लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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अरुण तिवारी

 

क्या जलवायु परिवर्तन का मसला इतना सहज है कि कार्बन उत्सर्जन कम करने मात्र से काम चल जायेगा या पृथ्वी पर जीवन बचाने के लिए करना कुछ और भी होगा ? इसके लिए हम दूसरे देशों के नजरिए और दायित्वपूर्ति की प्रतीक्षा करें या फिर हमें जो कुछ करना है, हम वह करना शुरु कर दें। जलवायु परिवर्तन के कारण और दुष्प्रभावों के निवारण में हमारी व्यक्तिगत, सामुदायिक, शासकीय अथवा प्रशासकीय भूमिका क्या हो सकती है ? सबसे महत्वपूर्ण यह कि जलवायु परिवर्तन, क्या सिर्फ पर्यावरण व भूगोल विज्ञान का विषय है या फिर कृषि वैज्ञानिकों, जीव विज्ञानियों, अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, चिकित्साशास्त्रियों, नेताओं और रोजगार की दौङ में लगे नौजवानों को भी इससे चिंतित होना चाहिए ? इन प्रश्नों के उत्तर में ही जलवायु परिवर्तन के प्रति भारत का पक्ष और पथ का चित्र निहित है। अतः उत्तर की तलाश जरूरी है। आइये, तलाशें:

 

कुदरत का कैलेण्डर से, विश्व मौसम संगठन के आकलन का कैलेण्डर छोटा है। इसलिए विश्व मौसम संगठन ने वर्ष 2015 को अब तक का सबसे गर्म वर्ष करार दिया है। मनुस्मृति का प्रलयखण्ड पढ़ा होता, तो शायद वह ऐसा न करता; फिर भी विश्व मौसम संगठन के रिकाॅर्ड का सबसे गर्म वर्ष तो 2015 ही है; 19वीं शताब्दी के औसत तापमान की तुलना में एक डिग्री सेल्सियस अधिक। गौर कीजिए कि पृथ्वी पर जीवन के लिए इस एक डिग्री की वृद्धि का बहुत मायने है। वायुमंडल की 90 प्रतिशत गर्मी सोखने का काम महासागर ही करते हैं। कार्बन अवशोषण में मानव की सीधी भूमिका भले ही 10 प्रतिशत दिखती हो, किंतु मूूंगा भित्तियों के नाश का कारण ढूढे़ंगे, तो यह भूमिका पूरे 100 फीसदी दिखेगी। खैर, इस एक डिग्री के बढ़ने से मौसम, खेती, ग्लेशियरों और महासागरों में उथल-पुथल मच गई है।

 

एक डिग्री वृद्धि के मायने

एक डिग्री वृद्धि का एक मायने यह है कि उत्तरी ध्रुव के आर्कटिक सागर में इस बार 1970 के बाद सबसे कम बर्फ जमी है। उत्तरी और दक्षिणी धु्रव से बाहर दुनिया का सबसे बङा बर्फ भंडार, तिब्बत में ही है। इसी नाते तिब्बत को ’दुनिया की छत’ कहा जाता है। इस नाते आप तिब्बत को दुनिया का तीसरा ध्रुव भी कह सकते हैं। यह तीसरा धु्रव, पिछले पांच दशक में 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि की नई चुनौती के सामने विचार की मुद्रा में है। नतीजे में इस तीसरे धु्रव ने अपना 80 प्रतिशत बर्फ भंडार खो दिया है। सृष्टि में मानव की उत्पत्ति सबसे पहले हिमालय की गोद में बसे वर्तमान तिब्बत में ही हुई। कह सकते हैं कि आज मानव उत्पत्ति का मूल क्षेत्र ही संकट में है। यह मात्र एक डिग्री वृद्धि का असर है।

 

ग्लेशियर

तिब्बती धर्मगुरू दलाईलामा चिंतित हैं कि 2050 तक तिब्बत के ग्लेशियर नहीं बचेंगे। नदियां सूखेंगी और बिजली-पानी का संकट बढे़गा। तिब्बत का क्या होगा ? वैज्ञानिकों की चिंता है कि ग्लेशियरों पिघलने की रफ्तार जितनी तेज होगी, हवा में उत्सर्जित कार्बन का भंडार उतनी ही तेज रफ्तार से बढ़ता जायेगा। हमें सोचना चाहिए कि यदि दुष्प्रभावित तिब्बत से निकलने वाली नदियों पर आश्रित उत्तर-पूर्व भारत का क्या होगा ?

