लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

Posted On by &filed under विधि-कानून, विविधा, समाज.


डॉ. मयंक चतुर्वेदी

मानव अधिकारों के संरक्षण की चर्चा आरंभ करने से पहले यह जानना जरूरी है कि आखिर यह मानवाधिकार क्या हैं और इसके बाद यह जानेंगे कि भारतीय मीडिया का इनके विकास में क्या योगदान रहा है। वस्तुतः मानव अधिकारों से अभिप्राय ‘‘मौलिक अधिकारों एवं स्वतंत्रता से है जिसके सभी मानव प्राणी हकदार है। अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं के उदाहरण के रूप में जिनकी गणना की जाती है, उनमें नागरिक और राजनीतिक अधिकारों, नागरिक और राजनैतिक अधिकार सम्मिलित हैं जैसे कि जीवन और आजाद रहने का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के सामने समानता एवं आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ ही साथ सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार, भोजन का अधिकार काम करने का अधिकार एवं शिक्षा का अधिकार।‘‘1 विकिपीडिया भाग।

मानवाधिकारों के इतिहास और इसकी चिंताओं को देखें तो सर्वप्रथम इसके बारे में हमें भारतीय वांग्मय में व्यापक तौर पर सामग्री मिलती है। दुनिया कि आदि ग्रंथ कहे जाने वाले सबसे प्राचीन ग्रंथों के रूप में मान्य वेदों में यह सर्वप्रथम दिखाई देते हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद से लेकर अथर्ववेद में अनेक ऋचाएं हैं, जो इस बात पर चिंता व्यक्त करती हैं कि व्यक्ति के स्वतंत्रता के अधिकार के साथ उसके बोलने की आजादी का संपूर्ण रूप से ख्याल रखा जाए। राज्य के स्तर पर या स्थानीय निकाय में प्रत्येक नागरिक कानूनी समानता, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के स्तर पर एक समान हो। भारत में इन वैदिक ग्रंथों के बाद अन्य पौराणिक ग्रंथों, जातक कथाओं, अपने समय के कानूनी दस्तावेजों सहित धार्मिक और दार्शनिक पुस्तकों में ऐसी अनेक अवधारणाएं, नियम, सिद्धांत मिलते हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि भारत में मानवाधिकार की चिंता शुरू से की जाती रही है।वर्तमान संदर्भों में इसकी बात करें तो ‘‘आधुनिक मानवाधिकार कानून तथा मानवाधिकार की अधिकांश अपेक्षाकृत व्यवस्थाएं समसामयिक इतिहास से संबंध हैं। द ट्वेल्व आर्टिकल्स ऑफ द ब्लैक फॉरेस्ट (1525) को यूरोप में मानवाधिकारों का सर्वप्रथम दस्तावेज माना जाता है। यह जर्मनी के किसान- विद्रोह (Peasants’ War) स्वाबियन संघ के समक्ष उठाई गई किसानों की मांग का ही एक हिस्सा है। ब्रिटिश बिल ऑफ राइट्स ने युनाइटेड किंगडम में सिलसिलेवार तरीके से सरकारी दमनकारी कार्रवाइयों को अवैध करार दिया। दूसरी ओर 1776 में संयुक्त राज्य में और 1789 में फ्रांस में 18 वीं शताब्दी के दौरान दो प्रमुख क्रांतियां घटीं, जिसके फलस्वरूप क्रमशः संयुक्त राज्य की स्वतंत्रता की घोषणा एवं फ्रांसीसी मनुष्य की मानव तथा नागरिकों के अधिकारों की घोषणा का अभिग्रहण हुआ। इन दोनों क्रांतियों ने ही कुछ निश्चित कानूनी अधिकारों की स्थापना की।2 वही

