लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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जंगली भेड़ियों द्वारा उठाये गये तथा सिकन्दरा आगरा के अनाथालय में पाले गये बच्चे

 

आदमी अपने परिवेश के अनुसार ही अपना विकास करता है। यदि कोई बच्चा जन्म के तुरन्त बाद से या जब वह संभलने लायक हो जाय तबसे जानवरों के बीच रहने लगे तो वह उसी की तरह आदतें व व्यवहार करने लगता है। इसे पुनः ट्रैक पर लाने के लिए प्यार व सामाजिक व्यवहार से जीने लायक तो बनाया जा सकता है, किन्तु इसका सामान्य विकास घरों व समाज में पलने वाले बच्चों की तरह नहीं बन सकता है। बालपन में रहने  व मानव व्यवहार ना पाने के कारण उसका स्वाभाविक विकास अवरूद्ध हो जाता है और वह अपने हमउम्र के अन्य बालकों से विल्कुल अलग ही दिखता है। जंगल में वह जानवरों के संग में विल्कुल अलग ही व्यवहार एवं आचरण वाला बन जाता है। उसका जानवरों जैसा ही विकास होने लगता है। वह उसी तरह का आचरण करने लगता है। वह आम बालक बालिकाओं जैसा ना होकर ताउम्र आसामान्य ही रहता है।

मानव विज्ञानी एवं समाजशास्त्री इन आसामान्य बच्चों का पालन  उनकी जरूरत के अनुरूप अलग तरह से करते हैं। इन्हें पूर्णरूपेण विल्कुल अलग भी नहीं रखा जाना चाहिए । इन्हें आम मानव में घुलने व मिलजुल कर रहने के लिए खास निरीक्षकों व सहायको की मदद से तैयार किया जाता है। मानव जहां बुद्धिजीवी होने के कारण अपना भरण पोषण करने में सक्षम होता है। वहीं वह अन्य पशुपक्षियों की भी भली भांति रक्षा कर सकता है। इतना ही नहीं ऐसे भी उदाहरण मिले हैं कि मानव इन प्राकृतिक पशुपक्षियों के बीच रह भी लेता हैं औेर सुरक्षित भी रहता है। प्राचीन समय में जंगलों में जानवर व आदमी एक ही जगह पर बिना किसी वैर भाव के रहते देखे व सुने गये हैं।

जब कोई बालक जन्म लेता है तो सर्वप्रथम अपनी मां के दूध के सहारे जीता है और उसके ही सानिध्य में पलता हैं। इसके बाद वह अपने परिवार तथा बाद में अपने वातावरण के अनुकूल स्वयं को ढालता हैं और तदनुरूप उसका पालन पोषण होता है। उसे एक अनुकूल सामाजिक वातावरण में सुरक्षित रहने व अपना प्रारम्भिक विकास करने का अवसर प्राप्त होता है। यदि माता पिता में किसी का अभाव होता हैं तो उसका सर्वांगीण विकास न होकर आधा अधूरा विकास होता है। परित्यक्त वच्चे प्रतिकूल परिस्थितियों में आसामान्य आचरण करने लगते है।ं यदि इन्हें उचित वातावरण नहीं मिला तो वे जानवरों जैसे तथा जड़वत हो जाते हैं। यह भी देखा गया है कि किसी समय में मानव भी जानवरों  जैसा ही आचरण करता था और भेजन आहार भी उसी तरह करता था, परन्तु चूंकि उसमें संवेदनाये, सोचने की क्षमता और अनुभव आदि अपेक्षाकृत ज्यादा था। इस कारण वह सबका नियन्ता बन सबका संचालन भी करने लगा है।

समय समय पर एसी घटनाये प्रकाश में आती हैं जो सामान्य जीवन प्रक्रिया से अलग देखी गयी है। समाचार प़त्रांें में इस प्रकार के घटनायें प्रकट हुई हंै।  कुछ बच्चों का पालन उपके मां बाप व समाज से न होकर किसी लापरवाही या संयोग से जंगली जानवरों द्वारा होती देखी गई हैं। रूडियार्ड किपलिंक की जंगल बुक में मोगली की कहानी भी इसी प्रकार की हैं। उस बालक का जंगल के जानवरों ने पालन किया था। इस श्रृंखला में दस आसामान्य बच्चों  का परिचय प्रस्तुत किया जाएगा। इन सबको  बचपन में कोई जानवर उठा ले गया था। बाद में ये पुनः मानवों के बीच आये और उन लोगों का एक अलग ही अन्दाज में पालन किया गया।

1.            दीना शनीचर मानव बालक था जिसे  भेड़िया उठा ले गया था। उसे बुलन्दशहर के जंगलों से 1867 में पकड़कर आगरा लाकर ंपाला गया था।

2.            कमला और अमला भेड़ियों द्वारा उठाई गयी लड़कियां थीं जो 1920 मिदिनापुर में मिली थीं ।

3.            डैनियल एंडीज बकरियों के साथ रहने वाली लड़की पेरू में 1990 में मिली थी ।

