लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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प्रवक्‍ता की पांचवीं सालगिरह सार्थक हो रही है। इसके प्रारंभिक टोली के सदस्‍य पंकज झा, जो रूठ गए थे, फिर से हम सबकी इच्‍छाओं का सम्‍मान करते हुए करीब 3 साल बाद प्रवक्‍ता पर लौट आए हैं। एक वाकया, जो वेबमीडिया पर सर्वाधिक चर्चित प्रकरण बना, से उन्‍हें तकलीफ हुई और उन्‍होंने प्रवक्‍ता से स्‍वयं को निर्वासित कर लिया था। इस बीच कुछ लोगों ने पंकजजी की कानाफूसी की तो कुछ ने मेरे भी कान भरे। ना तो उन पर असर हुआ और हम भी असरहीन रहे। मतभेद सैद्धांतिक थे, मनभेद का सवाल ही नहीं था। निर्वासन के पश्‍चात् भी वे प्रवक्‍ता से गहरे जुड़े रहे। आज उनकी लेखनी से प्रवक्‍ता जगमगा रहा है। सच में, बहुत अच्‍छा लग रहा है। प्रस्‍तुत है परंपरा के प्रहरी पंकज जी का बौद्धिकता से लबालब यह संस्‍मरण : 

pravaktaपांच साल पहले, इसी अक्टूबर की एक शाम का वाकया है. जी मेल चैट पर संजीव सिन्हा ने हार्दिक प्रसन्नता व्यक्त करते हुए लिखा था ‘खुशखबरी है. हमें ‘प्रवक्ता.कॉम’ के नाम से नया डोमेन मिल गया है.’ शिष्टतावश बधाई देते हुए भी मन में यही सोचा था कि पार्टी को चाहिए कि संजीव को कुछ अच्‍छा काम दे. फुर्सत में शायद कुछ भी उल-जुलूल सोचते रहते हैं ये. कहां तो मैं ये उम्मीद कर रहा था कि वेतन बढ़ जाने या पदोन्नति हो जाने की कोई खुशी बांटना चाहते हैं तो कहां ये डोमेन मिल जाने पर बल्लियाँ उछाल रहे हैं. डोमेन का क्या है, वो तो कोई पांच सौ रूपये खर्च कर रजिस्टर करा सकता है. लेकिन फिर जल्द ही उस खुशी की सार्थकता भी सामने आने लगा.

यह वो दौर था जब ब्लॉग लेखन का दौर चरम पर पहुंचने के बाद उतार की ओर था. अपने जैसे लोग ब्लॉग के प्रति तो शुरू से उदासीन जैसे ही थे और उसे समय काटने या बर्बाद करने का साधन मात्र समझते थे. लेकिन बड़े ब्लॉगर्स भी ब्लॉग का कोई विकल्प ढूँढने की तैयारी में लग गए थे. हालांकि तबतक अपने लिए लिखने का मतलब वही था जो अखबार में प्रकाशित हो. वेब का न कोई वर्तमान और न ही भविष्य जैसा कुछ खास तब नज़र आ रहा था. हालांकि विस्फोट.कॉम पर अखबारों में प्रकाशित एकाध लेख को ही पोस्टित करा अपन ने भी थोड़ा सा आनंद तो लिया था वेब मीडिया का. लेकिन उसे तब भी डेजर्ट की तरह ही माना गया था. मैन्कोर्स तो क्या हम उसे स्टार्टर भी नहीं मानते थे. संजीव भाई ने भी यही कह कर अपना लेख आदि देने को कहा था कि कम से कम सॉफ्ट कॉपी के रूप में आपके लेख एक जगह तो संगृहीत रहेंगे. इससे कन्विंस होकर फिर अपन ने कुछ लेख वहां भेजना शुरू किया जैसा सभी मित्रों ने करना शुरू कर दिया था. हालांकि उस समय भी लेख लिख कर अखबार में उसके छपने का इंतज़ार करने के बाद ही सभी लोग वेब के लिए मेल करने को प्राथमिकता देते थे.