इसके बाद युरोप के देशों समेत दुनिया के तमाम देशों में किसी न किसी रूप में मानव के अधिकारों और उनके संरक्षण की बातें उठने लगीं। राष्ट्र संघ ने 10 दिसम्बर 1948 को मानव अधिकार की सार्वभौम घोषणा अंगीकार की। जिसमें यह बात साफतौर पर लिखी गई कि संयुक्त राष्ट्र के लोग यह विश्वास करते हैं कि कुछ ऐसे मानवाधिकार हैं जो कभी छीने नहीं जा सकते, मानव की गरिमा है और स्त्री-पुरुष के समान अधिकार हैं। इस घोषणा के परिणामस्वरूप विश्व के कई राष्ट्रों ने इन अधिकारों को अपने संविधान में शामिल करना आरंभ कर दिया।भारत के राज्यों में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 की धारा 21 में राज्य में मानवाधिकार आयोग गठन का प्रावधान है और राज्यों में इसके गठन की प्रक्रिया तेजी से बढ़ रही है। इन आयोगों के वित्तीेय भार का वहन राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है। संबंधित राज्य का राज्यंपाल, अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति करता है। आयोग का मुख्यालय राज्य में कहीं भी हो सकता है। ‘‘सन 1993 की धारा 21 (5) के तहत राज्य मानव अधिकार के हनन से संबंधित उन सभी मामलों की जांच कर सकता है, जिनका उल्लेख भारतीय संविधान की सूची में किया गया, वहीं धारा 36 (9) के अनुसार आयोग ऐसे किसी भी विषय की जांच नहीं करेगा, जो किसी राज्य आयोग अथवा अन्य आयोग के समक्ष विचाराधीन है।”3.डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव, हिन्दी विभाग डी.वी.(पी.जी.) कालेज उरई, जालौन उ.प्र.।

मानवाधिकार की इस चर्चा के बाद अब हम बात करते हैं, मीडिया या पत्रकारिता की। वास्तव में मीडिया है क्या, सबसे पहले यह सोचा जाना चाहिए। मीडिया शब्द देखा जाए तो मीडिएटर शब्द से बना है, जिसका आशय है दो लोगों के बीच परस्पर संवाद बनाने का माध्यम। दूसरे शब्दों में कहें तो यह जन सूमह तक सूचना, शिक्षा और मनोरंजन पहुंचाने का एक माध्यम है। यह संचार का सरल और सक्षम साधन है, जो अर्थव्यवस्था के समग्र विकास में मुख्य भूमिका निभाता है। अब जैसा कि हमारा विषय है, मानव अधिकारों का संरक्षण और भारतीय मीडिया तो यहां समझना होगा कि मीडिया एक संवाद सेतु है, जोकि अपने संवाद माध्यम सेतु होने का अहसास सभी को करा रहा है। वास्तव में मीडिया का मुख्य कार्य भी यही है कि वह जितनी जल्दी हो सके एक सूचना को दूसरे स्थान तक ले जाए, जिनसे कि वह जुड़ी हुई है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि मीडिया जितना सक्रिय होगा, मानवों के अधिकारों का संरक्षण, उनका विकास उतनी ही तेजी से होगा। दूसरी ओर यह भी कहा जा सकता है कि मीडिया की अधिकतम सक्रियता के चलते समाज में व्याप्त विसंगतियों और मानवों अधिकारों का हो रहा क्षरण भी द्रुत गति से रोका जा सकता है।भारतीय परिप्रेक्ष्य में संचार माध्यमों को अपनी ताकत का अंदाजा स्वाधीनता आंदोलन से हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में समाचार पत्रों, पत्रिकाओं व स्वयंसेवी संगठनों का आपस में गहरा रिश्ता रहा जो आगे सतत बढ़ता रहा है, इसे लेकर यह भी कह सकते हैं कि यही रिश्ता समय के साथ मानव अधिकारों के संदर्भ में और अधिक सबल हुआ है। वास्तव में देखें तो भारत में मीडिया की भूमिका शुरू से ही सकारात्मक, उपदेशात्मक और उदाहरणात्मक रही है। जो लोग मीडिया पर कई बार बिना जाने यह आरोप लगा देते हैं कि मीडिया अपना धर्म सही से नहीं निभा रहा है, उनको यह जरूर समझना चाहिए कि यदि मीडिया होता ही नहीं तो क्या होता ? आज जितने भी विकासात्मक संवाद चल रहे हैं, सूचनाओं के स्तोर पर घटनाओं की जानकारी और मानवाधिकारों के हनन के मुद्दे जिस तेजी से प्रसारित हो रहे हैं, क्या वे इतनी तत्परता से सभी तक पहुंच पाते, वह भी बिना देरी बगैर ? स्वाभाविक है, ऐसा नहीं होता। यानि कि यह पूरी तरह मान लिया जाए कि दुनिया में जितना भी विकास हुआ है और जितने भी विवादास्पद मुद्दें हैं उन सभी को प्रमुखता से आगे बढ़ाने का कार्य हो या अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा कहने तथा जन-जन का मार्गदर्शन करने का कार्य, सभी में आज मीडिया की प्रभावी भूमिका है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि आगे भी मानव के अधिकारों के प्रति सतत् जागरूकरता तभी तक बनी रह सकती है जब तक कि मीडिया अपनी भूमिका सार्थक ढंग से निभाता रहेगा।

