लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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डा.राधेश्याम द्विवेदी
tirangaभारतीय राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा का अपना विशेष महत्व व स्थान रहा है। इस प्रतीक के माध्यम से हमने देश की आजादी को एक लम्बी लड़ाई के माध्यम से प्राप्त किया है। इसके सम्मान तथा आन, बान और शान के लिए कितने गुमनाम शहीदों ने अपनी कुरबानियां दी है। आज भी भारतीय सेना इसके प्रतिष्ठा के लिए अपने प्राणों के उत्सर्जन में कोई कोर कसर नहीं लगाता है।
भारत में लम्बे समय तक कांग्रेस ने शासन किया है। देश की आजादी का सर्वाधिक लाभ इसी संगठन ने उठाया है। इस बार जब से यह सरकार 2014 में सत्ताच्युत हुई हैं तब से वह सकारात्मक राजनीति के माध्यम से पुनः जनता का विश्वास हासिल करने का ना तो प्रयास कर पा रहा है और ना ही प्रतीक्षा कर पा रहा है। इस हताशा में वह सारे कार्य जाने या अनजाने करने लगा है जो उसके सुत्रधारो ने कभी सोचा तक नही रहा होगा। मसलन सत्ता के लिए वह राष्ट्र विरोधियों का समर्थन तथा राष्ट्रीय प्रतीकों का असम्मान आदि कामों से भी स्वयं को अलग नहीं कर पा रहा है। वाम पार्टियां भी इसी नक्शे कदम पर चल रही हैं। आम आदमी पार्टी ने इस प्रतीक का खुलमखुल्ला उलंघन किया है। वह इसे अपने पार्टी प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया है। खेल के मैदान में खेल पे्रमियों द्वारा इस प्रतीक का असम्मान हो जाया करता है। हमें इन सबसे बचने का प्रयास करना चाहिए।
अभी हाल ही में दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी राष्ट्र विरोधी घटनायें हुई हैं। एक तरह से भारतीय संप्रभुता को खुलेआम चुनौती दी गई है। अनेक राजनीतिक संगठन व उनके नेता इसे महिमा मण्डित करते देखे गये हैं। भारत सरकार ने सभी केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में नियमित राष्ट्र ध्वज के फहराने के लिए निर्देश जारी किये हैं। इसके लिए राजनीतिक दल अपने निजी स्वार्थ तथा नकारात्मक सोच के फलस्वरूप इसका विरोध करते देखे गये हैं। वे इन संस्था के स्वायत्तता का नाम लेकर देश की कुरबानियां, अस्मिता व परम्परा की अवहेलना कर रहे हैं। हमारे सौनिक जो अपने प्राण से भी ज्यादा इस प्रतीक का सम्मान करते हैं, उनकी भावनाओं को भी आहत किया जा रहा है। इस प्रतीक के विकास क्रम की यात्रा तथा प्रमुख पड़ावों को देश की आम जनता को अवगत कराने के लिए इस आलेख को संकलित किया गया है।
भारत के राष्ट्रीय ध्वज जिसे तिरंगा भी कहते हैंए तीन रंग की क्षैतिज पट्टियों के बीच नीले रंग के एक चक्र द्वारा सुशोभित ध्वज है। इसकी अभिकल्पना पिंगली वैंकैया ने की थी। इसे 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान.सभा की बैठक में अपनाया गया था । इसमें तीन समान चौड़ाई की क्षैतिज पट्टियाँ हैं । जिनमें सबसे ऊपर केसरियाए बीच में श्वेत ओर नीचे गहरे हरे रंग की पट्टी है। ध्वज की लम्बाई एवं चौड़ाई का अनुपात 2/3 है। सफेद पट्टी के मध्य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है जिसमें 24 अरे होते हैं। इस चक्र का व्यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है व रूप सम्राट अशोक की राजधानी सारनाथ में स्थित स्तंभ के शेर के शीर्ष फलक के चक्र में दिखने वाले की तरह होता है।
