लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में डिजीटल विभाजन की खाई को पाटने का महास्वप्न देख रहे हैं। सिलिकाॅन वैली के डिजीटल व्यापारियों के निवेश के जरिए मोदी इस स्वप्न को साकार करने की पृष्ठभूमि आस्ट्रेलिया में तैयार भी कर आए हैं। भारत में सवा अरब नागरिकों को इंटरनेट-ब्राडबैंड के मार्फत डिजीटल रूप में जोड़ने का स्वप्न बहुत बड़ा जरूर है,लेकिन असंभव नहीं है। यह प्रक्रिया जनधन और आधार योजनाओं के जरिए गतिशील भी है। इसमें और तेजी लाने की दृष्टि से मोबाइल प्रशासन को प्रभावशील बनाया जाएगा। जिससे योजनाओं की सबको जानकारी मिले और विकास की गति समावेशी हो। किंतु इस परिप्रेक्ष्य में यह समझना भी जरूरी है कि डिजीटल इंडिया की कवायाद व्यक्ति तक डिजीटल उपकरण पहुंचा देना भर नहीं होना चाहिए,इन साधनों की सार्थकता तभी है जब ये साधन आम आदमी की सामाजिक,आर्थिक और शैक्षिक उपलब्धियों का हिस्सा बनें। दरअसल देश में सरकारी और निजी स्तर पर उपरोक्त विसंगतियों को दूर करने की अनेक योजनाएं चल रही हैं,लेकिन उत्तरोत्तर उनके परिणाम ढांक के तीन पांत ही रहे हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि दुनिया के साथ कदमताल मिलाने की हमारी कोशिशों में मोदी के प्रयासों से गति आई है। किंतु व्यवस्था की भ्रष्ट सोच, उद्यमियों को हतोत्साहित करने की मानसिकता और संसाधनों के अन्यायपूर्ण बंटवारे के चलते हम पिछड़ रहे हैं। इसके लिए व्यवस्था बनाम लालफीताशाही को जिम्मेबार ठहराया जाता है। इसी वजह से उद्योग जगत के महारथी भारत में पूंजी लगाने से कतराते हैं। इस व्यवस्था पर लगाम की तैयारी डिजीटल इंडिया बनाम मुट्ठी में बंद मोबाइल प्रशासन से मोदी कर रहे हैं। मोदी को उम्मीद है कि एक अरब सेलफोन और एक करोड़ चालीस लाख इंटरनेट उपभोक्ता वाले देश में मोबाइल गवर्नेंस को हकीकत में बदलने की क्षमता है। इसी दृष्टि से मोदी ने सूचना तकनीक क्षेत्र के कुछ प्रमुख सीईओज के बीच अपनी महत्वाकांक्षी डिजीटल योजना की चर्चा की और मदद मांगी।
भारत में कंप्युटर लाने की पहल राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में हुई थी। तब इसे संकोच और कई शंका-कुशंकाओं के बीच धीमी गति से आगे बढ़ाया गया। चूंकि कंप्युटर उत्पादकता से नहीं जुड़ा है,इसलिए डर था कि कहीं यह बेरोजगारी का बड़ा कारण न बन जाए। किंतु नवें दशक में सूचना क्रांति निरंतर जोर पकड़ती रही और भारत में इसका असर दिखाई देने लगा। नतीजतन षहरों से लेकर गांव तक कंप्युटर और मोबाइल पहुंच गए। सरकार की संरक्षणवादी नीतियों के चलते भी यह क्रांति फली-फूली। इसलिए आज ग्रामीण समाज में शौचालय से कहीं ज्यादा मोबाइल को अहमियत दी जा रही है।
हालांकि यह समझ से परे है कि अरबों रूपए खर्चने के बावजूद जब ई-प्रशासन,भ्रष्टाचार मुक्त और पारदर्शी शासन नहीं दे पाया तो मोबाइल प्रशासन कैसे दे पाएगा ? क्योंकि अततःमोबाइल गवर्नेंस ई-गवर्नेंस का ही नवीनतम संस्करण है। महज प्रक्रिया को संचालित करने वाले उपकरण का फर्क है। ई-प्रशासन कंप्युटर से संचालित होता है,जबकि मोबाइल-गवर्नेंस में उसी प्रक्रिया को मोबाइल से आगे बढ़ाया जाएगा। तब इस पहल से प्रशासनिक सुधार में बुनियादी बदलाव कैसे संभव है ? जबकि हमारे यहां केंद्र और राज्य सरकारों के सभी दफ्तर नेटवर्किंग से जुड़ चुके हैं। बावजूद ज्यादातर सरकारी कर्मचारी व अधिकारी कंप्यूटर साक्षर भी नहीं हैं। इस प्रणाली के खराब रहने का रोना भी कर्मचारी रोते रहते हैं। यहां तक की बैंकों का भी कारोबार कनेक्टविटी नहीं मिलने के कारण घंटों ठप्प रहता है।
