लेखक परिचय

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी, दैनिक समाचार पत्र दैनिक मत के प्रधान संपादक, कविता के क्षेत्र में प्रयोगधर्मी लेखन व नियमित स्तंभ लेखन.

Posted On by &filed under चुनाव, राजनीति.


-प्रवीण गुगनानी-
election modi

सोलहवीं लोकसभा को निर्वाचित करने वाला २०१४ का यह निर्वाचन एक विषय में तो घोषित रूप से भारतीय सविंधान के प्रावधानों के विपरीत चलन पर जा रहा है! भारतीय मतदाता संविधान के विरुद्ध आचरण कर रहा है, किन्तु यह विधि विरुद्ध आचरण अपराध की श्रेणी में नहीं आ रहा है! भारतीय मतदाता का यह विधि विरुद्ध आचरण नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता के कारण हो रहा है! ऐसा इस प्रकार हो रहा है कि सविंधान से तो उसे ब्रिटिश संसद की भांति मात्र अपनें सांसद को चुनने का अधिकार है किन्तु इस चुनाव में अमेरिका की तरह वह सांसद को नहीं, बल्कि प्रधानमन्त्री को चुनने की मानसिकता में आ गया है.

नरेन्द्र मोदी की प्रधानमन्त्री पद की घोषित उम्मीदवारी के चलते ये चुनाव कमोबेश अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनाव की तरह माना जा सकता है. अब तक देश भर की ३४२ सीटों पर हुए मतदान के बाद तो ऐसा ही लगता है कि भारतीय मतदाता ने अमेरिका के मतदाता की भांति देश के सर्वोच्च विधायी पद यानि प्रधानमन्त्री के लिए वोट किया है. जिस प्रकार अमेरिका में वहां का आम नागरिक सीधे अपने देश की सर्वोच्च लोकतान्त्रिक शक्ति का निर्वाचन करता है उसी प्रकार भारतीय नागरिक भी इस चुनाव में वैधानिक स्तर पर नहीं, किन्तु अवश्य ही वह मानसिकता के स्तर पर तो अपनें सांसद को कम और प्रधानमन्त्री चुनने की प्रक्रिया के स्तर पर जाकर मतदान कर रहा है या करने वाला है. अमेरिका और भारत में एक सबसे बड़ी समानता जो है वह है कि दोनों ही देश लोकतांत्रिक देश हैं और दोनों में निर्वाचन के माध्यम से जनता अपने जन-प्रतिनिधियों को चुनती है. भारत में पांच वर्षों में लोकसभा चुनाव होते हैं, वहीं अमेरिका में यह अंतराल चार वर्षों का होता है. भारत में जहां हमें अपने संसद सदस्यों को मत देकर निर्वाचित करना होता है। वहीं अमेरिका में इससे अलग मतदाता को अपने राष्ट्रपति का सीधा चुनाव करना होता है. वहां राष्ट्रपति का चुनाव प्रत्यक्ष पद्धति से सीधे देश की जनता करती है. राष्ट्रपति अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों की नियुक्ति करता है और वे मंत्री केवल राष्ट्रपति के प्रति ही जवाबदेह होते हैं.

भारत में संसदीय प्रणाली से निर्वाचन होकर विधायिका बनती है जिसमें मतदाता सीधे तौर पर देश के प्रधानमन्त्री या शासनाध्यक्ष का चुनाव नहीं कर पाता है और वह केन्द्रीय चुनावों में केजरीवाल अपने संसद सदस्यों का चुनाव कर उन्हें संसद में भेजता है, जहां वे अपने बहुमत से प्रधानमन्त्री का चुनाव करते हैं. किन्तु वर्तमान में तो लगता है कि नरेन्द्र मोदी ने देश में चुनाव पद्धति ही बदल दी है. देश में जब सोलहवीं लोकसभा के लिए लगभग आधे लोकसभा क्षेत्रों में मतदान हो चुका है तब अधिकांश सर्वेक्षण यह आशा प्रकट कर रहे हैं कि देश के अधिसंख्य मतदाताओं ने नरेन्द्र मोदी को अपना प्रधानमन्त्री बनाने के मंतव्य और आशा से भाजपा के प्रत्याशियों को मत दिया है. प्रश्न यह है कि देश के मतदाता को संवैधानिक रूप से केवल अपने सांसद को ही चुनने का अधिकार है, तब यह मतदाता प्रधानमन्त्री को कैसे चुन रहा है? यह सवाल अपने आप में उत्तर सिद्ध भी है कि देश का मतदाता वर्तमान चुनावों में अपने सांसद को नहीं, बल्कि उस व्यक्ति को मत कर रहा है जिसके विजयी होने पर नरेन्द्र मोदी प्रधानमन्त्री पद की ओर प्रशस्त होंगे! देश ने साठ के स्वातंत्रयोत्तर इतिहास में जितने लोकसभा चुनाव देखे, उनमें से किसी भी चुनाव में ऐसा व्यक्ति केन्द्रित वातावरण नहीं बना, जैसा वर्ष २०१४ के लोकसभा चुनाव में बन गया है. इस व्यक्ति आधारित चुनावी संकल्पना ने तो भारतीय लोकसभा आम चुनाव की संवैधानिक और ढांचागत विशेषताओं ही बदल दिया है! भारत में वर्तमान चुनाव घोषित रूप से संसदीय प्रणाली से हो रहे हैं, किन्तु अप्रत्यक्ष रूप से भारत में वर्तमान के ये चुनाव अमेरिका में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव का रूप धारण कर चुके हैं. यद्दपि भाजपा के अतिरिक्त किसी अन्य दल ने अपने आधिकारिक प्रधानमन्त्री प्रत्याशी का नाम घोषित नहीं है, तथापि पूरे राष्ट्र के अधिकांश लोकसभा क्षेत्रों में चुनावी वातावरण, स्थानीय प्रत्याशियों के सामान्य निर्वाचन से ऊपर उठकर, भाजपा के प्रधानमन्त्री प्रत्याशी नमो बनाम अन्य का चुनाव हो गया है।

