लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

देशभर के राज्यों के पुलिस महानिदेशकों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुलिस से एक बार फिर वही अपेक्षाएं की हैं,जो देश के पूर्व प्रधानमंत्री भी करते रहे हैं। किंतु पुलिस इन अपेक्षाओं से कोसों दूर इसलिए है क्योंकि पुलिस की कार्य संस्कृति में आमूलचूल परिवर्तन के लिए बुनियादी पहल का जोखिम कोई भी राजनीतिक दल उठाने को तैयार नहीं है। इसीलिए ये सम्मेलन किसी परिणाम में नहीं बदल पाते है। जबकि देश में जब भी कानून व्यवस्था से जुड़ी बड़ी घटना घटती है तो प्रशासन और पुलिस पर सवाल राजनीतिकों से लेकर नागरिक समाज तक के लोग उठाने लगते हैं। चहूंओर से पुलिस को जबावदेह बनाने के साथ, उसका चेहरा मानवतावादी बनाये जाने की मांग भी उठने लगती है। ब्रिटिश राज्य के दौरान लागू किए गए कानून और उनको अमल में लाने की प्रणालियां आज भी बरकरार है। जबकि आजादी के बाद देश की जरूरतों के हिसाब से जो बदलाव लाने थे,वे आज तक नहीं लाए गए हैं। हकीकत तो यह है कि पुलिस के पुराने ढर्रे पर चलते रहने के कारण समस्याएं जस की तस बनी हुई है। इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय भी पुलिस में व्यापक एवं  मानवीय फेरबदल के निर्देश कई बार दे चुकी है, लेकिन केंद्र सरकार और राज्य सरकारें इस दिशा में कोई पहल करती दिखाई अब तक नहीं दी हैं।

policeपुलिस की कार्यप्रणाली प्रजातांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक अधिकारों के प्रति उदार, खरी व जवाबदेह हो, इस नजरिये से सर्वोच्च न्यायालय ने करीब नौ साल पहले राज्य सरकारों को मौजूदा पुलिस व्यवस्था में फेरबदल के लिए कुछ सुझाव दिए थे, इन पर अमल के लिए कुछ राज्य सरकारों ने आयोग और समितियों का गठन भी किया था। लेकिन किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले ये कोशिशें आईएएस बनाम आईपीएस के बीच उठे वर्चस्व के सवाल और अह्म के टकराव में उलझकर रह र्गइं। ब्रितानी हुकूमत के दौरान 1861 में वजूद में आए ‘पुलिस एक्ट’ में बदलाव लाकर कोई ऐसा कानून अस्तित्व में आए जो पुलिस को कानून के दायरे में काम करने को तो बाध्य करे ही, पुलिस की भूमिका भी जनसेवक के रूप में चिन्हित हो, क्या ऐसा नैतिकता और ईमानदारी के बिना संभव है ? पुलिस राजनीतिकों के दखल के साथ पहुंच वाले लोगों के अनावश्यक दबाव से भी मुक्त रहते हुए जनता के प्रति संवेदनशील बनी रहे, ऐसे फलित तब सामने आएंगे जब कानून के निर्माता और नियंता ‘अपनी पुलिस बनाने की बजाय अच्छी पुलिस’ बनाने की कवायद करें।

पुलिस को समर्थ व जवाबदेह बनाने के लिए उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह बनाम भारतीय संघ के एक मामले में उच्चतम न्यायालय ने पुलिस व्यवस्था को व्यावहारिक बनाने की दृष्टि से सोराबजी समिति की सिफारिशें लागू करने की हिदायत राज्य सरकारों को दी थीं। लेकिन पुलिस की कार्यप्रणाली को जनतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप बनाने की पहल देश की किसी भी राज्य सरकार ने नहीं की। चूंकि ‘पुलिस’ राजनीतिकों के पास एक ऐसा संवैधानिक औजार है,जो विपक्षियों को फंसाने,उन्हें जलील व उत्पीड़ित करने के आसान तरीके के रूप में पेश आती है। इसीलिए पुलिस तो पुलिस, सीवीसी और सीबीआई को भी विपक्षी दल सत्ताधारी हाथों का खिलौना कहते नहीं अघाते।

इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आजादी के 68 साल बाद भी पुलिस की कानूनी सरंचना, संस्थागत ढांचा और काम करने का तरीका औपनिवेशिक नीतियों का पिछलग्गू है। इसलिए इसमें परिवर्तन की मांग न केवल लंबी है,बल्कि लाजिमी भी है। लिहाजा इसी क्रम में कई समितियां और आयेाग वजूद में आए और उन्होंने सिफारिशें भी कीं, परंतु सर्वोच्च न्यायालय के बार-बार निर्देश देने के बावजूद राज्य सरकारें सिफारिशों को लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देने की बजाय इन्हें टालती रही हैं। बल्कि कुछ सरकारें तो सर्वोच्च न्यायालय की इस कार्यवाही को विधायिका और कार्यपालिका में न्यायपालिका के अनावश्यक दखल के रूप में भी देखती हैं। इसीलिए सोराबजी समिति ने पुलिस विधेयक का जो आदर्श प्रारूप तैयार किया है, वह अब तक ठण्डे बस्ते में है।

पुलिस की स्वच्छ छवि के लिए जरूरी है उसे दबाव मुक्त बनाया जाए। क्योंकि पुलिस काम तो सत्ताधारियों के दबाव में करती है, लेकिन जलील पुलिस को होना पड़ता है। झूठे मामलों में न्यायालय की फटकार का सामना भी पुलिस को ही करना होता है। पुलिस के आला-अधिकारियों की निश्चित अवधि के लिए तैनाती भी जरूरी है। क्योंकि सिर पर तबादले की तलवार लटकी हो तो पुलिस भयमुक्त अथवा भयनिरपेक्ष कानूनी कार्रवाई को अंजाम देने में सकुचाती है। कई राजनेताओं के मामलों में तो जांच कर रहे पुलिस अधिकारी का ऐन उस वक्त तबादला कर दिया जाता है, जब जांच निर्णायक दौर में होती है। हालांकि जांच और अभियोजना के लिए पृथक एजेंसी की जरूरत भी सिफारिशों में हैं। ऐसा होता है तो पुलिस लंबी जांच प्रक्रिया से मुक्त रहते हुए, कानून-व्यवस्था को चुस्त बनाए रखने में ज्यादा ध्यान दे पाएगी।

पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के लिए बाध्यकारी बनाए जाने की कवायद भी सिफारिशों में शामिल है। क्योंकि पुलिस कमजोर व पहंुचविहीन व्यक्ति के खिलाफ तो तुरंत एफआईआर लिख लेती है, लेकिन ताकतवर के खिलाफ ऐसा तत्काल नहीं करती। इसलिए नाइंसाफी के शिकार लोग अदालतों में निजी इस्तगासे दायर करके  मामलों को संज्ञान में ला रहे हैं। ऐसे मामलों की संख्या पूरे देश में बढ़ रही है। इस वजह से पहली नजर में जो दायित्व पुलिस का है,उसका निर्वहन अदालतों को करना पड़ रहा है। अदालतों पर यह अतिरिक्त बोझ है। अदालतों में ऐसे मामले अपवाद के रूप में ही पेश होने चाहिए ? न्यायालय ने तो निर्देशित भी किया है कि पुलिस किसी भी फरियादी को एफआईआर दर्ज करने से मना नहीं कर सकती। दिल्ली उच्च न्यायालय ने तो एफआईआर की प्रति भी अनिवार्य रूप से फरियादी को देने और उसे फौरन वेबसाइट पर डालने की हिदायत दी है।

दिल्ली में पुलिस को लेकर जबरदस्त विडंबंना है। स्वतंत्र राज्य सरकार होने के बावजूद दिल्ली पुलिस केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है। ऐसे में दिल्ली के मुख्यमंत्री भी बड़ी से बड़ी घटना मे ंपुलिस का प्रत्यक्ष दोष देखने के बावजूद,किसी मामूली सिपाही के विरुद्ध भी कोई अनुशासनात्मक अथवा दण्डनीय कार्यवाही नहीं कर सकते। जबकि कानून व्यवस्था की प्रत्यक्ष जबावदेही राज्य सरकार की है। राष्ट्रीय पुलिस आयोग भी पुलिस की मौजूदा कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं है। आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 60 फीसदी, ऐसे लोगों को हिरासत में लिया जाता है, जिन पर लगे आरोप सही नहीं होते। कारागारों में बंद 42 फीसदी कैदी इसी श्रेणी के हैं। ऐसे ही कैदियों के रखरखाव और भोजन पानी पर सबसे ज्यादा धनराशि खर्च होती है। ऐसे मामलों में सीबीआई और पुलिस की नाकामी जाहिर होती है और निर्दोषों को बेवजह प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। इसलिए राज्य सरकारों को पुलिस व्यवस्था में सुधार की जरूरत को नागरिक हितों की सुरक्षा के तईं देखने की जरूरत है, न कि पुलिस को राजनीतिक हित-साध्य के लिए खिलौना बनाए रखने की ?

 

पुलिस से संवेदनशील होने और लचीला रुख अपनाने की उम्मीद की जाती है। किंतु ऐसे अनेक अप्रसांगिक और विरोधाभासी कानून अस्तित्व में बने हुए हैं,जिनकी वजह से पुलिस की कार्य संस्कृति को असमंजस की स्थिति का सामना करना पड़ता है। यह सम्मेलन ऐसे समय संपन्न हुआ है जब पुलिस की चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। आईएसआईएस और अलकायदा के आतंक की छाया पूरे देश पर मंडरा रही है। साईबर अपराधों का खतरा सुरसामुख की तरह फैल रहा है। दूसरी तरफ महिला सुरक्षा और प्राकृतिक आपदा प्रबंधन के र्मोचे पर भी चुनौतियां बढ़ रही हैं। ऐसे में नरेंद्र मोदी ने जिन बातों का जिक्र सम्मेलन में किया है,उन्हें कानूनी बदलावों के जरिए पुलिस की कार्य संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा बनाने की जरूरत है। जिससे पुलिस की मानसिकता बदले और उसे मानवीय व उत्तरदायी बनने के अवसर मिलें।

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1 Comment on "पुलिस के मानवतावादी चेहरे की दरकार"

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Himwant
Guest

पुलिस का चेहरा कठोर होना चाहिए। व्यवहार में मानवधिकार के व्यवहारिक पक्षों का ध्यान रखा जाना चाहिए। पेशवर मांवधिकारवादी अपराधियो और आतंकवादीयो की भलाई की बात करते है, लेकिन उनके अपराध एवं हिंसा की वजह से आम नागरिको का शांतिपूर्वक जीने का जो अधिकार हनन होता है उसको नजरअंदाज करते है।

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