मोदी के मेक इन इंडिया,स्किल इंडिया,स्मार्ट सिटी,स्मार्ट विलेज और बुलैट ट्रेन के स्पप्नों के क्रम में ही डिजीटल इंडिया का महत्वाकांक्षी स्पप्न शामिल है। वे डिजीटल इंडिया के विस्तार से सुदूर हिस्सों में बसे लोगों की जिंदगी में खुशहली और बदलाव देख रहे हैं। उन्हें भरोसा है कि तकनीक का अंतर्जाल फैला देने से प्रशासन की कार्यशैली में व्यापक बदलाव आएगा तथा जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित होंगे। साथ ही कागज की बजाय ई-तरंगो पर जो लिखा-पढ़ी होगी,वह कहीं ज्यादा गोपनीय रहेगी। इस गैर-कागजी लेन-देन के लिए हरेक नागरिक का डिजीटल लाॅकर स्थापित होगा, जिससे सूचनाएं गोपनीय रहें। यदि ऐसा तकनीक से संभव हो जाता है तो तय है, 24 घंटे का काम 24 मिनट में पूरा हो जाएगा,यह दावा मोदी ने किया है। इस हेतु ग्रामीण जनता को डिजीटल तकनीक के प्रयोग के लिए दक्ष बनाया जाएगा,जिससे गांव स्मार्ट इकोनाॅमिक हब बन जाएं और किसान को सीधे बाजार से कृषि उत्पादों के भावों की जानकारी मिलती रहे।
इस मकसद पूर्ती के लिए ही मोदी ने वैश्विक जगत के महारथियों से मदद मांगी। महारथियों ने मदद का भरोसा भी जताया। गूगल के सुदंर पिचई ने भारत के 500 रेलवे स्टशनों पर मुफ्त में वाई-फाई सेवा देने की घोशणा की। माइक्रोसाॅफ्ट के सत्या नडेला ने देश के पांच लाख गांवों में ब्राॅडबैंड प्रौद्योगिकी पहुंचाने का दम भरा। जल्दी ही माइक्रोसाफ्ट डेटा सेंटर्स से क्लाउड कंप्युटिंग सेवा भी हासिल कराएगी। क्वालकाॅम के अध्यक्ष पाॅल जेकब्स ने भारत में मोबाइल इंटरनेट और देश के सभी क्षेत्रों में स्टार्टअप के लिए 15 करोड़ डाॅलर के निवेश का भरोसा दिया। इसी साल अक्टूबर के अंत तक गुजराती समेत 10 भारतीय भाषाओं को गूगल पर टाइप करने की सुविधा मिल जाएगी। बावजूद हिंदी समेत भारतीय भाषाओं में कुंजी पटल की कमी खलती रहेगी।
यह सही है कि तकनीक से भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में बदलाव के बेहतर व व्यापक संकेत मिले हैं। रेलवे, बैंक और मीडिया में ये बदलाव अन्य क्षेत्रों से कहीं ज्यादा कारगर साबित हुए हैं। लेकिन भारत में प्रशासनिक सुधार और मौसम की भविष्यवाणी में सूचना तकनीक बेअसर रही है। न्यायप्रणाली में भी इसका प्रभाव गौण है। बेरोजगारी भी इससे दूर नहीं हुई,किंतु कंपनियों के मुनाफे में जरूर इजाफा हुआ है। जबकि भारत में ई-तकनीक को प्रभावशील हुए दो दशक का समय बीत चुका है। इसलिए तकनीक का विस्तार हो भी जाए तो यह जरूरी नहीं कि जिन क्षेत्रों में मोबाइल तकनीक का हस्तक्षेप लागू होने जा रहा है,उनका कायाकल्प हो ही जाएगा ? गोया,यह तो भविष्य के गर्भ में है कि तकनीक को अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति की मुट्ठी में पहुंचा देने के बावजूद आम आदमी को वास्तविक फायदा कितना होगा ? क्योंकि तमाम हेल्पलाइनों के जरिए ये कथित जन-सुविधाएं उपलब्ध तो आज भी हैं,लेकिन क्रियान्वयन की स्थिति में प्रशासन की देहरी पर पहुंचते ही ठिठक जाती हैं। कृषि और किसान भी इसी मार की चपेट में हैं। मौसम विभाग ने सामान्य वर्षा होने का दावा किया था, लेकिन कई क्षेत्रों में बारिष सामान्य से 80 प्रतिषत तक कम हुई। दरअसल, कंपनियों के सीइओज् राष्ट्राध्यक्षों की उपस्थिति में तो पूंजी निवेश की बड़ी इच्छाएं जता देती हैं,लेकिन जब कारोबार जमीन पर उतारने की बात आती है तो लाभ-हानि के गुणाभाग लगाने पर मुंह फेर लेती हैं। मोदी ने पिछले 16 महीने में करीब ढाई-दर्जन देशों की यात्राएं कीं, लेकिन अपेक्षित निवेश नहीं आया।
तकनीक के जरिए सुशासन की पहल एक अच्छी शुरूआत तो कही जा सकती है,लेकिन इसी दौरान संयुक्त राष्ट्र की महासभा में स्थायी विकास के जो 17 लक्ष्य तय किए गए हैं,उनमें से ज्यादातर में भारत की स्थिति दयनीय है। इनमें प्रमुख हैं,गरीबी और भूख सबके लिए स्वास्थ्य और शिक्षा,साफ पानी,प्रदूषण मुक्त शहर,समानता का अधिकार और स्वच्छ पर्यावरण। संयुक्त राष्ट्र की महासचिव बान की मून ने विशमता के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए उपाय भी सुझाए हैं। उनका दावा है कि आर्थिक संपन्नता को विकेंद्रित करके साझा नहीं किया गया तो लोगों के जीवन-स्तर में सुधार नही आएगा और न ही वैश्विक षांति कायम होगी। साथ ही धरती कल की पीढ़ियों के लिए बेहतर भी नहीं बनी रहेगी। दरअसल यही वे उपाय हैं,जिन्हें पूरा करने से ही भारत समेत पूरी दुनिया में असमानता दूर होने की उम्मीद की जा सकती है।
नरेंद्र मोदी तकनीकी कौशल को बढ़ावा देने की बात पुरजोरी से कर रहे हैं। इसी ‘स्किल इ्रडिया‘ से वे ‘मेक इंडिया‘का स्वप्न पूरा करने की हैरतअंगेज कवायद में लगे हैं। लेकिन इस बाबत हम श्रम विभाग की 2014 में जारी हुई रिपोर्ट का अध्ययन करें तो जमीनी हकीकत कुछ और नजर आती है। रिपोर्ट के अनुसार चंद ऊंची नौकरियों को नजरअंदाज कर दें तो भारत की कंपनियां छोटी नौकरियां युवाओं को देने से पहले उसकी कौशल दक्षता की बजाय अनुभव को महत्व देती हैं। इसलिए तकनीकी डिप्लोमाधारियों को आसानी से नौकरी नहीं मिलती है। नतीजतन औद्योगिक प्रषिक्षण संस्थानों या अन्य कौशल केंद्रो से डिप्लोमाधारियों में बेरोजगारी की दर 14.5 प्रतिषत है। सिविल और कंप्युटर इंजीनियरों को छोड़ दें तो बाकी अन्य क्षेत्रों के हुनरमंदों में 25 फीसदी से भी ज्यादा लोग बेरोजगार हैं। भारत में वस्त्र उद्योग में ज्यादा रोजगार हैं। लेकिन विडंबना है कि टेक्सटाइल स्किल में दक्ष 17 फीसदी युवा बेरोजगार हैं। रिपोर्ट के मुताबिक हर साल 1.20 करोड़ कुषल युवा रोजगार के लिए तैयार हो रहे हैं, लेकिन करीब 55 लाख युवाओं को ही छोटा-बड़ा रोजगार मिल पा रहा है। हमारे शिक्षा संस्थानों से लाखों साफ्टवेयर इंजीनियर निकलते हैं, लेकिन हमारा साफ्टवेयर उत्पाद में चीन और पूर्वी एशियाई देशों की तुलना में बेहतर स्थान नही है। इाीलिए हम साफ्टवेयर उद्यमिता पैदा नही कर पाये हैं। सच्चाई तो यह है कि युवाओं को कौशल के अनुरूप उचित वेतन वाला काम संसाधनों के न्यायपूर्ण बंटवारें के बिना संभव ही नहीं है। गोया,टिकाऊ विकास और उत्तम रोजगार अकेले डिजीटल विस्तार से संभव नहीं है।

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