लेकिन समय बदला. ज़माना ने तेज़ी से पल्टी मारी और फिर तो पिरामिड बिलकुल ही उलटा हो गया. हर व्यक्ति लिखने के कुछ मिनट के साथ ही प्रवक्ता पर पोस्ट होना और टिप्पणी के इंतज़ार में कुछ-कुछ मिनट पर पेज को रिफ्रेस करना शुरू कर चुका था. अखबारों में छपे लेखों को यहाँ भेजने के उलट हर व्यक्ति यहाँ प्रकाशित होने को प्राथमिकता देने लगा था ताकि तुरत प्रतिक्रया आदि तो मिले ही और बोनस में, बिना किसी संपादक की चिरौरी किये देश भर के अखबारों में लेख छप भी जाए.

इसके बाद वक़्त की तरह ही प्रवक्ता नाम का यह परिंदा भी रुका नहीं, वो सरपट उड़ान भरने लगा, परवाज़ करने लगा उस प्रवासी पक्षी की मानिंद जिसे कोई सीमा कभी रोक नहीं पाता है. फिर न केवल इसने विचारधारा की हदें लांघी अपितु सरहदें भी लांघते हुआ सात समंदर पार तक जा कर किलकारी भर आया प्रवक्ता तो. हर जगह स्नेह रूपी दाना लेकर खड़े उसे कहीं कोई लन्दन निवासी ‘भारतीय’ मिले तो कहीं सुदूर अमेरिका में किसी मधुसूदन झवेरी जी ने इसे पलकों पर बैठाया. अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, न्यूज़ीलैंड से लेकर अफ्रिकन देशों तक में निवासित भारतीयों-भारतवंशियों को लगा कि कोई कबूतरनुमा कंप्यूटर चुपके से उसके अंगने की खबर उसे दे जाता है. उसके अपने गाँव की बात बता जाता है. आँखों के रास्ते कुछ कह जाता है कि भाई आपके घर के मुंडेर पर आज वो वाला काला कौआ बैठ गया था. शीघ्र ही यह संवाद इकतरफा न रह कर दुतरफा बना. अनेक पाठक पहले टिप्पणीकार और फिर लेखक के रूप में प्रतिस्थापित हुए. रंगहीन, स्वादहीन इकतरफे संवाद की परंपरा देखते ही पुरातन मानी जाने लगी. संप्रेषक एवं गृहीता, पाठक और लेखक, संचारक और ग्राहक का फर्क मिट गया या फिर सारी भूमिकाएं सुन्दर रूप से गडड-मड्ड हो गयी. कथित विद्वानों को भी इसने जगत का ईश्वर समझने-बनने से रोका. उनके अभिमानों के अश्वमेध घोड़े की यथासंभव लगाम भी थामी. वास्तव में ऐसे समय में जब जन-सत्ता की बात करने वाले लोग खुद राजसत्ता से ज्यादा दंभी हो गए हों वहाँ बिना किसी दंभ के प्रवक्ता ने ‘जनसत्ता’ होना स्वीकार किया. कभी नीर-क्षीर विवेक का परिचय देकर हंसों को भी कौए की चाल चलने के खिलाफ कड़े शब्दों में चेतावनी देने का साहस अपने अन्दर लाकर प्रवक्ता सही अर्थों में तब तक अग्रदूत बन गया था.

ऐसा करते हुए इसके संपादक को कभी नहीं लगा कि कुलीन होकर ही, ज्ञान के अभिमान में आकर ‘जन’ से हिकारत जैसा कर ही वे अपनी सत्ता स्थापित कर पायेंगे. ऐसे चलताऊ फार्मूलों को इन्होंने मठाधीशों के लिए रख, उन्हें उनके खुद के बनाए मूर्खों के स्वर्ग में संवेदनापूर्वक छोड़ प्रवक्ता आगे बढ़ गया. सही अर्थों में विचारधाराओं से आगे जा कर यह हर वैसे आम-अनाम व्यक्ति का प्रवक्ता बन गया. ऐसे व्यक्तियों का प्रवक्ता जो रहता तो किसी बचेली में था लेकिन अभिलाषा जिसकी दिल्ली तक आवाज़ बुलंद करने की थी. मानो इसने उद्घोष कर दिया हो सबके लिए कि अच्छा भाई, आप टूटी-फूटी लिखते हैं? कोई बात नहीं. हम हैं न सुधारने के लिए. आप लिखिए तो सही. अच्छा आपको हिन्दी टाइपिंग नहीं आती? कोई बात नहीं टिप्पणी लिखिए रोमन में ही लेकिन ‘कहना’ मत छोडिये. ओ आप अमेरिका में इंजीनियर हैं? अरे सर तब तो आपको लिखना ही होगा देश के लिए? क्या कहा आप अंग्रेज़ी में सोचते हैं? कोई बात नहीं, आप विद्वान् हैं, संस्कृत में सोचिये और गूगल टूल्स का इस्तेमाल करते हुए बिलकुल देवनागरी में अभिव्यक्ति का आनंद उठाइए.