हम इस चित्र की उपेक्षा नहीं कर सकते, चंूकि हिमालय का उत्तरी ही नहीं, दक्षिणी क्षेत्र भी दुष्प्रभाव की सीधी पकङ में आ चुका है। हिमालयी ग्लेशियरों का 2077 वर्ग किलोमीटर का रकबा, पिछले 50 वर्षों में 500 वर्ग किमी घट गया है। हिमालयी ग्लेशियरों के 30 मीटर प्रतिवर्ष की रफ्तार से घटने का अनुमान लगाया गया है। जिस-जिस हिमालयी इलाकों में ग्लेशियर पिघलने की रफतार तेज पाई गई है, वहां-वहां बर्फ के रेतीले कण भी पाये गये हैं। लाहुल-स्पीति, हिमाचल के ठंडे मरुस्थल हैं। कोई ताज्जुब नहीं कि कल को हिमालय में कई और ठंडे मरुस्थल बन जायें।

 

मौसम

वैज्ञानिकों की चिंता है कि ग्लेशियरों पिघलने की रफ्तार जितनी तेज होगी, हवा में उत्सर्जित कार्बन का भंडार उतनी ही तेज रफ्तार से बढ़ता जायेगा। अंततः इससे समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा। कई द्वीप जलमग्न होंगे। पृथ्वी के कोणीय झुकाव में बदलाव होगा। परिणामस्वरूप, मौसम कुछ इस तरह बदलेगा कि कब कहां सूखा पङेगा, कब कहां कोई बादल धङाम से बरस जायेगा; कहना मुश्किल हो जायेगा। अचानक अत्यंत गर्मी, अत्यंत सर्दी, दिन-रात के तापमान और लंबाई में अंतर बढ़ने के आसार अभी से नजर आने लगे हैं। तथ्य है कि सहारा के मरूस्थल में हरियाली लौटी है। आगे चलकर पूर्वी भारत में अनावृष्टि और पश्चिमी भारत में अतिवृष्टि की घटनायें बढ़ जायें, तो ताज्जुब की बात नहीं। गौर कीजिए कि वर्ष 2010 के वैश्विक जलवायु संकट सूचकांक में भारत पहले दस देशों में है। एक अध्ययन के मुताबिक, विकास के नये पैमानांे को अपनाने की भारतीय ललक यदि यही रही, तो वर्ष 2050 तक शीतकाल में तापमान 3 से 4 डिग्री तक बढ़ सकता है। मानसूनी वर्षा में 10 से 29 प्रतिशत कमी आ सकती है। हेमंत और बसंत गायब होंगे। दुखद है कि भविष्य में भारत, छह ऋतुओं के गौरव से वंचित हो जायेगा।

 

25 नवंबर, 2015 और अगले कुछ दिनों को आधार बनाकर दिल्ली के मौसम का एक अध्ययन हुआ। अध्ययन में पता चला कि दिल्ली का तापमान कभी उतर रहा है और कभी चढ़ रहा है। मौसम विभाग के मुताबिक न्यूनतम और अधिकतम..दोनो तापमान में सामान्य से एक-एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि पाई गई। पश्चिमी विक्षोभ के चलते पहाङों में बूंदाबांदी हो रही है, किंतु  25-26-27 नवंबर की तारीखों में दिल्ली का औसतन तापमान बढ़ रहा है यानी मौसम अपने रुख में अस्थिरता दिखा रहा है। नवंबर के महीने में इस तरह की मौसमी अस्थिरता एक तरह का अपवाद है। यह अपवाद, आगे अपवाद न होकर, नियमित क्रम हो सकता है। यह अस्थिरता आगे और बढ़ सकती है।

