लेखक परिचय

डॉ. राजेश कपूर

डॉ. राजेश कपूर

लेखक पारम्‍परिक चिकित्‍सक हैं और समसामयिक मुद्दों पर टिप्‍पणी करते रहते हैं। अनेक असाध्य रोगों के सरल स्वदेशी समाधान, अनेक जड़ी-बूटियों पर शोध और प्रयोग, प्रान्त व राष्ट्रिय स्तर पर पत्र पठन-प्रकाशन व वार्ताएं (आयुर्वेद और जैविक खेती), आपात काल में नौ मास की जेल यात्रा, 'गवाक्ष भारती' मासिक का सम्पादन-प्रकाशन, आजकल स्वाध्याय व लेखनएवं चिकित्सालय का संचालन. रूचि के विशेष विषय: पारंपरिक चिकित्सा, जैविक खेती, हमारा सही गौरवशाली अतीत, भारत विरोधी छद्म आक्रमण.

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-डा. राजेश कपूर, पारम्परिक चिकित्सक

पता नहीं भारत में कब और कैसे ये छुआ-छूत का विषधर सांप घुस गया? पूर्वाग्रहों को छोड़ कर ज़रा तथ्यों व प्रमाणों की रोशनी में देखें तो पता चलता है कि भारत में जातियां तो थीं पर छुआ- छूत नहीं. स्वयं अंग्रेजों के द्वारा दिए आंकड़े इसके प्रमाण हैं.

भारत को कमज़ोर बनाने की अनेक चालें चलने वाले अंग्रेजों ने आंकड़े जुटाने और हमारी कमजोरी व विशेषताओं को जानने के लिए सर्वे करवाए थे. उन सर्वेक्षणों के तथ्यों और आज के झूठे इतिहास के कथनों में ज़मीन आस्मान का अंतर है.

सन १८२० में एडम स्मिथ नामक अँगरेज़ ने एक सर्वेक्षण किया. एक सर्वेक्षण टी. बी. मैकाले ने १८३५ करवाया था. इन सर्वेक्षणों से ज्ञात और अनेक तथ्यों के इलावा ये पता चलता है कि तबतक भारत में अस्पृश्यता नाम की बीमारी नहीं थी.

यह सर्वे बतलाता है कि—

# तब भारत के विद्यालयों में औसतन २६% ऊंची जातियों के विद्यार्थी पढ़ते थे तथा ६४% छोटी जातियों के छात्र थे.

# १००० शिक्षकों में २०० द्विज / ब्राह्मण और शेष डोम जाती तक के शिक्षक थे. स्वर्ण कहलाने वाली जातियों के छात्र भी उनसे बिना किसी भेद-भाव के पढ़ते थे.

# मद्रास प्रेजीडेन्सी में तब १५०० ( ये भी अविश्वसनीय है न ) मेडिकल कालेज थे जिनमें एम्.एस. डिग्री के बराबर शिक्षा दी जाती थी. ( आज सारे भारत में इतने मेडिकल कालेज नहीं होंगे.)

# दक्षिण भारत में २२०० ( कमाल है! ) इंजीनियरिंग कालेज थे जिनमें एम्.ई. स्तर की शीशा दी जाती थी.

# मेडिकल कालेजों के अधिकांश सर्जन नाई जाती के थे और इंजीनियरिंग कालेज के अधिकाँश आचार्य पेरियार जाती के थे. स्मरणीय है कि आज छोटी जाती के समझे जाने वाले इन पेरियार वास्तुकारों ने ही मदुरई आदि दक्षिण भारत के अद्भुत वास्तु वाले मंदिर बनाए हैं.

# तब के मद्रास के जिला कलेक्टर ए.ओ.ह्युम ( जी हाँ, वही कांग्रेस संस्थापक) ने लिखित आदेश निकालकर पेरियार वास्तुकारों पर रोक लगा दी थी कि वे मंदिर निर्माण नहीं कर सकते. इस आदेश को कानून बना दिया था.

# ये नाई सर्जन या वैद्य कितने योग्य थे इसका अनुमान एक घटना से हो जाता है. सन १७८१ में कर्नल कूट ने हैदर अली पर आक्रमण किया और उससे हार गया . हैदर अली ने कर्नल कूट को मारने के बजाय उसकी नाक काट कर उसे भगा दिया. भागते, भटकते कूट बेलगाँव नामक स्थान पर पहुंचा तो एक नाई सर्जन को उसपर दया आगई. उसने कूट की नई नाक कुछ ही दिनों में बनादी. हैरान हुआ कर्नल कूट ब्रिटिश पार्लियामेंट में गया और उसने सबने अपनी नाक दिखा कर बताया कि मेरी कटी नाक किस प्रकार एक भारतीय सर्जन ने बनाई है. नाक कटने का कोई निशान तक नहीं बचा था. उस समय तक दुनिया को प्लास्टिक सर्जरी की कोई जानकारी नहीं थी. तब इंग्लॅण्ड के चकित्सक उसी भारतीय सर्जन के पास आये और उससे शल्य चिकित्सा, प्लास्टिक सर्जरी सीखी. उसके बाद उन अंग्रेजों के द्वारा यूरोप में यह प्लास्टिक सर्जरी पहुंची.

