लेखक परिचय

डॉ. मनोज जैन

डॉ. मनोज जैन

लेखक जैन महाविद्यालय, भिण्ड में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक है;

Posted On by &filed under राजनीति, लेख.


डॉ. मनोज जैन

टैक्स हैवन देशों की बैंकों में जमा देश की जनता के हकों से चुराकर जमा किया हुआ कालाधन वापिस देश में लाने के लिये राजधानी के रामलीला मैदान में रात को सो रहे अहिंसक और शान्तिपूर्वक सत्याग्रह कर रहे आन्दोलनकारियों पर केन्द्र सरकार द्वारा किये गये नादिरशाही हमले ने न केवल लोकतंत्र पर सवालिया निशान लगा दिये हैं अपितु गांधीवादी तरीकों पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। गांधी के देश में आखिर अपनी बात कहने का कौन सा तरीका उचित होगा। संभवतः कांग्रेस हिंसक आन्दोलनों की ही भाषा समझती है। चाहे वह मिजोरम में लालदेगां की आतंकवादी गतिविधियां हो या पंजाब में खलिस्तानी आतंकवाद की घटनाऐं। इतिहास गवाह है कि कांग्रेस ने लोकतान्ति्रक तरीकों को कभी तबज्जो नहीं दी है। वहीं कश्मीरी आतंकवादियों को सरओम दिल्ली में पे्रस कान्फ्रेस करने को अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर नजरअंदाज किया जाता है तो स्वामी रामदेव के कपडें फाड़ कर कबीलाई हिसां से गला घोटनें के क्रूर प्रयास को कानून एंव व्यवस्था की रखवाली कहा सिद्ध करने का प्रयास किया जा रहा है। खैर भला हो देश की सकि्रय होती न्यायपालिका का जिसने मीडिया की खबरों पर स्वतः संज्ञान लेकर संबघित ऐजेसियों को नोटिस जारी किये है कि रात को सो रहे लोगों पर राक्षसी आक्रमण करके राजसत्ता कौन से कानून की रक्षा कर रही थी।

गांधीवाद से तो काग्रेस उस दिन ही दूर हो चुकी थी जब महात्मा गांधी ने कांग्रेस पार्टी को खत्म करके नये राजनैतिक दल के गठन का सुझाव दिया था, जो आजाद भारत में अपनी नीतियां बनाकर अपनी दशा और दिशा तय करता। पर काग्रेस में शीर्ष पर बैठे हुये उम्रदराज हो चुके चतुर सुजान लोग जानते थे कि वर्षो के संघर्ष के उपरान्त जो आजादी प्राप्त हुयी है उसका सत्तासुख भोगने के लिये यदि नये नाम के राजनैतिक दल के रुप में जनता के सामने चुनाव में जायेगें तो जनता उनमें और अन्य राजनैतिक दलों में भावनात्मक रुप से भेद नहीं करेगी। क्योंकि आजादी के आन्दोलन में कमोवेश सभी नेताओं का योगदान था। और लाख विरोधों के बाबजूद भी गांधी जी का सम्मान लगभग सभी करते ही थे। पर जैसे ही आजादी प्राप्त हुयी तो योजनावद्ध तरीके से कांग्रेस पार्टी के झण्डे को ही राष्ट्रीय ध्वज के रुप में अपना लिया गया। और गांधी के नाम को अपना कर गांधी की विरासत हथिया ली तथा गांधीजी के प्रति देश की जनता में व्याप्त गांधी जी प्रति प्रति सहजश्रद्घा का सुनियोजित अपहरण कर लिया गया।

नेहरु परिवार के मुखिया पं. मोतीलाल नेहरु अपने समय के जाने माने धनी व्यक्ति थे। इस परिवार की विलासिता का अंदाजा इसी से लग जाता है कि इनके कपडे धुलने के लिये पेरिस जाते थें। यद्यपि गांधी जी भी काठियावाड की रियासत के दीवान के पुत्र थे फिर भी अपनी मां से मिले धार्मिक संस्कारों संस्कारित भारतीय जीवन मूल्यों में अगाध श्रद्घा रखने वाले सहज, सरल और मानवीय व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे। मोतीलाल नेहरु वक्त की नब्ज जानने वाले चतुर सुजान व्यक्ति थे उन्हौने जवाहर लाल को प्लानिंग से राजनीति में प्रोजेक्ट किया और समय आने पर गांधी जी के पास अपने संस्कार रह गये और उनकी विरासत को मय नाम के नेहरु परिवार द्वारा अपहरण कर लिया गया। और आज तक गांधीजी की विरासत के नाम पर देश पर शासन कर रहा नेहरु परिवार और कांग्रेस पार्टी कभी भी गांधीवादी मूल्यों में आस्था सिद्ध नहीं कर पाये है। जब जब गांधीवादी मूल्यों की परीक्षा की घडी आई है। कांग्रेस ने जबरदस्ती मूल्यों को कुचला है। गांधी प्रतिमा पर फूल माला और गांधीवाद की हत्या यही कांग्रेस के चरित्र का दर्शन रहा है। 1975 का आपात काल हो, गौहत्या बंदी आन्दोलन हो, मणिपुर में महिलाओं का नग्न प्रर्दशन हो, भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे का आन्दोलन हो, कालेधन को लेकर बाबा रामदेव का आन्दोलन हो कांग्रेस ने हमेशा पहले छल से फिर बल से आन्दोलनों को दमन पूर्वक कुचला ही है।