स्पष्ट है कि वर्तमान चुनावों में मतदाता अपने स्थानीय विषयों, व्यक्तिगत पसंद-नापसंद, और दलीय भावनाओं से ऊपर उठाकर नरेन्द्र मोदी को प्रधानमन्त्री बनाने के लिए उस व्यक्ति को ही वोट दे रहे हैं जो नमो को प्रधानमन्त्री बनाने में सहायक सिद्ध होगा. प्रश्न है कि आखिर इस प्रकार का क्रांतिकारी परिवर्तन कैसे संभव होने जा रहा है? लगता है कि सप्रंग के पिछले दस वर्षों के महाघोटालों और कीर्तिमान स्थापित कर देने वाले और विराटतम संख्या के रुपयों में होने वाले भ्रष्टाचारों से घबराकर नमो के साफ़ और बेदाग़ ट्रैक रिकॉर्ड पर अपना मत दे रही है. नमो ने जिस प्रकार का बेदाग़ और भ्रष्टाचारविहीन सार्वजनिक जीवन जिया, वैसा जीवन जनता को किसी और नेता में नहीं दिखा! नमो के विकास आधारित गुजरात मॉडल को जहां जनता अपना मत दे रही है, वहीँ उनकी बेलाग बोलने और स्पष्टवादी रूख रखने के गुण को भी जनता ने अपने प्रधानमन्त्री में देखना चाहती है. स्वाभाविक ही चुप्पे से, दब्बू से और अली बाबा चालीस चोर के मंत्रिमंडल के नाम से विख्यात मनमोहन सिंग के सामने जनता को नमो की वह छवि रूचिकर लगी होगी जो अपने मंत्रियों के साथ मित्रवत व्यवहार तो रखता है किन्तु किसी भी गलत काम को किसी भी स्थिति में सहन न करने के भाष्य को गुर्राने वाली भाषा में बोलना और समझाना भी जानता है. क्या यही कारण है कि भारतीय मतदाता का मानस संसद सदस्य को चुनने का नहीं बल्कि एक प्रधानमन्त्री को चुनने का बनता जा रहा है? क्या इस ट्रेंड या नए प्रचलन में ऐसा नहीं लग रहा है कि भारतीय मतदाता अपने सांसद को चुनने के अपने परम्परागत अधिकार से ऊपर उठकर देश का प्रधानमन्त्री चुनने के लिए मतदान का अधिकार भी प्राप्त करना चाहता है? यदि भारतीय मतदाता और ख़ास तौर पर इस निर्वाचन से जुड़े देश के युवा नव मतदाता का आशय ऐसा है तो हमारी विधायिका और कार्यपालिका को इस दिशा में सोचना होगा! भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को भी इस संभावना का पूर्ण भ्रूण परीक्षण कर लेना चाहिए! इस विचार का पूरा ऊपरी हाव भाव और अंतर्भाव हमें ग्रहण करना होगा, तभी हम नवाचारों और प्रयोगों के प्रति सदा सकारात्मक रहने वाले राष्ट्र की अपनी पहचान और भूमिका को अक्षुण्ण रख पायेंगे. नवाचार जो भी हो और देश जिस भी निर्वाचन प्रक्रिया को स्वीकार करे, यह बाद की बात है किन्तु वर्तमान में इतना स्पष्ट और निर्विवाद है कि नरेन्द्र मोदी उस व्यक्ति का नाम है जिसने इस देश के मतदाता को एक संसद सदस्य नहीं, बल्कि एक प्रधानमंत्री को चुनने के लिए मतदान करने की स्वस्फूर्त प्रेरणा दे दी है।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz