लेखक परिचय

मनोज ज्वाला

मनोज ज्वाला

* लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

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मनोज ज्वाला
रावण के हाथों भारत की संस्कृति-सुता सीता का अपहरण जरूर हुआ था, किन्तु हमारी संस्कृति का प्रदूषण कतई नहीं हुआ था । भारतीय संस्कृति की पवित्रता-प्रखरता अक्षुण्ण ही कायम रही थी । वेदों-पुराणों-शास्त्रों में न किसी तरह का कोई आसुरी प्रक्षेपण हुआ था , न ही उनके अनुवाद के नाम पर उनका आसुरीकरण , मैक्समूलरीकरण अथवा अभारतीयकरण और न ही किसी भारतीय का धर्मान्तरण । बल्कि असुराधिपति रावण-विरचित ‘शिव-ताण्डव’ और ‘लाल किताब’ नामक दो ऐसे ग्रन्थ हमारे प्राचीन वाङ्ममय में शामिल हो गए जो शिवोपासना और ज्योतिषीय विवेचना के क्षेत्र में आज भी अनुकरणीय व प्रणम्य हैं । बावजूद इसके हमारे सीमावर्ती समन्दर के दक्षिण पार की स्वर्णिम लंका की असुर (अ)सभ्यता के विस्तारवाद का संवाहक होने के कारण का वह उद्भट्ट शिवोपासक रावण कभी भी हमारे समाज का आदर्श नहीं बन सका , बल्कि सदैव निन्दनीय ही बना रहा । इतना और इस कदर कि आज भी हर वर्ष विजयादश्मी के अवसर पर पुतला-दहन का शिकार होता रहा है रावण ।
किन्तु कालान्तर बाद भारत की सीमा से सात-समन्दर पश्चिम पार यूरोप की नस्लभेदी असुर यांत्रिक (अ)सभ्यता-जनित औपनिवेशिक साम्राज्यवाद के संवाहक मैक्समूलर-मैकाले ने हमारी किसी सीता का अपहरण किये बगैर न केवल हमारी संस्कृति को प्रदूषित कर दिया और धर्मशास्त्रों-ग्रन्थों को विकृत किया ; बल्कि धर्मान्तरण का सदाबहार बीज बो कर अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति के सहारे हमारी पीढियों को बौद्धिक रूप से इस कदर अपना गुलाम भी बना लिया कि रावण-वध-विषयक विजयादश्मी का उत्सव भी अब हम पश्चिम के बाजारवादी तरीके से मनाने लगे हैं ।
मालूम हो कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के माध्यम से भारत पर अपना औपनिवेशिक शासन-साम्राज्य कायम कर लेने के पश्चात अंग्रेजों ने पहले तो अपने साम्राज्यवादी उपनिवेशवाद का औचित्य सिद्ध करने के लिए अपने तथाकथित विद्वानों-भाषाविदों के हाथों प्राचीन भारतीय शास्त्रों-ग्रन्थों को अपनी सुविधा-योजनानुसार अनुवाद करा कर उनमें तदनुसार तथ्यों का प्रक्षेपण कराया और फिर बाद में भारतीय शिक्षण-पद्धति एवं शिक्षण सामग्री को उलट-फेर कर ऐसा गड-मड कर दिया कि शिक्षा के नाम पर ज्ञान-विज्ञान के भ्रामक भंवर में फंस कर हमारी पीढी-दर-पीढी अपनी जडों से कटती जा रही है और बौद्धिक गुलामी के कीचड में डूबती जा रही है । गौरतलब है कि रावण और उसकी असुर संस्कृति के झण्डाबरदारों ने वेद-विरूद्ध आचरण जरूर किया, यज्ञ-विरोधी विध्वंस भी किया और साधु-संतो-ऋषि-मुनियों को पीडित-प्रताडित भी ; इन्तु बावजूद इन सबके , हमारे वेद-शास्त्रों-ग्रन्थों को प्रदूषित नहीं किया था, कपोल-कल्पित मन्त्रों का प्रक्षेपण कर कभी यह प्रचारित नहीं किया-कराया कि हमारे पूर्वज ऋषि-महर्षि गोमांस खाते थे , अथवा वैदिक यज्ञों में गोमांस की आहूतियां डाली जाती थी । सदियों पुरानी ऋषि-प्रणित हमारी शिक्षा-पद्धति को जडों से उखाड कर अपनी कोई आसुरी शिक्षा-पद्धति थोपने और उसके सहारे हमारे बच्चों-पीढियों को असुर बनाने , धर्मान्तरित करने , हमें लंकापेक्षी बनाने और हमारी भाषा को पंगु बनाने व हम पर अपनी भाषा थोपने का काम रावण के द्वारा नहीं किया गया । किन्तु इन सारे अनर्थकारी-अवांछित कार्यों को इस आधुनिक-यांत्रिक युग में समुद्री लुटेरों के संगठन- ईस्ट इण्डिया ट्रेडिंग कम्पनी और उसकी संरक्षक – ब्रिटिश पार्लियामेण्ट से निर्देशित-पोषित-संरक्षित ‘मैक्समूलरासुर’ और ‘मैकालासुर’ द्वारा ऐसी बौद्धिक बर्बरतापूर्वक अंजाम दिया गया कि उसके विषैले परिणाम बीतते समय के साथ और ही विषम होते जा रहे हैं ।
उल्लेखनीय है कि यूरोपीय औपनिवेशिक साम्राज्यवाद और उसकी पीठ पर सवार ईसाई विस्तारवाद ने भारत में अपनी जडें जमाने के लिए एक तरफ हमारे शास्त्रों-ग्रन्थों के अनुवाद के नाम पर भारतीय वैदिक सनातन ज्ञान-विज्ञान के मूल स्रोतों में प्रक्षेपण कर हमारी अनेक बौद्धिक सम्पदओं का अपहरण कर लिया , तो दूसरे तरफ ऋषि-प्रणीत हमारी प्राचीन समग्र शिक्षण-पद्धति को उखाड फेंक उसके स्थान पर अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति स्थापित कर हमारे परम्परागत ज्ञान-विज्ञान चिन्तन-मन्थन शोध-अनुसंधान के मूल स्रोत- संस्कृत भाषा को पंगु बनाते हुए हमारे ऊपर अपनी अंग्रेजी भाषा थोप कर हमारी चिन्तना-विचारणा को हमारी जडों से काट कर हमें पूरी तरह से यूरोपाश्रित बना दिया । इन दोनों तरह के अनर्थकारी विनाशकारी भारत-विरोधी , वेद-विरोधी कार्यों को अंजाम देने वाले क्रमशः मैक्समूलर और मैकाले तो महिषासुर व रावण से भी ज्यादा खतरनाक असुर प्रतीत होते हैं ।
सन १७९४ में मनुस्मृति का अंग्रेजी अनुवाद करने वाले विलियम जोन्स ने गोरी चमडी वालों की स्वघोषित श्रेष्ठता और ईसाइयत की आध्यात्मिकता को पुष्ट करने के उद्देश्य से हिन्दूत्व और ईसाइयत के बीच समानता स्थापित करने हेतु हिन्दू-धर्म-ग्रन्थों (संस्कृत-ग्रन्थों) का उपयोग ईसाइयत के समर्थन में तर्क गढने के लिए किया । उसने शब्दों की ध्वनियों से संयोगवश प्रकट होने वाली समानता के बाहरी आवरण के सहारे रामायण के ‘राम’ को बाइबिल के ‘रामा’ से जोड दिया और राम के पुत्र ‘कुश’ को बाइबिल के ‘कुशा’ से । इसी तरह की कई संगतियों को खींच-तान कर उसने यह प्रतिपादित किया कि बाइबिल-वर्णित ‘नूह’ के जल-प्लावन के बाद राम (रामा) ने भारतीय समाज का पुनर्गठन किया, इसलिए भारत बाइबिल से जुडी सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है । उसने बाइबिल में वर्णित बातों को सत्य प्रमाणित करने के लिए संस्कृत-ग्रन्थों से उसकी पुष्टि करने के हिसाब से उनका अनुवाद किया है । इस क्रम में उसने ‘मनु’ को ‘एडम’ घोषित कर दिया और विष्णु के प्रथम तीन अवतारों को नूह के जल-प्लावन की कहानी में प्रक्षेपित कर दिया । इस धुर्ततापूर्ण वर्णन में उसने बाइबिल-वर्णित- ‘नाव पर सवार आठ मनुष्यों’ को मनुस्मृति के ‘सप्त-ऋषि’ घोषित कर दिया ।
विलियम जोन्स के बाद भारतीय शास्त्रों-ग्रन्थों के अनुवाद से उसके मिशन को आगे बढाने वालों में फ्रेडरिक मैक्समूलर का नाम सर्वाधिक कुख्यात रहा है, जिसने वेदों का भी अनुवाद किया । आर्यों के युरोपीय मूल के होने सम्बन्धी पूर्व कल्पित-प्रायोजित पश्चिमी कुतर्कों की स्थापना को मजबूती प्रदान करने के लिए भारत पर आर्यों के आक्रमण की तिथि भी घोषित कर देनेवाले मैक्समूलर का काम कितना विश्वसनीय है यह जानने के लिए उसके दो निजी पत्रों पर गौर करना पर्याप्त है । १६ दिसम्बर १८६८ को ओर्गोइल के ड्यूक , जो ब्रिटेन में एक मंत्री थे को लिखे पत्र में मैक्समूलर कहता है- “मेरे कार्यों से भारत का प्राचीन धर्म पूरी तरह ध्वस्त होता जा रहा है, ऐसे समय में अगर ईसाइयत यहां पैर नहीं जमाती तो यह किसकी गलती होगी ?” उसी वर्ष अपनी पत्नी को लिखे पत्र में उसने लिखा- “…..मैं उम्मीद करता हूं कि मैं इस कार्य को सम्पन्न करूंगा, और आश्वस्त हूं कि मैं वह दिन देखने के लिए जीवित नहीं रहूंगा , फिर भी मेरा यह संस्करण और वेदों का अनुवाद आज के बाद भारत के भविष्य और इस देश में मनुष्यों के विकास को बहुत सीमा तक प्रभावित करेगा । वेद उनके धर्म का मूल है और वह मूल क्या है , इसे उन्हें दिखाने के लिए मैं कटिबद्ध हूं ; जिसका सिर्फ एक रास्ता है कि पिछले तीन हजार वर्षों में जो कुछ भी इससे निकला है उसे उखाड दिया जाये ।” पश्चिम के इन बौद्धिक षड्यंत्रकारियों ने यह भी प्रतिपादित-प्रचारित कर रखा है कि अंग्रेज सबसे शुद्ध आर्य हैं और भारत में साफ चमडी के उतर-भारतीय लोग अशुद्ध आर्य हैं ; जबकि दक्षिण भारतीय लोग द्रविड हैं, जो उतर भारतीय आर्यों से शोषित-प्रताडित होते रहे है । राम को आक्रमणकारी आर्य और रावण को भोले-भाले द्रविडों का राजा बताने वाले इन पश्चिमी बौद्धिक असुरों का दावा है कि संस्कृत भाषा लैटिन व ग्रीक से निकली हुई भाषा है जिसे उत्तर भारतीय ब्राह्मणों ने गैर- सवर्णों व द्रविडों का शोषण करने के लिए हथिया लिया । और यह भी कि भारत की समस्त समस्याओं की जड यह संस्कृत भाषा और यहां कि वर्ण-व्यवस्था है , जो यहां के लोगों के ईसाईकरण में सबसे बडा बाधक है ।
अपने औपनिवेशिक साम्राज्यवाद की जडें जमाने हेतु भारत के प्राचीन शास्त्रों-ग्रन्थों , भाषा व समाज-व्यवस्था और इतिहास को इस तरह से विकृत कर उन्हें शैक्षिक पाठ्य-पुस्तकों के माध्यम से पढाने के लिए थामस विलिंगटन मैकाले की कुटिल योजनानुसार ईजाद की गई अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति , जो अपने देश में आज भी कायम है , के दुष्परिणाम हमारे सामने हैं । गुजरात के अहमदाबाद में प्राचीन भारतीय गुरुकुलीय शिक्षा-पद्धति पर विश्व-स्तरीय प्रयोग कर रहे उत्तमभाई शाह के संरक्षण में इसी वर्ष पुनरुत्थान ट्रस्ट द्वारा आयोजित शीर्षस्थ शिक्षाविदों की एक राष्ट्रीय संगोष्ठी में यह निष्कर्ष उभर कर सामने आया कि वर्तमान भारत की समस्त समस्याओं की जड वास्तव में यह अंग्रेजी-मैकाले शिक्षा-पद्धति ही है , जिसके कारण एक ओर हमारी भाषा-संस्कृति–संस्कार-परम्परायें सब के सब विलुप्त होती जा रही हैं और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हम पश्चिम का आश्रित हो कर रह गये हैं; तो दूसरी ओर समाज में बडी तेजी से नैतिकता व राष्ट्रीयता का क्षरण तथा पारिवारिक-सामाजिक विघटन और भ्रष्टाचार व बलात्कार जैसी आसुरी प्रवृतियों का उन्नयन हो रहा है । सच भी यही है । ऐसे में रावण का पुतला-दहन किये जाने के बजाय मैकाले की अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति का दहन किया जाना अब ज्यादा जरूरी है ।
• मनोज ज्वाला ;

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