लेखक परिचय

अजीत कुमार सिंह

अजीत कुमार सिंह

अजीत कुमार सिंह, झारखंड की सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली, भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर लिंग में से एक बाबा की नगरी बैद्यनाथधाम, देवघर के रहने वाले हैं। इनकी शिक्षा-दीक्षा स्नातक तक यहीं हुई। बाद में पत्रकारिता एवं जनसंचार में डिप्लोमा किया और अभी ‘’राष्ट्रीय छात्रशक्ति’’ मासिक पत्रिका, दिल्ली में संपादन मंडल सदस्य हैं।

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-अजीत कुमार सिंह
कभी आतंकवादियों के मारे जाने पर किसी देश में मातम मनाते देखा है…। नहीं न !
हाँ! आतंकवादियों के मारे जाने पर हमारे देश में मातम मनाया जाता है। नमाज-ए-जनाजा होता है। इसका ताजातरीन उदाहरण कश्मीर मुठभेड़ में मारे गये कुख्यात आतंकी बुरहान वानी के बाद का दृश्य है। 8 जुलाई को सुरक्षा बलों ने अनंतनाग जिले में हुई मुठभेड़ में आतंक का पर्याय बन चुके बुरहान वानी को मार गिराया। सेना के इस साहसिक कदम का अभिनंदन होना चाहिए। लेकिन कश्मीर में स्थिति बिल्कूल उल्ट है। कश्मीर के लोग इस आंतकी के लिए आँसू बहा रहे हैं। मातम मनाने के नाम पर सुऱक्षा बलों पर पत्थर फेंक रहे हैं। पूरे कश्मीर में उपद्रव मचा रखा है। अभी अनंतनाग, कुलगाम, शोपिया और पुलवामा में पूरी तरह कर्फ्यू है। पूरा दक्षिणी कश्मीर एक बार फिर जल उठा है। लगभग 32 लोग मारे जा चुके हैं जिसमें पुलिस बल भी शामिल हैं। सैंकड़ो लोग घायल हैं। आखिर ये लोग किसके लिए आँसू बहा रहे हैं और सूरक्षा बलों को निशाना बना रहे हैं। एक आतंकी जिसका काम ही मानवता का हत्या करना है।
हाँलाकि हमारे देश में आतंकियों के लिए आँसू बहाने की घटना आम है। भूल गये क्या..। पिछले साल जुलाई की तो बात है, जब याकूब मेनन को फांसी दी गई थी तब देखा था न ! कितने लोग उसके अंतिम संस्कार के समय इकट्ठा हुए थे। छाती पीट-पीट कर रो रहे थे। संयोगवश उसी समय भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे अब्दूल कलाम साहब का भी निधन हुआ था लेकिन…? याकूब को बचाने के लिए हमारे देश के बुद्धिजीवि रात के 12 बजे अदालत को खुलवाया था।
कुख्यात आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर घाटी एक बार फिर दहल उठा है। लगातार हिंसा और प्रदर्शन जारी है। कई लोंगो की जानें भी जा चुकी है। कई पुलिसकर्मी भी घायल हो गये। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि इन अलगाववादी को प्रश्रय देता कौन है? इसकी फंडिग करता कौन है? आखिर कश्मीर के लोगों को आतंकवादियों से इतनी सहानुभूति क्यों…? दक्षिणी कश्मीर के मौत के सौदागर कहे जाने वाले बुरहान वानी के जनाजे में इतनी भीड़ क्यो…? आखिर वहां के लोंगो को कब समझ आयेगा कि आतंकी उनकी भावनाओं का इस्तेमाल कर घाटी में अशांति फैलाना चाहते हैं। उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ आतंक फैलाना है। हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकती है। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और हमेशा रहेगा भी। यह बात जितना जल्दी वहां के लोंगो को समझ में आ जाये बेहतर होगा।
22 वर्षीय बुरहान वानी एक आतंकवादी था जो दक्षिण कश्मीर में इधर तेजी के सक्रिय था। जिस कारण उसे पोस्टर ब्वॉय कहा जाने लगा था। कारण, कभी वह वीडियो जारी करता था जिसमें हथियार लिए सुरक्षा बलों का मजाक उड़ाता था। कभी सोशल मीडिया कर अपने फोटो पोस्ट करता था, दूसरे आतंकवादियों को गले लगाते हुए वीडियो पोस्ट करता था। वह अपनी तकरीरों से कम उम्र के युवाओं को आकर्षित करने लगा था। पिछले दिनों उसका एक वीडियो वायरल हुआ, इसमें उसने सैनिक कॉलोनी और कश्मीरी पंडितों के लिए अलग कॉलोनी बनाने पर हमले की धमकी दी थी। उसे पकड़ने या मारने की कोशिश काफी समय से चल रही थी। पिछले साल जंगल में मिलने जा रहे उसका भाई सुरक्षा बलों की गोली से मारा गया लेकिन बुरहान पकड़ में नहीं आ सका। बुरहान धीरे-धीरे कश्मीरी युवको के बीच रॉल मॉडल बनने लगा था। इससे पहले 80 के दशक में मकबूल भट्ट कश्मीर में एक आइकॉन थे, जिन्हें देखकर युवा चरमपंथ की ओर आकर्षित हुए थे।