ऐसे-ऐसे आग्रहों-निवेदनों-चिरौरियों से लोगों को उत्साहित–उकसाहित करते हुए संजीव सिन्हा का वेब रथ आगे बढ़ता गया. कभी इस गढ़ को ध्वस्त करते हुए तो कभी उस मठ को. अभिव्यक्ति के तमाम खतरे उठा कर, उसकी आज़ादी का नया मुक्तिबोध रचते हुए. राईट करते हुए हर ‘रॉन्ग’ को. सुधारते हुए हर बिगरईल वामजादों को भी. और ऐसा करते हुए हर वक्त ‘इदं राष्ट्राय इदं न मम’ के ध्येय वाक्य की कंठी पहन ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि’ का महाजाप करते हुए भी.

लेकिन… लेकिन अपनी इस पांच साला यात्रा के दौरान संजीव ने कोई गलती ही नहीं कि ऐसा कहना तो सृष्टि के नियमों को ही धत्ता बताना होगा. सफलता के कुछ निश्चित बाय-प्रोडक्ट तो होते ही हैं. निश्चित ही इन यात्राओं में मिले कठिनाइयों के साथ-साथ उपलब्धियों ने थोड़ा सा संजीव को भी अड़ियल बनाया, कुछ जिद्दी भी बनाया और शायद कुछ हद तक अहंकारी भी. एकाध प्रसंगों में लोकतंत्र के नाम पर विशुद्ध अलोकतांत्रिक भी हुए संजीव. उदारता के नाम पर फासीवादी चेहरे की वकालत करते हुए भी दिखे. शायद खुद को या प्रवक्ता को सर्व-स्वीकार्य बनाने की उत्कट लालसा ने उन्हें अपनों में ही अस्वीकार्य बनाने का जोखिम लेने की हद तक भी पहुंचा दिया था. यह संस्मरण चूंकि मैं लिख रहा हूँ अतः ज़ाहिर है संजीव का मूल्यांकन भी मैं खुद की प्रज्ञा, अपने विवेक के आधार पर ही करूंगा.

हालांकि कोई निजी विवाद कभी भी सार्वजनिक रूचि का विषय नहीं हो सकता और न उसे होना चाहिए. लेकिन प्रवक्ता की संपादकीय नीतियों को लेकर उठे असहमति के स्वर ने उस समय शीघ्र ही प्रवक्ता के लगभग सभी पाठकों के स्वर का रूप ले लिया था. आज इस पांच साला जलसे के लिए लिखे कई संस्मरणों में विद्वान् लेखकों ने उस वाकये को याद किया है, अतः हमें भी फिर से एक बार उसकी याद ताज़ा कराने में कोई संकोच नहीं हो रहा है. अपवादस्वरूप एक बार के लिए अपने स्व-निर्वासन को रद्द करना हमें अपने कृष्ण परंपरा की ही याद दिलाता है. जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में हथियार नहीं उठाने के अपने निर्णय को एक बार के लिए मुल्तवी कर दिया था वैसे ही आज के (कु)विचार-कौरवों के वैचारिक संहार के लिए कलम उठाना हमें उचित ही लगा. आप भले इसे हमारा अहंकार समझ सकते हैं कि खुद को उतनी बड़ी उपाधि मैंने खुद ही दे डाला हो. लेकिन ज़ाहिर है हम अगर खुद को भगवान कृष्ण की परंपरा के अभिमानी पाते हैं तो क्यूँ कर अपनी तुलना किसी कंस से करें? जब आज भी हमारे आस-पास मतान्ध मार्क्सवादी और मदांध माओवादी भरे पड़े हैं तो क्यूँ न हम महात्मा गांधीवादी खुद को ही घोषित करें? अगर विदेश से ही कोई सन्दर्भ हमें तलाशना हो तो हम क्यूँ कर किसी मैकाले के चट्टे-बट्टे बनें? क्यूँ न मैक्समूलर का उदाहरण देकर अपनी बात पूरी करें जिसने भारत नाम की पवित्र भूमि पर पैदा होने का ख्वाब सजाया था. वामपंथी मोह में पड़ा कोई जगदीश्वर अगर पेशेवर मजबूरी के कारण मथुरा की अपनी भूमि का मोह छोड़ मैकडोनाल्ड और माओ की खिचड़ी पकाने लगे तो आवश्यक हो जाता है है कि हम खुद को शंकराचार्य की परंपरा के शिशु होने का गौरव गान करें? खैर.

