लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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पांच सितम्बर को भारत में ‘शिक्षक दिवस’ मनाया जाता है। यह हमारे दूसरे राष्ट्रपति डा. राधाकृष्णन का जन्मदिन है, जो एक श्रेष्ठ शिक्षक भी थे। इस दिन राष्ट्रपति महोदय देश भर के श्रेष्ठ शिक्षकों को सम्मानित करते हैं। शिक्षक होने के नाते मुझे भी इसमें रुचि रहती है कि इस बार कौन-कौन सम्मानित हुआ ? यद्यपि इन दिनों राजनीति जीवन के हर क्षेत्र में हावी हो गयी है। अतः शिक्षकों का चयन भी निष्पक्ष नहीं रहता। फिर भी राष्ट्रपति से सम्मानित होना हर अध्यापक के लिए गौरव की बात तो है ही।

गत पांच सितम्बर को हुए सम्मान समारोह का समाचार दूरदर्शन पर देखते हुए मैं अचानक चैंक पड़ा। सम्मानित शिक्षकों में एक मेरठ के विकलांग अध्यापक मोहन सिंह भी थे। वे पहिया कुर्सी पर चलते हुए आगे आये। मंच पर चढ़ने में उनकी असमर्थता देखकर राष्ट्रपति महोदय स्वयं नीचे उतरे और उन्हें अंगवस्त्र एवं प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया। तालियों की गड़गड़ाहट से सभागार गूंज उठा। पत्रकारों के लिए यह दृश्य विशेष था। अतः दूरदर्शन के हर चैनल पर बार-बार इसे दिखाया गया। अगले दिन के समाचार पत्रों ने भी इसे प्रमुखता से छापा।

मोहन को देखकर मेरी बचपन की यादें ताजा हो गयीं। हम दोनों एक ही गांव के हैं। मैंने कुछ खोजबीन की, तो पता लगा कि वह उ.प्र. निवास में ठहरा है। शाम को मैं वहां जाकर उससे मिला। मेरे आग्रह पर वह अगले दिन मेरे घर आया। मैं उससे लगभग 35 साल बाद मिला था। इसलिए बहुत सी पुरानी बातें हुईं। बहुत से गिले-शिकवे निकाले गये; पर मुझे उस भीषण दुर्घटना के बाद के घटनाक्रम को जानने की उत्सुकता थी, जिसने मोहन के जीवन को पूरी तरह बदल दिया था।

हमारा गांव मेरठ से बीस कि.मी. दूर है। श्री गजेसिंह वहां चार बीघे भूमि वाले एक साधारण किसान थे। उनका निधन हुए कई साल हो गये। उनके दो बेटे हैं सोहन और मोहन। सोहन से दो साल छोटी उसकी बहिन सरिता है और उससे तीन साल छोटा मोहन। यों तो मैं पूरे परिवार को अच्छे से जानता हूं; पर मोहन से मेरी घनिष्ठ मित्रता थी, चूंकि इंटर और फिर बी.एस-सी. करते समय मेरठ में हम दोनों एक साथ ही रहते थे।

उन दिनों हमारे गांव में हाई स्कूल तक ही शिक्षा की व्यवस्था थी। सोहन की पढ़ाई में कोई खास रुचि नहीं थी। इसलिए वह दसवीं के बाद पिताजी के साथ खेती में लग गया। सरिता को उसके घर वालों ने हाई स्कूल के बाद पढ़ाना उचित नहीं समझा और उसका विवाह कर दिया। अगले ही साल सोहन का विवाह भी हो गया; पर मोहन पढ़ने में अच्छा था। उसके पिताजी चाहते थे कि वह पढ़कर कहीं सरकारी नौकरी में लग जाए, तो खेती के अलावा आय का एक òोत और हो जाएगा। इसलिए उन्होंने मोहन को आगे पढ़ाने का निर्णय लिया।

कुछ ऐसे ही विचार मेरे पिताजी के भी थे। गांव में सब लोग एक-दूसरे को जानते ही हैं। अतः मैंने और मोहन ने मिलकर एक कमरा किराये पर ले लिया। मकान मालिक हमारे पड़ोसी गांव के ही एक वकील थे। वकालत के कारण उन्होंने मेरठ में ही मकान बना लिया था। हमारे घर वालों को लगा कि वहां रहकर हम पढ़ भी लेंगे और वकील साहब का कुछ नियंत्रण भी रहेगा।