4.            सीरियाई चिंकारा लड़का 1946 सीरिया के जंगलों में चिंकारा (कलपुंछ) द्वारा उठा लिया गया लड़का था ।

5.            बेलोे नाइजीरियाई चिम्प द्वारा पाला गया लड़का 1996 में मिला था ।

6.            जान  सिसबुनिया यूगांडा बन्दर द्वारा पाला गया लड़का 1991 में मिला था ।

7.            ट्रायन कलन्दर रोमानियाई कुत्तों द्वारा पाला जा रहा लड़का .2002 में मिला था ।

8.            रोचम पेंगिंग कम्बोडियन जंगलों में पल रही लड़की 2007 में मिली थी ।

9.            चहकने वाला रूसी चिड़ियों द्वारा पाला जा रहा एक लड़का 2008 में मिला था ।

10.          टोकसाना मलाया में यूक्रेनी कुत्ते द्वारा पाली जा रही लड़की थी ।

दीना शनीचर भेड़िया बालक की कहानी

उत्तर प्रदेश के आगरा जनपद कें सिकन्दरा में मरियम के मकबरे के अन्दर अंग्रेजो द्वारा एक अनाथालय बनवाया गया था । यहां तीन एसे बालकों को रखा गया था जिनका संसार में कोई नहीं था, अपितु वे किसी अप्राकृतिक घटना का शिकार होकर जंगली जानवर भेड़ियों के झुण्ड में पहुच गये थे। ना जाने क्या हुआ ? कि ये हिसक जानवर मानव के इन बच्चों को मारकर खाने के बजाय इ्रन्हे पालने लगे थे। इनके लिए खाने का प्रवन्ध करने लगे थे। इन्हें अपनी मांद में अपने बच्चों के साथ रखने लगे थे। वहीं उनका प्रारम्भिक भरण पोषण भी हो रहा था। जब इन पर किसी मानव की नजर पड़ी तो उन्हें वापस मानवों के बीच लाया गया और फिर बड़ी मुश्किल से इनका लालन पालन हुआ। एसे आसामान्य बच्चे कुछ समय तक मानवों में बीच में रहकर जी भी लेते हैं, परन्तु ज्यादातर इस वातावरण को अपने अनुकूल नहीं ढ़ाल पाने के कारण असमय में काल कवलित भी हो जाते हैं।

आगरा में पले इन तीन बच्चों का नाम मरियम के मकबरे में संचालित मिशन अनाथालय के रजिस्टर में दर्ज है। दो बच्चे इस नये माहौल में स्वयं का ढ़ाल ना सके और जल्द ही मृत्यु को प्राप्त हो गये थे। इनमें एक बालक लगभग 30 साल जीया था इसका नाम दीना शनीचर था। यह मिशन अनाथालय 1837 से इस एतिहासिक भवन में संचालित होे रहा था। 1840 में अकाल तथा महाभरी फैलने के कारण सौकड़ो बच्चे अनाथ हो गये थे। इनके विस्थापन के लिए इसाई मिशनरी सोसायटी ने यह आश्रम खोल रखा था।

4 फरवरी 1867 में कंजड़ शिकारियों का एक दल बुलन्दशहर के जंगलों में शिकार के लिए गया हुआ था। इस टीम के सदस्य औरतो से छिपकर घर से बाहर धूम्रपान के लिए गये हुए थे। वहां उन्होने देखा कि मिट्टी के टीले के पास एक भेड़िया भटक रहा था। वह मिट्टी के अपने मांद की तरफ बढ़ता जा रहा था। टीले के ऊपर एक पत्थर का सपाट टुकड़ा पड़ा था। जिसके नीचे भेड़िये के मांद का मुख ढ़का हुआ था। एक छोटा विचित्र जानवर जैसी आकृति पत्थर के ऊपर धूप में सो रहा था। शिकारियों का दल उसे देख कर आवाक रह गया , क्योंकि यह जानवर ना होकर मानव का एक बालक था। यह चट्टान से छलांग लगाता था। उस भेड़िये द्वारा पाला जाने वाला बालक ज्यों ही शिकारियों के दल को देखा अपने दोनों हाथ और पैरों की सहायता से भागता हुआ आगे जा रहे भेड़िये के साथ मांद में घुसकर छिप गया। शिकार दल उस दिन उसे देखकर वापस लौट आया । अगले दिन मजिस्ट्रेट की अनुमति लेकर यह दल फिर उसी गुफा की ओर गया। उसने मानव बच्चे को मुक्त कराने के उद्देश्य से उस भेड़िये को गोली से मार दिया। उसके दो बच्चे भी इस अभियान में मारे गये। उसके मांद में आग लगा दी गई थी। बड़ी जद्दो जहद के बाद उस मानव बच्चे को उसके हम वतन भेड़ि़यों के चंगुल से मुक्त कराया जा सका। उस बालक की उस समय उम्र 6 साल की थी। उसका नाम दीना रखा गया । वह  शनिवार को मिशन अनाथालय में प्रवेश किया था इसलिए शनीचर उप नाम भी उसके लिए प्रयुक्त किया जाता रहा।

