लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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taimur lang

दिल्ली यूं तो अब से पूर्व कई विदेशी आक्रांता या बलात् अधिकार कर दिल्ली के सुल्तान बन बैठे शासकों के आतंक और अत्याचार का शिकार कई बार बन चुकी थी, पर इस बार का विदेशी आक्रांता और भी अधिक क्रूरता की वर्षा करने के लिए आ रहा था। हिंदू प्रतिरोध यद्यपि निरंतर जारी था, परंतु दिल्ली पर नियंत्रण स्थापित कर पुन: हिंदू राज्य स्थापित करने की सारी चेष्टाएं निष्फल जा रही थीं।

दिल्ली नही थी सुरक्षित

मुगलों ने दिल्ली सल्तनत के अब तक के इतिहास में अनेकों बार भारत के भू-भाग को हथियाने के लिए आक्रमण किये, परंतु वे अभी तक असफल रहे थे। दिल्ली का तुगलक वंश लड़खड़ा रहा था, और अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था। ऐसे समय में दिल्ली को पूर्णत: सुरक्षित नही कहा जा सकता था। देश का बहुसंख्यक हिंदू दिल्ली को पुन: प्राप्त नही कर पा रहा था और बलात दिल्ली के शासक बने विदेशी तुर्कों की शक्ति क्षीण हो चुकी थी। जिनके विनाश की कामना यहां का बहु संख्यक वर्ग हिंदू चौबीसों घंटे किया करता था।

सत्ता और जनता में थी दूरी

कहने का अभिप्राय है कि दिल्ली के साथ सत्ता तो थी पर जनता नही थी और जनता के पास सत्ता नही थी। इसलिए सत्ता और जनता में दूरी थी एकात्मकता नही थी, समरूपता नही थी। इतिहास के इस सच को लोगों ने उपेक्षित करते हुए हमें यह समझाने का प्रयास किया है कि हम परस्पर फूट से ग्रस्त थे और विदेशी हमारी पारस्परिक फूट का लाभ उठाने मेंं सफल रहे।

हम मानते हैं कि इस प्रकार के कथन में सत्यांश हो सकता है, परंतु यह पूर्ण सत्य नही हो सकता। हमारी फूट का आधार जनता और सत्ता के मध्य का ऊपरिलखित अंतद्र्वद्व ही था

हिन्दू की दयनीय स्थिति

इस देश के मूल निवासी हिन्दू से उसके मौलिक अधिकार छीन लिये गये थे और देश के आर्थिक संसाधनों से उसका प्रथम अधिकार छीनकर मुस्लिमों को दे दिया था, हिंदू जितना ही अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करता था, उसे उतना ही दलन, दमन, शोषण और उत्पीडऩ की चक्की में क्रूरता से पीसा जाता था।

हिन्दू की मानसिकता…..

सत्ता के इस क्रूर स्वरूप से हिंदू मुक्त होना चाहता था और सत्ता उसे अपने शिकंजे में कसे रखना चाहती थी। इसलिए देश के मुस्लिम शासकों पर यदि कोई अन्य विदेशी मुस्लिम शासक हमला करता था तो उस समय हमारे देश का हिंदू उस विदेशी नये हमलावर के विरूद्घ अपने देश के शासक वर्ग के साथ नही होता था। इसका कारण ये था कि एक तो हिंदू को यह भली प्रकार ज्ञात था कि आने वाले आक्रांता के शासल काल में भी उसके साथ अन्याय और अत्याचार का वर्तमान क्रम ही चलते रहना है, दूसरे जिस सत्ता को वह स्वयं उखाड़ देना चाहता है, उसको विदेशी के विरूद्घ सहायता देना हिंदू उचित नही मानता था, विशेषत: तब जब विदेशी आक्रांता का अंतिम उद्देश्य भी हिंदुस्थान के क्रूर शासन का अंत करना ही था।

सत्ता कभी राष्ट्र नही हो सकती

कुछ लोगों ने भारतवर्ष के हिंदू समाज की अपने शासक वर्ग (मुस्लिम सुल्तानों) के प्रति अपनायी गयी ऐसी नीति की ये कहकर आलोचना की है कि भारतवर्ष में कभी राष्ट्रवाद की भावना नही रही। हम इस प्रकार की आलोचना को समालोचना न मानकर केवल ‘निंदा वचन’ मानते हैं और ‘निंदा वचनों’ में कभी ईमानदारी नही हो सकती। ऐसे ‘निंदा वचन’ कहने वाले लोगों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि सत्ता के साथ विद्रोह ‘राष्ट्र के साथ विद्रोह’ कभी नही हो सकता। कारण कि सत्ता कभी राष्ट्र नही हो सकती। सत्ता को राष्ट्र के साथ समरूप होना चाहिए।

सत्ता खो देती है राष्ट्र की निष्ठा

जो सत्ता राष्ट्र के मूल्यों का वध करने लगती है, वह सत्ता राष्ट्र के निवासियों की और राष्ट्र की निष्ठा खो देती है। इसलिए राष्ट्र की परिभाषा के नियामक तत्वों में उस राष्ट्र की सत्ता या शासक वर्ग का उस राष्ट्र के राष्ट्रीय मूल्यों सम्प्रभुता और निवासियों के मौलिक अधिकारों के प्रति संवेदनशील होना अनिवार्य है। जो शासक वर्ग लोक की मान्यता प्राप्त नही कर पाता है वह शासन कभी ‘लोकमान्य’ नही हो सकता। भारत के मुस्लिम शासकों को यहां के लोगों की मान्यता कभी नही मिली, इसलिए लोक से बहिष्कृत तिरस्कृत और उपेक्षित सत्ता या शासक वर्ग के किसी भी प्रकार के समर्थन की आवश्यकता नही थी। अत: इतिहासकारों को भारत के लोगों के द्वारा अपने तत्कालीन शासक वर्ग का सहयोग न करने को यह कहकर आलोचना से बचने का प्रयास करना चाहिए कि भारतीयों में कभी राष्ट्रवादिता की भावना थी ही नही।

तैमूर बढ़ता आ रहा था

ऐसी परिस्थितियों में दिल्ली की ओर तैमूर बढ़ता जा रहा था। अपनी जीवनी में वह कहता है-‘‘दिल्ली पर मेरे अंतिम हमले से पूर्व मुझे यह बताया गया कि हिंदुस्तान में प्रवेश करने से आज तक हम लोगों ने एक लाख हिंदुओं को कैद किया है ये सभी कैदी मेरे पड़ाव में थे। मैंने अपने दरबारियों से परामर्श किया कि इन कैदियों का क्या किया जाए? उन लोगों ने बताया कि युद्घ के दिन एक लाख कैदियों को सामान के पास नही छोड़ा जा सकता। उस पर इन बुत परस्तों और इस्लाम के शत्रुओं को स्वतंत्र छोड़ देना युद्घ के नियमों के विरूद्घ होगा। उन लोगों का यह परामर्श मुझे युद्घ के नियमों और नीति के अनुकूल लगा। मैंने सारे पड़ाव के लिए घोषणा कर आदेश जारी किया कि जो कोई व्यक्ति इस आदेश को न मानेगा उसका वध कर दिया जाएगा और उसकी सारी चीजें ऐसी सूचना देने वाले को दे दी जाएंगी। इस्लाम के गाजियों को जब इस आदेश की जानकारी हुई तो उन लोगों ने अपनी अपनी कटारें खींच ली, और अपने अपने कैदियों की हत्या कर दी। मौलाना नासिरूद्दीन उमर मेरा परामर्शदाता और उच्च शिक्षित व्यक्ति था, उसने अपने जीवन में एक चिडिय़ा को भी नही मारा होगा अब उसी ने मेरी आज्ञा का पालन करने के लिए अपनी तलवार से 15 मूत्र्ति पूजक हिंदुओं की हत्या कर दी थी, जो उसकी कैद में थे।’’

उन एक लाख हिंदुओं को हमारा प्रणाम

स्वंय तैमूर की जीवनी के इस उद्घरण से स्पष्ट है कि दिल्ली में प्रवेश पाने से पूर्व अब तक के एक लाख हिन्दू बंदियों को कितनी निर्ममता से मृत्यु के घाट उतार दिया गया। हमारे वह निहत्थे और असहाय हिंदू पूर्वज कितने आत्माभिमानी, स्वाभिमानी और बलिदानी भावना से ओत प्रोत थे, जिन्होंने तैमूर की तलवार के अत्याचारों के सामने झुककर अपना धर्मांतरण स्वीकार नही किया और बड़ी सहजता से मृत्यु को गले लगा लिया। किसी से मिलने की उनकी इच्छा ना तो पूछी गयी और ना ही उन्होंने किसी से मिलने की इच्छा व्यक्त की, क्योंकि मिलने की इच्छा व्यक्त करना भी उस समय दुर्बलता थी और शत्रु को अपने ऊपर और भी अधिक अत्याचार करने के लिए प्रेरित करना था।

मरने वालों की प्रार्थना होती थी….