मानवाधिकारों के रक्षण में मीडिया की तरह ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इसके समानांतर अपनी भूमिका निभा रहा है। जब कभी भी आयोग में कोई शिकायत पहुंचती है तो इस संस्थान की भरसक कोशिश यही रहती है कि शिकायतकर्ता की गरिमा को ठेस पहुंचाने का जो कुत्सित प्रयास हुआ है, उसे राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग अपने अनिवार्य हस्तक्षेप से दूर करने में सफल रहा है। अभी तक हजारों मामले देश में मानवाधिकार हनन के ऐसे उजागर हुए हैं जो मीडिया की सक्रियता के कारण सभी के समक्ष आ सके और जिन्हें स्वतः संज्ञान में लेकर उन पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी ओर से कड़ी कार्रवाही की है।एक उदाहरण यहां दृष्टव्य है, नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन की अपनी एक पुस्तक में चीन और भारत को लेकर की गई तुलना का जिक्र किया जा सकता है। इन दोनों देशों के बीच स्वतंत्र होने में सिर्फ दो वर्षों का फांसला है। एक ओर चीन ने कई क्षेत्रों में तेजी से सामाजिक और आार्थिक विकास किया लेकिन वह एक क्षेत्र में भारत से बुरी तरह पिछड़ गया, वह था सूखे पर विजय पाना। चूंकि भोजन का अधिकार एक मानवाधिकार है। अगर लोग भूखे रहते हैं तो वह मानवाधिकार का हनन है। इस दृष्टि से इसे देखें तो भारत अपने यहां सूखे से इसलिए तेजी से निपट पाया क्योंकि यहां स्वतंत्र मीडिया है। स्वतंत्र मीडिया ने सूखे के संकट को खूब उजागर किया। जिससे सरकार को इस पर पर्याप्त ध्यान देना पड़ा। इस तरह कह सकते हैं कि मानवाधिकार के सतत विकास तथा संरक्षण में मीडिया अपना श्रेष्ठ योगदान दे रहा है।