मौसम में ऐसे बदलाव बाढ, चक्रवात, सूखा लायेंगे तथा प्रदूषण को और बढ़ायेंगे। जहां जोरदार बारिश होगी, वहीं कुछ समय बाद सूखे का चित्र हम देखेंगे। 100 वर्ष में आने वाली बाढ़, दस वर्ष में आयेगी। हो सकता है कि औसत वही रहे, किंतु वर्षा का दिवसीय वितरण बदल जायेगा। नदियों के रुख बदलेंगे। कई सूखेंगी, तो कई उफन जायेंगी। गंगा-बह्मपुत्र के निचले किनारे पर शहर बनाने की जिद्द की, तो वे डुबेंगे ही। बांध नियंत्रण के लिए नदी तटबंध तोडने पडेंगे। निचले स्थान पर बने मकान डुबेंगे। लोगांे को ऊंचे स्थानों पर जाना होगा। पानी के कारण संकट, निश्चित तौर पर बढे़गा, साथ ही पानी का बाजार भी।

 

समुद्र

2015 के पहले छह महीने का महासागरीय तापमान, 1993 से लेकर अब तक के किसी भी वर्ष के पहले छह माह की तुलना में ज्यादा हो गया है। जलवायु परिवर्तन पर बनाई एक इंटर गवर्नमेंटल पैनल (आई पी सी सी ) के अनुसार, इस सदी में धरती का तापमान में 1.4 से लेकर 5.8 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि हो सकती है। इससे धु्रवों और ग्लेशियरों से बर्फ पिघलने की रफ्तार बढे़गी। अंदाजा लगाया गया है कि बर्फों के पिघलने के असर को न जोङा जाये, तो महज् इस तापमान वृद्धि के सीधे असर के कारण ही समुद्रों का तापमान 35 इंच तक बढ सकता है। तापमान यदि सचमुच यह आंकङा छूने में सफल रहा, तो समुद्री चक्रवातों की संख्या और बढेगी। हिंद महासागर से लेकर प्रशांत महासागर तक सुंदरबन, बांग्ला देश, मिस़्त्र और अमेरिका के फ्लोरिडा जैसे निचले प्रांत सबसे पहले इसका खामियाजा भुगतेंगे। बांग्ला देश का लगभग 15 फीसदी और हमारे शानदार सुंदरबन का तो लगभग पूरा क्षेत्रफल ही पानी में डूब जायेगा। पिछले दशक की तुलना में धरती के समुदों का तल भी 6 से 8 इंच बढ गया है। समुदों का तल 6 से 8 इंच बढने की खबर का असर, भारत के सुंदरबन से लेकर पश्चिमी घाटों तक नुमाया हो गया है। समुद हर बरस हमारे और करीब आता जा रहा है। इसका मतलब है कि समुद्र फैल रहा है।

 

इसका यह भी मतलब है कि उसका जलस्तर बढ रहा है; मंुबई, विशाखापतनम, कोचीन और सुंदरबन में क्रमशः 0.8, 0.9, 1.2 और 3.14 मिलीमीटर प्रतिवर्ष। इसका मतलब है कि भारतीय समुद्र के जलस्तर में प्रतिवर्ष औसतन 1.29 मिमी की बढ़ोत्तरी हो रही है। करीब 13 साल पहले प्रशांत महासागर के एक टापू किरीबाटी को हम समुद्र में खो चुके हैं। ताज्जुब नहीं कि वनुबाटू द्वीप के लोग द्वीप छोङने को विवश हुए। न्यू गिनी के लोगों को भी एक टापू से पलायन करना पङा। भारत के सुंदरबन इलाके में स्थित लोहाचारा टापू भी आखिरकार डूब ही गया। जिस अमेरिका में पहले वर्ष में 5-7 समुद्री चक्रवात का औसत था, उसकी संख्या 25 से 30 हो गई है। हालांकि भारतीय महासागर में समुद्र तल में बढोतरी को लेकर भारत के पृथ्वी विज्ञान विभाग मंत्रालय का मानना है कि इसका कारण जलवायु परिवर्तन या तापमान वृद्धि ही है; यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। अटकलें लगाई जा रही हैं कि यह नदियों में पानी बढने अथवा भूकंप के कारण समुद्री बेसिन में सिकुङन की वजह से भी हो सकता है। इसका कारण प्रत्येक साढे 18 वर्ष में आने वाला टाइड भी हो सकता है, किंतु समुद्रांे का सामने दिख रहा सच कुछ और नहीं हो सकता। क्या सुनामी, समुद्री चक्रवातों की आवृति और समुद्र के जलस्तर में वृद्धि के संकेतों को हम नजरअंदाज कर सकते हैं ? मुंबई और कोलकोता तो कतई नहीं।

 

जल-जीवन

गंगा जल का अमरत्व यानी अक्षुण्णता हम खो चुके हैंै। आंकङा बताने की जरूरत नहीं, हमारी कई नदियां, नाला बन चुकी हैं, कई बनने की ओर अग्रसर हैं। तालाब, सूखे कटोरे में तब्दील होने वाले तालाबों की संख्या लगातार बढ़ रही है। भूजल घटा है। भारत के 70 प्रतिशत भूजल भंडार संकटग्रस्त श्रेणी में हैं। बाढ. और सुखाङ अब भारत के नियमित साथी हैं। इंसान, अब इस घटोत्तरी और बढोत्तरी का नया शिकार है। किसान, कश्मीर, चेन्नई हो या उत्तराखण्ड; सभी को चिंतित होते हमने देखा ही है। चिंता का विषय है कि जलचक्र अपना अनुशासन और तारतम्य खो रहा है। लिहाजा, पानी के कारण अब उद्योग और चिकित्सा जगत भी चिंतित हों।

 

शोध बता रहे हैं कि हमारी सांसें घटी हैं और सेहत भी। हमें ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि दुनिया में 40 प्रतिशत मौत पानी, मिट्टी और हवा में बढ आये प्रदूषण की वजह से हो रही हैं। हमें होने वाली 80 प्रतिशत बीमारियों की मूल वजह पानी का प्रदूषण, कमी या अधिकता ही बताया गया है। पानी में क्रोमियम, फ्लोराइड, लैड, आयरन, नाईटेªट, आर्सेनिक जैसे रसायन तथा बढ आये ई-कोलाई के कारण कैंसर, आंत्रशोथ, फ्लोरिसिस, पीलिया, हैजा, टाइफाइड, दिमाग, सांस व तंत्रिका तंत्र में शिथिलता जैसी कई तरह की बीमारियां सामने आ रही हैं। एक अध्ययन ने पानी के प्रदूषण व पानी की कमी को पांच वर्ष तक की उम्र के बच्चों के लिए ’नंबर वन किलर’ करार दिया है। आंकङे बताते हैं कि पांच वर्ष से कम उम्र तक के बच्चों की 3.1 प्रतिशत मौत और 3.7 प्रतिशत विकलांगता का कारण प्रदूषित पानी ही है। भारत भी इसका शिकार है। आकलन है कि यदि तापमान एक से चार डिग्री सेल्सियस तक नीचे गया, तो दुनिया में खाद्य उत्पादन 24 से 30 प्रतिशत गिर जायेगा। मौसम की मार का असर, फसल उत्पादन के साथ-साथ पौष्टिकता पर भी असर पडेगा। भारत, पहले ही दुनिया से सबसे अधिक कुपोषितांे की संख्या वाला देश है; आगे क्या होगा ? स्पष्ट है कि पानी का संकट बढेगा, तो जीवन विकास पर संकट गहरायेगा ही। किंतु इसका उपाय, आर ओ, फिल्टर या बोतलबंद पानी या बाजार नहीं हो सकता।

 

जैव विविधता

यूनिवर्सिटी आॅफ फलोरिडा के प्रमुख शोधकर्ता डाॅ ग्लेन माॅरिस के अनुसार, तापमान बढ़ने से गैम्बीयर्डिक्स नामक विषैला  समुद्री शैवाल बढ़ रहा हैं । मछलियां, समुद्र में शैवाल खाकर ही जिंदा रहती हैं। शैवालों की बढ़ती संख्या के कारण, वे इन्हे खाने को मजबूर हैं। यह ज़हर इतना ख़तरनाक किस्म का है कि पकाने पर भी इनका ज़हर खत्म नहीं होता। इन मछलियों को खाने वाले लोग गंभीर रोग की चपेट में आये हैं। तापमान बढ़ने के कारण, समुद्र की पूरी खाद्य श्रृंखला ही संकट में है। कोई चिंता करे, न करे, भारत को करनी चाहिए।

 

