लेखक परिचय

सुप्रिया सिंह

सुप्रिया सिंह

स्वतंत लेखिका

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odishaआमतौर पर कहा जाता है कि व्यक्ति जीवन मे तीन चीजों से हमेशा बचना चाहता है – पहला पुलिस , दूसरा कोर्ट और तीसरा अस्पताल  पर अब ऐसी परिस्थिति होती जा रही है कि ये तीनों ही व्यक्तियों से बचना चाहते है । कोर्ट एंव पुलिस मामलों की सुनवाई के लिए आती भीड़ से परेशान रहती हैं तो दूसरी तरफ भगवान कहे जाने वाले डॉक्टर अपने भक्तों को ही परेशान करने में लगे रहते हैं तो ऐसे मे भक्तों का परेशान होना भी लाजमी है । महँगे और प्राइवेट अस्पताल में तो डॉक्टरों की मनमानी प्रत्यक्ष रुप से चलती है लेकिन सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की इस मनमानी का स्वरुप प्रत्यक्ष रुप से बदलकर अप्रत्यक्ष हो जाता हैं और सरकारी डॉक्टर भी मनमानी के खेल मे कब प्राइवेट डॉक्टर बन जाते हैं पता ही नही चल पाता है । मरीज की आर्थिक स्थिति से तथाकथित भगवान स्वरुप डॉक्टर को कोई खास फर्क नहीं पड़ता है , वे तो अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए और मरीजों की आर्थिक स्थिति बिगाड़ने के लिए ऐसी दवाइँया लिखने से भी नही कतराते हैं जिनका विकल्प बतौर सस्ती दवाईयों के रुप में मौजूद हो । सस्ती दवाईयों को उपलब्ध कराने के लिए केन्द्र सरकार ने 2016 -17 के बजट मे खास प्रवधान भी किया है । प्रधानमंत्री जन औषधि योजना के तहत सस्ती दवाईयों को जरुरतमंद लोगों को उपलब्ध कराने के लिए 3 हजार सस्ती दवाईयों के स्टोर खोलने का लक्ष्य रखा गया है । सरकार ने एक नयी स्वास्थ्य सुरक्षा योजना शुरु करने का फैसला लिया है जिसके अन्तर्गत प्रति परिवार को एक लाख रुपये तक का स्वास्थ्य कवर प्रदान किया जाएगा । इस श्रेणी के अन्तर्गत 60 वर्ष और इससे अधिक आयु के लोगों को सम्मिलित किया गया है और ऐसे लोगों को 30 हजार रुपयें का एक अतिरिक्त टॉप पैकेज प्रदान किया जाएगा । पर इन सब व्यवस्था के बावजूद भी उम्मीद कम ही लगती है कि गरीब मरीजों को सस्ती दवाईयाँ उपलब्ध हो पाएंगी क्योंकि यहाँ शासन प्रशासन मे कई ऐसे लोग मौजूद हैं जो कई चरणों पर बतौर भ्रष्टाचाररुपी अपना कटोरा लिए बैठे रहते हैं जिसके कारण ये सस्ती दवाईयाँ कब महँगी दवाईयों के रुप मे बदल जाती हैं किसी को पता ही नहीं चल पाता है ।

अस्पतालों में भगवान स्वरुप डॉक्टरों का मरीजों के प्रति व्यवहार कई बार इतना खराब होता है कि मरीज की आधी बीमारी डॉक्टर के डर के कारण बाहर ही नही आ पाती है । डॉक्टर की परेशानी को भी समझा जा सकता है कि लगातार और दिन भर काम करने के पश्चात उनका धैर्य जवाब दे देता होगा लेकिन डॉक्टरों को भी समझना चाहिए कि उनकी एक मुस्कराहट से और थोड़े से सरल व्यवहार  के कारण मरीज की आधी बीमारी तो ऐसी ही खत्म हो जाएगी ।