वहां रहते हुए महीने में एक बार हम गांव हो आते थे। गांव से भी कोई न कोई प्रायः वहां आता ही रहता था। अतः दूध और घी की कमी नहीं रहती थी। इंटर के बाद हमने बी.एस-सी. में प्रवेश ले लिया। मेरी और मोहन की दोस्ती तो गांव में भी थी; पर यहां लगातार साथ रहने से वह और प्रगाढ़ हो गयी। हम दोनों मिलकर खाना बनाते और खाते थे। युवावस्था में जैसी मस्ती उन दिनों सब करते थे, हमने भी की। हां, इतना जरूर है कि हम किसी गलत मार्ग पर नहीं गये। वकील साहब का भी कुछ भय रहता था। उन दिनों को मैं अपने जीवन का स्वर्णिम काल मानता हूं।

आजकल तो बी.ए. और बी.एस-सी. तीन या चार साल में होतीे है; पर उन दिनों वह दो साल की थी। मई-जून में द्वितीय वर्ष की परीक्षा होनी थी। हम तैयारी में लगे थे। उसी समय हमारे गांव के प्रधान जी के लड़के राहुल का मोदीनगर में विवाह तय हो गया। दो साल बड़ा होने पर भी वह हमारा मित्र था। वह उन दिनों लखनऊ में एम.बी.बी.एस. अंतिम वर्ष का छात्र था। जिस लड़की से उसका विवाह हो रहा था, वह हमारे महाविद्यालय से ही बी.एस-सी. कर रही थी। राहुल ने हम दोनों को बारात में चलने को कहा। मोहन तो तैयार हो गया; पर मेरे पिताजी खुद जा रहे थे, अतः इच्छा होने पर भी मेरा नंबर कट गया।

सामान्यतः गांव की बारातें टैªक्टर ट्राली में जाती हैं; पर प्रधान जी का परिवार सम्पन्न था। अतः बारात के लिए दो बस और दो कार किराये पर ली गयी थीं। ठीक समय से सब लोग मोदीनगर पहुंच गये। एक धर्मशाला में सबके रुकने की व्यवस्था थी। कुछ विश्राम और फिर बढि़या नाश्ते के बाद बारात चलने को तैयार हो गयी। पंडित जी के मंत्रोच्चार के बीच दूल्हे राजा घोड़ी पर चढ़ गये। बहिनों और भाभियों ने घोड़ी को गुड़-चना खिलाया। नयी फिल्मी धुनों के लिए प्रसिद्ध मेरठ के ‘भारत बैंड’ की स्वर लहरियों से लोग मस्ती में आ गये। हर कोई दूल्हे के आगे नाचते हुए फोटो खिंचवाकर इस अवसर को यादगार बना लेना चाहता था।

बारात में बुजुर्ग शांति से चल रहे थे। महिलाएं भी दूल्हे के पीछे चलते हुए मंगलगीत गा रही थीं। कुछ लोगों ने आने-जाने वाले वाहनों को निर्देशित करने की जिम्मेदारी संभाल ली, जिससे सड़क पर जाम न लगे; लेकिन बच्चों और युवाओं पर किसी का नियन्त्रण नहीं था। वे नाचकर वह सब नाश्ता हजम कर लेना चाहते थे, जो धर्मशाला में कराया गया था। कुछ लोगों ने थोड़ी सी चढ़ा भी ली थी। वे सबसे अधिक झूम रहे थे।

डेढ़ घंटे की इस कवायद के बाद बारात कन्या पक्ष के घर पहुंच गयी। द्वाराचार के बाद बाराती भोजन आदि में व्यस्त हो गये। दूसरी ओर कुछ चुहलबाजी का माहौल था। दूल्हे के मित्रों और दुल्हन की सहेलियों में जुबानी छेड़छाड़ होने लगी। आखिर दूल्हे ने दुल्हन की बहिनों को सोने के तथा सहेलियों को चांदी के छल्ले दिये। तब जाकर दूल्हे राजा को भोजन नसीब हुआ। इसके बाद निर्धारित समय पर विवाह की धार्मिक रस्में पूरी हुईं।

विदा के समय दूल्हा और दुल्हन एक कार में बैठे, तो दूसरी में कुछ खास सम्बन्धी। दोनों कारें खचाखच भरी थीं। एक बस भोजन के बाद ही प्रस्थान कर चुकी थी। बचे हुए लोग दूसरी बस में बैठ गये। दहेज का सामान उसकी छत पर चढ़ा दिया गया। चलने की तैयारी पूरी हो गयी। बैंड वाले ‘‘छोड़ बाबुल का घर, आज पी के नगर, मोहे जाना पड़ा..’’ जैसी मार्मिक धुन बजा रहे थे। दुल्हन की मां, बहिनें और सहेलियां फफक कर रोने लगीं। उसके पिताजी भी रूमाल से आंसू पोंछ रहे थे।