हम भारतीयों के लिए यह अमल इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि जीवन विकास के इस मूल संकट का विस्तार यह है कि हमने पिछले 40 सालों में प्रकृति के एक-तिहाई दोस्त खो दिए हैं। एशियाई बाघों की संख्या में 70 फीसदी गिरावट आई है। मीठे पानी पर रहने वाले पशु व पक्षी भी 70 फीसदी तक घटे हैं। आंकङे कह रहे हैं कि गत् 40 वर्षों के छोटे से कैलेण्डर में प्रकृति के खो गये 52 फीसदी दोस्तों के रूप में खोया भारत ने भी है। जैव विविधता के मामले में दुनिया की सबसे समृद्ध गंगा घाटी का हाल किसी से छिपा नहीं है। भागलपुर की गंगा में डाॅलफिन रिजर्व बना है; फिर भी डाॅलफिन के अस्तित्व पर ही खतरे मंडराने की खबरें मंडरा रही हैं। क्यों ? उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में कई प्रजातियों की संख्या 60 फीसदी तक घट गई है। यह आंकङों की दुनिया है। हकीकत इससे भी बुरी हो सकती है। हम भूलें नहीं कि प्रकृति की कोई रचना निष्प्रयोजन नहीं है। हर रचना के नष्ट होने का मतलब है कि कुदरत की गाङी से एक पेच या पार्ट हटा देना। यही हाल रहा, तो एक दिन पृथ्वी का समूचा जीव चक्र ही इतना बिगङ जायेगा कि इंसान वहीं पहुंच जायेगा, जहां था। शायद उससे भी बदतर हालत में। पुनः मूषकः भव !!

 

भूगोल

समुद्री उठाव के कारण, भारत के पूर्व से लेकर पश्चिमी समुद्री घाट से सटे इलाकों में खारापन बढ़ने का एक बङा खतरा तो सामने है ही; खासकर, इसलिए भी चूंकि हमारी नदियां सूख रही हैं और हम नदियों के शेष मीठे पानी कोे समुद्र में जाने से रोक रहे हैं। इसका दुष्प्रभाव समुद्री तटों पर बसे इलाकांे मिट्टी, खेती और सेहत पर दिखाई देगा।

खैर, भारतीय भूगोल का दूसरा बदलता चित्र यह है कि पिछले कुछ सालों में भारत की 90 लाख, 45 हजार हेक्टेयर जमीन बंजर हो चुकी है। केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान ’काज़री’ का आंकङा है कि रेगिस्तान से उङे रेत कणों के कारण, भारत प्रतिवर्ष 50 वर्गमील खेती योग्य भूमि की उर्वरता खो रहा है। रेत कणों की यह आंधी हिमालय तक पहुंच रही है। ऐसा, आई आई टी, कानपुर की रिपोर्ट है। आई आई टी कानपुर के शोध मे पता चला है कि थार की रेतीली आंधियां, हिमालय से टकराकर कर उसे भी प्रभावित कर रही है। कोई ताज्जुब नहीं कि अगले कुछ दशक में लाहुल-स्पीति की तर्ज पर भारतीय हिमालय में कई नये ठंडे मरूस्थल जन्म आकार ले लें।

 

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ’इसरो’ के अनुसार, थार रेगिस्तान पिछले 50 सालों में औसतन आठ किलोमीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से बढ़ रहा है। अन्य इलाकों की तुलना में, रेगिस्तानी इलाकों के वायुमंडल में कार्बन की अधिक मात्रा की उपस्थिति बताती है कि खनन और अरावली से अन्याय के अलावा, यह वैश्विक तापमान वृद्धि का भी असर है। रेगिस्तान के इलाकों में अधिक वनस्पति की हरी चादर फैलाकर इसे ढक लें। खनन पर लगाम लगायें और अरावली से अन्याय करना बंद कर दें। राजस्थान से निकलकर, गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा और पंजाब में पैर फैला चुके थार रेगिस्तान में तो यह करना ही होगा। यह प्रक्रिया अभी और इलाकों में भी बढेगी। शोध निष्कर्ष यह भी है कि भारत के जिन 32 फीसदी भू-भागों की उर्वरा शक्ति लगातार क्षीण हो रही है, उनमें से 24 फीसदी इलाके, थार क्षेत्र के आसपास के हैं। इसमें तापमान वृ़िद्ध के अलावा, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और तेजी से नीचे गिरते भूजल स्तर का भी योगदान है। रासायनिक खेती भी हरित गैसों का उत्सर्जन बढ़ाती है। समझ सकते हैं कि रासायनिक उर्वरक, भूजल, रेत व बंजर का ग्लेशियर व वैश्विक तापमान में वृद्धि से क्या संबंध हैं। तापमान बढ़ने से मिटटी की नमी, कार्यक्षमता भी प्रभावित होगी। लवणता बढे़गी। जैव विविधता घटेगी। बाढ से मृदा क्षरण बढ़ेगा, सूखे से बंजरपन की भारतीय रफ्तार और बढ़ेगी।

 

खेती

जलवायु परिवर्तन का वनस्पति पर एक असर यह होगा कि फूल ऐसे समय खिलेंगे, जब नहीं खिलने चाहिए। फसलें तय समय से पहले या बाद में पकने से हम आश्चर्य में न पङें। गर्मी कीट प्रजनन क्षमता में सहायक होती है। अतः कीट व रोग बढ़ेगा। परिणामस्वरूप, कीटनाशकों का प्रयोग बढे़गा, जो अंत में हमारी बीमारी का कारण बनेगा। असिंचित खेती सीधे प्रभावी होगी। असिंचित इलाके सबसे पहले संकट में आयेंगे। असिंचित इलाकों में भी किसान सिंचाई की मांग करेगा। सिंचित इलाकों में तो सिंचाई की मांग बढेगी ही, चूंकि उपलब्धता घटेगी।

 

विशेषज्ञों के मुताबिक, इन सभी का असर यह होगा कि भारत में चावल उत्पादन के 2020 तक 6 से 7 प्रतिशत, गेहूं में 5 से 6 प्रतिशत आलू में तीन तथा सोयबीन मे 3 से 4 प्रतिशत कमी आयेगी। तापमान में 10 सेल्सियस की वृद्धि हुई तो गेहूं का उत्पादन 70 लाख टन गिर जायेगा। अंगूर जैसे विलासी फल गायब हो जायंेगे। दूसरी ओर, जनसंख्या बढ़ने से खाद्य सामग्री की मांग बढ़ेगी। भारतीय राष्ट्रीय आय में कृषि का हिस्सा पिछले तीन साल में डेढ फीसदी घटा है। वर्ष 2009 में सूखे की वजह से 29 हजार करोड का खाद्यान्न कम हुआ। खेती में गिरावट का असर सीधे 64 प्रतिशत कृषक आबादी पर तो पढेगा ही। खाद्य वस्तुएं मंहगी होने से गैर कृषक आबादी पर भी असर पङेगा और राजनीति पर भी। पिछले महीने, दाल के उत्पादन में कमी के कारण हो-हल्ला हुआ। खाद्यान्न में पांच फीसदी की कमी आयेगी, तो जीडीपी एक फीसदी नीचे उतर जायेगी। भारत में 2100 तक प्रति व्यक्ति सकल घरेलु उत्पाद में 23 प्रतिशत तक की कमी का अनुमान है। जब खाद्य सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं बचेगी, तो परिणाम क्या होगा ? खाद्य सुरक्षा घटेगी, तो गरीबी बढेगी; आत्महत्यायें बढेंगी; छीना-झपटी बढ़ेगी; अपराध बढेंगे; प्रवृतियां और विकृत होंगी। सबसे ज्यादा गरीब भुगतेगा; मछुआरे, कृषक और जंगल पर जीने वाले आदिवासी। भारत के हाथों से दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का बिल्ला छिन जायेगा।

 

प्रदूषण

25 नवंबर को कार्तिक पूर्णिमा के चलते काशी, कानपुर, गाजियाबाद आदि में देवदीपावली मनाई गई, कितु दिल्ली में ऐसा कुछ नहीं हुआ। दिल्ली में न कोई व्यापक आतिशबाजी हुई और न अतिरिक्त प्रदूषण का कोई नया स्त्रोत दिखा, बावजूद इसके दिल्ली के वायुमंडल में प्रदूषण सामान्य से काफी अधिक दिखाई दिया – पी एम 10 का स्तर 382.9 माइक्रोग्राम क्युबिक मीटर, पी एम 2.5 का स्तर 234.4 माइक्रोग्राम क्युबिक मीटर। 26 नवंबर को इसमें और वृद्धि हुई। विचारने का विषय यह है कि प्रदूषण का यह स्तर दीवाली के दिन हुई व्यापक आतिशबाजी के परिणामस्वरूप बढ़े प्रदूषण स्तर से भी अधिक है। दीवाली के अगले दिन 12 नवंबर को पी एम 10 का स्तर 376.5 माइक्रोग्राम क्युबिक मीटर तथा पी एम 2.5 का स्तर 229.5 माइक्रोग्राम क्युबिक मीटर पाया गया था। यह क्यों हुआ ? विज्ञान पर्यावरण केन्द्र ने तलाशा, तो हवा की रफ्तार काफी कम पाई और तापमान अस्थिर रहा। विशेषज्ञ मत है कि इन्ही दो वजह से कारण वाहनों से निकले उत्सर्जन को वायुमंडल में पूरी तरह घुलने का मौका। प्रदूषण नियंत्रकों के लिए यह विशेष चिंता का विषय होनी चाहिए। गर्म प्रदूषक गैसें, कचरे से पैदा होती हैं। कचरा चाहे, तरल हो या ठोस; पानी में हो या तैलीय ईंधन में अथवा कोयले में।  तपन, जलन, सङन और दाब: ये चार प्रक्रिया, गैस की उत्पत्ति का माध्यम बनती हैं। इसका मतलब है कि कचरा बढ़ने से भी उत्सर्जन बढ़ रहा है।