नए पाठकों को इतना बताना होगा कि यहाँ बात एक उस बहस की हो रही है जब बड़ी संख्या में प्रवक्ता पर आ रहे वामपंथी कचड़ों को रोकने का प्रवक्ता के पाठकों ने एक अभियान चलाया था. लंबी बहस हुई थी और अंततः उस बहस को निष्कर्ष पर पहुंचाये जाने के आग्रह को तब संजीव सिन्हा ने फासीवाद तक कह डाला था. संजीव के अनुसार किसी निष्कर्ष की कोई ज़रुरत नहीं थी और कथित तौर पर वो शास्त्रार्थ की परंपरा में यकीन करते हैं इसलिए ऐसे विमर्श होते रहने चाहिए. तो संजीव को बस इतना ही बताना चाहूँगा कि उन्होंने शास्त्रार्थ के मर्म को समझा ही नहीं है आज तक. वे भले फासीवाद-नाजीवाद या माओवाद को न समझें तो चलेगा लेकिन उन्हें अपने राष्ट्र में शास्त्रार्थ की सुन्दर परंपरा को समझना होगा तभी वे एक अच्छे संपादक हो सकते हैं. विदेशी व्यभिचार से लथ-पथ बहसों की परंपरा में कोई ओर-छोर भले न हो. भले वामपंथी विमर्श केवल खाए-अघाए पतित बुजुर्गों के बुद्धिविलास का साधन मात्र हों लेकिन हमारे शास्त्रार्थ की परंपरा में आदिकाल से एक निष्कर्ष तक पहुंचने की जुगत भिड़ाई जाती रही है. हर ऐसे विमर्श में एक विजेता और दूसरा पराजित होता रहा है, समाज को एक नया निष्कर्ष, नया परिणाम तक पहुंचने में मददगार रहा है हमारे विमर्श का मॉडल.

शायद आपने पंडित जगन्नाथ का नाम सुना हो. उन्हें मुग़ल बादशाह ने इस शर्त के साथ शास्त्रार्थ के लिए बुलाया था कि अगर वे जीत गए तो जो भी मांगेंगे उन्हें दिया जाएगा. कहते हैं उन्हें उस बादशाह की बेटी के प्रति आसक्ति थी और जीत जाने के बाद उन्होंने दो टूक बादशाह से मांग रख दिया कि ‘न याचे गजालिम न …. लवंगी कुरंगी द्रिघंघी करोति.’ लंबा श्लोक है जिसका अर्थ यह है कि मुझे कोई राज-पाट आदि नहीं चाहिए बस लवंगी नाम की सुन्दर स्तनों वाली (श्लोक में शब्दशः यही है) आपकी बेटी मुझे चाहिए. और अंततः उन्हें वो युवती मिली. आज के मानदंडों के अनुसार निश्चित ही पंडित जगन्नाथ नारी विरोधी माने जा सकते हैं लेकिन जब आप उस काल के बारे में सोचेंगे तो पायेंगे कि वो ऐसा अन्धेरा युग था जब किसी समूह या सम्प्रदाय की नारी को पा जाना ही उस पर विजय का सबसे बड़ा साधन माना जाता था. (हालांकि आज भी ‘लव जेहाद’ आदि का लक्ष्य अंततः समुदाय विशेष को अपमानित करना ही होता है) वह वो समय था जब कोई मान सिंह रीढविहीन होकर अपनी बहन का सौदा करने अकबर के दरबार में पहुंच जाता था. ऐसे समय में स्वाभिमान के साथ बादशाह की बेटी मांग लेना उस समय के अनुसार कैसा रहा होगा, आप कल्पना कर सकते हैं. ज़ाहिर है आक्रमणों के कारण रीढविहीन हो गए समाज में उस शास्त्रार्थ के परिणाम ने समाज के स्वाभिमान को बढाया ही रहा होगा. आशय यह कि अपने यहाँ शास्त्रार्थ किसी परिणाम तक पहुंचने के लिए ही होता था.

आपको शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच हुए शास्त्रार्थ की भी जानकारी होगी ही. वहाँ भी एक निष्कर्ष निकला और शंकर की जीत हुई थी, मण्डन मिश्र ने हार मानी. निष्कर्ष निकाला गया. फिर आगे की कहानी है कि मिश्रा जी की धर्मपत्नी भारती ने शंकर को कामशास्त्र में हराया. फिर परिणाम निकला. इस बार शंकर ने हार मानी और फिर अपनी कमियों को खत्म करने हेतु उन्होंने उद्यम शुरू किया. यानी वहाँ भी शास्त्रार्थ केवल बौद्धिक लफंगों के बुद्धिविलास का साधन नहीं था. इसी तरह बंगाल के नरेंद्र के बारे में किसे पता नहीं होगा. वह युवा शिकागो तक गया. वहाँ धर्म सम्मलेन में शिरकत किया उन्होंने. निष्कर्ष अगले दिन के ‘न्यूयार्क हेरॉल्ड’ ने दिया कि जिस देश में स्वामी विवेकानंद जैसे महान युगपुरुष हों वहाँ इससे बड़ी मूर्खता और कुछ नहीं हो सकती कि पश्चिम वहाँ पर धर्म प्रचारक भेजे. विमर्श तो कुरुक्षेत्र में भी हुआ था. वहाँ भी निष्कर्ष यही निकला कि न्यायार्थ अपने बंधुओं को कत्ल करना धर्म है. साथ ही उस विमर्श ने समाज, देश-दुनिया को ‘गीता’ जैसा पुनीत दर्शन भी उपलब्ध कराया था. उदाहरण हज़ारों मिलेंगे आपको. कभी मीरा ने विमर्श किया था तुलसी से. निष्कर्ष यही निकला कि ‘जाके प्रिय न राम वैदेही, तजीय ताहि कोटि वैरी सैम जदपि परम सनेही.’ कभी ‘मूर्ख’ कालीदास को धोखे से ही विजय दिला दी गयी लेकिन फिर भी उन्हें विद्योत्तमा मिली और अंततः वह उसके काबिल भी हुए. कभी रामबोला अपनी पत्नी से हार कर घर छोड़ देता है और फिर समाज को मानस के रचयिता तुलसी बाबा मिलते हैं. और तो और भगवान् राम खुद एक कथा के अनुसार मरणासन्न बाली के समक्ष अपने तर्कों की हार स्वीकार करते हैं और बाली फिर भगवान् भजन करते हुए स्वर्गवासी होते हैं.

