लेखक परिचय

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

Posted On by &filed under महत्वपूर्ण लेख, राजनीति.


-सुरेश हिन्दुस्थानी-

arvind kejrival rally- Farmer-suicide-l-reuters

दिल्ली के जंतर मंतर पर हुए आम आदमी पार्टी के एक आंदोलनात्मक कार्यक्रम में जिस प्रकार से कथित जनहितैषी अरविन्द केजरीवाल के समक्ष एक किसान ने पेड़ से लटककर अपनी जीवन लीला समाप्त की है, उससे आम आदमी पार्टी की राजनीति की जमकर छीछालेदर हो रही है। वैसे वर्तमान में राजनीति का जो स्तर दिखाई देता है, उसमें जनभावना कम और स्वार्थ ज्यादा दिखाई देता है। आम आदमी पार्टी को कम से कम दिखावे के लिए ही सही अपनी सभा को निरस्त कर ही देना चाहिए था। लेकिन आम आदमी पार्टी के नेताओं ने ऐसा न करके जिस असंवेदनशीलता का परिचय दिया है, वह भारत की राजनीति में काले पन्ने पर जरूर दर्ज किया जाएगा।

आम आदमी पार्टी के इस कार्यक्रम में जहां दिल्ली की पूरी सरकार थी तो वहीं देशभक्ति जनसेवा की दुहाई देने वाली पुलिस भी उपस्थित थी। राजस्थान के किसान द्वारा आत्महत्या किए जाने के इस मामले में किसको दोषी माना जाए, यह सवाल आज राजनीति की गहरी खाई में गोता लगाता हुआ दिखाई दे रहा है। आम आदमी पार्टी सहित सभी दलों को जैसे कुछ कहने का अवसर मिल गया हो। कांग्रेस, भाजपा सहित कई दल इस संवेदनशील मुद्दे पर सीधे तौर पर आम आदमी पार्टी की सरकार को कटघरे में खड़ा कर रही है, वहीं आम आदमी पार्टी के नेता इस मामले में भाजपा सरकार के कान खींचने पर उतारू दिखाई दे रही है। वैसे केजरीवाल की राजनीति का मुख्य केन्द्र भाजपा का विरोध ही रहा है। उन्हें आपनी पार्टी के अंदर किसी भी कमी में भी भाजपा का ही हाथ दिखाई देता है।

वर्तमान में आम आदमी पार्टी की राजनीति और उनके सरकार चलाने के तरीकों का अध्ययन किया जाए तो यह तो साबित हो रहा है कि केजरीवाल ने आम जनता को जिस प्रकार के सपने दिखाए थे, सरकार वैसा कुछ भी नहीं कर रही है। इतना ही नहीं अब तो आम आदमी पार्टी के नेताओं को भी यह स्पष्ट रूप से लगने लगा है कि हमने जनता से जो वादे किए हैं वे पूरे हो ही नहीं सकते। तभी तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने स्वये इस बात को स्वीकार किया है कि हमारी सरकार जनता से किए गए वादों को पूरा नहीं कर सकती। केजरीवाल की इस बात से यह साफ हो जाता है कि चुनाव के समय केजरीवाल ने आम जनता से झूठ बोला था, यानि राजनीति की शुरूआत ही झूंठ पर आधारित थी। इस प्रकार के राजनीतिक संत्रास से त्रस्त होकर ही दिल्ली की जनता ने केजरीवाल को छप्पर फाड़कर समर्थन दिया, लेकिन केजरीवाल द्वारा इस प्रकार की स्वीकारोक्ति करना क्या जनता के साथ विश्वासघात नहीं है।

जंतर मंतर पर किसान द्वारा आत्महत्या किए जाने को लेकर यह एक बार फिर से सिद्ध हो गया है कि केजरीवाल की सरकार को आम जनता के दर्द से कुछ भी वास्ता नहीं है, वे तो केवल सरकार बनाने भर की ही राजनीति कर रहे थे, अब सरकार बन गई तो केजरीवाल एंड कंपनी राजा बनकर राजनीति करने का खेल खेलने पर उतारू हो गई है।

