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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-विशाल त्यागी-

agriculture

अन्नदाता : भारत देश में यह एक परिचित सा शब्द है, जो हर रोज किसी समाचार पत्र या पत्रिका के पन्नो को तेजी से पलटते हुए हमारे सामने आ ही जाता है| जहाँ तक शब्दार्थ से समझ आता है तो यह नाम देश की उस बड़ी आबादी को दिया गया है जो अपनी उपजाऊ जमीन में फसलों को उगाकर अन्न उत्पादन का कार्य करती है| जी हाँ, यह वही अन्नदाता है जिसे हम आमतौर पर “किसान” भी कहते हैं| जिनकी आत्महत्या या फसलें खराब होने की खबरे ही अक्सर हमारा ध्यान आकृषित कर पाती हैं|

दरअसल गौर करने वाली बात यह हैं कि अन्नदाता शब्द सम्मानसूचक हैं या अपमानसूचक| यह सुनने में आपको बड़ा ही अजीब लग रहा होगा लेकिन इस पर विचार करना अत्यंत आवश्यक हैं | नेशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार सन 2012 में भारत में आत्महत्या करने वाले किसानी की संख्या 13,754 थी| किसान आत्महत्या के सर्वाधिक आंकड़े सन 2004 में 18,241 थे| राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय” द्वारा प्रस्तुत किये गए आंकड़ों के अनुसार 1995 से 2011 के बीच 17 वर्ष में 7 लाख, 50 हजार, 860 किसानों ने आत्महत्या की है।सन 1991 से अब तक भारत में किसानी की संख्या में लहभग 1,50,00,000 की कमी आई हैं जबकि भारत में खेतिहर मजदूरो की संख्या में निरन्तर वृद्धि हुई हैं | “THE HINDU” समाचार पत्र के अनुसार भारत में प्रतिदिन किसानो की संख्या में  2000 की कमी आ रही है|

आखिर किसानो की इस घटती आबादी का क्या कारण है ? क्यों कोई पिता अपने बच्चे का भविष्य एक किसान के रूप में नहीं देखता ? क्यों कोई विद्यार्थी अपना भविष्य एक किसान के रूप में नहीं चुनना चाहता ? क्यों हर किसान अपने बच्चे को सिर्फ डॉक्टर,इंजीनियर या कलेक्टर ही बनते देखना चाहता है ? इस पर विचार करने की आवश्यकता है ? इंडियन रूरल अफेयर विशेषज्ञ पी. साईनाथ का कहना है कि किसान आत्महत्या के आंकड़े मानव इतिहास में सबसे बड़े आत्महत्या के आंकड़े हैं| सरकार की तमाम कोशिशों और वादों के बावजूद कर्ज के बोझ तले दबे किसानो की आत्महत्या का सिलसिला नही रुक रहा है| देश में हर महीने 70  से अधिक किसान हर महीने आत्महत्या कर रहे है| इन आंकड़ों कि माने तो व्याहारिक तौर पर तो “अन्नदाता” शब्द सम्मानसूचक सा प्रतीत नही होता|

कहने के लिए तो हम नारा लगाते है “जय जवान – जय किसान ” जिसमे सेना के सैनिक और देश के किसान को बराबर का सम्मान दिया गया है| लेकिन प्रतीत होता है यह बराबरी का किस्सा सिर्फ परिश्रम तक ही सिमित है| पिछले कुछ दशकों में किसान और उसका सम्मान राजनैतिक कविताओं और भाषणो में ही सिमट कर रह गया है| किसान, उसका नाम, उसका सम्मान, उसकी जमीन, उसका भविष्य, उसका परिश्रम, उसका विकास यहाँ तक कि उसका जीवन और मृत्यु भी राजनीती की भेट चढ़ चुका है| किसान जो वर्ष भर अपने बच्चो के पालन -पोषण और उनकी पढाई के लिए अथक परिश्रम कर पसीना बहाता हैं, अनेक प्राकृतिक आपदाओं और संसाधनो के अभाव को सहन कर वह अपनी फसल को मंडियों और मिलों में बेचता हैं| लेकिन इन सब के बाद भी मिल मालिक और मंडी मालिक अपने फायदे के अनुसार उसका पैसा रोक कर रखते हैं| वही दूसरी ओर वह किसान अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए इंजिनीरिंग और मेडिकल कॉलेजों की फीस भरते – भरते निरन्तर कर्ज की दल – दल में फसते जाता है|