लेकिन मोटे तौर पर वामपंथी, तर्क-वितर्क के उस रावण परंपरा में यकीन करने वाले लोग हैं जहां आपने असहमति के स्वर बुलंद किये तो विभीषण की तरह आपको लतिया दिया जाएगा. इन्हें एक सीमा तक तर्क-वितर्क तो चाहिए लेकिन उनका खूंटा वहीं गड़ेगा जहां से उखाड़ कर फेके गए थे वे दूध की मक्खी की तरह. ऊपर के दर्ज़नों उदाहरण के बरक्स आप याद करेंगे तो यही पायेंगे कि पीढ़ियों तक ये वामपंथी अपना पेट पालते रहे और एक विषय पर ही आजतक इनके बहस का परिणाम नहीं आया कि कला, कला के लिए हो या समाज के लिए. लेकिन इस अधूरे बहस के बदौलत ही पीढ़ियों का गुजारा हो गया. अगर यह बहस भी चल निकला कि ‘विमर्श, विमर्श के लिए हो या परिणाम के लिए’ तो तय मानिए दो-चार पीढी इनकी और मज़े से मुफ्त की रोटी तोड़ते हुए बुद्धिविलास में गुजार देंगे. यानी जब तक शासकों के पास देने को वातानुकूलित कक्ष और कुछ टुडे कायम हैं और शासितों के पास थामने के लिए लाल झंडे, तय मानिए तब-तक खुद को जगदीश्वर मानने वाले परजीवियों की ज़मात कायम भी रहेगी और आपकी छाती पर मूंग दला जाना जारी भी रहेगा.

तो चूंकि संजीव सिन्हा का अन्नप्राशन वाम संस्कारों से हुआ है तो वे उसी सिगरेट परंपरा को शास्त्रार्थ समझने की भूल कर बैठे हैं जहां कोलकाता विश्वविद्यालय के किसी प्रोफसर को अपनी ही मातृभूमि को गरियाने के लिए टीए-डीए दिया जाता है. कोई अहमद फाई किसी नय्यर और नवलखा को मेहमान बना कर बुलाता है कि आकर थोड़ा अपनी ही मां को कुछ गाली सुना जाए. या आधी दिल्ली के वातानुकूलित हॉलों-कक्षों पर कब्ज़ा जमाए भाड़े के टट्टुओं को ही उन्होंने आदर्श मान लिया है जो खुद को बुद्धिजीवी साबित करने की सनक में किसी भी हद तक खुद को गिरा सकता हो. संजीव के मुंह से एक शब्द लगातार सुनने को मिलता है मुझे. वे कहते हैं भाई .. उस आदमी में सच में बड़ी वैचारिक उत्तेजना है. आज कहने की जुर्रत करता हूँ संजीव भाई कि उत्तेजना तलाशना हो तो सेक्स में तलाशिये. ‘वैचारिक’ शब्द के साथ उत्तेजना विशेषण डाल कर इस शब्द के साथ कम से कम आप व्यभिचार तो नहीं करें कृपया. अपने यहाँ वैचारिकी का अर्थ शान्ति, सद्भाव, कल्याण से है न कि किसी उत्तेजना से या फिर किसी बुद्धिविलास से.

तो प्रिय मित्र संजीव, आपने सच में प्रवक्ता जैसा मंच इस समाज को देकर एक बड़ा काम किया है. लेकिन यही निवेदन होगा कि इस मंच को वैसी बहस के लिए नहीं उपयोग होने दें जैसा खाए-अघाए वामपंथी करना चाहते हैं. इस मंच को वैसा बनाएं जैसा कि हमारी परंपरा रही है. वैचारिक उत्तेजना की ललक और जिद्द को छोड़, इस मंच को परिणाममूलक शास्त्रार्थ के लिए उपयोग होने दें. गलतियां आप में मेरे मुकाबले रंच मात्र ही है, यह जानता हूँ मैं. लेकिन आपकी गलती इसलिए अक्षम्य होगी क्यूंकि आप बड़ा ध्येय लेकर चल रहे हैं. हम जैसे पेशेवर लोगों की एकमात्र सफलता अपनी जीविका को बचाए रखने में होता है लेकिन आपके अन्दर राष्ट्र को दिशा देने का जूनून कुलांचे भरता रहता है. ऐसे में आपको ज्यादा सावधान रहने की ज़रुरत है. मेरे जैसे आपके मित्र आपकी गलतियों को खुर्दबीन से देख-देख कर आपकी आँखों में अंगुलिया कर-कर के इसी तरह सावधान इसलिए करते रहेंगे क्यूंकि आपसे जितनी उम्मीद हमें है और आपने राष्ट्र के लिए जितने महान सपने पाल रखे हैं, ऐसे में केवल वैचारिक उत्तेजना के झांसे में आ कर, केवल अपनी जिद्द के कारण देशद्रोहियों का टूल्स बन जाने से काम नहीं चलेगा. आपको अपने अन्दर की गलतियों को भी विनम्रता से मान लेने का मैकेनिज्म भी विकसित करना होगा. शेष सदिच्छा तो है ही सदा आपके लिए. अस्तु.

प्रवक्ता के पांच वर्ष पूरे होने के मौके पर मुझे बालक शंकर का अभिमान से ओत-प्रोत एक उद्घोष याद आ रहा है. बाद में शंकराचार्य बने तब के पांच वर्ष के शिशु ने उन्नत मस्तक-उभरे सीने के साथ राजा के सामने खड़े होकर यह कहा था कि ‘बालोहं जगदानंद, न मे बाला सरस्वती, अपूर्ण पंचमे वर्षे, वर्णयाम जगत्रयम’ यानी ‘हे राजन, मैं ज़रूर शिशु हूँ लेकिन मेरी सरस्वती, बाला नहीं हैं. मैंने पांच वर्ष भी पूरे नहीं किए हैं लेकिन मुझे तीनों जगत की विद्याओं का ज्ञान है.’ पांच वर्ष का शिशु प्रवक्ता, शंकराचार्य की उसी परंपरा का वाहक खुद को बनाए. इस देश को जगद्गुरु के पुरा गौरव और वैभव को लौटाने में अपनी प्रभावी भूमिका का निर्वहन करे यह कामना करने के अलावा और कर ही क्या सकते हैं मेरे जैसे लोग?

बहुत बधाई संजीव भाई. ह्रदय से शुभकामना.

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11 Comments on "प्रवक्‍ता पर पधारे पंकज झा : शास्त्रार्थ की भारतीय परंपरा और प्रवक्ता"

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abhaydev
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pravakta. com par ishwar, jiv, prakriti, ved, dharm, vaidik rajniti adi vishyo par bhi charcha hona chahiye.

Murli Dhar
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मन जीत लिया आपने, पंकज जी।

शायद आपके ही किसी संस्मरण से प्रवक्ता का वेब लिंक मिला और पढ़ने के आसक्त होने के कारण खींचा चला आया।

धन्यवाद इस से जोड़ने के लिए।

Bipin Kishore Sinha
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पंकज जी का लेख सारगर्भित है. पठनीय है. माननीय है. सत्य कटु होता है, अतः कुछ लोगों का आक्रामक होना स्वाभाविक है. देशद्रोहियों में आक्रामकता अधिक होती है. पंकज जी लिखते रहिये.

Dr. Dhanakar Thakur
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१. मिथिला के बालक शंकर का बाद में शंकराचार्य बने कहना गलत है – इससे भांति हो सकती है- मिथिला के अयाची मिश्र के पुत्र शकर का शंकराचार्य से कोई सम्बन्ध नहीं है – यह शंकर प्रसिद्द मीमांसक हुवे है आज के १५ पीढी पहले २. मैं पता नहीं चन्दन या किसी और के लिखने पर कभी प्रवक्ता के संपर्क में आया – प्रारंभ में किसी वामपंथी छात्रा के खिलाफ ( प्राय: सुनीता नहीं) किसी के अतार्किक ढंग से लिखने पर उसके पक्षमे शालीन्तासे लिखा था (वैसे मैं वामपंथी नहीं हूँ) और उसने मुझमे आदर्बह्व्व्यक्त किया था ३.तर्क- कुतर्क सभी… Read more »
आर. सिंह
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प्रवक्ता पर श्री पंकज झा की वापसी का स्वागत है,पर कुछ विचारों में मैं संजीव जी का समर्थक हूँ.मैं पुराने शास्त्रार्थों का आधुनिक वाद विवाद से तुलना को उचित नहीं मानता. इस पर ऐसे विस्तृत विवेचना की आवश्कता है,अतः मैं भी इसको आगे बढ़ाऊंगा,पर आज बस इतना हीं.

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