 

इससे यह भी स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हमारे छोङा गया प्रदूषण, हवा-पानी में और प्रभावी होकर दिखाई देगा। हम चिंतित हों।  क्यों ? क्योंकि दुनिया में 40 प्रतिशत मौत पानी, मिट्टी और हवा में बढ आये प्रदूषण की वजह से हो रही हैं। भारत में हर रोज करीब 1.60 लाख मीट्रिक टन कचरा पहले से ही होता है। इलेक्ट्रानिक कचरा, वायु प्रदूषण बढ़ाने वाला एक नया प्रदूषक बनकर इन मौतों को और बढ़ायेगा। कहते हैं कि बिना शोधन किए, ई कचरे और रासायनिक कचरे का निष्पादन नहीं करना चाहिए। ऐसा न करने पर, ऐसी जगहों पर अगले 15 साल तक गैसों के अलावा घुलनशाील नाईटेªट आदि प्रदूषणकारक तत्वों का उत्सर्जन होता रहता है। अंततः यह उत्सर्जन जा तो वायुमंडल में ही रहा है।

 

जैविक कचरे पर क्या असर होगा ? फ्रिज में रहने पर भोजन सामग्री, सामान्य से अधिक समय तक खराब नहीं होती। यह हम जानते हैं। अणु, परमाणु की तरह जीवाणु, विषाणु, कीटाणु. से हम परिचित हैं। गर्मी में इनकी प्रजनन दर बढ़ जाती है। यह भी हम जानते हैं। स्पष्ट है कि तापमान बढे़गा, तो जैविक कचरे में सङन की प्रक्रिया और तीव्र होगी। जैविक कचरा कम से कम समय में निष्पादित करने का कौशल अपनाना होगा; क्षमता बढ़ानी होगी। क्या उत्सर्जन रोकने का दावा पेश करने वाली सरकार इसे बारे में भी कुछ सोच रही है ? भारत सरकार का स्वच्छ भारत अभियान, क्या इस दिशा में भी कुछ हौसला दिखायेगा या शौचालय ही बनाता रह जायेगा ? अभी तक का परिदृश्य संतोषजनक नही है। हमने कचरा प्रबंधन के नाम पर कई नारे गढे; किंतु हम कचरा कम करने की बजाय, बढाने वाले साबित हो रहे हैं। कचरे के पुनर्चक्रीकरण यानी रिसाइक्लिंग की हमारी रफ्तार अत्यंत धीमी है। अभी हम कुल कचरे की मात्र एक प्रतिशत मात्रा को रिसाइकल कर पा रहे हैं।

 

स्पष्ट है कि हमारा कचरा और हमारे कृत्य मिलकर, भविष्य में हमारे पानी, मिट्टी, वायु और शरीर को विष से भर देंगे। जलवायु परिवर्तन, इसमें सहायक होगा। यह चित्र साफ है; फिर भी सोच नहीं रहे। खेती, पानीे, सेहत, जीव और जैवविविधता और रोजगार पर जलवायु परिवर्तन का असर आंकते उक्त चित्र कह रहे हैं कि अपनी आबोहवा के बारे में भारत चिंतित भी हो और समाधान के लिए संकल्पित भी। समाधान क्या हों और संकल्प कैसे सुनिश्चित हो ? आइये, सोचें।

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