यद्यपि गांधीजी स्वंय के विचारों और पद्धतियो को गांधीवाद के नाम से जानना उचित नहीं मानते थे क्योंकि उनका मानना था कि सत्य के प्रति मेरे प्रयोग और सत्य के प्रति मेरा आग्रह भारतीय जीवन मूल्यों मे मेरा विश्वास है। वह संवय विलायत पनें के लिये गये पर अपने चिन्तन में सदैव आध्यात्मिकता को पुष्पित और पल्लिवित होने दिया वहीं नेहरु की दृष्टि में उनका हिन्दू घर मे जन्म होना एक दुर्घटना थी जिस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं था। गांधी और पटेल के अवसान के वाद तो गांधीवाद का कोसला भी लगभग वन्द ही कर दिया गया। हॉ गांधी जी के नाम की कमाई को सब मिलबॉट कर जरुर खाते रहें

गांधीजी के चिन्तन का मूल आधार धर्म था या राजनीति का आघ्यात्मीकरण था। पर नेहरु धर्म के नाम पर ऐसे बिदकते थे जैसे किसी सांड के सामने लाल कपडा लहरा दिया गया हो। और उन्हौनंें सार्वजनिक रुप से ऐसा प्रदर्शित भी किया। जब डॉ राजेन्द्र प्रसाद सोमनाथ मन्दिर के जीणोद्घार के लिये उदघाटन के लिये जाने वाले थे तो पं. जबाहर लाल नेहरु ने अपनी ओर से भरसक प्रयास किये कि तत्कालीन राष्ट्रपति उसमें न जायें। कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानन्द के स्मारक के बनने के अवसर पर भी नेहरुजी की भूमिका नकारात्मक ही थी। जबकि गांधी जी कहते थे कि “मानव कि्रयाओं से पृथक कोई धर्म नहीं है।’ गांधीवाद का अगला सूत्र कहता है कि सत्य और अंिहसां जीवन के आधार होने चाहिये। पर आजादी के बाद से आज तक कांग्रेस की अफजल गुरुओं की फासीं के मामलों में ही दिखाई दी है। गांधी जी ने एक और शस्त्र विकसित किया था “सत्याग्रह’’ जिसके विविध रुप हैं जैसे असहयोग, सविनय अवज्ञा, प्रवजन, अनशन और हडताल पर कांग्रेस ने सत्याग्रह के इन विविध रुपों को जिस प्रकार समय समय पर कुचला है। उससे तो यही सिद्ध होता है कि आजादी के बाद की कांग्रेस की सबसे बडी लडाई गांधीवाद से ही है। गांधी जी चाहते थे कि शासन का रुप लोकतात्रक रहे इसीलिये उन्हौने अपने जीते जी अपने परिवार के किसी भी सदस्य को राजनैतिक लाभ के लिये प्रेरित नहीं किया। पर आजादी के बाद की क्रांग्रेस एक ही परिवार की जेब में बैठी रही है। गांधीवाद की हत्या का और भला क्या रुप हो सकता है।

गांधी जी न केवल राजनैतिक बल्कि आर्थिक बिकेन्द्रीकरण भी चाहते थे। यदि कांग्रेस ने गाधीवाद के इस सिद्घान्त को मान लिया होता तो आज यह कालेधन का मुददा ही नहीं होता। काला धन ही वह धन है जो देश की जनता के हक पर चुपके से डकैती डाल कर एकत्र किया गया है। जिसके विकेन्द्रीकरण के लिये स्वामी रामदेव के नेतृत्व में मांग कर रही है। जनता की मांग नागरिक अधिकारों में ही है। नागरिक अधिकारों के गांधीजी प्रबल सर्मथक थे। जिसका दमन हम सबने 4 और 5 जून की मघ्यरात्रि को देखा ही है। स्ति्रयों को सभी क्षेत्रों में समान अधिकार देने के पक्षधर गांधी जी उस रात को फूट फूट कर रोये होगें जब उन्हौने अपने नाम की कमाई खाने वाले काग्रेसी नेता सुशील शर्मा को नैना साहिनी के टुकडे टुकडे करके तंदूर में भूने जाने का समाचार सुना होगा।

गांधी जी अस्पृश्यता को जड मूल से समाप्त कर देना चाहते थें। परन्तु अस्पृश्यता कांग्रेसी मानस में किस हद बैठी है उसका नमूना तब देखने को मिला जब भारतीय जनता पार्टी के संसद में गांधी प्रतिमा पर धरना देने के बाद कांग्रेसी सांसदों ने गांधीजी की प्रतिमा को यह कह कर धोया था कि भाजपा सांसदो के छूने से गांधीजी की प्रतिमा अपवित्र हो गई है। गौवध निषेघ, मद्यनिषेध आदि मामलों में भी यदि हम देखेंगे तो कांग्रेस गांधीवाद से लडती हुयी नजर आती है।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz