य मित्रों में से एक और उनको छोड़कर चला गया. राजनीति में व्यक्तिगत संबंध कितने महत्वपूर्ण होते हैं इसका एक उदाहरण अटलजी और वेंकटरमण की मित्रता हैं. इन दोनों महान विभूतिओं के आपसी संबंध स्वाभाविकता बहुत पुराने रहे होंगे. लेकिन इस बात की जानकारी बहुत कम लोगों को होगी कि 1998 से 2004 तक उनके प्रधानमंत्री काल में अटलजी के निकटतम मित्रों एवं सलाहकारों में जो लोग शामिल थे, उनमें वेंकटरमण प्रमुख थे. स्वतन्त्रता संग्राम से लेकर तमिलनाडु की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने, केन्द्र में गृह, वित्त एवं रक्षा मंत्री बनने और उपराष्ट्रपति एवं राष्ट्रपति पद के अपने लम्बे राजनैतिक अनुभव के आधार पर वह सदा अटलजी को विभिन्न मुद्दों पर समय-समय पर सलाह देने 7 रेसकोर्स रोड आया करते थे. अटलजी भी उन्हें अत्यन्त आदर एवं सम्मान प्रदान किया करते थे.

अटलजी के कुशल प्रशासन एवं अनेक दलों के गठबंधन की सरकार को संभाले रखने की अद्भुत क्षमता में वेंकटरमण के भरपूर सहयोग को भारतीय राजनीति में एक अनुकरणीय उदाहरण के तौर देखा जा सकता है. यहां यह कहना आवश्यक नहीं होगा कि अटलजी एवं वेंकटरमण सदा अपने-अपने दल के प्रमुख नेता रहे. आवश्यकता पड़ने पर एक दूसरे का विरोध भी किया. लेकिन दलगत राजनीति से ऊपर उठकर, व्यक्तिगत संबंधों में जो घनिष्ठता बनाये रखी, वह आज की एवं आने वाले पीढ़ी के लिए एक मिसाल बन सकती है.

अपने प्रधानमंत्री काल में दलगत राजनीति से परे, जिन विशिष्ठ नेताओं एवं सामाजिक कार्यकताओं से अटलजी की व्यक्तिगत घनिष्ठता रही उनमें नरसिंह राव, ज्योति बसु, सोमनाथ चटर्जी, इन्द्रकुमार गुजराल, करूणानिधि, शरद पवार के नाम प्रमुख हैं. नरसिंह राव से उनकी मित्रता तो जगजाहिर है ही. उन्होने 1993 के जनेवा में हुए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के बेहद महत्वपूर्ण सम्मेलन में उस समय के नेता विपक्ष अटलजी को भारतीय प्रतिनिधिमंडल कर नेता नियुक्त कर भारतीय लोकतन्त्र में एक स्वस्थ परम्परा का आरम्भ किया था.

लेकिन यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि अटलजी जब पहली बार प्रधानमन्त्री पद की शपथ ग्रहण कर रहे थे तो राष्ट्रपति भवन में उन्हें हाथ मिलाकर बधाई देते समय, नरसिंह राव ने चुपके से उनके हाथ में एक कागज का टुकड़ा भी थमा दिया था. इसमें लिखा था कि जो काम मैं चाहकर भी नहीं कर पाया उसे आप अवश्य पूरा करें. यद्यपि अटलजी भी इस काम को अपनी 13 दिन की सरकार में पूरा नहीं कर पाये, लेकिन 1998 में दूसरी बार प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करते ही उन्होंने तुरन्त उसे करके दिखा दिया. जी हां आप ठीक समझे. मई 11 और मई 13, 1998 को पोखरण-2 के परमाणु परीक्षण ही वह कार्य था जिसे नरसिंह राव नहीं कर पाये और जिसे करने का विशेष अनुरोध उन्होंने अटलजी से किया था. जब तक जीवित रहे, नरसिंह राव ने सदा अटलजी के प्रति अपना स्नेह बनाये रखा. अटलजी ने भी उन्हें कभी निराश नहीं किया.