भारत के सारे राजनीतिक दल मन से नहीं तो केवल दिखावे भर के लिए किसान आत्महत्या मामले को लेकर संवेदनशील हो जाते, लेकिन आम आदमी पार्टी के लिए इसके कोई मायने नहीं हैं। किसान द्वारा आत्महत्या किए जाने के बाद भी उन्होंने अपना कार्यक्रम जारी रखा और अपनी भड़ास निकालने का असंवेदनशील खेल खेला। इससे यह भी प्रमाणित हो गया कि आम आदमी पार्टी को किसानों के जीवन से कोई मतलब नहीं हैं, उन्हें ता बस अपनी राजनीति ही करना है। अब सवाल उठता है कि जीवन महत्वपूर्ण है या फिर राजनीति? जाहिर है केजरीवाल ने राजनीति को प्रथम स्थान दिया। केजरीवाल साहब पहले तो किसान की आत्महत्या मामले को भाजपा और पुलिस का नाटक बता रहे थे, लेकिन किसान की जीवनलीला समाप्त हो गई तब भाजपा और पुलिस की साजिश का हिस्सा बता दिया। यहां पर यह सवाल भी पैदा होता है कि अगर यह पुलिस द्वारा रचा गया नाटक होता तो यह प्रकरण केवल नाटक तक ही सीमित रहता, किसान इसमें अपनी जान नहीं देता, केवल जान देने का नाटक ही करता, लेकिन किसान ने अपना जीवन उत्सर्ग कर दिया। धन्य है केजरीवाल जी उन्हें तो अब भी इस खेल में नाटक ही दिखाई दे रहा है। जबकि सच तो यह है कि राजस्थान के गजेन्द्र नामक किसान केजरीवाल के कार्यक्रम में कुछ उम्मीदें लेकर गया था, कि शायद अब मेरी सुनवाई हो जाएगी, लेकिन किसान को लगा होगा कि केजरीवाल तो केवल भाषण के सहारे और एक दूसरे पर आरोप लगाने वाली राजनीति करके अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं, तब किसान को उम्मीद के सारे रास्ते बन्द दिखाई दिए होंगे और उसने इस भयानक रास्ते पर चलने का मानस बनाया होगा। हद तो उस समय हो गई जब केजरीवाल के मुंह से किसानों के पक्ष में एक बात भी नहीं निकली।

आम आदमी पार्टी के कार्यक्रम में किसान द्वारा आत्महत्या करने के मामले में यह कहा जाए तो ज्यादा तर्कसंगत ही होगा कि यह मामला हत्या का ही है, क्योंकि कार्यक्रम स्थल पर जब बचाने के सारे इंतजाम मौजूद थे, तब किसान को बचाने के उपक्रम क्यों नहीं किए गए। मुख्यमंत्री केजरीवाल अग्रिशमन दल के कर्मियों को बुलाने का आदेश भी दे सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं, यह जांच के बाद ही चल पाएगा, लेकिन इस सारे मामले में केजरीवाल की सरकार पूरी तरह से दोषी है। पूरी सरकार के ऊपर हत्या का प्रकरण दर्ज होना चाहिए।

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8 Comments on "संवेदनहीन होती आप की राजनीति"

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आर. सिंह
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कल जंतर मंतर पर जो कुछ हुआ ,उसका चस्मदीद गवाह तो नहीं हूँ,पर मैं यह अवश्य कह सकता हूँ, कि वह आदमी पुलिस की लापरवाही का शिकार हो गया. मैं वहां करीब १२.४५ तक था और मैंने उमड़ता हुआ जन सैलाब देखा था.मैंने यह भी देखा था कि वहाँ पुलिस भारी संख्या में उपस्थित थी.पुलिस के पास ऐसा इंतजाम अवश्य होगा ,जिससे वह हर जगह नजर रख रही होगी.क्या रैली में पेड़ पर चढ़ने की अनुमति थी?पुलिस ने फिर उसे पेड़ पर चढ़ने से क्यों नहीं रोका?वह दो घंटें तक पेड़ पर बैठा रहा,फिर भी पुलिस ने उसपर ध्यान क्यों… Read more »
suresh karmarkar
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सत्ता और सुख सुविधा के लिए ये कितने लालायित थे इसका उदाहरण देखिए. सभी (१ )सभी ६७ विधायकों को आवास औरवाहन की मंज़ूरी (२) १४/२/१५ को ६ ”आप”विषयक मंत्री बने. (३)१५/३/१५ २१ ”आप” विधायक संसदीय सचिव बने. मंत्री का दर्ज़ा होने से शासकीय वाहन और आवास मुफ्त,(४)१० ”आप” विधायकों को स्वस्थ विभाग का जिला प्रभारी होने से आवास और वाहन की पात्रता. (५) २८ विधायकों को रोगी कल्याण समिति का अध्यक्ष बनाये जाने से आवास और वाहन की सुविधा. इस प्रकार ६ +२१ + ३८ =६५ विधायकों को शासकीय वाहन और आवास, टेलीफोन ,ड्राइवर मुफ्त बचे दो विधायक। अगर इन्हे… Read more »
आर. सिंह
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सुरेश जी,आपने लांछन तो लगा दिया,पर कभी पता लगाने का प्रयत्न किया कि मंत्रियों के अतितिक्त अन्य विधायकों को अतिरिक्त जिम्मेदारी के साथ क्या अतिरिक्त सुविधाएं भी मिली या आपने योंही हवा में छलांग लगा दी?

शिवचरण जांगड़ा
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शिवचरण जांगड़ा
मैं सिंह साहब जी की बातों से पूर्ण सहमत हूँ। दिल्ली पुलिस का बद इंतज़ाम इस मौत के लिए पूर्ण रूप से ज़िम्मेदार है। ये घटना इस बात की तरफ साफ़ इशारा कर रही है कि दिल्ली पुलिस की नाक के नीचे इस प्रकार की रैलियों में किसी को भी मारा जा सकता है। ये मौत आत्महत्या नहीं है हत्या है, और दिल्ली पुलिस इसके लिए अगर खुद को दोषी नहीं मानती है तो इसका सीधा अर्थ ये है कि वो किसी के इशारे पर सिर्फ दिखावे के लिए वहां पर उपस्थित थी। इस घटना का दूसरा पहलु ये हैं… Read more »
शिवचरण जांगड़ा
Guest
शिवचरण जांगड़ा
मैं सिंह साहब जी की बातों से पूर्ण सहमत हूँ। दिल्ली पुलिस का बद इंतज़ाम इस मौत के लिए पूर्ण रूप से ज़िम्मेदार है। ये घटना इस बात की तरफ साफ़ इशारा कर रही है कि दिल्ली पुलिस की नाक के नीचे इस प्रकार की रैलियों में किसी को भी मारा जा सकता है। ये मौत आत्महत्या नहीं है हत्या है, और दिल्ली पुलिस इसके लिए अगर खुद को दोषी नहीं मानती है तो इसका सीधा अर्थ ये है कि वो किसी के इशारे पर सिर्फ दिखावे के लिए वहां पर उपस्थित थी। इस घटना का दूसरा पहलु ये हैं… Read more »
शिवचरण जांगड़ा
Guest
शिवचरण जांगड़ा
मैं सिंह साहब जी की बातों से पूर्ण सहमत हूँ। दिल्ली पुलिस का बद इंतज़ाम इस मौत के लिए पूर्ण रूप से ज़िम्मेदार है। ये घटना इस बात की तरफ साफ़ इशारा कर रही है कि दिल्ली पुलिस की नाक के नीचे इस प्रकार की रैलियों में किसी को भी मारा जा सकता है। ये मौत आत्महत्या नहीं है हत्या है, और दिल्ली पुलिस इसके लिए अगर खुद को दोषी नहीं मानती है तो इसका सीधा अर्थ ये है कि वो किसी के इशारे पर सिर्फ दिखावे के लिए वहां पर उपस्थित थी। इस घटना का दूसरा पहलु ये हैं… Read more »
शिवचरण जांगड़ा
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शिवचरण जांगड़ा
मैं सिंह साहब जी की बातों से पूर्ण सहमत हूँ। दिल्ली पुलिस का बद इंतज़ाम इस मौत के लिए पूर्ण रूप से ज़िम्मेदार है। ये घटना इस बात की तरफ साफ़ इशारा कर रही है कि दिल्ली पुलिस की नाक के नीचे इस प्रकार की रैलियों में किसी को भी मारा जा सकता है। ये मौत आत्महत्या नहीं है हत्या है, और दिल्ली पुलिस इसके लिए अगर खुद को दोषी नहीं मानती है तो इसका सीधा अर्थ ये है कि वो किसी के इशारे पर सिर्फ दिखावे के लिए वहां पर उपस्थित थी। इस घटना का दूसरा पहलु ये हैं… Read more »
शिवचरण जांगड़ा
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शिवचरण जांगड़ा
मैं सिंह साहब जी की बातों से पूर्ण सहमत हूँ। दिल्ली पुलिस का बद इंतज़ाम इस मौत के लिए पूर्ण रूप से ज़िम्मेदार है। ये घटना इस बात की तरफ साफ़ इशारा कर रही है कि दिल्ली पुलिस की नाक के नीचे इस प्रकार की रैलियों में किसी को भी मारा जा सकता है। ये मौत आत्महत्या नहीं है हत्या है, और दिल्ली पुलिस इसके लिए अगर खुद को दोषी नहीं मानती है तो इसका सीधा अर्थ ये है कि वो किसी के इशारे पर सिर्फ दिखावे के लिए वहां पर उपस्थित थी। इस घटना का दूसरा पहलु ये हैं… Read more »
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