प्राकृतिक आपदाएं, संसाधनो की कमी, फसलों के सस्ते मूल्य, असमय भुगतान, कॉलेजों की मोटी फीस, बेटी का दहेज़ इन सबके बीच कब उसके चहरे पर झुर्रियां पद जाती हैं, समय दशकों में गुजर जाता हैं, उसे पता ही नही लगता| उसका व्यक्तिगत जीवन कब कर्ज और जिम्मेदारियों की भेट चढ़ जाता हैं ये तो शायद समय ही जनता हैं| खेती उसके लिए वरदान हैं या अभिशाप दशकों से वह बस इसी सोच में लगा हैं|

 

चलिए अब किसान के गाँव से वापस लौटते हैं अपनी राजधानी दिल्ली में, जहाँ हर वर्ष लाखों विद्यार्थी कुछ बनने का सपना लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इसलमिया. जवाहरलाल नेहरू, आई. आई. टी. आदि संस्थानों में दाखिला लेने आते हैं|कॉलेज के पहले दिन ही टीचर्स और सीनियर्स नये विद्यार्थियों से परिचय करते हैं| जिसमे हर विद्यार्थी सामान्य रूप से अपना नाम, पिता का नाम, व्यवसाय, अपने राज्य का नाम, इंटरमीडिएट का अंक प्रतिशत बताता हैं| जैसा की आप लोग जानते दिल्ली राजधानी के साथ – साथ बड़े नाम वाले अत्यधिक शिक्षित लोगो का भी शहर हैं तो अंग्रेजी भाषा का चलन सामान्य हैं| अधिकतम विद्यार्थी उत्तरप्रदेश,हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार जैसे खेतिहर राज्यों से होने के बाद भी कोई बिरला ही होता हैं जिसके मुँह से सुनने को मिलता हैं “माई फादर इज अ फार्मर”| दरअसल यहाँ मामला इम्प्रैशन और स्टैण्डर्ड का दिखाई देता हैं| कारण और भी हो सकते हैं जैसे कोई हँस न दे,गाँव का गँवार न समझ ले, कोई लड़की भाव दे न दे इत्यादि| समझने की बात यह की जिस व्यवसाय को अपने पिता के नाम से जोड़ने पर बच्चो के स्टेटस पर गलत प्रभाव पड़ता हो वह सम्मानसूचक कैसे हो सकता हैं| जीवन भर अथक परिश्रम करने, और समाज के लिए अन्न उत्त्पादन करने के बाद भी हमने उसे अशिक्षित, गवाँर मनुष्य के रूप में ही देखा हैं| समाज को तो छोड़िये अब तो उसके इंजीनियर बेटे को भी उसे अपने साथ रखने में शर्म का अहसास होने लगा हैं|

“गाँव का गवाँर” इस वाक्यांश की में थोड़ी व्याख्या करना चाहता हूँ | दरअसल गांव से होने के कारण इस श्लोक से काफी बार मेरा परिचय होता रहा हैं| लेकिन जहाँ तक मुझे ज्ञात हैं हमारे देश की 65 % से अधिक जनसँख्या गाँव में रहती हैं और हमारे देश के लोकतंत्र में बहुमत की सरकार भी मात्र 35 -40 % वोटबैंक से ही बन जाती हैं| तब न जाने लोकतंत्र में 70 % लोगों के गंवार होने के बावजूद भी ये समज सभ्य और बुद्धिजीवी लोगो से कैसे भरा पड़ा हैं|

अब ये सब सम्मान हैं या अपमान इसका फैंसला तो मैं आप पर छोड़ता हूँ मुझे तो बस चिंता हैं कि अगर किसान ऐसे ही कम होते रहे ता भगवान पशुराम और प्रभु बलराम इस जन्मभूमि पर फिर से हल जोतने का साहस कौन करेगा? इस पर विचार करने की आवश्यकता हैं अन्यथा हमारी आने वाली पीढ़ियां मक्के की रोटी और चने का साग सिर्फ म्यूजियम में ही देख पाएंगी |

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