एक एक हिंदू के सामने अपने दूसरे भाई का सिर कटकर एक बार हवा में उड़ता और धांय से पृथ्वी पर आ गिरता। देखने वाला केवल अपने ईश्वर को स्मरण करता और उससे केवल यही प्रार्थना करता कि-‘‘हे दयानिधे! मुझे अपने धर्म पर अडिग रखना  मैं किंचित भी डगमगाऊं नही और अपने सर्वोत्कृष्ट बलिदान को देकर आपके श्रीचरणों में स्थान पाऊं।’’

 ईश्वर-अल्लाह का अंतर

तैमूर और उसकी सेना का अल्लाह उन्हें ‘काफिरों’ को मारने की प्रेरणा दे रहा था तो हमारा ईश्वर हमें निज धर्म की रक्षा के लिए मरने की प्रेरणा दे रहा था। जो लोग ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’ कहकर उस शक्ति को एक ही मानते हैं, उन्हें यहां ईश्वर और अल्लाह के मध्य का अंतर स्वत: स्पष्ट हो जाना चाहिए।

तैमूर का दिल्ली में प्रवेश

17 दिसंबर 1398 को तैमूर की सेना ने दिल्ली में प्रवेश किया। दिल्ली की हिंदू जनता को नये आक्रांता के अत्याचारों की भनक लग चुकी थी कि उसने किस प्रकार एक लाख हिंदू कैदियों को दिल्ली में प्रवेश पाने से पूर्व ही ‘शकुन’ बनाने के लिए समाप्त करा दिया है। इसलिए उसने भी अपने आपको युद्घ करने और मरने के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार कर लिया। कुछ लोगों ने भयभीत होकर दिल्ली को छोड़ दिया तो कुछ ने तैमूर के अत्याचारों से बचने के लिए अपने परिवार सहित किसी भी प्रकार से आत्महत्या का मार्ग अपना लिया।

अब क्या खाक मुसलमां होंगे

यह मुहावरा हमें अक्सर सुनने ेको मिलता है कि ‘अब आखिर में क्या खाक मुसलमां होंगे?’ यह उन हिंदू वीरों का ही एक उद्घोष था जो मध्यकालीन भारत के स्वतंत्रता सैनानी थे और अंतिम क्षणों तक अपने धर्म की रक्षा  के लिए कृत संकल्प रहते थे। उनसे मृत्यु के अंतिम क्षणों में कई बार जब ‘इस्लाम या मौत’ में से एक को चुनने की बात कही जाती थी तो वे अक्सर यही बात कहा करते थे कि जिस धर्म की रक्षार्थ (हिंदुत्व) पूरा जीवन संघर्ष में लगा दिया और उस समय मृत्यु से भय नही लगा, तो अब दो चार पलों के जीवन के लिए अंतिम क्षणों में क्या मुसलमां होंगे? हमारे वीर पूर्वजों की वीरता और शौर्य का प्रतीक यह मुहावरा बड़ी सरलता से कह दिया जाता है। जबकि इसके पीछे हमारी शौर्य परंपरा की एक गौरवमयी गाथा है। उसकी ओर हमारा ध्यान नही जाता क्योंकि प्रचलित इतिहास ने हमारी गौरव गाथा को विलुप्त करने का हरसंभव प्रयास किया है, और उसी प्रयास के तले दबकर यह मुहावरा भी अपनी गौरवगाथा की पुण्य आभा से हीन हो चुका है।

दिल्ली के रक्तपात की कहानी

दिल्ली में प्रविष्ट होकर तैमूर और उसकी सेना ने किस प्रकार का तांडव मचाया उसे अपने शब्दों में न रखकर तैमूर के शब्दों में ही लिखा जाना उचित होगा। तैमूर लिखता है-

सिपाही हिंदुओं को पकडऩे के लिए जब आगे बढ़े तो बहुतों ने अपनी तलवारें खींच लीं। (इसका अभिप्राय है कि हिंदुओं ने तैमूर का प्रतिरोध किया) इस लड़ाई से लगी हुई आग सभी कुछ जलाती हुई सीरी से लेकर पुरानी दिल्ली तक फैल गयी। क्रोधित होकर तुर्क काटने-लूटने में लग गये हिंदुओं (आत्मरक्षार्थ और निज धर्म को बचाने के लिए) ने अपने घरों में अपने हाथ से आग लगा दी, अपनी स्त्रियों तथा बच्चों को उसमें जला दिया, फिर लडऩे दौड़े और मारे गये। हिंदुओं ने लड़ाई में बड़ी फुर्ती और वीरता दिखाई। (इतने भयंकर रक्तपात के मध्य भी हिंदुओं की फुर्ती और वीरता को शत्रु से प्रशंसा मिलना उनके शौर्य की गौरवमयी गाथा का सुंदर चित्रण है) बृहस्पतिवार और शुक्रवार की सारी रात लगभग 15 हजार तुर्क काटने, लूटने और विनाश करने में लगे रहे। शुक्रवार की प्रात: मेरी सेना मेरे नियंत्रण से बाहर हो गयी। शहर में जाकर उन लोगों ने कुछ भी सोच-विचार नही किया। काटने, लूटने और (हिंदुओं का) विनाश करने में लग गये। सारे दिन मारकाट (भयंकर स्तर पर) चलती रही। लूट इतनी अधिक थी कि हर व्यक्ति (तुर्क सैनिक) के पास 50 से 100 कैदी थे, जिनमें स्त्रियां पुरूष और बच्चे सभी थे। हीरे, जवाहरात, माणिक, मोती, सोने, चांदी के गहने अशर्फी, सोने चांदी के टंके, सोने चांदी के बर्तन, कीमती कपड़े और रेशम आदि का लूट का बहुत अधिक सामान हाथ लगा। …मुसलमानों के रहने के लिए सारा शहर खाली हो गया।’’

हिंदू ने दिखायी अपनी देशभक्ति

तैमूर के इस वर्णन पर यदि समीक्षा की जाए तो स्पष्ट होता है कि शहर के वीर हिंदुओं ने जहां तुर्क सेना के अत्याचारों का डटकर सामना किया वहीं आत्महत्या करना या पूरे परिवार को अग्नि के समर्पित करने और पलायन आदि करके शहर को खाली करने की घटनाएं भी अपरिमित स्तर पर हुई होंगी तभी तो तैमूर को यह लिखना पड़ा कि सारा शहर ही खाली हो गया था।

हिंदुओं का साहस दर्शनीय था

हिंदुओं ने अपने चारों ओर शवों को देखा उन्हें यह भी पता था कि दिल्ली में उनका रक्षक अब ईश्वर के अतिरिक्त और कोई नही था, परंतु इसके उपरांत भी उनका साहस दर्शनीय था। उनका एक दल बड़ी वीरता और साहस के साथ आगे बढ़ा और दिल्ली जामा मस्जिद के पास मुस्लिमों पर आक्रमण करने के लिए एकत्र हो गया। तैमूर आगे लिखता है-‘‘बहुत से हिंदू हथियार और राशन लेकर दिल्ली की मस्जिद-ए-जामी (जामा मस्जिद) में जमा हो गये और बचाव की तैयारी कर रहे हैं। मेरे कुछ सिपाही उधर जा रहे हैं। हिंदुओं ने (आक्रमण कर) उन लोगों को घायल कर दिया। मैंने तुरंत अमीर शाह मलिक और अली सुल्तान तबाची को काफिरों और मूर्ति पूजकों से अल्लाह के घर को खाली करवाने का आदेश दिया। उन लोगों ने काफिरों पर हमला करके सभी को समाप्त कर दिया। इसके बाद पुरानी दिल्ली लूट ली गयी।’’

दिल्ली बन गयी भूतों का बसेरा

इस प्रकार हिंदुओं के साहस को दंडित किया गया और दिल्ली  हिंदू विहीन हो गयी। सारी दिल्ली भूतों का बसेरा बन चुकी थी। कटी हुई लाशें, सिसकते हुए जीवन, मंडराते हुए गिद्घ और कौवे, मानव शवों पर झगड़ते कुत्ते और सर्वत्र शवों के सडऩे की दुर्गंध इस सबके मध्य भी तुर्क सेना हिंदू आवासों में स्त्रियों के आभूषणों को खोजने और यदि कहीं उनके सौभाग्य से कोई हिंदू स्त्री मिल जाए तो उसका शील भंग करने की अमानवीय कार्यवाहियों में लगे हुए थे। मानवता कहीं दूर-दूर तक भी दृष्टिगोचर नहीं हो रही थी, सर्वत्र दानवता का नग्न नृत्य हो रहा था। जब उन शवों से सड़ती दुर्गंधित राजधानी दिल्ली में मुस्लिमों के लिए ठहरना भी कठिन हो गया और जब उन्हें इस बात का पूर्ण विश्वास हो गया कि अब दिल्ली में लूट के लिए शेष कुछ भी नही बचा है, तो उन्होंने दिल्ली को उस समय छोडऩा ही उचित समझा।