### अब ज़रा सोचें कि भारत में आज से केवल १७५ साल पहले तक तो कोई जातिवाद याने छुआ-छूत नहीं थी. कार्य विभाजन, कला-कौशल की वृद्धी, समृद्धी के लिए जातियां तो ज़रूर थीं पर जातियों के नाम पर ये घृणा, विद्वेष, अमानवीय व्यवहार नहीं था. फिर ये कुरीति कब और किसके द्वारा और क्यों प्रचलित कीगई ? हज़ारों साल में जो नहीं था वह कैसे होगया? अपने देश-समाज की रक्षा व सम्मान के लिए इस पर खोज, शोध करने की ज़रूरत है. यह अमानवीय व्यवहार बंद होना ही चाहिए और इसे प्रचलित करने वालों के चेहरों से नकाब हमें हटनी चाहिए. साथ ही बंद होना चाहिए ये भारत को चुन-चुन कर लांछित करने के, हीनता बोध जगाने के सुनियोजित प्रयास. हमें अपनी कमियों के साथ-साथ गुणों का भी तो स्मरण करते रहना चाहिए जिससे समाज हीन ग्रंथी का शिकार न बन जाये. यही तो करना चाह रहे हैं हमारे चहने वाले, हमें कजोर बनाने वाले. उनकी चाल सफ़ल करने में‚ सहयोग करना है या उन्हें विफ़ल बनाना है? ये ध्यान रहे!

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26 Comments on "भारत में छुआ-छूत नहीं थी / डॉ. राजेश कपूर"

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Peeyush Chaturvedi
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वेदों के बारे में मैकाले के मानसपुत्रों ने कुछ भ्रान्तिया फैलाई हैं , उन्ही भ्रांतियों में से एक यह भी है कि वे ब्राह्मणवादी ग्रंथ हैं और शूद्रों के साथ अन्याय करते हैं | यही नहीं मैकाले के मानस पुत्रों द्वारा हिन्दू/सनातन/वैदिक धर्म का मुखौटा बने जातिवाद की जड़ भी वेदों में बताई जा रही है और इन्हीं विषैले विचारों पर दलित आन्दोलन इस देश में चलाया जा रहा है | परंतु, इस से बड़ा असत्य और कोई नहीं है | इस पोस्ट में इस मिथ्या मान्यता को खंडित करते हुए, वेद से स्थापित करेंगे कि – १. चारों वर्णों… Read more »
डॉ. राजेश कपूर
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इतिहास की एक रोचक और बड़े महत्व की जानकारी सुधि पाठकों के लिए है कि……….. भारत में अंग्रेजों के आने से पहले भी स्वदेशी तकनीक से चेचक का टीकाकरण होता था. आई.आई.टी दिल्ली के प्रो राजेन्द्र जी ने भी यह जानकारी प्राप्त की थी और अनेक कार्यक्रमों में इसकी जानकारी वे देते रहते हैं. # १० फ़रवरी,१७३१ को ओलिवर कोल्ट के नाम आर. कोल्ट ने एक पत्र लिख कर इसकी जानकारी देते हुए लिखा था कि गंगा के तट पर कासिम बाज़ार से आगे चंपारण कस्बे में चेचक का टीकाकरण बड़ी सफलता से होता हुआ उसने देखा था. इसीप्रकार ऍफ़.आर.एस.,… Read more »
डॉ. मधुसूदन
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जाति एक ब्रिटीश कुचेष्टा” अनुवाद: डॉ. मधुसूदन एक पुस्तक अकस्मात हाथ लगी।बस, ले लीजिए उसे आप यदि ले सकते हैं तो। नाम है, , “Castes of Mind: Colonialism and Making of British India” अर्थात “मानसिक जातियां : उपनिवेशवाद और ब्रिटीश राज का भारत में गठन” और लिखी गयी है, एक इतिहास और मानव विज्ञान के अमरिकन प्रोफेसर Nicholas D. Durks द्वारा। लेखक तर्क देकर पुष्टि भी करते हैं, कि वास्तविक वे अंग्रेज़ ही हैं, जिन्होंने जाति व्यवस्था के घृणात्मक रूपका आधुनिक आविष्कार किया, और कपटपूर्ण षड-यंत्र की चाल से जन-मानस में, उसे रूढ किया। आगे लेखक कहते हैं कि, जाति… Read more »
shelley khatri
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आपके तथ्य सही हैं, पर यह भी सच है की अंग्रजो के पहले से ही यहाँ छुआछूत आ चूका था, अछूतों का मंदिर में प्रवेश वर्जित होना, एकलव्य की घटना, parshuram or karn की kath aadi kitna kuchh है ise sabit karne के liye .

डॉ. राजेश कपूर
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* इतिहास तथ्यों के आधार पर चलता है. हम तथ्यों के विश्लेषण में मतभेद तो रख सकते हैं पर तथ्यों को नकार नहीं सकते, उनसे मुंह नहीं चुरा सकते. * जो कहते हैं की हमको ऐतिहासिक तथ्य नहीं जानने, केवल पौराणिक ग्रंथों से ही अस्पृश्यता के प्रमाण निकालने हैं. तो इससे क्या समझा जाए ? अर्थात उनकी नीयत की खोट सामने उन्ही के शब्दों में आगई. वे सच से भागना चाहते हैं और केवल-केवल वही कहना, सुनना, सुनाना चाहते हैं जो भारत, भारतीयता या हिन्दू के विरुद्ध है. यही तो हम सब भी चाहते हैं की इनकी वास्तविकता, इनकी असली… Read more »
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