वैसे तो कई प्रसंग हैं, लेकिन सभी की चर्चा करना उचित नहीं होगा. लेकिन एक छोटा सा उदाहरण अवश्य देना चाहूंगा. आतंकवादी हमले में बचे युवा कांग्रेस के नेता एम.एस. बिट्टा, नरसिंव राव के बहुत करीबी थे. वह उनकी सुरक्षा के लिये चिन्तित रहते थे. उन्होंने व्यक्तिगत तौर पर अटलजी से आग्रह किया कि बिट्टा की सुरक्षा का स्तर बरकरार रखा जाए जिसे तुरन्त मान लिया गया.

ज्योति बसु और अटलजी लम्बे समय तक समकालीन राजनीतिज्ञ रहें. प्रधानमंत्री बनने के पश्चात अटलजी अक्सर ज्योति बसु से सम्पर्क करते थे. कई बार रेसकोर्स रोड कार्यालय में बैठे, अचानक वह ज्योति बसु को फोन लगाने को कहते थे. कमरे में उपस्थित सभी सहयोगियों को बाहर भेजकर वह उनसे बहुत देर तक बातचीत किया करते थे.

 

सोमनाथ दा तो उन्हें अपना मित्र एवं सहयोगी मानते रहे हैं. संसद भवन कार्यालय में सोमनाथ दा अक्सर बिना पूर्व सूचना के पहुंच सीधे प्रधानमंत्री कक्ष में आकर अटलजी से बातचीत करते. मार्क्‍सवादी नेता कहते थे अटलजी पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं और हमारा भी उनपर उतना ही अधिकार है जितना भाजपा तथा एन.डी.ए. नेताओं का है.

जिस दिन सोमनाथ दा को लोकसभा अध्यक्ष नियुक्त किये जाने का फैसला किया गया उस दिन वह अटलजी से मिलने आए थे. वह इस फैसले से बहुत खुश नहीं थे. उन्होंने इस बारे में जिन शब्दों में अपनी निजी राय अटलजी के समक्ष रखी उससे हम लोगों ने पहली बार जाना कि दोनों में व्यक्तिगत स्तर पर कितनी आत्मीयता है. उन शब्दों को यहां सार्वजनिक करना उचित नहीं होगा.

इन्द्र कुमार गुजराल वैचारिक दृष्टि से अटलजी से मतभेद रखते रहे हैं. लेकिन विदेशी मामलों में समय-समय पर वह अटलजी को अपने अनुभवों से अवगत कराते रहते थे. एनडीए के शासनकाल में राज्यसभा में नेता विपक्ष डॉ. मनमोहन सिंह राजनीति में आने से पूर्व से ही अटलजी के प्रशंसक रहे हैं.

जिस समय डॉ. मनमोहन सिंह जनेवा स्थित साउथ कमीशन के प्रमुख के पद पर कार्य कर रहे थे, उन्हीं दिनों अटलजी एक भारतीय प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व करते हुए वहां कुछ दिन रहे थे. संयोग से मैं उन दिनों पी.टी.आई. के लंदन स्थित संवाददाता के नाते वहां गया हुआ था. एक दिन डॉ. मनमोहन सिंह अटलजी के पास आए और कहा कि वह सदा ही उनके प्रशंसक रहे हैं. यदि आप किसी दिन मेरे घर पर भोजन के लिए पधारें तो मैं कृतज्ञ महसूस करूंगा. डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा उनके सम्मान में आयोजित रात्रि भोज में जनेवा स्थित अनेक देशों कें प्रतिनिधि शामिल हुए.