सरकारी झंडा निर्दिष्टीकरण के अनुसार झंडा खादी में ही बनना चाहिए। यह एक विशेष प्रकार से हाथ से काते गए कपड़े से बनता है जो महात्मा गांधी द्वारा लोकप्रिय बनाया था। इन सभी विशिष्टताओं को व्यापक रूप से भारत में सम्मान दिया जाता हैं भारतीय ध्वज संहिता के द्वारा इसके प्रदर्शन और प्रयोग पर विशेष नियंत्रण है ।
ध्वज का हेराल्डिक वर्णन
1.परिचय
गांधी जी ने सबसे पहले 1921 में कांग्रेस के अपने झंडे की बात की थी। इस झंडे को पिंगली वेंकैया ने डिजाइन किया था। इसमें दो रंग थे लाल रंग हिन्दुओं और हरा रंग मुस्लिमों के लिए तय किए। बीच में एक चक्र था। बाद में इसमें अन्य धर्मो के लिए सफेद रंग जोड़ा गया। स्वतंत्रता प्राप्ति से कुछ दिन पहले संविधान सभा ने राष्ट्रध्वज को संशोधित किया। इसमें चरखे की जगह अशोक चक्र ने ली। इस नए झंडे की देश के दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने फिर से व्याख्या की ।
1. 21 फीट गुणा 14 फीट के झंडे पूरे देश में केवल तीन किलों के ऊपर फहराए जाते हैं। मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में स्थित किला एकर्नाटक का नारगुंड किले और महाराष्ट्र का पनहाला किले पर भी सबसे लम्बे झंडे को फहराया जाता है।
2. 1951 में पहली बार भारतीय मानक ब्यूरो ;बीआईएसद्ध ने पहली बार राष्ट्रध्वज के लिए कुछ नियम तय किए।
3. 1968 में तिरंगा निर्माण के मानक तय किए गए। ये नियम अत्यंत कड़े हैं। केवल खादी या हाथ से काता गया कपड़ा ही झंडा बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। कपड़ा बुनने से लेकर झंडा बनने तक की प्रक्रिया में कई बार इसकी टेस्टिंग की जाती है। झंडा बनाने के लिए दो तरह की खादी का प्रयोग किया जाता है। एक वह खादी जिससे कपड़ा बनता है और दूसरा खादी.टाट। खादी के केवल कपासए रेशम और ऊन का प्रयोग किया जाता है। यहां तक की इसकी बुनाई भी सामन्य बुनाई से भिन्न होती है । ये बुनाई बेहद दुर्लभ होती है। इसे केवल पूरे देश के एक दर्जन से भी कम लोग जानते हैं।
धारवाण के निकट गदग और कर्नाटक के बागलकोट में ही खादी की बुनाई की जाती है। जबकी श्श्श्हुबलीश्श्श् एक मात्र लाइसेंस प्राप्त संस्थान है जहां से झंडा उत्पादन व आपूर्ति की जाती है। बुनाई से लेकर बाजार में पहुंचने तक कई बार बीआईएस प्रयोगशालाओं में इसका परीक्षण होता है। बुनाई के बाद सामग्री को परीक्षण के लिए भेजा जाता है। कड़े गुणवत्ता परीक्षण के बाद उसे वापस कारखाने भेज दिया जाता है। इसके बाद उसे तीन रंगो में रंगा जाता है। केंद्र में अशोक चक्र को काढ़ा जाता है। उसके बाद इसे फिर परीक्षण के लिए भेजा जाता है। बीआईएस झंडे की जांच करता है इसके बाद ही इसे बाजार में बेचने के लिए भेजा जाता है।
2.तिरंगे का विकास
यह ध्वज भारत की स्वतंत्रता के संग्राम काल में निर्मित किया गया था। 1857में स्वतंत्रता के पहले संग्राम के समय भारत राष्ट्र का ध्वज बनाने की योजना बनी थी। लेकिन वह आंदोलन असमय ही समाप्त हो गया था और उसके साथ ही वह योजना भी बीच में ही अटक गई थी। वर्तमान रूप में पहुंचने से पूर्व भारतीय राष्ट्रीय ध्वज अनेक पड़ावों से गुजरा है। इस विकास में यह भारत में राजनैतिक विकास का परिचायक भी है। ऐतिहासिक पड़ाव
1.प्रथम चित्रित ध्वज 1904 में स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता द्वारा बनाया गया था।
2. 7 अगस्तए 1906 को पारसी बागान चौक ;ग्रीन पार्कद्ध कलकत्ता ;वर्तमान कोलकाताद्ध में इसे कांग्रेस के अधिवेशन में फहराया गया था। इस ध्वज को लालए पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था। ऊपर की ओर हरी पट्टी में आठ कमल थे और नीचे की लाल पट्टी में सूरज और चाँद बनाए गए थे। बीच की पीली पट्टी पर वंदेमातरम् लिखा गया था।
3. द्वितीय ध्वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था। कुछ लोगों की मान्यता के अनुसार यह1905 में हुआ था। यह भी पहले ध्वज के समान थाय सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपर की पट्टी पर केवल एक कमल थाए ये सप्तऋषियों को दर्शाते थे। यह ध्वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।
4. 1917 में भारतीय राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड़ लिया। डॉ॰ एनी बीसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान तृतीय चित्रित ध्वज को फहराया। इस ध्वज में 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्ततऋषि के अभिविन्यास में इस पर सात सितारे बने थे। ऊपरी किनारे पर बायीं ओर ;खंभे की ओरद्ध यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।
5. कांग्रेस के सत्र बेजवाड़ा ;वर्तमान विजयवाड़ाद्ध में किया गया । यहाँ आंध्र प्रदेश के एक युवक पिंगली वैंकैया ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया। यह दो रंगों का बना था। लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्वं करता है। गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए।
6. वर्ष 1931 तिरंगे के इतिहास में एक स्मरणीय वर्ष है। तिरंगे ध्वज को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप मंर अपनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया और इसे राष्ट्र.ध्वज के रूप में मान्यता मिली। यह ध्वज जो वर्तमान स्वरूप का पूर्वज हैए केसरियाए सफेद और मध्य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था। यह भी स्पष्ट रूप से बताया गया था कि इसका कोई साम्प्रदायिक महत्त्व नहीं था।
7. 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने वर्तमान ध्वज को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया। स्वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्व बना रहा। केवल ध्वज में चलते हुए चरखे के स्थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को स्थान दिया गया। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा ध्वज अंततरू स्वतंत्र भारत का तिरंगा ध्वज बना।
1.
गांधी का ध्वजए 1921 में कांग्रेस की बैठक में पेश किया

2.
स्वराज ध्वज आधिकारिक तौर पर 1931 में कांग्रेस द्वारा अपनाया गया

3.
कोलकाता फ्लैगा
3.रंग.रूप

अशोक चक्रए धर्म का पहिया ;धर्मद्ध
भारत के राष्ट्रीय ध्वज की ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच की पट्टी का श्वेत धर्म चक्र के साथ शांति और सत्य का प्रतीक है। निचली हरी पट्टी उर्वरताए वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है। सफ़ेद पट्टी पर बने चक्र को धर्म चक्र कहते हैं। इस धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तृतीय शताब्दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है। इस चक्र को प्रदर्शित करने का आशय यह है कि जीवन गति‍शील है और रुकने का अर्थ मृत्यु है।

विधान सौदा बेंगलुरु ;बंगलोरद्ध के ऊपर भारतीय झंडा और राज्य प्रतीक
1950 में भारत के गणतंत्र बनने के उपरांतए भारतीय मानक ब्यूरो ;बीआईएसद्ध ने 1951 में पहली बार ध्वज की कुछ विशिष्टताएँ बताईं। ये 1964 में संशोधित की गयींए जो भारत में मीट्रिक प्रणाली के अनुरूप थीं। इन निर्देशों को आगे चलकर 17 अगस्त 1968 में संशोधित किया गया। ये दिशा निर्देश अत्यंत कड़े हैं और झंडे के विनिर्माण में कोई दोष एक गंभीर अपराध समझा जाता हैए जिसके लिए जुर्माना या जेल या दोनों सजाएं भी हो सकती हैं।
ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड ;बीआईएसद्ध द्वारा राष्ट्रध्वज को तैयार करने के तीन दस्तावेज जारी किए गए हैं। इसमें कहा गया है कि सभी झंडे खादी के सिल्क या कॉटन के होंगे। झंडे बनाने का मानक 1968 में तय किया गया जिसे 2008 में पुनरू संशोधित किया गया। तिरंगे के लिए नौ स्टैंडर्ड ;मानकद्ध साइज तय किए गए हैं। सबसे बड़ा झंडा 21 फीट लंबा और 14 फीट चौड़ा होता है। सबसे पहले बैंगलुरू से लगभग 550 किमी दूर स्थित बगालकोट जिले के खादी ग्रामोद्योग सयुक्त संघ में कपड़े को बहुत ध्यान से काता और बुना जाता है। इसके बाद कपड़े को तीन अलग.अलग लॉट बनाए जाते हैं। इन को तिरंगे के तीन अलग.अलग रंगो में डाई किया जाता है। डाई किए हुए कपड़े बैंगलुरू से 420 किमी स्थित हुबली इकाई में भेज दिए जाते हैं। यहां इन्हें अगल.अलग साइज के अनुसार काटा जाता है। कटे हुए कपड़े को हुबली में ही सिला जाता। यहां लगभग 40 महिलाएं प्रतिदिन 100 के करीब झंडे सिलती हैं। कटे हुए सफेद कपड़े पर चक्र प्रिंट किया जाता है। इसके बाद तिरंगे की तीनों रंग के कपड़े की सिलाई की जाती है। सिलाई के बाद कपड़े को पेस किया जाता है।
केवल खादी या हाथ से काता गया कपड़ा ही झंडे के लिए उपयुक्त माना जाता है। खादी के लिए कच्चा माल केवल कपासए रेशम और ऊन हैं। झंडा बनाने में दो तरह के खादी का उपयोग किया जाता हैए एक वह खादीए जिससे कपडा बनता है और दूसरा है खादी.टाटए जो बेज रंग का होता है और खम्भे में पहनाया जाता है। खादी टाट एक असामान्य प्रकार की बुनाई है जिसमें तीन धागों के जाल जैसे बनते हैं। यह परम्परागत बुनाई से भिन्न हैए जहां दो धागों को बुना जाता है। इस प्रकार की बुनाई अत्यंत दुर्लभ हैए इस कौशल को बनाए रखने वाले बुनकर भारत में एक दर्जन से भी कम हैं। दिशा.निर्देश में यह भी बताया गया है कि प्रति वर्ग सेंटीमीटर में 150 सूत्र होने चाहिएए इसके साथ ही कपड़े में प्रति चार सूत्र और एक वर्ग फुट का शुद्ध भार 205 ग्राम ही होना चाहिये। इस बुनी खादी को धारवाड़ के निकट गदग और उत्तरी कर्नाटक के बागलकोट जिलों के दो इकाइयों से प्राप्त किया जाता है ।
वर्तमान मेंए हुबली में स्थित कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संयुक्त संघ को ही एक मात्र लाइसेंस प्राप्त है जो झंडा उत्पादन और आपूर्ति करता है। यद्यपि भारत में झंडा विनिर्माण इकाइयों की स्थापना की अनुमति खादी विकास और ग्रामीण उद्योग आयोग ;केवीअईसीद्ध द्वारा दिया जाता है परन्तु यदि दिशा.निर्देशों की अवज्ञा की गयी तो बीआईएस को इन्हें रद्द करने के सारे अधिकार प्राप्त हैं।
बुनाई पूरी होने के बादए सामग्री को परीक्षण के लिए बीआईएस प्रयोगशालाओं में भेजा जाता है। कड़े गुणवत्ता परीक्षण करने के बादए यदि झंडा अनुमोदित हो जाता है तोए उसे कारखाने वापस भेज दिया जाता है। तब उसे प्रक्षालित कर संबंधित रंगों में रंग दिया जाता है। केंद्र में अशोक चक्र को स्क्रीन मुद्रितए स्टेंसिल्ड या काढा जाता है। विशेष ध्यान इस बात को दिया जाना चाहिए कि चक्र अच्छी तरह से मिलता हो और दोनों तरफ ठीक से दिखाई देता हो। बीआईएस झंडे की जांच करता है और तभी वह बेचा जा सकता हैं।, भारत में सालाना लगभग चार करोड़ झंडे बिकते हैं। भारत में सबसे बड़ा झंडा ;613× 412 मीण्द्ध राज्य प्रशासनिक मुख्यालयए महाराष्ट्र के मंत्रालय भवन से फहराया जाता है।

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