अचानक पीछे वाली कार का चालक गाड़ी को चालू हालत में छोड़कर किसी काम से नीचे उतरा। अगली सीट पर बैठा एक युवक भी उधर से ही उतरने लगा। समय की बात, उसका पैर क्लच पर पड़ा और हाथ गियर से टकरा गया। इससे कार गियर में आकर झटके से आगे बढ़ गयी। मोहन उस समय कार के आगे से निकल रहा था। कार से टकराकर वह नीचे गिरा और कार उसकी कमर पर से होती हुई अगली कार से जा टकराई।

चारों तरफ हाहाकार मच गया। मोहन को कार के नीचे से निकाला गया, तो वह बेहोश हो चुका था। उसके सिर पर भी चोट आयी थी। कुछ लोग इसके लिए चालक को दोषी बता रहे थे, तो कुछ उस युवक को, जिसके हाथ से गियर हिला था। विदाई का सारा माहौल खराब हो गया। जैसे-तैसे लोगों ने दूल्हे वाली कार को घर की ओर रवाना किया और दूसरी कार में मोहन को डालकर अस्पताल ले जाया गया। सुबह पांच बजे का समय था। सब तरफ अंधेरा और हल्की ठंडक फैली थी। अस्पताल में कुछ कर्मचारी तो थे, पर कोई डाॅक्टर नहीं था। उन्होंने मोहन की गंभीर स्थिति देखकर हाथ खड़े कर दिये। अतः सब लोग उसे लेकर मेरठ के मैडिकल काॅलेज में दौड़े।

वहां आपातकालीन कक्ष में प्राथमिक उपचार के बाद उसे अस्पताल में भर्ती कर लिया गया। अगले दिन कई तरह की जांच से पता लगा कि उसकी रीढ़ की हड्डी बुरी तरह टूट चुकी थी। इलाज शुरू हुआ। डाॅक्टरों ने भरपूर कोशिश की। कई आॅपरेशन हुए। घर वालों ने खूब पैसा खर्च किया; पर विधि का विधान कुछ और ही था। छह महीने बाद जब वह घर आया, तो उसकी दोनों टांगे बेकार हो चुकी थीं। उसे पहिया कुर्सी पर चलना पड़ता था। इससे भी खराब बात यह थी कि कमर से नीचे के अंगों पर उसका अब कोई नियंत्रण नहीं रह गया था। उसे पता ही नहीं लगता था कि कब उसके कपड़े गंदे हो गये। दुर्गन्ध से ही उसे या घर वालों को इसका पता लगता था। तब उसकी साफ-सफाई की जाती थी। दुर्गन्ध के कारण उसके मित्र और परिचितों ने वहां आना बंद कर दिया। इससे उसका मनोबल गिर गया और उसने घर वालों से भी बोलना कम कर दिया।

मोहन और उसके घर वालों का सपना टूट गया। वे सोचते थे कि पढ़कर वह कोई सरकारी नौकरी करेगा, जिससे घर की आय बढ़ेगी; पर यहां तो जीवन भर के लिए भारी खर्च सिर पर आ गया। मां-बाप सोचते थे कि बेटा उनके बुढ़ापे का सहारा बनेगा; पर यहां तो उन्हें बुढ़ापे में अपने जवान बेटे का सहारा बनने को मजबूर होना पड़ा।

इस दुर्घटना से मोहन की पढ़ाई छूट गयी। दूसरी ओर मैंने गणित में एम.एस-सी. और फिर पी-एच.डी. किया। इससे मुझे दिल्ली वि.वि. में नौकरी मिल गयी। मैं घर में अकेला पुत्र था। दोनों बहिनों का विवाह हो चुका था। गांव में पिताजी की छोटी सी दुकान और मकान था। नौकरी और गृहस्थी पक्की होने पर मैंने पिताजी को उसे बेचने के लिए राजी कर लिया। पुरखों का गांव छोड़ने की उनकी इच्छा तो नहीं थी; पर गांव में अकेले वे भी कब तक रहते ? मांजी और बहिनों ने इस बारे में मेरा पूरा साथ दिया। इस प्रकार हम गांववासी से दिल्लीवासी हो गये। जब तक पिताजी जीवित रहे, वे किसी सुख-दुख का समाचार मिलने पर गांव हो आते थे; पर उनके बाद गांव से हमारा नाता टूट गया।

इसी तरह समय बीतता रहा। मोहन का कष्ट उसके पूरे परिवार का कष्ट हो गया। सबसे बड़ी समस्या उसकी सफाई की थी। दिन में कई बार उसके कपड़े बदलने पड़ते थे। दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में तो पैसे लेकर ऐसे सेवक उपलब्ध कराने वाली एजेंसियां हैं; पर यहां तो ये जिम्मेदारी उसकी माता-पिता ही निभाते थे।

इस बीच उसके पिताजी कैंसर के शिकार हो गये। मोहन की बीमारी ने उन्हें आर्थिक रूप से तो कमजोर कर ही दिया था, अब कैंसर ने उन्हें मन से भी तोड़ दिया। दो महीने के इलाज के बाद वे समझ गये कि अब मामला किनारे पर है। अतः उन्होंने एक वकील बुलाकर अपनी सम्पत्ति का पहला वारिस अपनी पत्नी को बनाया और उसके बाद अपने बेटों को। वे जानते थे कि मोहन अब कभी खेती नहीं कर सकेगा। अतः खेत उन्होंने बड़े बेटे सोहन के नाम कर दिये और मकान मोहन के नाम। उन्होंने तीनों बच्चों को भी ये बता दिया। इसके एक महीने बाद वे चल बसे।

यों तो उस घर में स्थायी रूप से शोक व्याप्त था; पर परिवार के मुखिया के निधन से यह और गहरा हो गया। मोहन की मां पर तो मानो वज्रपात ही हुआ। उनका घर से निकलना बिल्कुल बंद हो गया। सोहन के मन में छोटे भाई के प्रति प्रेम था; पर उसकी पत्नी पूजा उसे बोझ समझती थी। जब से पिताजी ने मकान मोहन के नाम किया, तब से उसका व्यवहार और कठोर हो गया था। इससे मां बहुत परेशान और चिन्तित रहने लगीं। उनके स्वास्थ्य पर भी इसका विपरीत असर हुआ। उन्हें हमेशा ये डर लगता था कि मेरे बाद मोहन का क्या होगा ? वे बार-बार सोहन और बहू को समझाती थीं। जब कभी सरिता और उसके पति यहां आते, तो मां उनसे भी अपने बाद मोहन का ध्यान रखने को कहती थीं।

इसी तरह दो साल और बीत गये। मां की स्थिति अब अच्छी नहीं थी। फिर भी वे मोहन के प्रति अपना कर्तव्य निभा रही थीं; पर उनकी कमजोरी बढ़ने के साथ ही पूजा की उग्रता भी बढ़ रही थी। उसे लगता था कि मां के बाद मोहन की साफ-सफाई उसे ही करनी पड़ेगी। वह इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी। उसके व्यवहार से लगता था कि वह मां की आंखें बंद होते ही मोहन को कहीं घर से न निकाल दे। यद्यपि वह मकान मोहन के ही नाम था; पर पूजा जानती थी कि मोहन मुकदमा नहीं लड़ सकता। एक बार मां ने किसी काम से वह संदूक खोला, जिसमें महत्वपूर्ण कागज रखे थे, तो वहां वसीयत न पाकर उसका माथा ठनक गया। अर्थात सोहन ने वह वसीयत अपने कब्जे में कर ली थी। इससे मां कई आशंकाओं से घिर गयीं।

उधर जिस राहुल के विवाह के समय यह दुर्घटना हुई थी, वह विवाह के एक साल बाद पत्नी सहित विदेश चला गया। वहां उसेे एम.एस. में तथा उसकी पत्नी ममता को नर्सिंग के पाठ्यक्रम में प्रवेश मिल गया। पढ़ाई पूरी कर उन्होंने वहीं नौकरी कर ली। सबको लगता था कि अब वे विदेश में ही बस जाएंगे; पर वे दोनों अपने गांव की मिट्टी से जुड़े हुए थे। दस साल विदेश में रहकर उन्होंने खूब धन कमाया और फिर वापस आकर मेरठ में अपना अस्पताल खोल लिया। उसका नाम उन्होंने अपने दादाजी की स्मृति में ‘श्रीराम अस्पताल’ रखा।

राहुल दम्पति के परिश्रम, योग्यता और मधुर व्यवहार से श्रीराम अस्पताल शीघ्र ही लोकप्रिय हो गया। वहां भारी भीड़ रहने लगी। उस बहुमंजिले अस्पताल में एक ही छत के नीचे अधिकांश सुविधाएं उपलब्ध थीं। कई विशेषज्ञ डाॅक्टर भी वहां नियमित रूप से आते थे। गांव वालों के लिए यह वरदान की तरह था। अधिकांश अस्पतालों में बिल बढ़ाने के लिए बिना बात ही कई तरह की जांच कराई जाती हैं; पर यहां ऐसा बिल्कुल नहीं था। निर्धन मरीजों को कई तरह की छूट भी दी जाती थी। व्यस्तता के बावजूद राहुल और ममता कभी-कभी गांव आ जाते थे। इस प्रकार वे गांव से लगातार जुड़े हुए थे।