सोनिया गांधी भी अटलजी से बहुत प्रभावित रही हैं. 2001 में राष्ट्रपति चुनाव के सिलसिले में अटलजी ने औपचारिक रूप से प्रमुख विपक्षी दल के नेताओं से विचार-विमर्श के लिये सोनिया गांधी को आमन्त्रित किया. उनके साथ डॉ. मनमोहन सिंह, प्रणव मुखर्जी तथा अर्जुन सिंह भी थे. वातावरण तनावपूर्ण लग रहा था, बैठक शुरू हुई. कुछ मिनट मौन के बाद अटलजी ने पहल की. बोले हमने डॉ. अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति पद के लिये उम्मीदवार बनाने का निश्चय किया है. हम चाहते हैं कि उनके नाम पर सर्वानुमति बनाई जाए. आपका क्या विचार है. डॉ. कलाम का नाम आते ही वातावरण एकदम बदल गया. जो थोड़ा बहुत तनाव कांग्रेसी नेताओं के चेहरे पर दिखाई दे रहा था वह एकदम समाप्त हो गया. कुछ देर तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा. फिर सोनियाजी ने चुप्पी तोड़ी. उन्होंने अंग्रेजी में कहा – हम आपके निर्णय से स्तब्ध हैं.

वहां से लौटने के पश्चात कांग्रेस पार्टी ने डॉ. कलाम का समर्थन करने का निर्णय किया. डॉ. कलाम को राष्ट्रपति बनाने का अटलजी का ऐतिहासिक निर्णय भारतीय राजनीति में सर्वानुमति निर्माण करने की दिशा में एक अनूठा उदाहरण सिद्ध हुआ. अटलजी ने राष्ट्रपति चुनाव को दलगत राजनीति से ऊपर उठाकर अपने गठबंधन की मजबूती को भी बनाए रखा और भारतीय लोकतंत्र में धर्म निरपेक्षता की एक बेजोड़ मिसाल कायम की. शरद पवार, ए.के. एंटनी, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, वाइको, चन्द्रबाबू नायडू, जार्ज फर्नाडिस, शरद यादव, नीतीश कुमार आदि अनेक गैर भाजपा नेताओं के प्रति अटलजी का सदा विशेष स्नेह रहा है.

करूणानिधि से भी अटलजी के अच्छे संबंध रहे. मुरासोली मारन की मृत्यु के समय द्रमुक एन.डी.ए. का साथ छोड़ चुकी थी. अटलजी ने तय किया कि वह चेन्नई अवश्य जाएंगे. रात दस बजे के लगभग अटलजी चेन्नई पहुंचे. करूणानिधि उनका इन्तजार कर रहे थे. उनसे संवेदना व्यक्त कर अटलजी देर रात 2 बजे चेन्नई से लौटे.

यह अटलजी के व्यक्तिगत संबंधों का ही कमाल था उनके प्रधानमंत्री काल में कावेरी-जल विवाद कभी भी उग्र रूप धारण नहीं कर सका. नवीन पटनायक, ममता बनर्जी और वाइको तो एन.डी.ए. में अटलजी स्तम्भ के रूप में खड़े रहते थे. ममता दी और वाइको तो उनके लिये किसी से भी भिड़ जाते थे.

अटलजी की 13 महीने की सरकार जब लोकसभा में एक वोट से हार गई तो एन.डी.ए. में ऐसी कानाफूसी सुनाई दी कि तीसरे मोर्चे की सरकार की तर्ज पर देवेगौड़ा की जगह गुजराल को प्रधानमंत्री बनाए जाने का अनुसरण करते हुए अटलजी की जगह किसी और को नेता चुन कर फिर से सरकार बनाने का दावा पेश किया जाए. इस पर ममता दी, वाइको तथा नवीन पटनायक ने न केवल इस कानाफुसी का पुरजोर किया. बल्कि एन.डी.ए. से नाता तोड़ने की धमकी दे डाली. तीनों ने एक स्वर में कहा कि वाजपेयी नहीं तो एन.डी.ए. नहीं

 

जार्ज फर्नाडिस, शरद यादव तथा नीतीश कुमार एन.डी.ए. सरकार में अटलजी के शक्तिशाली सिपेहसालार थे जिन्हें वह समय-समय पर विभिन्न मुद्दों पर संसद में सरकार का पक्ष रखने के लिये आगे करते थे. एन.डी.ए. के कुछ घटक दलों के ऐसे नेता भी रहे हैं जो राजग छोड़ने से पहले बाकायदा अटलजी से मिलकर अपनी राजनैतिक मजबूरियों का बखान कर उनसे क्षमा मांग कर गठबंधन छोड़ने की अनुमति लेते थे. गणतंत्र दिवस के दिन 2001 में गुजरात के भयंकर भूकम्प के बाद अटलजी ने शरद पवार को कैबिनेट मन्त्री का दर्जा देकर उन्हें राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन समिति का उपाध्यक्ष नियुक्त किया था. इस प्रकार उन्होंने शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस को बिना एन.डी.ए. में शामिल हुए अपने साथ खड़ा किया था. भारतीय राजनीति के चतुर खिलाड़ी शरद पवार ने सदा अटलजी का सम्मान किया और उन्हें अपना अग्रज माना.

सोमनाथ चटर्जी की तरह शरद पवार भी कभी भी संसद भवन में प्रधानमंत्री कक्ष में अटलजी से मिल सकते थे. एक दिन शरद पवार अटलजी से मिलने आये और उन्हें अपने षष्टिपूर्ति कार्यक्रम के आयोजन में शामिल होने के लिये मुम्बई आने का आग्रह किया. शरद पवार ने 1999 के चुनाव के समय कांग्रेस से हटकर अपनी राष्ट्रवादी कांग्रेस बनाई थी. महाराष्ट्र की राजनीति में उनकी पार्टी भाजपा के लिये एक चुनौती के रूप में खड़ी हो गई थी. ऐसे में प्रधानमन्त्री शरद पवार के षष्टीपूर्ति कार्यक्रम में जाएं यह बात महाराष्ट्र भाजपा नेताओं को अच्छी नहीं लग सकती थी. इसलिए अटलजी चुप रहे. डायरी में केवल लिखने मात्र के निर्देश दिये. महाराष्ट्र भाजपा-शिवसेना यही मानती रही कि उनका कोई नेता उस कार्यक्रम में नहीं जा रहा है. दिसम्बर का महीना था. दिल्ली में ठंड पड़ रही थी. अटलजी को कार्यक्रम का दिन याद था. बोले तैयारी करो हम मुम्बई जाएंगे. प्रधानमंत्री का आदेश कौन टाल सकता था. अटलजी शाम आठ बजे के लगभग विशेष विमान से मुम्बई रवाना हुये. हवाई अड्डे से हाजी अली तक का सफर तय कर साढ़े दस बजे के लगभग जब प्रधानमंत्री का काफिला मुम्बई के रेसकोर्स में दाखिल हुआ तो वहां उपस्थित हजारों पवार समर्थकों में खुशी की लहर दौड़ गई. खड़े होकर करतल ध्वनि से उपस्थित जनसमूह ने उनका अभिवादन किया. शरद पवार के उल्लास का अन्दाजा लगाना मुश्किल था. अटलजी ने पवार की प्रशंसा में जो बोल कहे वह अपनी जगह थें. लेकिन जिस तरह उन्होंने व्यक्तिगत मित्रता को निभाया उसका कोई मोल नहीं हो सकता.

विपरीत विचारधारा एवं प्रतिपक्षी राजनीति के धुरंधर, व्यक्तिगत जीवन में आपसी संबंधों को क्या महत्व देते हैं. इसकी मिसाल आज देखने को कम मिलती है. काश भारतीय राजनीति इस स्वच्छ परम्परा को जीवित रख सकें. शायद यही अटलजी के जन्मदिन पर उनको सच्ची तथा अर्थपूर्ण शुभकामना होगी और हम सब को होगी हार्दिक बधाई.

लेखक का परिचय

समाचार एजेंसी पीटीआई के यूरोप ब्‍यूरो प्रभारी रहे वरिष्‍ठ पत्रकार अशोक टंडन, वाजपेयी जी के करीबी हैं. वाजपेयी जी जब प्रधानमंत्री थे तब श्री टंडन उनके मीडिया सलाहकार थे.

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