कश्मीर को लेकर दोहरी राजनीति भी वहां की समस्या का कारण है। कश्मीर के अंदर सुरक्षा बलों के हाथ बंधे हैं। सीमा की तरह खुले नहीं हैं। अगर उनके हाथ बंधे न हो तो पत्थर चलाने वाले और पाकिस्तानी झंडे लहराने वाले चंद घंटे भी टिक न पाएं। सरकार को भी अपना रूख स्पष्ट कर देना चाहिए। हमारी सेना अपनी जान को खतरे में डालकर उस कुख्यात आतंकी को मार गिराया। इसकी सराहना करने के बजाय ये लोग आतंकियों के समर्थन में उल्टे सुरक्षा बलों पर पत्थर बरसा रहे हैं। यह देखना बेहद दयनीय है कि कश्मीर के युवाओं का एक बड़ा वर्ग न केवल बुरहान वानी सरीखे आतंकी को अपना आदर्श मान रहा है, बल्कि आइएस और लश्कर-जैश सरीखे आतंकी संगठनों को अपना मददगार मानने लगा है। उसके मौत के बाद उमड़ी भीड़ यह बता रही है कि घाटी की जनता किस हद तक अलगाववादी एवं पाकिस्तान परस्त तत्वों के बहकावे में आ चुकी है। जिस आतंकी के मारे जाने पर जश्न मनाना चाहिए वहां घाटी के लोग मातम मना रहे हैं। आखिर क्या कारण है कि ये लोग आतंकियों को अपना आदर्श मानता है। बुरहान वानी हिजबुल मुजाइद्दीन का 10 लाख ईनामी आतंकी था कोई न कोई फरिस्ता, जो ये लोग मातम मना रहे हैं।
बुरहान वानी के मारे जाने के बाद हमारे नेताओं की जिस तरह सधी प्रतिक्रिया आयी है। वो बेहद चिंतनीय है। इससे हमारी सेना का मनोबल गिरेगा। विडंबना देखिए कि नेता इसकी आलोचना करने की बजाय अप्रत्यक्ष रूप से आतंकियो को ही समर्थन कर रहे हैं। बुरहान वानी के मौत के बात जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को ट्वीट आया कि “कश्मीर के लोगों को शुक्रवार को एक नया आइकॉन मिला है… मेरी बात याद रखिये बुरहान अपनी कब्र से इतने लोंगो को आतंकवाद से जुड़ने के लिए प्रेरित कर देंगे कि वो जिंदा रहते हुए सोशल मीडिया के जरिए नहीं कर पाते” उमर के इस ट्वीट से क्या अर्थ निकाला जाय। उमर से यह पूछा जाना चाहिए कि वो किसके साथ हैं ? क्या वो बुरकान जैसे आतंकवादियों के समर्थन में हैं या विरोध में ? सुरक्षा बलों ने बुरकान को मारा वो सही कदम था या नहीं ? उमर ने तो ये बहुत आसानी के कह दिया कि उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए कभी बुरहान वानी के किसी सोशल मीडिया पोस्ट को आतंकवाद से जुड़ा नहीं पाया। तो उसके सिर पर 10 लाख का इनाम क्यों रखा गया था?
कश्मीर कि स्थिति जैसे पहले थी वैसे आज भी कायम है। जब तक इस मसले का राजनीतिक हल नहीं खोजा जाता और केंद्र व राज्य सरकार राजनीतिक कोशिशें नहीं करती, तब तक मुझे नहीं लगता कि स्थिति बदेलेगी। कश्मीर को लेकर एक ठोस और दूरदर्शी रणनीति बनानी होगी। आये दिन हमारे जवानों पर पत्थर फेंके जाते हैं। आखिर भारत अभी कश्मीरियों का विश्वास क्यों नहीं जीत पाया है। जनता के बीच विश्ववास बहाली का काम किसका है…। अलगाववादियों को पूरी से निपटने में क्या हमारी सेना सक्षम नहीं है?
आखिर कबतक कश्मीरी, आंतकियों के लिए आँसू बहाते रहेंगे? कितना आँसू बहायेंगे? यह एक विचारणीय प्रश्न है। वहां के लोंगो को अलगाववादियों ने मानसिक रूप से पूरी तरह सरकार के खिलाफ कर दिया है। उसके बीच विश्वास बहाल किया जाना चाहिए। पूर्व में जो गलतियां हो चुकी है, उसको फिर से न दोहराया जाना चाहिए। कश्मीर की जनता को भरोसा में लेना होगा। तभी इसका स्थायी हल निकल पायेगा।

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