लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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15 अक्तूबर – अंतर्राष्ट्रीय विवाद निपटारा दिवस
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सहअस्तित्व संस्कृति से सधेगा समाधान
या
..ताकि पानी और हम रहें निर्विवाद

कम को ही याद होगा कि 15 अक्तूबर – अंतर्राष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस है। इसे अंतर्राष्ट्रीय विवाद निपटारा दिवस के तौर पर भी मनाया जाता है। संदर्भ दोनो ही महत्वपूर्ण है। अच्छा हो कि जो ग्रामीण नारी शक्ति के महत्व को जानते हैं, वे उनका आभार प्रकट करने को कुछ कदम उठायें। जो नहीं जानते, वे जानें। यह देश और दुनिया के आपसी विवादों से उबरने का रास्ता खोजने का भी दिन है। मैं पानी का कलमकार हूं। ब्रह्मपुत्र पर चीनी पनबिजली परियोजना का ताजा संदर्भ, जल विवाद की भूमिका लेकर आया है। आइये, आज के दिन हम जल विवादों के निपटारे पर ही कुछ चर्चा करें।
हम जल विवादों को निपटारे पर चर्चा कर रहे हैं, तो हमे जरा सोचना चाहिए कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गंग और हरियाणा में यमुना नहरों से अधिकांश पानी निकाल लेने के कारण इनके निचले हिस्से वालों की सेहत पर कुप्रभाव पङता है कि सुप्रभाव ? उत्तराखण्ड के बांधों द्वारा पानी रोक लेने से उत्तर प्रदेश वाले खुश क्यों नहीं होते ? नदी जोङ परियोजना, ऐसी नाखुशी कोे घटायेगी कि बढ़ायेगी ? क्या भारत की गंगा-ब्रह्मपुत्र पर बांध-बैराज, बांग्ला देश के हित का काम है ? भारत, आज यही सवाल चीन से भी पूछ सकता है।

हित-अनहित की गांठ बनते नदी बांध

गौर कीजिए कि चीन, पहले ही भारत की 43,800 वर्ग किलोमीटर जमीन हथियाये बैठा है। अब वह पांच बङे बांध, 24 छोटे बांध और 11 झीलों के जरिए छह से ज्यादा नदी धाराओं पर अपना कब्जा मजबूत करने में लगा है। जागू, जियाचा और जिएंझू – ताजा मंजूरी प्राप्त चीनी बांध परियोजनायें ब्रह्मपुत्र नदी पर के इन तीन स्थानांे पर हैं। ये तीनों स्थान तिब्बत में स्थित हैं। ब्रह्मपुत्र के तिब्बत वाले हिस्से का नाम, यारलुंग जांगबो है। मंगलवार, दिनांक 13 अक्तूबर, 2015 को चीन ने यारलुंग जांगबो पर अपने सबसे बङे ’जम हाइड्रो पावर स्टेशन’ की सभी छह इकाइयों का पावर ग्रिड में प्रवेश कार्य सम्पन्न किया। करीब डेढ़ अरब डाॅलर के निवेश और 2.5 अरब किलोवाट सालाना बिजली उत्पादन लक्ष्य के साथ शुरु इस परियोजना को दुनिया की सबसे अधिक ऊंचाई पर बनी पनबिजली परियोजना चीन के लिए गौरव का विषय हो सकती है; किंतु भारत के लिए तो यह चिंता का विषय हो गई है। बताइये कि यह चिंता, विवाद बढ़ायेगी कि घटायेगी ?

स्पष्ट है कि यह परियोजना, ब्रह्मपुत्र के ऊपरी हिस्से से बङे पैमाने पर पानी का दोहन करेगी। चीन, पहले ही तिब्बत से भारत में आने वाली आक्सास, सिंधु, ब्रह्मपुत्र और इरावदी में रेडियोधर्मी कचरा बहाकर, इन्हे प्रदूषित करने में लगा है। रन आॅफ रिवर बांध होने से नदी के पानी की गुणवत्ता बेहतर नहीं होती; खराब ही होती है। ज्यादा बारिश के दिनों में चीनी बांधों द्वारा एकाएक पानी छोङ देने से उत्तर-पूर्व भारत और बांग्ला देश में अप्रत्याशित बाढ़ का खतरा हमेशा रहेगा ही। चीन की ऐसी कारगुजारियों का नतीजा लद्दाख की बाढ और किन्नौर की तबाही के रूप में भारत पहले ही झेल चुका है। उत्तराखण्ड आपदा के अनुभवों के बाद एक बात मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि चीन के मंजूरशुदा बांध भारत का आर्थिक खतरा भी बढायेंगे। कहने को चीनी विदेशी मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस बाबत् कहा कि पर्याप्त वैज्ञानिक अध्ययन के बाद ही इन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। उसने यह भी प्रतिक्रिया दी थी कि अंतर्देशीय नदियों के मामले में चीन जिम्मेदारी समझता है; जबकि हकीकत यह है कि चीन ने इन परियोजनाओं के बारे में भारत को जानकारी देना तक जरूरी न समझा, तो विवाद तो होगा ही। ब्रह्मपुत्र पर अंतर-मंत्रालयी समूह ने इन परियोजनाओं पर निगरानी रखने की सलाह दी है, किंतु क्या इससे भारत-चीन के बीच के जल-विवाद निपट जायेंगे ?? जाहिर है कि नहीं; एक-दूसरे के हित-अनहित समझने से ही बात बनेगी।

झगङे की वजह: जरूरत या प्रवृति ?

जरा जल विवादों के स्तर और कारणों पर गौर कीजिए। जहां पीने योग्य पानी की कमी है, वहां मिलने वाले पानी को लेकर मारामारी है। दिल्ली से महाराष्ट्र तक कितने ही किस्से हैं, जब पानी पिलाने आये टैंकर से पहले पानी पाने के चक्कर में झगङे हुए। गांवों में नहर में पानी आने पर पानी काट ले जाने वालों के बीच तू तू-मैं मैं होती ही रहती है। प्लाचीमाड़ा, वाराणसी और जयपुर में पेप्सी-कोक फेक्टरियों को लेकर विवाद क्यों हुआ ? क्योंकि उन्होने जिस मात्रा में भूजल-भंडार से पानी खींचा, उतनी मात्रा में वापस लौटाया नहीं। पंजाब-हरियाणा में जल विवाद क्यों हुआ ? दिल्ली और हरियाणा में कभी-कभार पानी को लेकर विवादित बोल क्यों सुनाई देते हैं ? कावेरी जल विवाद की नींव में क्या है ? दरअसल, नदी कोई भी हो, उसके यात्रा मार्ग में आने वाले इलाकों के बीच विवाद के कारण दो ही होते हैं – पहला: नदी के ऊपरी हिस्से द्वारा अधिक पानी खींच लेने के कारण, निचले हिस्से को मिलने वाले पानी में कमी होना। नदी जल बंटवारे को लेकर हुए समझौते की पालना न करना, इसी श्रेणी का विवाद है। दूसरा: नदी के ऊपरी हिस्से में किए प्रदूषण से निचले हिस्से में बसे लोगों को तकलीफ का होना।

क्यों अनसुलझे हैं नदी जल बंटवारा विवाद ?

आप प्रश्न कर सकते हैं कि जब कारण मालूम है, तो फिर अंतर्राष्ट्रीय छोङिए, हम आज तक अपने अंतर्राज्यीय जल विवादों का कोई स्थाई हल क्यों नहीं निकाल पाये; जबकि राज्यों में तो अपनी ही सरकारें हैं ?? उत्तर साफ है: दरअसल, समझौते में एक बार लिख दी गई मात्रा व हिस्सेदारी तो सहज बदलती नहीं, जबकि हमारी नदियों में पानी की मात्रा लगातार बदल रही है। ज्यादातर मामलों में यह कम ही हो रही है। हमारी आबादी, उपभोग और तद्नुसार खपत लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में समझौता झूठा न हो जायेे तो क्या हो ? केन-बेतवा नदी जोङ परियोजना को लेकर यदि केन नहर के लोग झगङें, तो फिर आश्चर्य क्यों ?

प्रवृति बदलें: अनुशासन बढ़ायें

बुनियादी वजह है है कि भूमि के नीचे हो या ऊपर.. हर स्तर पर उपयोगी पानी की कमी बढ़ रही है। सभी, सबसे पहले अपने लिए पानी चाहते हैं और पानी की अपनी खपत में कमी करना कोई नहीं चाहता। जल संचयन को समाज ने सरकार का काम समझ लिया है और कोई भी सरकार, इसे अकेले कभी कर नहीं सकती। विकल्प के तौर पर हम अतिदोहन को ले आये हैं।
इस प्रवृति के चलते पानी के विवादों का हल तभी हो सकता है, जब हमारे पास खपत के अनुपात में इतना अतिरिक्त उपयोगी पानी हो जाये कि अगली एक सदी तक इसके बारे में सोचना ही न पङे। बढ़ती गर्मी, बढ़ता प्रदूषण और बदलता मौसम कह रहा है कि यह हो नहीं सकता। हमें अपनी प्रवृति ही बदलनी होगी। खुद की सुरक्षा के लिए दूसरे के विनाश की प्रवृति चलेगी नहीं। कचरा प्रबंधन सुधारना होगा। उपभोग की अति छोङ, सदुपयोग के अनुशासन की सीमा में आना होगा। यह अनुशासन सिर्फ पानी नहीं, हर चीज के उपयोग में करना होगा; क्योंकि दुनिया की कोई भी चीज बिना पानी के न पैदा हो सकती है और न ही किसी फैक्टरी में बन सकती है।

सहजीवन-सहअस्तित्व से सधेगा समाधान

गौर कीजिए, मंाग और आपूर्ति का सिद्धांत, सिर्फ अर्थशास्त्र का ही सिद्धांत नहीं है; यह शांति, सद्भाव और पर्यावरण संतुलन का भी सिद्धांत है। जब-जब इस सिद्धांत की अवहेलना होगी, तब-तब शांति भंग होगी; विवाद बढे़ंगे। यह बात पानी के मामले में अब और भी ज्यादा सटीक होती जा रही है; कारण यह कि पानी अब जीवन का ही विषय नहीं है, अब यह बाजार की भी रुचि का विषय बन गया है। इस विवाद का एक ही हल है: मांग और आपूर्ति में संतुलन हो। यह तभी हो सकता है, जब प्रकृति से लेने-देने में संतुलन के सिद्धांत को हम व्यवहार में उतार लायें; जब हम यह मान लें कि पानी और हमें एक साथ रहना है और वह भी एक-दूसरे का अस्तित्व मिटाये बगैर। हमारा यही भाव अपने पङोसी परिवार, गांव, नगर, राज्य और देश के साथ भी रहना चाहिए।

कहना न होगा कि ’सहजीवन’ और ’सहअस्तित्व’ भारतीय संस्कृति का भी मूलाधार हैं और सद्भाव संरक्षण व प्रकृति संरक्षण का भी। इसे अपनायें, तभी थमेंगे जल विवाद, बचेगा सद्भाव और हम सभी का अस्तित्व। क्या हम अपनायेंगे ?

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