इस असामान्य बालक को इस जंगली वातावरण से मुक्त कराकर मिशन अनाथालय में रखा गया। जब शिकारी कंजरो ने मांद से इसे निकाल कर मिशन के अनाथालय में लाया तो वह विल्कुल जानवर जैसे था। वह जंजीरों में चारपाई से बांधकर रखा गया था। वह आस पास खड़े लोगों पर आक्रमण कर देता था। उसके नाखून और बाल बहुत वड़े थै। धीरे धीरे उसे आदमी जैसा व्यवहार सिखाया गया। वह पहले अपना कपड़ा फाड़ देता था, परन्तु बाद में उसने कपड़ा पहनना सीख लिया था।  कपड़े फाड़ने के बाद भाी वह खुश नहीं होता था। वह अन्य बालकों से कुछ सीखने के लिए चर्च में जाने लगा था। जब भजन या गाने का समय होता तो वह अन्य बालकों की तरह खड़ा होकर उसे सुनता था। पहले तो वह कच्चा मांस खाता था परन्तु बाद में सिखाने पर वह पका हुआ खाना शुरू कर दिया था। जब वह बहुत भूखा होता तो जस्ते का प्लेट पटक पटक कर भूख लगने का संकेत देता था। पहले वह जानवर जैसे जीभ से पानी पीता था। बादमें कप से पानी पीना सीख गया था। वह अपना खाने का प्लेट और पीने का गिलास बहुत सफाई से साफ करता था। उसने दो एक शव्दो से ज्यादा कुछ बोलना कभी भी नही सीख पाया था। आवाज में वह ’वा वा’ की आवाज निकाल पाता था। वह ’धम्म धम्म’ भी कह लेता था।  बाद में यह आदत भी उसने छोड़ दिया था। उसके पास के बालक भी उसकी आवाज जब दुहराते और उसे छोड ़देते थे। वह तम्बाकू खाने व सिगरेट पीने का आदी बन गया था। वह हड्डियों से अपना दांत कट कटाता था। मिशनरी ने उसके पुनर्वास के लिए हर संभव प्रयास किया था। उसने वहां कई साल व्यतीत किया था।  मिशन में आने वाले हिन्दू अधिकारियों से अनुमति लेकर उसके पास आते तथा उसे सलाम करते थे। इसे देखने वालों का तांता लगा रहता था। इसके लिए मिशन ने टिकट भी लगा रख था। जो पैसा आता था उससे आश्रम के लिए ही खर्च किया जाता था। दीना का सर छोटा था। मस्तक नीचा एवं पतल , आंखे बड़ी भूरी तथा बेचैन सी दिखाई देती थी। वह निरन्तर टेढ़ा सा चलता था। वह चलते वक्त अपना पैर ऊपर इस प्रकार फेंककर चलता था कि मानो गीले घास पर चल रहा हो। वह अपना शरीर झटक झटक कर एक श्रृंखला की तरह मुडता हुआ चलता था। उसके हाथ 19 इंच बड़े थे। उसका परीक्षण करने वाले डाक्टरों का मानना है कि उसका विकास उसके हाथ व पैर से चलने के आदत के अनुसार ही हुआ है। वह लगभग तीस साल तक इस अनाथालय का कौतूहल बना रहा। उसका आचरण सामान्यतः पागल जैसा ही रहा। 35 साल की अवरूथा में 29 अक्तूबर 1895 ई. में उसकी मृत्यु हो गयी थी।

दूसरे बालक की कहानी:-एक और बालक जिसे भी भेडिया उठा ले गया था । यह आश्रम में 5 मार्च 1872 ई. को लाया गया था। इसे किसी हिन्दू ने लाया था। वह उत्तर प्रदेश के मैनपुरी के जंगल में आखेट करने गया था। यह युवा तथा कमजोर बालक था। उसे निकालने के लिए मांद में आग लगाया गया था जिसमें यह काफी जल गया था। इसका नाम ज्ञात नहीं है। जिस समय यह आश्रम में लाया गया था उस उस समय इसके बदन पर अनेक जख्म थे। यह हर तरीके से जानवर ही दिखता था। यह कुत्ते की तरह जीभ से पानी पीता था। यह हड्डी तथा कच्चा मांस ही खाना पसन्द करता था। इसे अकेला ही अंधेरे कोने में बांधकर रखा जाता था। इसे अन्य बालकों से दूर ही रखा जाता था। इसने कभी कपड़ा नहीं पहना । यह कपड़े को फाडकर तार तार कर देता था। यह मात्र चार माह ही इस आश्रम में रहा था। इसे बुखार आने पर खाने के लिए दवा दिया गया जिससे वह ठीक नही हुआ और मृत्यु को प्राप्त हुआ। तीसरे बच्चे की कहानी की जानकारी उपलब्ध नही हो सकी है। जानवरों के द्वारा उठाये तथा पाले गये अन्य बालक व वालिकाओं की कहानी अगली कड़ी में दी जाएगी।

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