तैमूर ने किया दिल्ली का वर्णन

तैमूर लिखता है-‘‘मैंने दिल्ली के निवासियों के और अधिक विनाश में और रूचि नही ली। सवार होकर मैं नगरों के चारों ओर (घोड़े पर) घूमा। सीरी एक गोलशहर है। इसके भवन ऊंचे-ऊंचे हैं। यह नगरी चारों ओर से किलेबंदी से घिरी हुई है। पुरानी दिल्ली में भी एक ऐसा ही सुदृढ़ दुर्ग है। (इस दुर्ग से तैमूर का अभिप्राय लालकिले से लिया जा सकता है) परंतु यह श्री के दुर्ग से बड़ा है।’’

लौटते हुए तैमूर का हिन्दू शक्ति ने किया प्रतिरोध

हिंदुओं का साहस भी देखने योग्य था। ऐसे कितने ही संघर्ष हुए हैं, जब हिंदुओं ने अपने किसी राजा की या सेनापति की प्रतीक्षा न करके हिंदुत्व और मां भारती की सेवा के लिए स्वयं को एक ऐसे दल के रूप में एकत्र किया, जिसका नेता कोई स्थानीय साधारण व्यक्ति बन जाता था और तुर्क सेनाओं पर प्राणों की चिंता किये बिना ही टूट पड़ता था। ऐसे वीरता पूर्ण हिंदू कृत्यों का वर्णन हम पूर्व के कई पृष्ठों पर कर चुके हैं।

अब तैमूर के समय में भी हिंदुओं ने अपनी वीरता का वही इतिहास दोहराया। तैमूर जब हिंदुस्तान से स्वदेश लौट रहा था, तो उसने अपना यात्रामार्ग ऐसे स्थलों से चुना जो उसे हिंदुओं से सुरक्षित रख सके। मुहम्मद हबीब के अनुसार तैमूर ने पिछले समय के मंगोल अनुभव से प्रेरित होकर  हिमालय पर्वत और शिवालिक पर्वत माला के मध्य का क्षेत्र चुना।

स्टडीज इन इण्डो मुस्लिम हिस्ट्री खण्ड 1 पृष्ठ 356 के अनुसार तैमूर गंगा नदी के किनारे-किनारे तुगलुकपुर की ओर बढ़ा (यह गांव मुजफ्फर नगर से सत्रह मील उत्तर पूर्व में है) जब वह तुगलुकपुर से 5 कोस की दूरी पर पहुंचा तो उसे सूचना प्राप्त हुई कि मार्ग में एक स्थान पर हिंदू उसके प्रतिरोध के लिए एकत्र हो गये हैं।

दिल्ली की पीड़ा से दुखी था हिंदू

हिंदू के रोम-रोम में दिल्ली की पीड़ा बोल रही थी उन तक दिल्ली और दूसरे स्थानों पर तुगलक के अत्याचारों और हिंदू विनाश की पीड़ादायक कहानी किसी न किसी रूप में पहुंच चुकी थी। इसलिए उन्हेंाने देश से लौटते हुए तैमूर पर वीरतापूर्वक आक्रमण किया। इन लोगों ने कम संख्या में होने के उपरांत भी मुस्लिमों से घोर संघर्ष किया और अपना प्राणोत्सर्ग कर देश के बलिदानी इतिहास में अपनी देशभक्ति के कार्य को अमर कर दिया। इन वीर हिंदुओं के बलिदान हो जाने पर मुस्लिम सेना ने इनकी स्त्रियों और बच्चों को कैद कर लिया। परंतु आग तो आग होती है, वह भी यदि जंगल में फेेल जाए तो बुझनी असंभव हो जाती है। यही स्थिति प्रतिरोध की थी। हिंदू प्रतिरोध की अग्नि एक स्थान पर शांत होती तो दूसरे स्थान पर जा लगती।

हिंदुओं का दूसरा प्रतिरोध

तुगलुकपुर के हिंदुओं के बलिदान की सुर्खियां सूख भी नही पायी थीं कि थोड़ी देर में ही तैमूर को पुन: सूचना मिली कि कुछ दूरी पर हिंदू एक बार पुन: एकत्रित हो रहे हैं और उनका मुस्लिम सेना से युद्घ अपरिहार्य है।

‘मुलफुजात-ए-तैमूरी’ के अनुसार 13 जनवरी 1399 को तैमूर की सेना और हिंदुओं के मध्य भयंकर संग्राम हुआ। इस संग्राम में हिंदू पराजित हुए और भाग खड़े हुए।

हरिद्वार ने भी किया प्रतिरोध

हरिद्वार ने अपने जन्मकाल से ही हिंदू समाज का मार्गदर्शन किया है। यह हिंदुओं की धर्म नगरी कही जाती है। हमारा धर्म-‘कर्म और विज्ञान’ का समुच्चय कहा जाता है। अत: हरिद्वार के लिए यह भला कैसे संभव था कि जब सारे देश में ही सर्वत्र प्रतिरोध की बयार बह रही थी तो वह शांत रह जाता?

हिंदू समाज की सुरक्षा के लिए तब हरिद्वार आगे आया। हरिद्वार अपने लिए यह कैसे कहलवा सकता था कि वह केवल धार्मिक सहिष्णुता की आत्मघाती उपदेशात्मक शैली का अवलंबन करते हुए सही समय पर कत्र्तव्य से च्युत हो गया और उसने हिंदुओं में शौर्य का भाव भरकर अपने धर्म की रक्षा के लिए प्रेरित नही किया? हरिद्वार ने अपना धर्म समझा और विदेशी आततायी को दंडित करने का निर्णय लिया।

वहां (तैमूर की जीवनी के अनुसार) बड़ी संख्या में हिंदू एकत्र हो गये। जब तैमूर हरिद्वार पहुंचा तो उसे हिंदुओं के विषय में जानकारी मिली कि उसे यहां भी इन लोगों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। अत: उसने अपनी अन्य सेना के आने की प्रतीक्षा की। रविवार के दिन पीर मुहम्मद और सुलेमान शाह के नेतृत्व में आसपास युद्घ के  लिए भेजी गयी तैमूर की शेष सेना भी आ पहुंची, जिससे उत्साहित होकर तैमूर ने उसी दिन मध्यान्ह और सायंकाल की नमाज के मध्य आगे बढक़र हिंदुओं पर धावा बोल दिया। ‘मुल फुजात-ए-तैमूरी’ के अनुसार हिंदुओं को यहां भी पराजित होना पड़ा। परंतु अगले ही दिन पुन: एक बार हिंदू शक्ति ने बड़ी प्रबलता के साथ मुस्लिम सेना पर आक्रमण कर दिया। यह अलग बात है कि  हिंदुओं को पुन: पराजित होना पड़ा।

पराजयें भाग्य का निर्णय नही करती हैं

हम पुन: यही दोहराएंगे कि युद्घ में पराजय अर्थ नही रखती युद्घ के लिए उत्साह और साहस महत्वपूर्ण होता है। पराजय यदि हमारे भाग्य का निर्णय करती तो ऐसी पराजयें तो पूर्व में कितनी ही बार मिल चुकी थीं, परंतु हमारे भाग्य का निर्णय तो हमारा उत्साह और साहस कर रहे थे और ये दोनों सौभाग्य से हमारे साथ थे। आश्चर्य की बात थी कि शत्रु इनसे सैकड़ों वर्षों से लड़ता आ रहा था पर इन्हें परास्त नही कर पाया था।

आगे भी मिला प्रतिरोध

हिंदुओं के इसी उत्साह और साहस के चलते 24 जनवरी को शिवालिक की पहाडिय़ों की ओर उसे रामरतन सिंह की सेना से और नगरकोट में हिंदुओं की एक टुकड़ी से भारी संघर्ष करना पड़ा। इसी प्रकार जम्मू में भी उसे हिंदू चुनौती का सामना करना पड़ा।

अंत में हम यही कहेंगे कि तैमूर के आक्रमण के समय भी हिंदू ने पराजय नही मानी, अपना सब कुछ हो करके भी निज राष्ट्र और निज धर्म की रक्षा करना उसने सर्वोपरि कत्र्तव्य माना। ऐसे वीर समाज का शत-शत अभिनंदन।

क्रमश:

–राकेश कुमार आर्य

 

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