लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

Posted On by &filed under राजनीति.


kisanडा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

दिल्ली में आप की राजनैतिक रैली है । स्थान जंतर मंतर है । जंतर मंतर का णिर्माण भी कभी राजस्थान के शासक ने ही करवाया था । उद्देश्य शायद ज्ञान विज्ञान का प्रसार और लोगों में तार्किक विश्वास जगाना था । उसी राजस्थान के दौसा से चलकर एक आदमी गजेन्द्र सिंह दिल्ली आता है । गजेन्द्र किसान है । साधारण किसान नहीं बल्कि जागृत किसान है और कहा जाता है कि राजस्थान विधान सभा के लिये चुनाव भी लड़ चुका था । यह अलग बात है कि विधान सभा में पहुँचना उसके भाग्य में नहीं था । वह आम आदमी की पार्टी की रैली में ख़ुद आया है या उसे इस मौक़े पर विशेष रुप से बुलाया गया है , यह अभी जाँच का विषय है । लेकिन मीडिया में जो छन छन कर आ रहा है , उसके अनुसार उसे दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने बुलाया था । ख़ैर यह रहस्य तो जाँच के बाद ही खुलेगा । जंतर मंतर  पर आम आदमी की इस रैली में अरविन्द केजरीवाल को ,’भारत में किसानों की दशा और दिशा’ पर लोगों का ध्यान आकर्षित करना है । उसको यह बताना है कि देश में किस प्रकार किसान दुखी होकर आत्महत्या कर रहे हैं । अपने विषय को प्रभावी बनाने के लिये वे मंच पर सभी तरीक़ों का इस्तेमाल कर रहे हैं । मसलन बोलते वक़्त आवाज़ का उतार चढ़ाव, शारीरिक भाव भंगिमा , चेहरे पर विभिन्न भंगिमाओं का प्रदर्शन , आदि आदि । दरअसल भाषण भी अभिनय का एक रुप बन गया है । अभिनय जितना सशक्त , प्रभाव उतना ज्यादा । श्रोता को बाँध लेने का मंतर । उसको कील लेने का जंतर । इस काम के लिये जंतर मंचर से अच्छी जगह और कौन सी हो सकती है ? लेकिन ऐन उस मौक़े पर सचमुच किसी किसान द्वारा आत्महत्या कर लेने की घटना शायद पहली बार हुई है ।
केजरीवाल मंच पर किसानों की दशा दिशा पर आँसू बहाना शुरु करते हैं और गजेन्द्र सिंह पास के नीम के पेड़ पर चढ़ना शुरु करता है । वह स्वयं राजस्थानी वेशभूषा में है । ज़ाहिर है   हज़ारों की भीड़ में एक अलग वेशभूषा वाला व्यक्ति सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करेगा ही । गजेन्द्र सिंह के पास एक झाड़ू और एक गमछा भी  है । गमछा देश के आम किसान का प्रतीक है और झाड़ू आम आदमी पार्टी का चुनाव चिन्ह है । वह नीम के पेड़ पर चढ़ जाता है । अब जंतर मंतर पर दो मंच बन गये हैं । एक मंच जिस पर केजरीवाल किसानों की दशा दिशा के बारे में आँसू बहा रहे हैं और दूसरा मंच नीम का पेड़ जिस पर एक किसान गजेन्द्र सिंह लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहा है । वैसे ख़बर यह भी है कि नीम के पेड़ का मंच संभालने से पहले गजेन्द्र सिंह ने अपने परिवार के किसी सदस्य को फ़ोन करके यह भी कहा कि टैलीविजन चालू करो और देखो ।
लेकिन धीरे धीरे नीम के पेड़ पर जो हो रहा है , वह ज़्यादा ख़तरनाक होता जा रहा है ? गजेन्द्र सिंह आत्महत्या भी कर सकता है , इसकी आशंका बननी शुरु हो गई है । लेकिन नीम के आसपास खड़े लोग गजेन्द्र सिंह को नीचे उतारने की कोशिश नहीं करते । यहाँ संशय का लाभ दिया जा सकता है कि भीड़ का व्यवहार इन परिस्थितियों में आम तौर पर इसी प्रकार का होता है । सड़क पर किसी दुर्घटना में घायल व्यक्ति ख़ून से लथपथ पड़ा होता है और लोग बाग़ मन ही मन दुख व्यक्त करते हुये पास से निकलते रहते हैं । कोई उसे हस्पताल ले जाने की ज़हमत नहीं उठाता । परन्तु केजरीवाल तो आम आदमी पार्टी में होते हुये भी आम आदमी नहीं थे । वे दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं । उन्होंने भी अपना भाषण बीच में रोककर गजेन्द्र सिंह को नीम से नीचे उतारने का प्रयास नहीं किया । उधर केजरीवाल भाषण देते रहे इधर गजेन्द्र सिंह ने झाड़ू छोड़ कर गमछा निकाल लिया और नीम की एक मोटी शाखा से बाँधना शुरु कर दिया । लेकिन अभी भी मुझे लगता है कि वह मरना नहीं चाहता था । उसने अपने परिवार वालों को फ़ोन पर बता रखा था कि वह रात को घर आ जायेगा । इधर गमछा गले तक में डाल लेने की नौबत आ चुकी थी लेकिन अभी भी उसे कोई नीम के पेड़ से उतारने की कोशिश नहीं कर रहा था । इस मोड़ पर यदि केजरीवाल अपना भाषण , चाहे थोड़ी देर के लिये ही सही , छोड़कर नीम के उस पेड़ के नीचे आ जाते तो शायद गजेन्द्र सिंह को पेड़ से नीचे उतारा जा सकता था । या फिर उसे स्वयं ही नीचे उतर आने के लिये मनाया जा सकता था । लेकिन ऐसा नहीं हुआ । और उधर गजेन्द्र सिंह सचमुच गले में गमछा डाल कर नीम के पेड़ से लटक गया । बताया जाता है कि केजरीवाल ने कहा था कि इसे नीचे उतारो , लेकिन जब उनके कार्यकर्ता इस काम के लिये नीम के पेड़ पर चडे तब तक बहुत देर हो चुकी थी । कोई वाक्य कब बोलना है , इसका भी उपयुक्त समय होता है । शायद वह समय निकल चुका था ।  गजेन्द्र सिंह के श्वास पूरे हो चुके थे । अब वह किसी के काम का नहीं रहा था । इसलिये उसकी लाश धड़ाम से नीचे गिरी ।
अब मुख्य प्रश्न केवल इतना ही बचता है कि केजरीवाल द्वारा उठाई गई समस्या को और धारदार बनाने हेतु ,लाईव डिमांस्ट्रेशन देने के लिये , सुदूर दौसा से चलकर आया गजेन्द्र सिंह किस की स्क्रिप्ट का शिकार हुआ ?
उसकी यह पूरी स्क्रिप्ट किसने लिखी ? जिसने भी यह स्क्रिप्ट लिखी , उसने वह पूरी तरह उसे बता भी दी थी या फिर आधी बता दी थी और आधी छिपा दी थी और गजेन्द्र सिंह उसी आधी छिपा ली गई स्क्रिप्ट का शिकार हो गया ? कहीं ऐसा तो नहीं की पूरे मामले को चामत्कारिक बनाने के लिये गजेन्द्र सिंह का दुरुपयोग किया गया हो और इसी में वह अपनी जान गँवा बैठा ? झाड़ू से शुरु हुई और गमछे पर जाकर ख़त्म हुई गजेन्द्र सिंह की यह कहानी बहुत ही करुणाजनक है । लेकिन यह पता लगाना बाक़ी है कि गजेन्द्र सिंह की मौत की यह स्क्रिप्ट किसने लिखी ? इस पूरी कहानी में आप के प्रवक्ता का बयान बहुत आपत्ति जनक है । किसी ने पूछा कि केजरीवाल ने भाषण छोड़ कर गजेन्द्र सिंह को बचाने की कोशिश क्यों नहीं की ? तो प्रवक्ता ने ग़ुस्से में आकर कहा कि केजरीवाल क्या पेड़ पर चढ़ जाते ? बात प्रवक्ता ने बिल्कुल अपनी सोच के अनुसार ही कहीं है लेकिन वे इतना तो जानते होंगे कि बहुत ज़्यादा समय नहीं बीता जब केजरीवाल आम आदमी को राहत पहुँचाने के नाम पर बिजली के खम्भे पर तेज़ी से चढ़ गये थे । लेकिन जब गजेन्द्र सिंह को बचाने की बात आई तो उन्हें पेड़ पर चढ़ना  नागवार लगा । वैसे केवल रिकार्ड के लिये आम आदमी पार्टी ने गजेन्द्र सिंह के परिवार को दस लाख रुपये देना मान लिया है । कम से कम इस पूरे मामले में दूध का दूध और पानी का पानी होना चाहिये ।

Leave a Reply

1 Comment on "जंतर मंतर में पेड़ पर झूलता किसान और निर्मम राजनीति"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
Himanshu Rajput
Guest
सत्ता के लिए भूख केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को उस मुकाम पे ले आई है जहाँ किसी मानव-जीवन का कोई मूल्य नहीं. ये घटना भारतीय राजनीति के उस घिनौने चेहरे को सामने लाती है जिसका उद्देश्य किसी भी मूल्य पे सत्ता प्राप्ति है. राजनीति की दिशा बदलने के लिय बनी पार्टी ने वास्तव में राजनीति बदल दी है . फर्क मात्र इतना है कि अब ये अपने न्यूनतम स्तर पर आ गयी है. आश्चर्य है कि कोइ अपने आप को आम आदमी कहता है मगर सामने कोई आदमी आत्म हत्या कर रहा है उसे रोकने कि कोशिश भी नहीं… Read more »
wpDiscuz