राहुल को मोहन की स्थिति का पता तो था; पर विदेश में रहते हुए वह उसके लिए कुछ कर नहीं सकता था; पर अब बात दूसरी थी। एक बार जब वह मोहन से मिलने गया, तो सोहन अपने साले के विवाह में सपरिवार ससुराल गया हुआ था। वहां मोहन और उसकी मां ही थी। मोहन की बहिन सरिता भी आयी हुई थी। मोहन तो अधिक बोलता नहीं था; पर बातचीत में मां की पीड़ा आंखों से बह निकली। राहुल के मन में कहीं न कहीं यह अपराधबोध भी था कि उसके विवाह में हुई दुर्घटना के कारण मोहन की यह स्थिति हुई है। उसने मांजी के पांव छूकर वचन दिया कि वह मोहन का पूरा ध्यान रखेगा। उसने सरिता को कहा कि यदि कोई गड़बड़ हो, तो उसे तुरंत सूचना दे।

और छह महीने बाद वही हुआ, जिसका डर था। मांजी का निधन होते ही मोहन के लिए मुसीबत आ गयी। कुछ दिन सरिता उसके पास रही; पर उसके जाते ही पूजा ने मोहन का पलंग कमरे से हटाकर पीछे वाले बरामदे में लगा दिया। सोहन ने गांव के एक सफाई कर्मचारी को तीन सौ रु. महीने पर नियुक्त कर दिया। वह सुबह और शाम वहां आता था; पर बाकी सारे दिन मोहन गंदगी में ही पड़ा रहता था। कभी-कभी उसे आने में देर भी हो जाती थी। एक बार वह सफाई कर्मचारी ही बीमार हो गया। अतः दो दिन तक मोहन ऐसे ही पड़ा रहा। उसका जीवन मानो नरक जैसा हो गया। सरिता ने एक बार घर में बात की। सोहन तो चुप रहा, पर पूजा ने उसे डांट दिया।

इसके बाद तो पूजा का व्यवहार और भी खराब हो गया। वह प्रायः मोहन को भोजन देर से देती थी। कभी-कभी जानबूझ कर खराब रोटियां थमा देती थी। कभी सब्जी में नमक कम होता था, तो कभी दाल में मिर्च अधिक। एक बार उसने मोहन को धमकाते हुए कहा कि वह मकान से अपना दावा छोड़ दे, वरना ठीक नहीं होगा। इससे मोहन को लगा कि कहीं किसी दिन वह धोखे से उसे जहर न दे दे। इससे वह खाना खाते हुए डरने लगा।

इस तरह की बातें दबी और ढकी भले ही रहें; पर सदा के लिए छुपती नहीं हैं। अतः सोहन और पूजा के दुव्र्यवहार की चर्चा गांव से होते हुए राहुल तक भी पहुंच गयी। उसने अपने पिताजी से बात कर इसका समाधान करने को कहा। राहुल के पिताजी गांव के प्रधान भी थे। उन्होंने सोहन को बुलाकर समझाया; पर सोहन का कहना था कि घर में काम करने वाला मैं अकेला हूं। मोहन के खानपान, दवाई और सफाई पर एक हजार रु. महीना खर्च हो रहा है। मुझे अपना परिवार भी देखना है। फिर भी जितना मुझसे संभव है, मैं कर रहा हूं। इससे अधिक मैं नहीं कर सकता।

प्रधान जी ने कहा, ‘‘सुना है गजेसिंह अपनी वसीयत में मकान मोहन के नाम कर गये हैं।’’ सोहन यह सुनकर चैंका। इसका पता उन्हें कैसे लगा ? हो सकता है पिताजी ने कभी उन्हें बताया हो; पर इसके कागज तो उसके ही पास थे। अतः वह संभलकर बोला, ‘‘जी नहीं। पिताजी ऐसी कोई वसीयत करके नहीं गये।’’ प्रधान जी समझ गये कि अब सीधी उंगली से घी नहीं निकलेगा। अतः उन्होंने उंगली टेढ़ी कर दी।