मानव अधिकारों को लेकर मीडियाकर्मी कितने संवेदनशील हैं। उसे इस उदाहरण से भी समझा जा सकता है कि जब किसी राज्य में किसी के साथ अन्याय होता है तो इस उत्पीड़न की खबर तमाम अखबारों में प्रकाशित होती है, इसके प्रकाशित होने के बाद राज्य विधानसभा और लोकसभा-राज्यसभा के सदनों पर लम्बी बहस होती है, देश में आंदोलन, धरना-प्रदर्शन का दौर शुरू हो जाता है, परिणाम स्वरूप सरकार भरसक प्रयत्न करके दोषियों को सजा दिलाने के लिए प्रयास करती है। इस संदर्भ में दिल्ली घटित निर्भया काण्ड से लेकर अनगिनत उदाहरण गिनाए जा सकते हैं। यहां अन्य उदाहरणों की बात की जाए तो किसी के साथ हुए अत्याचार, बलात्कार, सरकारी उदासीनता, न्यायालयीन प्रकरणों में देरी इत्यादि कई प्रमुख विषयों को मीडिया लगातार उजागर कर रही है। जिसका परिणाम यह है कि आज देश की जनता कई मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतर चुकी है। समाज एक स्वर में अन्याय के प्रतिकार के लिए खड़ा होकर बोलने लगा है, उनके पक्ष में जिनसे कि सीधे और अप्रत्यीक्ष लोगों का कोई संबंध तक नहीं होता है। इसके कारण केंद्र और राज्य सरकारों को अपने नियमों में लगातार फेर बदल तक करने पड़ रहे हैं।स्वतंत्रता के बाद से यदि प्रमुख घटनाओं और मीडिया की भूमिका को एक नजर देखें तो यह मीडिया की लगातार मांग और सक्रियता का ही यह परिणाम था कि सन् 1950 आते-आते यह सुनिश्चित हो गया कि भारत का अपना संविधान लागू हो रहा है। जिसमें कि भारत के संविधान ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के साथ संप्रभुता संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना की। संविधान के खण्ड 3 में उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय मौलिक अधिकारों का विधेयक अन्तर्भूत है। यह शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से पूर्ववर्ती वंचित वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान भी करता है। इसके अलावा 1952 में आपराधिक जनजाति अधिनियम को पूर्ववर्ती आपराधिक जनजातियों को अनधिसूचित के रूप में सरकार द्वारा वर्गीकृत किया गया तथा आभ्यासिक अपराधियों का अधिनियम (1952) पारित हुआ। 1955 में हिन्दुओं से संबंधित परिवार के कानून में सुधार ने हिन्दू महिलाओं को अधिक अधिकार प्रदान किए। सन् 1958 में सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम, 1958 सरकार लेकर आई। इसके बाद भी जब देखा गया कि मानवाधिकार हनन के मामले कम नहीं हो रहे हैं तो सन् 1973 में भारत का उच्चतम न्यायालय केशवानन्द भारती के मामले में यह कानून लागू करता है कि संविधान की मौलिक संरचना (कई मौलिक अधिकारों सहित संवैधानिक संशोधन के द्वारा अपरिवर्तनीय है। जिसके बाद 1975-77 में भारत में आपातकाल की स्थिति-अधिकारों के व्यापक उल्लंघन की घटनाएं घटीं। संपूर्ण देश में इसका विरोध हुआ। भारत सहित दुनिया का शायद ही कोई देश होगा जहां इसका विरोध न हुआ हो। सभी ओर व्यापक स्तर पर इस कालखण्ड को कव्हरेज मिला।

सन् 1978 में मेनका गांधी बनाम भारत संघ के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह कानून लागू किया कि आपात-स्थिति में भी अनुच्छेद 21 के तहत जीवन (जीने) के अधिकार को निलंबित नहीं किया जा सकता है। इसी समय जम्मू और कश्मीर जन सुरक्षा अधिनियम, 1978 प्रकाश में आया। इसके पांच साल बाद 1984 के वर्ष में ऑपरेशन ब्लू स्टार और उसके तत्काल बाद देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या किए जाने से सिख विरोधी दंगे चहुंओर भड़क उठे थे। इस समय मीडिया ने अपना संवेदनात्मरक कव्हरेज किया और कई सिख परिवारों को बचाने, उनके मानवाधिकार सुरक्षित रख पाने में अपना भरसक योगदान दिया।देश में सन् 1985 में शाहबानो मामला सामने आया, जिसमें उच्चतम न्यायालय ने तलाक-शुदा मुस्लिम महिला के अधिकार को मान्यता प्रदान की थी ने मौलानाओं में विरोध की चिंगारी भड़का दी। उच्चतम न्यायालय के फैसले को अमान्य करार करने के लिए राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिमा (तलाक पर अधिकार का संरक्षण) अधिनियम 1986 पारित किया। हालांकि इससे मुस्लिम महिलाओं के मानवाधिकारों का हनन हुआ है, किंतु यह निर्णय देश की चुनी हुई सरकार का था। भले ही इस निर्णय के आ जाने के बाद मुस्लिम उलेमाओं में खुशी का माहौल है और जो अब तक बना हुआ है। लेकिन मीडिया ने समान आचार सहिंता का मुद्दा जोर-शोर के साथ उठाया हुआ है और यह भी कि जब हिन्दू महिलाओं को संवैधानिक स्तर से अपार अधिकार दिए जा सकते हैं तो मुस्लिम महिलाओं को यह अधिकार क्यों नहीं मिलने चाहिए ? तब से लेकर अब तक यह बात लगातार मीडिया अपने स्तर पर उठा रहा है।

1989 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 पारित किया गया। जब 1989 में कश्मीर से कश्मीरी पंडितों का नस्ली तौर पर सफाया किया जा रहा था, हिन्दू मंदिर नष्ट-भ्रष्ट किए जा रहे थे, इस्लाम को मानने वाले जब कश्मीर में हिन्दुओं और सिखों की हत्या तथा विदेशी पर्यटकों और सरकारी कार्यकर्ताओं का अपहरण कर रहे थे, तब भी मीडिया ने इन सभी विषयों को प्रमुखता से देश की आम जनता के सामने रखा था। 1992 के दौरान संविधानिक संशोधन ने स्थानीय स्व-शासन (पंचायती राज) की स्थापना तीसरे तले (दर्जे) के शासन के ग्रामीण स्तर पर की, जिसमें महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीट आरक्षित की गईं। साथ ही साथ अनुसूचित जातियों के लिए प्रावधान किए गए। यह सब भी इसलिए हुआ क्योंकि मीडिया लगातार इस बात की मांग कर रहा था। देश में एक बड़ी घटना 1992 में घटी, बाबरी ढाचा ध्वस्त कर दिया गया, परिणामस्वरूप देश भर में दंगे हुए। मानवाधिकारों का जितना उल्लंघन हो सकता था, इस समय में हुआ। मीडिया ने हर परिस्थिति पर अपनी नजर रखी और व्यापक कव्हरेंज के द्वारा शासन-प्रशासन को जमीनी जानकारी उपलब्ध कराने के साथ आम जनता के बीच आपसी शांति स्थापित करने की दिशा में कार्य किया। उसके बाद देश की राष्ट्रीय सरकार ने 1993 में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना की।यह मीडिया के द्वारा मानवाधिकार से जुड़ा प्रश्न ही था कि वर्ष 2001 में उच्चतम न्यायालय ने भोजन का अधिकार लागू करने के लिए व्यापक आदेश जारी किए। 2002 के दौरान जब गोधरा कांड हुआ और निरीह हिन्दू रामभक्त कारसेवकों को ट्रेन में आग लगाकर मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा जलाकर मार दिया गया था और जिसके परिणाम स्वरूप गुजरात में चहुंओर हिंसा ने अपना ताण्डव शुरू कर दिया था, तब मीडिया उन सभी के जीवन में किसी रोशनी से कम नहीं था जो चारो ओर से दंगाइयों से घिरे हुए थे। मीडिया की त्वरित सूचनाओं के कारण राज्य-प्रशासन कई लोगों की जान बचाने और उन्हें फिर से मुख्यधारा में लाने में सफल रहा। आम तौर पर देखा गया है कि सांप्रदायिक दंगों के बाद प्रभावितों की चिंता करने वाला कोई नहीं रहता है। भारतीय मीडिया ऐसे सभी लोगों की आज आवाज बना हुआ है। शासन भी लगातार इस प्रकार की दिखाई जाने वाली घटनाओं के बाद जागता है और प्रभावितों की मदद के लिए भरसक प्रयत्न करने आगे आता है।