अस्पताल की व्यवस्था और एम्बुलेंस व्यवस्था की स्थिति तो ऐसी लचर होती जा रही है कि मरीज एंबुलेंस की आस में ही दम तोड़ देता है । हाल-फिलहाल में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं जिसने साबित किया है कि देश मे कुछ सस्ता हो या न हो पर मौत बहुत सस्ती होती जा रही है । देश के सबसे बड़े राज्य और आने वाले चुनावों मे जिस राज्य के नतीजों पर सबका सबसे ज्यादा ध्यान जाने वाला है वह उत्तरप्रदेश अपने मंत्रियों की पॉकेट मनी पर 8 करोड़ तो खर्च कर सकता है लेकिन अस्तपाल में एंबुलेस सेवा के अभाव मे दम तोड़ते मरीजों के लिए एंबुलेस सेवा उपलब्ध नहीं करा पा रहा है । उत्तरप्रदेश की समाजवादी पार्टी तथाकथित समाजवाद को स्थापित करने के नाम पर 2016 – 17 के बजट में स्वास्थ्य पर दवाओं की खरीद के लिए 519 करोड़ की राशि सुनिश्चित की है जो 2015 – 16 के बजट की तुलना में 58 करोड़ अधिक है । बजट में स्वास्थ्य पर कुल 10386 करोड़ रुपए की व्यवस्था की गई है । चिकित्सकीय उपकरणों के क्रय के लिए 306 करोड़ रुपए का प्रवधान किया गया है ।  पर जनता तक यह सुविधाएँ समय पर पहुँच रही हैं कि नहीं इस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है और इन विषयों पर ध्यान तब ही केन्द्रित हो पाएगा जब मंत्री एंव विधयकों को अपने ऊपर धन खर्च करने से फुरसत मिले ।

यूपी तो यूपी है लेकिन ओडिशा राज्य की शासन व्यवस्था तो जैसे ठान कर बैठी है कि वे जब तक सरकारी एंबुलेस सेवा की फजीहत नहीं करा देगी तब तक चैन से नहीं बैठेगी । पिछले ही दिन ओडिशा से खबर आई थी कि वहाँ दाना माँझी नामक एक व्यक्ति को उसकी पत्नी का शव घर तक ले जाने के लिए अस्तपाल से एंबुलेस उपलब्ध नही कराई गई । जिस कारण गरीबी के मारे उस व्यक्ति को अपनी पत्नी के शव को अपने कन्धे पर रखकर ले जाना पड़ा , हालांकि बाद में घटना के संज्ञान मे आने पर मजिस्ट्रेट ने दाना माँझी की पत्नी के शव को घर तक पहुँचाने के लिए एंबुलेस की व्यवस्था करवाई थी परन्तु समय के साथ वहाँ की परिस्थितियाँ अभी तक नहीं बदली और स्थिति जस की तस बनी हुई है । इस बार राज्य भी वहीं है , कहानी भी वहीं है लेकिन कुछ बदला है तो वह है कहानी के पात्र का नाम । इस बार दाना माँझी के स्थान पर दीनबन्धु खेमंडु आ गये हैं । खेमंडु को एंबुलेंस तो मिली पर आधे रास्ते मे उसकी सात साल की बेटी की मौत हो जाने पर एंबुलेंस ने आधे रास्ते मे खेमंडु को उनकी बेटी के शव के साथ उतार दिया । जिस कारण मजबूर पिता को बेटी के शव को गोद मे रखकर गांव तक पैदल जाना पड़ा । कई बार एंबुलेंस व्यवस्था की स्थिति ऐसी बन जाती हैं कि ड्राइवर और उसके साथी मे मतभेद का खामियाजा मरीज को भुगतना पड़ता है ।

वक्त के साथ जरुरत है कि सरकार इस ओर ध्यान दे और सुधार के लिए केवल योजना बनाने के अतिरिक्त डॉक्टरों के व्यवहार मे सुधार के लिए उनको मानसिक रुप से सहयोग देने प्रयास करें और एंबुलेंस सेवा को एक निश्चित समय के अन्दर पहुँचाने के लिए कड़ाई से नियमों का पालन करवाएं ।

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