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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह बुधवार 15 फरवरी को नई दिल्ली में श्री राजीव रंजन प्रसाद के उपन्यास ‘आमचो बस्तर’ का विमोचन करेंगे। विमोचन समारोह कांस्टीटयूशनल क्लब के सभागृह में शाम पांच बजे आयोजित किया जाएगा। लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. प्रेम जनमेजय करेंगे। वरिष्ठ पत्रकार श्री एन.के. सिंह समारोह के विशेष अतिथि होंगे।

उपन्यास के लेखक श्री राजीव रंजन प्रसाद ने बताया कि यह उपन्यास नक्सल हिंसा और आतंक से जुझते बस्तर अंचल की कथा पर आधारित है। इसमें प्रयाग ऐतिहासिक काल, मिथक, इतिहास और वर्तमान काल को एक साथ प्रस्तुत किया गया है। उपन्यास में बस्तर अंचल की कला-संस्कृति, परम्परा और भाषा जैसे विषयों को स्पर्श करते हुए नक्सल हिंसा की वजह से इस अंचल के सामाजिक-आर्थिक विकास में हो रहे विपरीत प्रभावों पर भी प्रकाश डाला गया है। यह उपन्यास दो अलग-अलग कथानकों पर आधारित है। उपन्यास का पहला कथानक बस्तर के इतिहास को वर्तमान तक लाता है। इसमें आदिवासियों के लोकप्रिय राजा प्रवीरचंद भंजदेव की हत्या का भी प्रसंग शामिल किया गया है। उपन्यास का दूसरा कथानक प्रवीरचंद के बाद से वर्तमान समय तक की पृष्ठ भूमि पर आधारित है।

श्री प्रसाद ने बताया कि उपन्यास के प्रथम कथानक में प्राचीन बस्तर में नल, वाकाटक, नाग, गंग, काकतीय और चालुक्य वंश के शासनकाल, जिसमें मराठा आधिपत्य और ब्रिटिश आधिपत्य का समय भी शामिल है, में हुए विभिन्न सशस्त्र विद्रोहों और उनके पीछे के कारणों और भावनाओं की तलाश करता है। इसमें बताया गया है कि सैकड़ों वर्षों से बस्तर के आदिवासियों को अपनी लड़ाई लड़ते हुए इतनी समझ है कि उन्हें क्या चाहिए और शत्रु कौन है। वे अपनी लड़ाई स्वयं लड़ना जानते हैं। चाहे वह 1774 की क्रांति हो या 1859 को कोई विद्रोह। इसी तरह वर्ष 1774-1779 के हल्बा विद्रोह, वर्ष 1795 का भोपालपट्नम संघर्ष, वर्ष 1825 का परलकोट विद्रोह, वर्ष 1842-1854 का तारापुर विद्रोह, 1842-1863 का मेरिया विद्रोह, 1856-1857 का महान मुक्ति संग्राम, 1910 का महान भूमकाल और 1964 से 1966 की अवधि में महाराजा प्रवीरचंद के विद्रोह की कहानियां भी इसमें जोड़ी गई है।

लेखक का कहना है कि इतिहास और वर्तमान की कहानियों को जोड़ने पर ही आज के बस्तर की सही तस्वीर उभरकर आती है। उपन्यास में यह कोशिश की गई है कि घटनाओं का वर्णन करते हुए बस्तर अंचल के पर्यटन स्थल, वहां के सांस्कृतिक विशेषतओं, तीज-त्यौहारों, देवी-देवताओं, आस्था, परम्परा, लोक नृत्य, दशहरा आदि प्रसंगों का भी उल्लेख हो, ताकि पाठकों के मन में बस्तर अंचल की एक स्पष्ट तस्वीर उभर सके।

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