इस क्षेत्र के साठ गांवों में सैकड़ों साल से जिस वंश और गोत्र के लोग बसे थे, प्रधान जी उनके भी मुखिया थे। इस नाते उन्हें ‘साठा स्याणा’ कहा जाता था। ग्राम प्रधान का पद तो राजनीतिक था। उसका चुनाव हर पांच साल बाद जनता करती थी; पर ‘साठा स्याणा’ का पद परम्परागत था। उसकी बात का कानूनी महत्व भले ही न हो; पर सामाजिक क्षेत्र में उनका कहा टाला नहीं जा सकता था। राहुल के दादा श्री रामसिंह के निधन के बाद पूरी बिरादरी ने सर्वसम्मति से साठा स्याणा की पगड़ी उसके पिता श्री रामपाल सिंह के सिर पर बांधी थी।

‘स्याणा पंचायत’ में ग्यारह पुरुष सदस्य होते थे; पर रामपाल सिंह जी ने तीन महिलाओं को भी ‘स्याणा’ बनाया। इससे पूरी बिरादरी, और विशेषकर महिलाओं में उनकी प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गयी। पहले किसी के बुलाने पर ही पंचायत होती थी और उसमें महिलाएं चुप बैठती थीं; पर प्रधान जी हर महीने की पहली तारीख को पंचायत करने लगे। बिरादरी की कोई भी महिला या पुरुष वहां आकर अपनी बात कह सकता था। इससे घर-परिवार की अनेक समस्याएं वहीं निबटने लगीं। कभी कोई ऐसी समस्या आ जाए, जिसका सम्बन्ध पूरी बिरादरी से हो, तो फिर महापंचायत बुलायी जाती थी। सभी साठ गांवों में इसके लिए मुनादी होती थी। हजारों लोग इसमें आते थे। काफी समय से ये परम्परा चल रही थी।

प्रधान जी ने जब देखा कि सोहन आसानी से मानने वाला नहीं है, तो उन्होंने उसे अगली पंचायत में हाजिर होने का आदेश जारी कर दिया। पहले तो सोहन ने सोचा कि वहां न जाए। पिताजी की वसीयत का किसी और को क्या पता है ? वह जब चाहे उसे फाड़कर जला सकता है; पर पूजा के कहने से वह पंचायत में चला गया। वहां प्रधान जी तथा अन्य सदस्यों ने उसे एक बार फिर समझाया; पर सोहन ने पुरानी बातें दोहरा दीं। इस पर प्रधान जी ने उसके पिता की वसीयत उसके सामने रख दी।

presidentसोहन के माथे पर पसीना आ गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह वसीयत प्रधान जी के पास कैसे आ गयी ?

असल में उसके पिताजी ने मूल वसीयत के साथ ही उसकी एक दूसरी प्रति बनवाकर सरिता के पास रखवा दी थी। इसका पता सोहन को नहीं था। प्रधान जी के पास जो प्रति थी, वह सरिता वाली ही थी। पिछले कुछ दिनों से पूजा भाभी द्वारा मोहन के साथ हो रहे दुव्र्यवहार से सरिता बहुत दुखी थी। उसने राहुल को सारी बात बतायी और वसीयत की यह प्रति उसे दे दी। राहुल ने अपने पिताजी से बात की और सोहन को पंचायत में बुलवा लिया।

लेकिन सोहन इतनी जल्दी हार मानने वाला नहीं था। वह बोला, ‘‘आप जो वसीयत मुझे दिखा रहे हैं, वह झूठी है। मैं तीनों भाई बहिनों में सबसे बड़ा हूं। ऐसा कैसे हो सकता है कि पिताजी की वसीयत का आपको तो पता हो, पर मुझे नहीं ? मैं इसे अदालत में चुनौती दूंगा।’’

अब प्रधान जी की बारी थी। वे बोले, ‘‘देखो सोहन, अदालत का रास्ता तो सदा खुला ही हुआ है; पर गांव और बिरादरी की बात यहीं निबट जाए, तो अच्छा है। जिस सरकारी वकील के सामने तुम्हारे पिताजी ने वसीयत लिखी थी, वह अभी जीवित है। उसके हस्ताक्षर भी इस पर हैं। मेरी उससे बात हो गयी है। अदालत में वह भी हमारी ओर से खड़ा होगा। बेटे सोहन, लोग हमें स्याणा ऐसे ही नहीं कहते। हमने इस मामले के हर पहलू पर खूब विचार किया है। इसलिए हम जो कह रहे हैं, पूरी तरह ठोक बजाकर ही कह रहे हैं।

सोहन के घुटने कांपने लगे। उसने सोचने के लिए कुछ समय मांगा। प्रधान जी ने उसे अगली पंचायत में फिर आने को कहा। जब वह चलने लगा, तो प्रधान जी बोले, ‘‘एक बात और भी समझ लो सोहन। अदालत का निर्णय तो पता नहीं दस साल में आये या बीस साल में; पर यदि तुमने हमारी बात नहीं मानी, तो बिरादरी में तुम्हारा हुक्का-पानी बंद रहेगा। मोहन की व्यवस्था तो हम कर लेंगे; पर तुम्हारी व्यवस्था कौन करेगा, ये सोच लो।’’

सोहन की रातों की नींद उड़ गयी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह खेल कब हुआ और कैसे ? गांव में हुक्का-पानी बंद होना सबसे बड़ी सजा थी। इसका अर्थ था कि सुख-दुख में अब कोई उसके घर नहीं आएगा और न ही कोई उसे अपने घर बुलाएगा। उसके बच्चों के विवाह बिरादरी में नहीं होंगे। उसने अपनी ससुराल में पूछा, फिर सरिता और उसके पति से बात की। सबने उसे प्रधान जी की बात मानने को कहा। उसने एक बार राहुल से भी बात की। उसने साफ कह दिया कि पंचों की बात न मानने पर हुक्का-पानी बंद होने के साथ ही उसे मकान भी खाली करना होगा। क्योंकि यह मकान मोहन का है।

सोहन का दिमाग एक महीने से पहले ही ठिकाने पर आ गया। अगली पंचायत में आकर उसने माफी मांगी और मोहन का पूरा ध्यान रखने का लिखित में वचन दिया।

लेकिन घर में कुछ व्यावहारिक समस्याएं भी थीं। सोहन के बच्चे बड़े हो रहे थे। उन्हें भी रहने के लिए जगह चाहिए थी। दो कमरे नीचे थे और एक ऊपर। अतः ऊपर दो नये कमरे बनवाये गये। अब सोहन का परिवार ऊपर ही चला गया। इधर राहुल ने अपने अस्पताल से एक सेवक वहां भेज दिया, जो मोहन की साफ-सफाई से लेकर उसके लिए खाना भी बना देता था। राशन की पूरी व्यवस्था सोहन के जिम्मे थी। दवाइयां अस्पताल से आ जाती थीं। गीत-संगीत सुनने के लिए राहुल ने एक अच्छा टू इन वन भी भेज दिया। इस सबसे उसका जीवन कुछ आसान हो गया। अब वह कभी-कभी बाहर बरामदे में भी बैठ जाता था। सेवक शाम को उसे पहिया कुर्सी पर लेकर सड़क पर घुमाने लगा। इससे गांव वालों से उसकी राम-राम होने लगी। कुछ पत्र-पत्रिकाएं भी वहां आने लगीं। इससे उसका मन भी क्रमशः ठीक होने लगा।

राहुल स्वयं एक सर्जन था। कुछ समय बाद उसने अपने अस्पताल में मोहन का आॅपरेशन किया। उसकी मूत्रनली में स्थायी रूप से एक रबड़ की नली डाल दी गयी, जिससे मूत्र एक थैली में जमा होता रहता था। इसी प्रकार उसके पेट पर भी रबड़ की थैली लग गयी, इसमें उसका मल एकत्र होने लगा। दिन में दो बार उन्हें साफ करना पड़ता था। इसके लिए प्रशिक्षित सेवक था ही। आॅपरेशन के दो महीने भर बाद जब मोहन घर पहुंचा, तो वह हर समय की गंदगी और दुर्गन्ध से निजात पा चुका था।

इस सारी प्रक्रिया के पीछे राहुल का दिमाग काम कर रहा था; पर अपने विवाह में हुई दुर्घटना के अपराधबोध से वह पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ था। उसे अभी और भी बहुत कुछ करना था। मोहन प्रथम श्रेणी का विद्यार्थी रहा था। यद्यपि उसकी पढ़ाई छूटे पन्द्रह साल हो चुके थे। फिर भी राहुल ने उसे ग्राम सभा द्वारा संचालित विद्यालय में पढ़ाने के लिए राजी कर लिया।

विद्यालय मोहन के घर के पास ही था। राहुल के पिताजी को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं थी। ग्राम सभा का विद्यालय होने के कारण वे उसके भी प्रधान थे। मोहन अपने सेवक के साथ पहिया कुर्सी पर चलकर विद्यालय आने लगा। मल और मूत्र की थैलियां उसके कपड़ों के नीचे छिपी रहती थीं। शुरू में उसे प्राथमिक कक्षाएं पढ़ाने का काम मिला; पर उसकी पढ़ाने की शैली इतनी अच्छी थी कि प्राचार्य जी ने दो साल बाद ही उसे जूनियर कक्षा में गणित पढ़ाने की जिम्मेदारी दे दी।

इस सबसे मोहन का विश्वास फिर जाग्रत होने लगा। दो साल में उसकी नौकरी पक्की हो गयी और उसे सरकार द्वारा निर्धारित वेतन मिलने लगा। उसने शाम को अपने घर पर आसपास के बच्चों को निःशुल्क पढ़ाना शुरू कर दिया। इससे उसके कमरे में चहल-पहल बनी रहती थी। अब सोहन के बच्चे भी वहां बैठकर ही पढ़ने लगेे। पूजा के मन में वहां रहने वाली गंदगी के कारण जो दुराव था, वह भी अब दूर हो गया। मोहन भी पुरानी बातें भूलकर अब आगे और आगे बढ़ने की ही बात सोचने लगा। उसका उत्साह देखकर लगता था कि वह पिछले 15 साल की कमी 15 महीने में ही पूरी कर लेगा।

धीरे-धीरे ऐसे ही आठ साल और बीत गये। मोहन ने इस दौरान अपनी बीच में छूट गयी पढ़ाई को पूरा करते हुए अंग्रेजी में एम.ए. और फिर बी.एड. भी कर लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि विद्यालय के प्रधानाचार्य जब सेवामुक्त हुए, तो इस पद पर मोहन को नियुक्ति मिल गयी। अब तो उसकी सक्रियता और भी बढ़ गयी। पढ़ने में कमजोर बच्चों के लिए उसने विद्यालय में छुट्टी के बाद विशेष कक्षाएं शुरू करवा दीं। उसका अपना खर्च तो कुछ खास था नहीं। अतः अपने वेतन से वह इन कक्षाओं का खर्च उठाने लगा। बड़े छात्रों के लिए दो कम्प्यूटर भी मंगवा लिये। इससे जहां एक ओर छात्र-छात्राओं का परीक्षा परिणाम उन्नत हुआ, वहां गांव में उसकी लोकप्रियता भी बढ़ने लगी।

मोहन समय से विद्यालय पहुंचकर पूरे समय वहीं रहता था। कोई कक्षा खाली रहती, तो वह स्वयं वहां पहुंच जाता था। इसका प्रभाव अन्य अध्यापकों पर भी पड़ा और विद्यालय का वातावरण बिना कुछ कहे ही ठीक होने लगा। गांव के बड़े लोग भी अब उसे ‘गुरुजी’ कहने लगे। प्रधान जी के निधन के बाद पूरा गांव उसे निर्विरोध ग्राम प्रधान बनाने को तैयार था; पर मोहन ने हाथ जोड़ लिये। वह राजनीतिक छल-प्रपंच से दूर रहकर अपनी पूरी शक्ति छात्रों के विकास में ही लगाना चाहता था।

मोहन के परिश्रम और लगन से उसके विद्यालय के छात्र परीक्षा में शीर्ष स्थान पाने लगे। फेल तो अब कोई होता ही नहीं था। इससे जिला प्रशासन का ध्यान इस ओर गया। अतः मोहन को कई सम्मानों से अलंकृत किया गया। पिछले साल गांव के एक छात्र ने हाई स्कूल की परीक्षा में उ.प्र. में सबसे अधिक अंक प्राप्त किये। जब अखबार और दूरदर्शन वाले उससे मिलने आये, तो उसने इसका पूरा श्रेय मोहन गुरुजी और उनके द्वारा संचालित विशेष कक्षाओं को दिया। इस पर जिलाधीश महोदय ने राष्ट्रपति द्वारा दिये जाने वाले ‘आदर्श शिक्षक सम्मान’ के लिए उनके नाम की संस्तुति प्रदेश शासन को कर दी। वहां से यह नाम केन्द्र में पहुंच गया और इससे आगे की घटना का उल्लेख इस कथा के प्रारम्भ में किया ही गया है।

मोहन अपनी कहानी सुनाते हुए कई बार भावुक हुआ, ‘‘राहुल के विवाह में जो दुर्घटना हुई, वह शायद मेरे पूर्वजन्म के किसी पाप का फल होगा; पर ये भी सच है कि यदि राहुल

ने रुचि न ली होती, तो मैं आज भी घर के पिछले बरामदे में गंदगी में ही पड़ा होता। राहुल मेरे लिए देवता के समान है। मैं उसका उपकार कभी नहीं भूल सकता।’’

मोहन के जाने के बाद मैंने टी.वी. खोला। वहां एक फिल्मी गीत बज रहा था –

गरीब जान के हमको न तुम मिटा देना।
तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना..।

मैं अभी तक असमंजस में हूं कि मोहन और राहुल के रिश्ते को क्या नाम दूं ? दर्द, दवा या दोनों ?

 

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