मीडिया ने लोकहित में यह बात भी लगातार उठाई कि क्यों नहीं सरकारी जानकारियां आम होना चाहिए। जब सभी कुछ सरकार जनता के लिए करती है तो यह जानना भी जनता का हक है कि आखिर उसकी सरकार कर क्या रही है और यदि कोई कार्य समय पर पूरा नहीं होता या उसमें भ्रष्टाचार हुआ है तो सिर्फ यह कहने से काम नहीं चलने वाला कि यह गोपनीय है। इस दौरान यदि किसी के मानवाधिकारों का भी हनन हुआ है तो वह भी सामने आना चाहिए और भविष्य में ऐसा न हो, यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए। लगातार की यह मीडिया की उठाई मांग एवं विभिन्न सरकारी विभाग की कार्यप्रणाली दिखाने का परिणाम था कि 2005 में देश में एक सशक्त सूचना का अधिकार अधिनियम पारित हुआ, जिससे कि सार्वजनिक अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में संघटित सूचना तक आम नागरिक की पहुंच हो गई। इसी साल दूसरा बड़ा निर्णय देशवासियों के हक में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एनआरईजीए) का आना है जो रोजगार की सार्वभौमिक गारंटी प्रदान करता है। इसी प्रकार मीडिया लगातार पुलिस की नौकरी कर रहे लोगों के जीवन में भारी दवाब के केस उठाता रहा है, जिसके बाद इस बात को संज्ञान में लेकर वर्ष 2006 में उच्चतम न्यायालय ने भारतीय पुलिस की मानवाधिकारों के प्रति अपर्याप्त व्यवस्थाओं को रेखांकित करते हुए प्रतिक्रिया स्वरूप पुलिस सुधार के आदेश जारी किए। इस निर्णय के आने के बाद से पुलिस की सेवा में कार्यरत लोगों को बहुत कुछ राहत मिल सकी है। मानवाधिकारों के हनन को लेकर दुनिया के तमाम देशों की तरह ही भारत में मानव तस्करी का लगभग 12 मिलियन अमेरिकी डॉलर का अवैध व्यापार है। हर साल अनुमानतः 10,000 नेपाली महिलाएं वाणिज्यिक यौन शोषण के लिए भारत लायी जाती हैं। प्रति वर्ष औसतन 20 हजार से 25 हजार महिलाओं और बच्चों की बांग्लादेश से अवैध तस्करी हो रही है। मीडिया लगातार इनके मानवाधिकारों के लिए आवाज उठा रहा है।ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट के अनुसार, अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लोगों के साथ भारत में लगातार भेदभाव, बहिष्कार, एवं सांप्रदायिक हिंसा के कृत्य हो रहे हैं। भारतीय सरकार द्वारा अपनाए गए कानून और नीतियां सुरक्षा के मजबूत आधार प्रदान करती हैं, लेकिन स्थानीय अधिकारियों द्वारा ईमानदारी से कार्यान्वित नहीं हो रही है। मीडिया आज इनकी भी एक मुखर आवाज है और इन सभी के मानवाधिकारों के हनन को रोकने में अपनी कारगर भूमिका अदा कर रहा है।

वस्तुतः 1990 में आरम्भ हुए उदारीकरण के कारण मीडिया पर निजी नियंत्रण फलने-फूलने के साथ-साथ स्वतंत्रता बढ़ गई और सरकार की अधिक से अधिक तहकीकात करने की गुंजाइश हो गई। इसके अलावा, हाल के वर्षों में प्रसार भारती के अधिनियम जैसे पारित कानूनों ने सरकार द्वारा प्रेस पर नियंत्रण को कम करने में उल्लेखनीय योगदान किया है। जिसके बाद से मीडिया पहले से ओर मुखर हुआ है तथा जनता के मानवाधिकारों की चिंता व्यापक स्तर पर खोजपरकता के साथ कर रहा है।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz